NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कृषि
भारत
राजनीति
बिहार : छोटी अवधि के सीज़न में धान की कम ख़रीद से दुखी किसान
बिहार के किसानों ने मांग की है कि सरकार ख़रीद की अवधि को फ़रवरी या मार्च तक बढ़ाए क्योंकि ऐसा पहले भी होता रहा है।
मोहम्मद इमरान खान
22 Jan 2021
Translated by महेश कुमार
बिहार : संक्षिप्त मौसम में धान की धीमी ख़रीद से दुखी किसान
Image Courtesy: The Indian Express

पटना: ऐसे समय में जब किसान दिल्ली की सीमा के चारो ओर तीन कृषि-क़ानूनों के खिलाफ एकजुट होकर आंदोलन कर रहे हैं, तब बिहार में धान पैदा करने वाले किसान बहुत दुखी हैं क्योंकि सरकारी एजेंसियों ने अब तक 45 लाख टन धान खरीद के लक्ष्य का लगभग 40 प्रतिशत ही खरीदा है। इस साल 31 जनवरी तक इसकी खरीद की आधिकारिक तारीख है और धान की खरीद मीन बमुश्किल दस दिन बचे हैं, इससे छोटे, सीमांत और बड़े किसान सभी संकट में पड़ गए है।

सहकारिता विभाग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, राज्य सरकार की एजेंसियों ने किसानों से 21 जनवरी तक कुल 17,20,380 लाख टन धान की खरीद की है। इस प्रक्रिया के लिए लगभग 2.5 लाख धान पैदा करने वाले किसानों का पंजीकरण किया गया था।

सरकारी एजेंसियों ने धान की खरीद को धीमाँ कर दिया है जिससे किसान काफी चिंतित हैं क्योंकि राज्य सरकार ने खरीद की अवधि/समय को कम कर दिया है। जबकि पहले, 31 मार्च तक खरीद होती थी, और इस बार इस साल के अंत तक खरीद की प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाएगा। उन्होंने बताया कि, 'आमतौर पर धान की खरीद मार्च तक चलती है, लेकिन इस साल सरकार ने जनवरी के अंत तक ही खरीद करना तय किया है। इसका हमारे ऊपर भारी असर पड़ेगा, ”पटना जिले के बिहटा ब्लॉक के रहने वाले एक किसान कमलेश सिंह ने दुखी मन से बताया। 

अधिकांश किसान खरीद के समय को कम करने के सरकार के फैसले को समझने में पूरी तरह से विफल हैं। दिसंबर 2020 में सरकार ने घोषणा की थी कि वह हमेशा की तरह धान की खरीद करेगी, लेकिन बाद में एक नोटिस जारी कर कहा कि धान की खरीद अब 31 जनवरी तक ही की जाएगी। धान खरीद के मामले में इस तरह की यह पहली समय सीमा है। 

बिहार के कृषि मंत्री अमरेन्द्र प्रताप सिंह ने बताया कि फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्णय लिया गया है। "सरकार का इरादा किसानों की मदद करना है," उन्होंने कहा। हालांकि, जब उनसे इस तथ्य पर टिप्पणी करने को कहा गया कि दो-तिहाई से अधिक धान की आधिकारिक खरीद जनवरी के बाद की जाती हैं- मुख्य रूप से फरवरी और मार्च में- तो वे चुप्पी साध गए। 

पटना के पालीगंज ब्लॉक के एक अन्य किसान बाल्मीकि शर्मा ने बताया कि सरकार ने पालीगंज के किसानों से 30 से 40 प्रतिशत धान की खरीद मुश्किल से की है। उन्होंने कहा कि बाकी की खरीद अगले दस दिनों में संभव नहीं है। उन्होंने आगे जोड़ते हुए बताया कि, "अब यह संभव नहीं है क्योंकि समय कम है और सरकार का अपने खरीद के लक्ष्य को हासिल करना एक बड़ी चुनौती होगी।"

किसानों के सामने अब 1,200 से 1,300 रुपये प्रति क्विंटल के बीच खुले बाजार में व्यापारियों को धान बेचने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। उन्होंने बताया, "यह इस तथ्य के बावजूद ये सब हो रहा है कि सरकार ने धान की एमएसपी 1,888 रुपए प्रति क्विंटल तय की है।"

