NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
शिक्षा
संस्कृति
पुस्तकें
भारत
राजनीति
भारत माता कौन है?
'हु इज़ भारत माता' के नाम से प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने जवाहर लाल नेहरू के चुनिंदा लेखों और भाषणों का एक किताब के रूप में संकलन किया है। फ़र्ज़ी राष्ट्रवाद और भावुक भारत माता के नारे के इस दौर में उस व्यक्ति के चिंतन प्रक्रिया को पढ़ना और समझना बहुत अहम हो जाता है जिसके लिए भारत माता का अर्थ भारत का सारा अवाम है।
अजय कुमार
30 Jun 2019
#WhoIsBharatMata का विमोचन
फोटो : ट्विटर

साल 1936, भारत की आजादी की लड़ाई का दौर, एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जनता से यह सवाल पूछते हैं कि भारत माता कौन है (अंग्रेजी में कहे तो 'हु इज़ भारत माता') ? और आप लोग किसकी जीत होते हुए देखना चाहते हैं? और ऐलान करते हुए जवाब देते हैं कि यहाँ के पर्वत, नदियां, मैदान और जंगल स्वाभाविक तौर पर सबको प्रिय हैं। लेकिन अंततः  इस विशाल भूमि पर फैले भारत के लोग भारत माता हैं। यहाँ के करोड़ो लोग भारत मता हैं। इनकी जीत होनी चाहिए, इन लोगों की जीत होनी चाहिए। 
#WhoIsBharatMata2.jpg
इस रिपोर्ट की शुरुआत करने से पहले यहां भारत माता का उल्लेख करना इसलिए जरूरी था ताकि पाठक समझ पाएं कि उन्हें टूटते हुए भारत के इस दौर में किस विषय से रूबरू होना है। 'हु इज़ भारत माता' के नाम से हिंदी के प्रसिद्ध प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने नेहरू के चुनिंदा लेखों और भाषणों का एक किताब के रूप में संकलन किया है। यह किताब अंग्रेजी में है। अब यहां यह मत सोचने लगिएगा कि हिंदी का एक प्रोफेसर अंग्रेजी में क्यों और कैसे लिख सकता है? बस समझिये ज्ञान की गंगा है जहां से बहे उसका पी लेना चाहिए। पुरुषोत्तम अग्रवाल के शब्दों में कहूं तो हमें मूर्खता और जड़ता से बचने के लिए अपने इग्नोरेंस या अज्ञानता को दूर करते रहना चाहिए। किताब स्पीकिंग टाइगर प्रकाशन से छपी है। किताब की कीमत 500 रुपये है। और इससे मिलने वाली कीमत कितनी होगी यह आप पढ़कर तय कीजियेगा।  
इस किताब का विमोचन शनिवार, 29 जून को दिल्ली के जवाहर भवन में हुआ। विमोचन करने के लिए मंच पर पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, पत्रकार सीमा मुस्तफा और जाने-माने इतिहासकार महेश रंगराजन की मौजूदगी रही। सभी ने एक साथ पुस्तक का विमोचन किया और बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ा।  

