NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
मिरात-उल-अख़बार का द्विशताब्दी वर्ष: भारत का एक अग्रणी फ़ारसी अख़बार, जो प्रतिरोध का प्रतीक बना
विख्यात पत्रकार पी साईनाथ के अनुसार, मिरात-उल-अख़बार के द्वारा जिस प्रकार की गुणवत्ता और पत्रकारिता का प्रतिनिधित्व किया गया, वह समकालीन भारत के लिए पूर्व से कहीं अधिक प्रासंगिक है। 
सौरव कुमार
18 Apr 2022
Mirat-ul-Akhbar
मिरात-उल-अख़बार के संस्थापक और संपादक राजा राम मोहन रॉय। चित्र साभार डेक्कन हेराल्ड

एक ऐसे दौर में जब भारत को भाषाई आधार पर अधिरोपण करने और स्वतंत्र प्रेस पर हमलों की दोहरी मार से दो-चार होना पड़ रहा है, ऐसे में 12 अप्रैल को एक ऐतिहासिक दिवस के रूप में चिह्नित किया गया, जब भारत के पहले फ़ारसी अखबार मिरात-उल-अख़बार ने अपने 200 साल पूरे किये।

समाचार पत्र मिरात-उल-अकबर - जिसका शीर्षक ‘खबरों का आईना’ के रूप में अनुदित होता है - की स्थापना वर्ष 1822 में राजा राम मोहन रॉय के द्वारा कलकत्ता में की गई थी। इसे हर सप्ताह शुक्रवार के दिन प्रकाशित किया जाता था। 

1803-4 में, मोहन रॉय ने एकेश्वरवादियों को तुह्फत-उल-मुवाह्हिदीन नामक पुस्तक के रूप में अपना पहला मौलिक फ़ारसी लेखन पेश किया था। और फिर 1814 में उन्होंने धर्म के संभाषणों पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए अपनी दूसरी फ़ारसी पुस्तक, मोनोज़ेऔतुल आदियाँ लिखी। फ़ारसी भाषा पर उनकी अच्छी पकड़ ने संभवतः 1822 में उन्हें मिरात-उल-अखबार  की स्थापना के लिए प्रेरित किया।

इस साप्ताहिक के पहले अंक में राम मोहन ने लिखा, “इस अखबार का उद्देश्य इसके संस्थापकों या इसके शुभचिंतकों की प्रशंसा  करना या किसी को भी बदनाम करना नहीं था। इसके विपरीत इसका उद्देश्य सत्य तक पहुंचना है।” दूसरा अंक ब्रिटिश संविधान पर केंद्रित था।

सतीप्रथा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुरीतियों, धार्मिक कट्टरवाद के विरोध, और तार्किकता एवं विज्ञान पर जोर देने पर अख़बार के जोर ने सुधारक के बहुआयामी दृष्टिकोण का गठन किया। ऐसा माना जाता है कि राजा राममोहन रॉय पश्चिमी आधुनिक विचारों से प्रभावित थे और उन्होंने तर्कवाद और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने पर जोर दिया, जो उनके लेखन में श्रवण में गूंज को, चुंबक के गुणों, मछली के व्यवहार और गुब्बारे के विवरण जैसे विषयों के बारे में नजर आता है।

रॉय की प्रतिरोध की पत्रकारिता

तमिलनाडु के पीटी एमडीएम कॉलेज में इतिहास के अनुसंधान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉक्टर पी. थंगामुथु एक लेख में लिखते हैं: “राम मोहन की लोकप्रिय ईसाई धर्म, अंग्रेजी विदेशी नीति और आम लोगों के प्रति सार्वजनिक सड़कों पर ब्रिटिश धृष्टता पर संपादकीय आलोचना भारत में मौजूद ब्रितानी प्रशासन को इतनी जहरीली लगी कि उसे गटकना उसके लिए संभव नहीं रहा।”