शर्मा, एक किसान संगठन- पालीगंज बिटरानी कृषक समिति के सचिव भी हैं और उन्होने मांग की है कि सरकार धान की खरीद का समय फरवरी-मार्च के अंत तक बढ़ाए। उन्होंने उल्लेख किया कि कम से कम 15 प्रतिशत किसानों का धान कटाई के बाद अभी भी खेत में पड़ा है और बेचने के लिए तैयार नहीं है। 

दिसंबर में, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्य में धान खरीद की सीमा को बढ़ाया और कुल खरीद लक्ष्य को 30 लाख टन से बढ़ाकर 45 लाख टन कर दिया था, तो किसान काफी आशान्वित हो गए थे। शर्मा ने बताया, "लेकिन बिचौलियों और अधिकारियों की मजबूत सांठगांठ के कारण यह घोषणा विफल हो गई।"

शर्मा की भावनाओं को बिहटा के किसान नेता आनंद कुमार ने भी साझा किया। उन्होंने कहा कि किसानों के लिए एमएसपी सुनिश्चित करने के लिए सरकार को धान खरीद की तारीख को मार्च तक बढ़ा देना चाहिए।

कृषि विभाग के अधिकारियों के अनुसार, किसानों से धान खरीदने और मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद यह सब सुनिश्चित करने के लिए दो "विशेष" अभियान चलाए गए थे। पहला अभियान 29 से 31 दिसंबर के बीच चलाया गया था, जबकि दूसरा अभियान 7 से 9 जनवरी के बीच चला।  हालांकि, खरीद अभी भी धीमी है।

बिहार की प्राथमिक कृषि सहकारी समितियां (PACS) और व्यापर मंडल प्रत्येक पंचायत में किसानों से सीधे धान खरीदने के काम में लगे हुए हैं। यह सब इस बात को सुनिश्चित करने के लिए किया गया है ताकि किसानों को उनकी फसलों का उचित दाम मिल सके। 

राज्य में 15 नवंबर से धान खरीद की प्रक्रिया शुरू होनी थी लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों के कारण देरी हुई। वास्तव में औपचारिक खरीद दिसंबर के पहले सप्ताह में शुरू हुई थी। 

राज्य के सहकारी विभाग के एक अधिकारी ने स्वीकार किया है कि धान की खरीद काफी धीमी है। 

पिछले खरीफ के सीजन (2019-20) में, कोविड-19 महामारी के कारण खरीद की समय सीमा 31 मार्च से 30 अप्रैल तक बढ़ा दी गई थी और बिहार करीब 2.50 लाख किसानों से लगभग 20 लाख मीट्रिक टन धान खरीदने में कामयाब रहा था। हालांकि, उस वर्ष से पहले, सरकारी एजेंसियों ने 30 लाख मीट्रिक टन के लक्ष्य के मुकाबले 2.10 लाख किसानों से 14.16 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद की थी।

किसानों को एमएसपी मिलने का सीएम का दावा भी झूठा है। विडंबना यह है कि केंद्र सरकार जिन तीन कृषि-क़ानूनों के माध्यम से जो करने का प्रयास कर रही है, वह बिहार सरकार 14 साल पहले ही कर चुकी है। उनके नेतृत्व वाली पहली एनडीए सरकार ने 2006 में बिहार की कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियम को रद्द कर दिया था। 

इसके बाद, यह दावा किया गया था कि इससे किसानों को बड़ा लाभ होगा: उन्हें उपज के अच्छे दाम मिलेंगे और यह कृषि के बुनियादी ढांचे में भारी निजी निवेश को आकर्षित करेगा।

