NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
समाज
भारत
राजनीति
भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियां और जलियांवाला बाग नरसंहार के 100 साल
“आज देश जिन हालात का सामना कर रहा है, आज से 100 साल पहले 13 अप्रैल 1919 में ब्रिटिश शासन में जलियांवाला बाग में हमारी जनता को उन्हीं हालात का सामना करना पड़ा था। फर्क सिर्फ यही था कि...”
न्यूज़क्लिक डेस्क
13 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Patrika

जलियांवाला बाग नरसंहार को आज 100 बरस हो गए हैं। इस मौके पर ऑल इंडिया पीपुल्स फोरम (एआईपीएफ) ने जनता के नाम एक अपील जारी की है। इसमें कहा गया है, “ऐसे महत्वपूर्ण समय में जबकि हमें कुछ ही दिनों बाद नई लोकसभा का गठन करना है, जरूरी है कि देश के लोकतंत्र-संविधान और संस्कृति पर हो रहे हमलों का एकजुटता से मुकाबला करें और फासीवादी ताकतों को परास्त करें।”

एआईपीएफ के जॉन दयाल, विजय प्रताप, किरन शाहीन, प्रेम सिंह गहलावत, मनोज सिंह और गिरिजा पाठक की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि आज देश जिन हालात का सामना कर रहा है, आज से 100 साल पहले 13 अप्रैल 1919 में ब्रिटिश शासन में जलियांवाला बाग में हमारी जनता को उन्हीं हालात का सामना करना पड़ा था। फर्क सिर्फ यही था कि उस दौर में विदेशी शासन में जनता जुल्म सितम का सामना कर रही थी और आज अपने ही देश के फासीवादी शासन में देश की जनता-लोकतंत्र और संविधान के सामने गंभीर चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। हम जलियांवाला बाग के शहीदों को श्रद्धांजलि देते हुए इस बात को महसूस करते हैं कि जलियांवाला बाग के शहीदों और उस घटना से प्रेरणा लेने वाले क्रांतिकारी उस समय देश के भीतर जिन परिस्थितियों का सामना कर रहे थे और उसके खिलाफ संघर्ष करते हुए क्रांतिकारियों ने जिस विचार को रेखांकित किया था वह आज हमारे लिए भी पूर्णतः प्रासंगिक है।

बयान में कहा गया है कि आइए, हम जलियांवाला बाग कांड से पूर्व स्थितियों का पुनरावलोकन कर लें जिससे हमारा  एहसास ज्यादा मजबूत होता है कि वर्तमान दौर में किस तरह से फासीवादी शासन हमले के लिए 'फूट डालो और राज करो' की उसी नीति का पालन कर रहा है। जिसके चलते समाज का सबसे कमजोर हिस्सा -अल्पसंख्यक-दलित-महिलाएं-किसान-मजदूर और लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखने वाले सबसे ज्यादा हमलों का सामना कर रहे हैं। यही नहीं भगतसिंह ने देश में आमूलचूल परिवर्तन की जिस लड़ाई को लड़ते हुए कहा कि '... यह लड़ाई तब तक चलती रहेगी जब तक कि शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिकों की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है - चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति या सर्वथा भारतीय ही हों, उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी कर रखी है.... ।

जलियांवाला बाग कांड की पृष्ठभूमि में भारतीय समाज में सभी धर्म-संप्रदायों में एकता बढ़ रही थी वह अंग्रेजी शासकों को अपने लिए खतरे की घंटी लग रहा था। जलियांवाला बाग पर हाल ही में प्रकाशित किम वैगनर की किताब बताती है कि अप्रैल 9, 1919 को राम नवमी थी - उस दिन डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल की गिरफ्तारी के खिलाफ जनता को हिन्दू मुस्लिम एकता के नारे लगाते हुए और मुसलमानों को राम नवमी के जुलूसों में शामिल देख कर ब्रिटिश शासकों को 1857 के दोहराए जाने का भय सताने लगा।

100 वर्ष पहले 'हिंदू मुस्लिम एकता' के नारे से जिस तरह ब्रिटिश शासक घबराते थे और ऐसे नारों को 'राजद्रोह' मानते थे। उसी तरह सन् 1925 में जन्में RSS-यानी संघ के नेता भी 'हिन्दू मुस्लिम एकता' के नारों के खिलाफ लिखते थे। इसके विपरीत जलियांवाला बाग के शहीदों से और 1857 और गदर आंदोलन के गदरियों से प्रेरित क्रांतिकारी धारा के प्रतीक भगत सिंह, हिंदू मुस्लिम एकता की ज़रूरत पर लोगों को सचेत कर रहे थे। वास्तविक आजादी के लिए संघर्षरत नायकों ने दंगा व नफरत फैलाने वालों के देश विरोधी और अंग्रेज प्रेमी चरित्र को उन्‍होंने अच्‍छी तरह से समझ लिया था। इसीलिए डॉ. अंबेडकर ने भी बॉम्बे असेंबली में मज़दूर आंदोलन पर दमन के खिलाफ बोलते हुए कहा था कि 'अंग्रेज़ तो खुल कर कह रहे हैं कि भारत के लोगों को 'होम रूल' - स्वशासन - दे दो क्योंकि अगर अंग्रेज़ शासक भारत के लोगों पर फायरिंग का आदेश देंगे तो अंग्रेज़ों के खिलाफ जनाक्रोश बढ़ेगा, पर अगर भारतीय मूल के शासक दमन करेंगे तो ऐसा नहीं होगा, वे हमारी ढाल बन जाएंगे! डॉ अंबेडकर ने कहा कि मैं ऐसी आज़ादी, ऐसा स्वशासन नहीं चाहता जिसमें भारतीय शासक अंग्रेज़ों जैसा ही दमनकारी बर्ताव करें और भारत की जनता पर गोली बरसाएं।

