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भाजपा घोषणापत्र बनाम बजट : बात ज़्यादा, काम कम  
क्या भाजपा सरकार के पहले बजट में हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में किए गए बेतहाशा वादों की छाया नज़र नहीं आनी चाहिए थी?

 
सुबोध वर्मा
06 Jul 2019
Translated by महेश कुमार
budget 2019
Image Courtesy: NDTV

हाल ही में हुए लोकसभा चुनावों में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा ने अपने पहले कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाने के लिए जोरशोर से भरपूर अभियान चलाया था और वादा किया था कि अगर दोबारा चुने गए तो आगामी पांच वर्षों में और अच्छे दिन आएंगे। मतदाताओं- में से कम से कम 40-प्रतिशत - ने उनकी इस बात को स्वीकार किया और उन्हें वापस सत्ता में पहुंचा दिया। इसलिए, यह उम्मीद करना स्वाभाविक और तर्कसंगत होगा कि नई मोदी सरकार एक ऐस बजट पेश करेगी जो जनता के प्रति एक धन्यवाद प्रस्ताव की तरह होगा - जो लोगों से किए गए सभी वादों को ठोस रूप देगा।

हालांकि, नई वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 5 जुलाई को पेश किए गए बजट का अगर जल्दी से विश्लेषण किया जाए तो लगेगा कि जैसे उन्होंने सभी वादों को कालीन के नीचे दबा दिया है। उन्होंने पहले तो भाजपा को मिले विशाल जनादेश की सराहना की और फिर उसी जनादेश के आधार को एक-एक कर दफ़न कर दिया। आइए इस वादाखिलाफी के विहंगम दृश्य को देखते है :

कृषि

घोषणापत्र का वादा : “कृषि क्षेत्र की उत्पादकता में सुधार के लिए 25 लाख करोड़ रुपये का निवेश”

संभवतः यह वादा पांच साल के लिए है, इसलिए इस क्षेत्र में हर साल कम से कम साढ़े पांच लाख करोड़ रुपये का निवेश होना चाहिए। किसान कल्याण मंत्रालय के लिए कुल आवंटन1,30,485 करोड़ रुपये है। ऐसा प्रतीत होता है कि पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से यह काफी बढ़ गया है जो कि मात्र 67,800 करोड़ रुपये था। लेकिन यह उछाल मुख्य रूप से चुनावों से ठीक पहले शुरू की गई पीएम-किसान योजना की वजह से है, जिसके तहत सभी छोटे और सीमांत किसानों को आय सहायता के रूप में 6000 रुपये दिए जाएंगे। इससे कृषि उत्पादकता में तो कोई वृद्धि नहीं होगी, न ही यह देश में मौजूद गहरे कृषि संकट को हल कर पाएगा तो फिर इसे एक कागज़ी योजना माना जाएगा क्योंकि यह उस संकट को दूर नहीं कर पाएगी जिसने देश के आधे से अधिक किसानों को गिरती आय के कारण ऋणग्रस्त होने पर और बर्बाद होने के लिए मजबूर किया है।

घोषणापत्र का वादा : "एक तय समय-सीमा के भीतर देश में 100 प्रतिशत सिंचाई क्षमता को हासिल करने के लिए प्रधानमंत्री कृषि सिचाई योजना का विस्तार करना।"

यह एक महत्वपूर्ण वादा था क्योंकि आज भी देश का 55 प्रतिशत से अधिक कृषि उत्पादन वर्षा आधारित क्षेत्रों से होता है। सिंचाई प्रदान करने से लाखों किसानों की किस्मत बदल जाएगी। 2018-19 में, सिंचित क्षेत्रों को बढ़ाने के लिए इस योजना के लिए 4000 करोड़ आवंटित किए गए थे। मोदी सरकार इसमें से केवल 2955 करोड़ रुपये ही खर्च कर सकी। पिछले साल के आवंटन की तुलना में इस वर्ष, उन्होंने कुल 3500 करोड़ का आवंटन किया है, जो पिछले साल की तुलना में 12 प्रतिशत कम है। क्या इस तरह से बजट कम करके 100प्रतिशत सिंचाई की क्षमता को हासिल किया जा सकता है?

घोषणापत्र का वादा: "हम (यानी भाजपा सरकार) 2022 तक किसान की आय दोगुनी करने के वादे के लिए प्रतिबद्ध हैं और यदि आवश्यक हुआ तो इसके लिए अधिक संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे।"

घोषणापत्र ने अपने कार्यकाल के दौरान पहले किए गए इस वादे को फिर दोहराया, हालांकि इसमें बहुत प्रगति नहीं देखी गई है। लेकिन ऐसा कोई बजटीय उपाय भी नहीं है जो इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य की दिशा में काम करता दिखे। जैसा कि हमने ऊपर देखा, उनके कुछ खुद के वादों के लिए आवंटन पहले से ही अपर्याप्त हैं। यह सिर्फ एक और जुमला है।

राष्ट्रीय राजमार्ग और सड़क

घोषणापत्र का वादा : "हम राष्ट्रीय राजमार्गों के 60,000 किलोमीटर के निर्माण की योजना बना रहे हैं।"

नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के लिए बजट आवंटन वास्तव में पिछले वर्ष खर्च के मुकाबले  कम हो गया है! एनएचएआई के संशोधित अनुमानों के अनुसार, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने राजमार्ग निर्माण पर 37,321 करोड़ रुपये खर्च किए थे, उन्हें इस प्रक्रिया के लिए बहुत प्रशंसा भी मिली। इस वर्ष, आवंटन को 36,691 कर दिया गया है। क्या किसी को अंदाज़ा है कि कैसे वे इस घटे हुए आवंटन में उन हाईवे का निर्माण करेंगी जिनकी योजना की घोषणा उन्होंने की है।