WhatsApp Image 2019-06-30 at 2.26.02 PM.jpeg

बातचीत के कुछ हिस्से -
इस दौर की सरकार हमें अपने इतिहास को भूल जाने का पाठ पढ़ा रही है। उसके द्वारा नेहरू भारत में मौजूद कई दोषों के लिए गुनहगार के तौर पर पेश किए जाते हैं। लेकिन वही शासन यह भूल जाता है कि उसके ‘सबका साथ और सबका विकास’ के नारे में नेहरू का  विचार मौजूद है। उस नेहरू का जो भारत माता में भावुकता की बजाय हिंदुस्तान की पूरी जमात को शामिल करता था। नेहरू के लेकर कई तरह के भ्रम फैलाये जाते हैं जैसे कि वह हिन्दू विरोधी थे, भारतीय संस्कृति विरोधी थे, पश्चिम से बहुत अधिक प्रभवित थे। जबकि यह पूरी तरह से झूठ है। नेहरू ने एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर तो जीवन जिया ही है लेकिन लिखा भी बहुत कुछ है। उनके पूरे भाषणा और उनकी नीतियां इतिहास में दर्ज हैं। उन सबको पढ़ने के बाद वह सारे आरोप सिरे से खारिज हो जाते हैं जो नेहरू पर लगाए जाते हैं। 
नेहरू भारतीयता की जड़ों में बहुत गहरे स्तर पर समाए हुए इंसान हैं। बहुत गहरे स्तर पर जुड़ाव करने का मतलब यह नहीं होता कि हम अपनी संस्कृति की आलोचना न करें और उसमें बदलाव करने की पहल न करे। बहुत गहरे स्तर पर जुड़ाव का मतलब यह होता है कि हम बहुत गहरा लगाव रखने के साथ-साथ अपनी संस्कृति में मौजूद कमियों की आलोचना भी करते रहें। नेहरू के लेखन से पता चलता है कि उन्होंने भारतीय संस्कृति के हर हिस्से पर लिखा। भारतीय दर्शन से लेकर भारत के प्रचीन इतिहास पर, भारत की खोज करते हुए जनमानस की आम संस्कृति से लेकर आम जनमानस की रुचियों और जिंदगियों पर, अशोक से लेकर अकबर तक , भारत की कला से लेकर भारत के प्राचीन गणित पर, हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता से लेकर मजदूरों पर गरिमा पर। ये सारे विषय बताते हैं कि नेहरू में भारतीय संस्कृति के प्रति गहरा लगाव था। इस लगाव ने गहरा अध्येता बनाया। और एक अध्येता जिस तरह से कमियों को उजागर करता है और खूबियों को अपना लेता है, ठीक वैसे ही उन्होंने काम किया। इस तरह से नेहरू को भारत विरोधी कहने वाले भूल जाते हैं कि नेहरू ने भारत के लिए जितना लिखा उतना वे अपनी पूरी जिंदगी में कभी पढ़ नहीं पाएंगे।  
नेहरू को हिन्दू विरोधी का भी तमगा दिया जाता है। हिन्दू विरोधी कहने वाले कहते हैं कि नेहरू खुद को एक्सीडेंटल हिन्दू कहते थे। इसलिए हिन्दू विरोधी हैं। जबकि यह अकाट्य सत्य हैं। हमारी सारी जन्मजात पहचानें एक्सीडेंटल होती हैं। हम खुद यह नहीं चुनते कि हम हिन्दू के घर जन्म लेंगे या मुसलमान के घर।  
नेहरू को पश्चिम समर्थक बताया जाता है। लेकिन वह गाँधी के अनुनायी हैं। गाँधी ने खुद कहा था कि मैं जिसे सिद्धांत में प्रस्तावित करता हूँ, उसे नेहरू व्यवहार में लागू करने की काबिलियत रखते हैं। नेहरू भी पश्चिम ही नहीं दुनिया के सारे ज्ञान भंडार को अपनी जरूरत का हिस्सा मानते हैं। जहां कहीं से भी सीखा जा सकता है, वहां से सीखा जाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हमने अपने जमीन  गंवा दी। या भारतीयता छोड़ दी।  
नेहरू की धर्मनिरपेक्षता राजनीति में राजनीतिक सिद्धांतों को स्वीकार करती थी न कि धार्मिक भावनाओं को। यानी राजनीति में जनता से जुड़ाव के लिए धर्म की कोई मध्यस्थता नहीं होगी। नेहरू के विरोधी वही हैं, जो राजनीति में धर्म की मध्यस्थता चाहते हैं। जिन्होंने हिन्दू धर्म में सुधारों का विरोध किया। जो नेहरू के हिन्दू कोड बिल के विरोधी थे, जिससे औरतों को भी उत्तराधिकारी बनने का हक मिलता था। उन सबने नेहरू का विरोध किया जिन्होंने ईश्वरचंद्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय जैसे समाज सुधारकों का विरोध किया। या यह कहा जाए कि इनका विरोध नेहरू से केवल इसलिए था क्योंकि हिन्दू धर्म की कमियों को बाहर निकालने की बात करते थे। 
पूर्व राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने नेहरू पर बात रखते हुए नेहरू के लिए महशूर राजनीतिक विश्लेषक रजनी कोठरी की राय का उल्लेख किया। रजनी कोठरी ने नेहरू पर कहा था कि नेहरू का सबसे बड़ा योगदान यह नहीं है कि उन्होंने पंचशील और गुटनिरपेक्षता जैसे सिद्धांत अपनाये या पंचवर्षीय योजनाओं की नीति अपनायी बल्कि उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने इस तरह से शासन व्यवस्था चलाई कि बहुत मजबूत सरकारी संस्थान बन सके। यह नेहरू का भारत के लिए बहुत बड़ा योगदान है। आज चरमराती हुई संस्थाओं के दौर में हम इसकी अहमियत समझ सकते हैं।  