पिछले साल बिहार में सरकार ने एमएसपी पर गेहूं खरीद काफी कम दर्ज की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2020-21 के रबी विपणन सीजन में बिहार में सात लाख टन के संशोधित लक्ष्य के मुकाबले, केवल 0.05 लाख टन गेहूं की खरीद की गई थी। जबकि 2019-20 में, राज्य सरकार की एजेंसियों ने मात्र 0.03 लाख टन गेहूं की खरीद की थी।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, बिहार की 12 करोड़ की कुल आबादी का लगभग दो-तिहाई हिस्सा अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। इनमें से ज्यादातर छोटे और सीमांत किसान हैं। इसके अलावा, राज्य में लगभग दो-तिहाई से अधिक कृषि का काम बारिश पर निर्भर हैं।

राज्य सरकार के आंकड़ों के अनुसार, कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो 81 प्रतिशत  कार्यबल को रोजगार देती है और राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 42 प्रतिशत पैदा  करती है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Bihar: Slow Paddy Procurement in Truncated Season Leaves Farmers Unhappy

Bihar
Bihar Paddy Procurement
Bihar Farmers
Bihar APMCs
Farm Laws
Nitish Kumar

Related Stories

युद्ध, खाद्यान्न और औपनिवेशीकरण

बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर

किसान-आंदोलन के पुनर्जीवन की तैयारियां तेज़

किसान आंदोलन: मुस्तैदी से करनी होगी अपनी 'जीत' की रक्षा

बिहार: कोल्ड स्टोरेज के अभाव में कम कीमत पर फसल बेचने को मजबूर आलू किसान

सावधान: यूं ही नहीं जारी की है अनिल घनवट ने 'कृषि सुधार' के लिए 'सुप्रीम कमेटी' की रिपोर्ट 

ग्राउंड रिपोर्ट: कम हो रहे पैदावार के बावजूद कैसे बढ़ रही है कतरनी चावल का बिक्री?

राजस्थान: अलग कृषि बजट किसानों के संघर्ष की जीत है या फिर चुनावी हथियार?

ख़बर भी-नज़र भी: किसानों ने कहा- गो बैक मोदी!

पीएम के 'मन की बात' में शामिल जैविक ग्राम में खाद की कमी से गेहूं की बुआई न के बराबर


बाकी खबरें

  • budget
    अजय कुमार
    बजट के नाम पर पेश किए गए सरकारी भंवर जाल में किसानों और बेरोज़गारों के लिए कुछ भी नहीं!
    01 Feb 2022
    बजट हिसाब किताब का मामला होता है। लेकिन भाजपा के काल में यह भंवर जाल बन गया है। बजट भाषण में सब कुछ होता है केवल बजट नहीं होता।
  • nirmla sitaraman
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बजट में अगले 25 साल के लिये अर्थव्यवस्था को गति देने का आधार: सीतारमण
    01 Feb 2022
    आमजन ख़ासकर युवा को नए आम बजट में न अपना वर्तमान दिख रहा है, न भविष्य, लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि केंद्रीय बजट ने समग्र और भविष्य की प्राथमिकताओं के साथ अगले 25 साल के लिये…
  • cartoon
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बजट में मध्यम वर्ग के साथ विश्वासघात और युवाओं की जीविका पर प्रहार: विपक्ष 
    01 Feb 2022
    “सरकार ने देश के वेतनभोगी वर्ग और मध्यम वर्ग को राहत नहीं देकर उनके साथ ‘विश्वासघात’ और युवाओं की जीविका पर ‘आपराधिक प्रहार’ किया है।”
  • kanpur
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव: ' बर्बाद होता कानपुर का चमड़ा उद्योग'
    01 Feb 2022
    अपने चमड़े के कारोबार से कानपुर का नाम पूरी दुनिया में मशहूर है। लेकिन आज चमड़ा फैक्ट्री अपने पतन की ओर है। चमड़ा व्यापारियों का कहना है कि इसका एक बड़ा कारण सरकार द्वारा गंगा नदी के प्रदूषण का हवाला…
  • varansi weavers
    दित्सा भट्टाचार्य
    यूपी: महामारी ने बुनकरों किया तबाह, छिने रोज़गार, सरकार से नहीं मिली कोई मदद! 
    01 Feb 2022
    इस नए अध्ययन के अनुसार- केंद्र सरकार की बहुप्रचारित प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (पीएमयूवाई) और प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) जैसी योजनाओं तक भी बुनकरों की पहुंच नहीं है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License