घोषणापत्र का वादा: "ग्रामीण सड़कों के साथ 100 प्रतिशत गांवों को जोड़ने की योजना" और एक विशाल ‘ग्रामीण सड़क उन्नयन कार्यक्रम’ को अंजाम देना।

भाजपा के घोषणापत्र में 100 प्रतिशत गांवों को सड़कों से जोड़ने का वादा किया गया था। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के लिए पिछले साल बजटआवंटन 15995 करोड़ रुपये था, लेकिन सड़क परिवहन मंत्रालय केवल 11,129 करोड़ रुपये ही खर्च कर पाया। इस साल उन्होंने इसे 14,223 करोड़ रुपये का आवंटन कियाहै, यानी पिछले साल की तुलना में लगभग 1700  करोड़ रुपये कम है। सभी गांवों को सड़कों से कैसे जोड़ा जाएगा? वास्तव में, बीजेपी के घोषणापत्र ने वादा किया था कि वेग्रामीण विकास को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा केंद्रों, स्वास्थ्य केंद्रों, और बाजारों को दूरदराज के इलाकों से जोड़ने के लिए एक बड़े पैमाने पर  ‘ग्रामीण सड़क उन्नयनकार्यक्रम’ शुरू करेंगे। यह एक प्रशंसनीय उद्देश्य था क्योंकि सभी मौसम में बेहतर कनेक्टिविटी निश्चित रूप से जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद करेगी औरविपणन या व्यापार को बहुत आवश्यक कनेक्टिविटी प्रदान करेगी। लेकिन सीमित आवंटन के साथ ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा है।

सबके लिए जल

घोषणापत्र का वादा : "2024 तक हर घर में पीने के पानी का पाइप कनेक्शन होगा।"

यह अनुमान लगाया गया है कि सभी घरों में सुरक्षित पाइप द्वारा पेयजल उपलब्ध कराने के लिए कम से कम 60,000 करोड़ रुपये खर्च करने की आवश्यकता होगी, इसमें रखरखाव और कार्य बल की लागत शामिल नहीं थी। सभी को बताया गया कि, इस साल राष्ट्रीय पेयजल मिशन को 10,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। यहां तक कि अगर इसमें से हर साल एक समान राशि खर्च की जाती, तो भी यह 2024 करोड़ रुपये कम बैठती है। विशेष रूप से, पिछले साल तो, मोदी सरकार ने इस कार्यक्रम पर पूर्ण आवंटन भी खर्च नहीं किया था। इसके लिए 7000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे लेकिन केवल 500 करोड़ रुपये ही खर्च किए गए। अगर इस बार भी वे ऐसा ही करने वाले हैं, तो फिर वे अपने किए गए वादे पर औंधे मुँह गिरेंगे।

बुनियादी ढाँचा

घोषणापत्र का वादा : "2024 तक, बुनियादी ढांचा के क्षेत्र में 100 लाख करोड़ रुपये का पूंजी निवेश" किया जाएगा।

हालांकि "बुनियादी ढांचे" पर पूंजी निवेश/व्यय को अलग करना मुश्किल है, इसके लिए सरकार के कुल पूंजीगत व्यय पर एक नजर डालनी होगी। वर्तमान बजट कहता है कि 2019-20 में, यह कुल पूंजीगत व्यय के तहत 8,76,209 करोड़ रुपये खर्च करेगा। इसमें सभी प्रकार के पूंजीगत व्यय शामिल हैं जिनमें बुनियादी ढांचा खर्च भी इस सबका एक हिस्सा है। लेकिन इस दर पर, 2024 तक, उन्होंने लगभग 44 लाख करोड़ रुपये खर्च करने होंगे, जो वादा किए गए 100 लाख करोड़ रुपये के आधे से भी कम है। इसके अलावा, इस वर्ष के लिए 8.76 लाख करोड़ का पूंजीगत व्यय आंतरिक और अतिरिक्त बजटीय संसाधनों (IEBR) के रूप में जाना जाता है, जो लगभग 5.3 लाख करोड़ रुपये है। ये संसाधन मुनाफे, ऋण और इक्विटी के माध्यम से सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा उगाहे जाते हैं। इन्हे आमतौर पर सरकार द्वारा बड़े व्यय को वित्तपोषित करने के लिए उपयोग किया जाता है लेकिन हाल के वर्षों मेंIEBR का उपयोग सरकार द्वारा अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है क्योंकि कर राजस्व गिरने की सूरत में सरकार संसाधन जुटाने की कोशिश करती है। इसका मतलब है कि सार्वजनिक उपक्रमों को खोखला करना या राष्ट्रीय लघु बचत कोष (एनएसएसएफ) का उपयोग करना है- जिसका खामियाज़ा उन्हें ही भुगतना होगा। लेकिन वह दूसरी कहानी है।

संक्षेप में, आम चुनावों में एक निर्णायक जनादेश की महिमा के मद्देनज़र सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट, वास्तव में उन लोगों के चेहरे पर एक तमाचा है जिन्होंने इस तरह का जनादेश दिया है। यह उन वादों के आधार पर जीता हुआ वोट है जिन्हे चुनावों के कुछ महीनों के भीतर बेशर्मी से भुला दिया गया है। लोग इस धोखे को जल्द या देर से समझने के लिए मज़बूर हो जाएंगे।

 

 

 

 

 

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