WhatsApp Image 2019-06-30 at 2.29.18 PM.jpeg
नेहरू के लिए इतिहासकार महेश रंगराजन के शब्द भी गौर करने लायक हैं। रंगराजन ने कहा कि नेहरू ने अपने दौर में फासीवादी ताकतों को नकार दिया। मार्क्सवाद से सीखा और लोकतंत्र को उन्नत करने की कोशिश की।  
इन बातों के साथ अंत करते हुए एक बार फिर से किताब पर चलते हैं कि 'हु इज़ भारत माता' और यह किताब आपको क्यों पढ़नी चाहिए? तो जवाब सीधा है कि फर्जी राष्ट्रवाद और भावुक भारत माता के नारे के इस दौर में उस व्यक्ति के चिंतन प्रक्रिया को पढ़ना और समझना बहुत अहम हो जाता है जिसके लिए 'हु इज़ भारत माता' का अर्थ भारत का सारा अवाम है। जो स्वंत्रता सेनानी है और आज़ाद भारत की चुनौतियों को सँभालने के लिए भारत के अवाम द्वारा चुना हुआ भारत का पहला प्रधानमंत्री रहा हो। 

#Nehru
Jawaharlal Nehru
#WhoIsBharatMata
Bharat Mata
bharat mata ki jai
Purushottam Agrawal
Hamid Ansari

Related Stories


बाकी खबरें

  • fark saaf hai
    सत्यम श्रीवास्तव
    फ़र्क़ साफ़ है- अब पुलिस सत्तासीन दल के भ्रामक विज्ञापन में इस्तेमाल हो रही है
    04 Jan 2022
    पिछले कुछ सालों से देश के शीर्ष नेतृत्व द्वारा अपने ही देश के नागरिकों को ‘कपड़ों से पहचानने’ की जो युक्ति ईज़ाद की है उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि पूरी मंशा से भाजपा ने इस विज्ञापन में दंगाई व्यक्ति…
  • Constitution of India and Privatization
    प्रभात पटनायक
    भारतीय संविधान की मूल भावना को खंडित करता निजीकरण का एजेंडा
    04 Jan 2022
    भारत में सार्वजनिक क्षेत्र का निर्माण कई कारणों से किया गया था। मसलन, देश के कच्चे माल संसाधनों का नियंत्रण विदेशी पूंजी से छुड़ाकर, देश के हाथों में लाने के लिए, जैसे तेल क्षेत्र में। 
  • mental health
    शिरीष खरे
    महामारी में किशोरों का बिगड़ा मानसिक स्वास्थ्य; कैसे निपटेगी दुनिया!
    04 Jan 2022
    पिछले सप्ताह यूनिसेफ ने अपनी एक महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट सार्वजनिक की। रिपोर्ट में यह चेतावनी दी गई है कि कोविड-19 के कारण बड़ी संख्या में बच्चों और किशोरों की एक बड़ी आबादी का मानसिक स्वास्थ्य बिगड़ गया…
  • Vasudhaiva Kutumbakam
    राम पुनियानी
    वसुधैव कुटुम्बकम: भारत को फिर से एक कैसे करें? 
    04 Jan 2022
    2022 में, याद रखें कि भारतीय राष्ट्रवाद ने हमें सांस्कृतिक समृद्धि और समन्वित धारणाओं की ताकत दी है।
  • namaj
    सतीश भारतीय
    खुले में नमाज़ के विरोध को लेकर गुरुग्राम निवासियों की प्रतिक्रिया
    04 Jan 2022
    खुले में नमाज के विरोध को लेकर गुरुग्राम निवासियों की प्रतिक्रिया में मुस्लिमों के प्रति गढ़ी गई कई तरह की धारणाएं साफ तौर पर सामने आती हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License