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महामारी से जुड़ी अनिश्चितताओं के बीच 2022-23 का बजट फीका और दिशाहीन
यह बजट उन लाखों भारतीयों के सामने पेश हो रही समस्याओं को लेकर जागरूकता की भयानक कमी को दिखाता है, जिनकी आय और आजीविका बेतरह प्रभावित हुई है।
वी श्रीधर
02 Feb 2022
nirmala sitharaman

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को संसद में 2022-23 का अपना केंद्रीय बजट पेश कर दिया और इसके साथ ही एक 'धूम-धड़ाके' वाले इस बजट को लेकर जो प्रचार-प्रसार चल रहा था, वह तेज़ी से हवा हो गया। प्रचार-प्रसार इस उम्मीद के इर्द-गिर्द केंद्रित था कि उनके इस चौथा बजट में उन लोकलुभावन रियायतों का तड़का होगा, जो उत्तर प्रदेश सहित पांच चुनावी राज्यों के मतदाताओं को आकर्षित करेंगे, लेकिन बहुत जल्द ही यह साफ़ हो गया कि इस बजट में न तो कुछ नया था और न ही चल रहे ढर्रे को दुरुस्त करने की कोई इच्छा ही दिखायी दी, जिससे कि महामारी के चलते होने वाले व्यापक संकट का समाधान हो सके। रणनीतिक नज़रिये से यह बजट उस अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पटरी पर लाने पर ज़्यादा दांव लगाते हुए दिखता है, जिसका चरित्र ज़बरदस्त ग़ैर-बराबरी वाला रहा है।

आम तौर पर अपने ग़ैर-मामूली लंबे-लम्बे बजट भाषणों के लिए जानी जाने वाली वित्त मंत्री ने यह संकेत दे दिया कि इस बजट में पूंजीगत परिव्यय में बढ़ोत्तरी की गयी है, जिससे अर्थव्यवस्था को रफ़्तार मिलेगी। दरअसल, आर्थिक सर्वेक्षण और वित्त मंत्री, दोनों ने इस बात का ज़िक़्र किया कि पूंजीगत परिसंपत्ति के निर्माण में सरकारी ख़र्च निजी क्षेत्र को भी इस खेल में खींच लायेगा।

लेकिन, जब बजट के काग़ज़ात उपलब्ध हुए, तो उसमें इस बात का कोई संकेत ही नहीं था कि इससे कुछ ख़ास होने वाला है। पता चला कि अगले वित्तीय साल के लिए अनुमानित पूंजीगत व्यय में 35% की बढ़ोत्तरी पर अनिश्चितता के बादल छाये हुए हैं, क्योंकि यह इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार किस तरह से पूंजीगत व्यय करती है।

एक फुटनोट में यह हक़ीक़त छिपी हुई है कि पूंजीगत व्यय के संशोधित अनुमानों का तक़रीबन 10% एयर इंडिया की ओर से किये जाने वाले बकाया ऋणों के निपटान के चलते था। ये अब एक विशेष प्रयोजन वाहन, एयर इंडिया एसेट्स होल्डिंग लिमिटेड के पास हैं।

2022-23 में पूंजीगत व्यय अब बढ़कर 7.50 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (MGNREGS) से 3.17 लाख करोड़ रुपये की और ज़्यादा परिसंपत्तियों के आने का अनुमान है। बजट पेपर में ही यह चेतावनी दी गयी है कि इस योजना के मांग-संचालित और पात्रता-आधारित होने के चलते यह तय है कि इन परिसंपत्तियों का मूल्य लक्ष्य से दूर हो सकता है। सहायता अनुदान की प्रकृति में होने के कारण कोई भी राजस्व आघात ऐसी परिसम्पत्तियों के सृजन को ख़तरे में डाल सकता है।

पूंजी परिव्यय को बढ़ावा देने का मिथक

विशिष्ट परिस्थितियों में 2022-23 के लिए अनुमानित 7.50 लाख करोड़ रुपये के परिव्यय में से 1.52 लाख करोड़ रुपये,यानी कि तक़रीबन 20% रक्षा सेवाओं के लिए पूंजीगत परिव्यय के रूप में निर्धारित किया गया है, जो कि सामान्य अर्थव्यवस्था से कुछ हद तक अलग होगा। रेलवे के लिए 137 लाख करोड़ रुपये (कुल पूंजी परिव्यय का तक़रीबन 18%) दिया गया है और सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के लिए एक बड़ा परिव्यय,यानी  1.88 लाख करोड़ रुपये (पूरी पूंजी परिव्यय का तक़रीबन एक-चौथाई) का प्रावधान किया गया है)।