जलियांवाला बाग कांड के 100 वर्ष होने पर हमें सोचना होगा कि संघ और भाजपा क्यों हिंदू मुस्लिम एकता के लिए काम करने वालों को देशद्रोही-राजद्रोही कहते हैं, और दंगाइयों को देश भक्ति का सर्टिफिकेट देते हैं? आज संघ, भाजपा, मोदी-योगी सब 'बांटो और राज करो' वाले अंग्रेज़ों के शासन वाले मॉडल पर चल रहे हैं। यही वे 'काले अंग्रेज़' हैं जिनके खिलाफ भगत सिंह ने हमें सचेत किया था।

जलियांवाला बाग के शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि तब होगी जब हम हिंदू मुस्लिम एकता तोड़कर नफरत फैलाने वाली संघी-भाजपाई ताकतों को पराजित करेंगे। अंग्रेज़ों के ज़माने से चले आ रहे काले कानूनों - जैसे राजद्रोह, AFSPA, UAPA आदि - को रद्द करेंगे। किसानों मज़दूरों आदिवासियों पर, कश्मीर की जनता पर जब पुलिस फायरिंग होती है तो जलियांवाला बाग के शहीदों की विरासत हमसे पूछती है - क्या आज के काले अंग्रेज़, उस समय के गोरे अंग्रेज़ों के रास्ते पर नहीं चल रहे हैं? इस रास्ते को बदल डालिए!

jallianwala bagh hatyakand
100 years of jallianwala bagh massacre
Save Nation
Save Democracy
save constitution
2019 आम चुनाव
General elections2019
2019 Lok Sabha Polls
BJP-RSS
Narendra modi
Hindutva
AIPF

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

जन-संगठनों और नागरिक समाज का उभरता प्रतिरोध लोकतन्त्र के लिये शुभ है

लखनऊ विश्वविद्यालय: दलित प्रोफ़ेसर के ख़िलाफ़ मुक़दमा, हमलावरों पर कोई कार्रवाई नहीं!

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!

दो दिवसीय देशव्यापी हड़ताल को मिला व्यापक जनसमर्थन, मज़दूरों के साथ किसान-छात्र-महिलाओं ने भी किया प्रदर्शन


बाकी खबरें

  • अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: अधिकारियों ने जामिया मस्जिद में महत्वपूर्ण रमज़ान की नमाज़ को रोक दिया
    29 Apr 2022
    प्रशासन का कहना है कि प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जामिया में इबादत गुजारों के लिए व्यवस्था की समीक्षा करने के बाद सामूहिक इबादत को रोकने का ये निर्णय लिया गया है।
  • लाल बहादुर सिंह
    किधर जाएगा भारत— फ़ासीवाद या लोकतंत्र : रोज़गार-संकट से जूझते युवाओं की भूमिका अहम
    29 Apr 2022
    गहराता रोज़गार संकट और कठिन होती जीवन-स्थितियां भारत में फ़ासीवाद के राज्यारोहण का सबसे पक्का नुस्खा है। लेकिन तमाम फ़ासीवाद-विरोधी ताकतें एकताबद्ध प्रतिरोध में उतर पड़ें तो यही संकट समाज को रैडिकल…
  • ज़ाहिद खान
    इरफ़ान ख़ान : अदाकारी की इब्तिदा और इंतिहा
    29 Apr 2022
    29 अप्रैल 2020 को हमसे जिस्मानी तौर पर जुदा हुए इरफ़ान ख़ान अपनी लासानी अदाकारी से अपने चाहने वालों के दिलो ज़ेहन में हमेशा ज़िंदा रहेंगे।
  • एजाज़ अशरफ़
    क्यों धार्मिक जुलूस विदेशी भूमि को फ़तह करने वाले सैनिकों जैसे लगते हैं
    29 Apr 2022
    इस तरह के जुलूस, मुसलमानों पर हिंदुओं का मनोवैज्ञानिक प्रभुत्व स्थापित करने और उन्हें अपने अधीन करने के मक़सद से निकाले जा रहे हैं।
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में कोरोना के 3,377 नए मामले, 60 मरीज़ों की मौत
    29 Apr 2022
    दिल्ली में आज फिर कोरोना के मामलों में बढ़ोतरी हुई, दिल्ली में पिछले 24 घंटों में कोरोना के 1,490 नए मामले दर्ज़ किए गए |
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License