थंगामुथु के लेख के अनुसार, रॉय की अन्य संपादकीय आलोचना ने एक नागरिक के साथ हुए क्रूर व्यवहार पर कैमिला के न्यायाधीश जॉन हैंस को लताड़ लगाई, जिसके चलते 1822 में सर्वोच्च न्यायालय में एक न्यायिक मुकदमा चला। अंग्रेज न्यायपालिका के एक उच्च अधिकारी के बरक्श में इस प्रकार का प्रभाव उस युग में यह अपनी तरह का विरला मामला था।

लेकिन अख़बार का कामकाज - जिसका अर्थ साम्राज्य के शासकों के लिए बड़ी परेशानी का सबब बना हुआ था- को शासकों की शत्रुता का खामियाजा भुगतना पड़ा। नए-नए प्रख्यापित प्रेस अध्यादेश ने स्वतंत्र प्रेस की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति को कम करने और विरोध के प्रतीक के तौर पर, मोहन रॉय को अध्यादेश के द्वारा निर्धारित अपमानजनक शर्तों के तहत अखबार को प्रकाशित कर पाने में असमर्थता का हवाला देते हुए 1823 में इस अखबार को बंद करना पड़ा।

मिरात-उल-अख़बार ने उन दिनों जिस चीज को अपनाया था वह प्रतिरोध था - जो आज के दिन काफी हद तक नदारद है। विख्यात पत्रकार पी साईनाथ के अनुसार, मिरात-उल-अख़बार के द्वारा जिस प्रकार की पत्रकारिता की गुणवत्ता और किस्म का प्रतिनिधित्व किया गया वह समकालीन अधिक प्रासंगिकता लिए हुए है।  ब्रिटिश राज के दौरान लिखा गया संपादकीय, जो सर्वोच्च न्यायालय  मी एक न्यायाधीश को मुकदमे में घसीटने में कामयाब रहा, वह अपने आप में एक कड़ी टक्कर देने वाली पत्रकारिता थी। संपादकीय के साथ मोहन रॉय के अखबार की प्रस्तावना में कहा गया था कि इसमें प्रायोजक की प्रशंसा का गायन नहीं होगा, जो कि विरोध करने की उनकी इच्छा की ओर इशारा करता है। रॉय की पत्रकारीय नैतिकता पर टिप्पणी करते हुए साई नाथ ने उल्लेख किया कि जिस इंसान ने देश में ‘सती’ प्रथा का अंत किया, उसने सती प्रथा के समर्थकों को जवाब देने का अधिकार देने की बात नहीं की - जो कि दमन करने वालों या इसके पक्ष में खड़े लोगों के लिए जवाब देने के अधिकार के आज के मॉडल के विपरीत है। हमारे समय में तो असहमति की पत्रकारिता ही मूल्यवान पत्रकारिता है।

फ़ारसी का महत्व

18 वीं शताब्दी के दौरान फ़ारसी का इस्तेमाल अभी भी एक अदालती भाषा के साथ-साथ पढ़े-लिखे लोगों, बुद्धिजीवियों और देश की शीर्ष नीति निर्माताओं के बीच में  उपयोग में लिया जा रहा था। भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी या फारसी भाषा का परिचय 13वीं शताब्दी में मध्य एशियाई  फ़ारसी शासकों के द्वारा किया गया था। साहित्य एवं दर्शन के क्षेत्र में  इस भाषा की अच्छी प्रतिष्ठा थी -  ठीक उसी तरह जैसे कि आधुनिक भारत में अंग्रेजी भाषा को हासिल हुई है। संचार और साहित्य में एक महत्वपूर्ण योगदान देने के बाद,19वीं शताब्दी के अंत में इस भाषा का स्थान अंग्रेजी ने ले लिया था। इसके बावजूद इसने न सिर्फ  हिंदी और उर्दू भाषा की शब्दावली में हजारों शब्दों का योगदान दिया है, बल्कि बंगाली मराठी और गुजराती भाषा को भी समृद्ध बनाया है।

फारसी भाषा को प्रासंगिक बनाये रखने और उसकी लौ को जलाए रखने की धुन में, कलकत्ता में ईरान सोसायटी ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।  77 साल पुराने फ़ारसी अध्ययन केंद्र की स्थापना एक प्रख्यात फारसी विद्वान मोहम्मद इशाक के द्वारा की गई थी। 1938 से लेकर 1940 के बीच में लंदन में स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज में अपने अध्ययन के दौरान वे ईरान सोसायटी, लंदन के संपर्क में आए, जो फारसी अध्ययन को बढ़ावा देने के काम में लगी हुई थी। और उसके बाद भारत लौटने पर उन्होंने शहर में इसी प्रकार की सोसाइटी की स्थापना की। ईरान सोसायटी  पिछले 75 वर्षों से बिना किसी रूकावट के एक त्रैमासिक पत्रिका को प्रकाशित कर रही है। इसके द्वारा छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है और सम्मेलन आयोजित किए जाते हैं।

डॉ चौधरी जो कि काउंसिल ऑफ़ इरान सोसायटी और इंडो-ईरानी पत्रिका के संपादकीय बोर्ड के सदस्य हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि भारत का मध्ययुगीन इतिहास फारसी भाषा में उपलब्ध है, जिसे संरक्षित किये जाने की आवश्यकता है।

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bicentenary Year of Mirat-ul-Akhbar: India’s Pioneering Persian Newspaper that Embodied Resistance

Raja Ram Mohan Roy
Mirat-ul-Akhbar
p sainath
Iran Society
Persian
British Rule

Related Stories


बाकी खबरें

  • tree
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु के चाय बागान श्रमिकों को अच्छी चाय का एक प्याला भी मयस्सर नहीं
    15 Mar 2022
    मामूली वेतन, वन्यजीवों के हमलों, ख़राब स्वास्थ्य सुविधाओं और अन्य कारणों ने बड़ी संख्या में चाय बागान श्रमिकों को काम छोड़ने और मैदानी इलाक़ों में पलायन करने पर मजबूर कर दिया है।
  • नतालिया मार्क्वेस
    अमेरिका में रूस विरोधी उन्माद: किसका हित सध रहा है?
    15 Mar 2022
    संयुक्त राज्य अमेरिका का अपनी कार्रवाइयों के सिलसिले में सहमति बनाने को लेकर युद्ध उन्माद की आड़ में चालू पूर्वाग्रहों को बढ़ाने का एक लंबा इतिहास रहा है।
  • डॉ. राजू पाण्डेय
    डिजिटल फाइनेंस: कैशलेस होती दुनिया में बढ़ते फ़्रॉड, मुश्किलें भी आसानी भी..
    15 Mar 2022
    हर साल 15 मार्च के दिन विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष कंज़्यूमर इंटरनेशनल के 100 देशों में फैले हुए 200 कंज़्यूमर समूहों ने "फेयर डिजिटल फाइनेंस" को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस की थीम…
  •  Scheme Workers
    न्यूज़क्लिक टीम
    क्यों आंदोलन की राह पर हैं स्कीम वर्कर्स?
    14 Mar 2022
    हज़ारों की संख्या में स्कीम वर्कर्स 15 मार्च यानि कल संसद मार्च करेंगी। आखिर क्यों हैं वे आंदोलनरत ? जानने के लिए न्यूज़क्लिक ने बात की AR Sindhu से।
  • Modi yogi
    अजय कुमार
    आर्थिक मोर्चे पर फ़ेल भाजपा को बार-बार क्यों मिल रहे हैं वोट? 
    14 Mar 2022
    आख़िर किस तरह के झूठ का जाल भाजपा 24 घंटे लोगों के बीच फेंकने काम करती है? जिससे आर्थिक रूप से कमजोर होते जा रहे राज्यों में भी उसकी सरकार बार बार आ रही है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License