सरकार की स्थित खराब है और सरकार ने यह उम्मीद पाल रखी है कि निजी निवेश किसी भी तरह से तो आयेगी ही,इस लिहाज़ से देखते हुए इन आवंटनों को कुछ संदेह की नज़रों से भी देखा जाना चाहिए। हक़ीक़त यह है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अपने दम पर परियोजनायें शुरू करने के लिए मजबूर इसलिए है,क्योंकि सड़क परियोजनाओं में निजी निवेश नहीं हो पा रहा है। इसके चलते उस पर काफ़ी कर्ज हो गया है। यह स्थिति और गहरी इसलिए होने जा रही है,क्योंकि इसके सड़क नेटवर्क का एक बड़ा हिस्सा नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन (NMP) के तहत निजी खिलाड़ियों को पेश किया जाना है, जो कि निजी खिलाड़ियों को भारी छूट पर बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय संपत्ति को पट्टे पर देने की परिकल्पना करता है।

पूरी तरह और अच्छी तरह से यह जानते हुए कि निर्मित परिसंपत्ति को रियायती दरों पर पट्टे पर दिया जायेगा,इसके बावजूद सरकार की ओर  से बड़े पैमाने पर यह निवेश विवेकपूर्ण मानदंडों और औचित्य के लिहाज़ से एक गंभीर बेपरवाही की ओर इशारा करता है। अब इस सिवसिले में ज़रा सरकार की दलील पर नज़र डालिए,जिसमें वह इसका औचित्य ठहराते हुए कहती है कि उसके पास सड़क नेटवर्क के विस्तार के लिए धन नहीं था और इसलिए, संसाधनों को जुटाने के लिए मौजूदा सड़क संपत्तियों से "राजस्व अर्जित" किया था। सवाल है कि आख़िर सही दिमाग़ वाला ऐसा कौन शख़्स होगा,जो मौजूदा संपत्तियों को पट्टे पर देना चाहेगा, जबकि नयी परिसंपत्तियां बाद में नीलाम होने वाली हैं ?

अहम बुनियादी ढांचे की लम्बे समय से अनदेखी

भारतीय रेलवे का मामला थोड़ा अलग है। नरेंद्र मोदी सरकार ने उस भव्य राष्ट्रीय आधारभूत संरचना पाइपलाइन (NIP) का अनावरण बड़ी ही धूमधाम के साथ किया था, जिसमें रेलवे भी शामिल था। रेलवे के लिए छह साल की अवधि में 13.69 लाख करोड़ रुपये के निवेश की योजना थी, जिसमें से 87%,यानी कि 11.90 लाख करोड़ रुपये बजटीय सहायता के रूप में आने वाले थे।

एनआईपी की शुरुआत के बाद हर साल बजटीय समर्थन उस लक्ष्य से पीछे रहा है, जिसे मोदी सरकार ने ख़ुद ही तय किया है। 2020-21 में सरकार की ओर से किया गया वास्तविक आवंटन 1.09 लाख करोड़ रुपये का था, जब एनआईपी ने 2.28 लाख करोड़ रुपये के आवंटन को रेलवे के पूंजी खाते के लिए बजटीय सहायता के रूप में की थी,जो कि आधे से ज़्यादा कम थी।

साल 2021-22 में संशोधित अनुमान बताते हैं कि पूंजी खाते में 1.17 लाख करोड़ रुपये की बजटीय सहायता दी जा रही है। लेकिन, तब यह भी अपने मायने खो देता है, जब इस तथ्य को इस लिहाज़ से देखा जाता है कि एनआईपी के हिस्से के रूप में इसके बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए बजटीय सहायता के रूप में 2.68 लाख करोड़ रुपये की राशि के प्रावधान किये जाने की ज़रूरत है।

साल 2022-23 में रेलवे के पूंजी खाते में आवंटन 1.37 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है, जबकि एनआईपी ने इस वित्तीय साल के लिए 2.38 लाख करोड़ रुपये की ज़रूरत का अनुमान लगाया था। इस तरह, रेलवे के बुनियादी ढांचे की लंबे समय से हो रही यह अनदेखी भारत के इस सबसे अहम वाहक में बरती जा रही कंजूसी में परिलक्षित होती है।यह आने वाले दिनों में इसके विस्तार के लिहाज़ से एक बड़ी बाधा है।

बुलेट ट्रेन जैसे चमकदार झुनझुनों को लेकर मोदी सरकार का लगाव कहीं ज़्यादा उन बुनियादी सवालों के साथ जुड़ पाने में उसकी नाकामी को दर्शाती है,जिन सावलों के दायरे में रेल पटरियों की कमी है, जिसके चलते इस सबसे अहम मार्गों में भारी भीड़ है, सिग्नल से जुड़े उपकरणों के आधुनिकीकरण में नाकामी और रेल संचालन से जुड़े दूसरे पहलू आते हैं। इस बजट में संदर्भ से काटकर बड़ी संख्या में चीज़ों को भ्रामक बना दिया गया है।

निष्पक्षता की भयानक अवहेलना

दो साल से ज़्यादा समय तक चली महामारी के असर से जूझ रहे आम लोगों के बड़े हिस्से की इस बजट में की गयी अनदेखी इसके आवंटन में भी दिखायी देती है। 2022-23 के लिए मनरेगा को लेकर किये गये आवंटन को चालू वर्ष के संशोधित अनुमानों के मुक़ाबले 25% से ज़्यादा कम कर दिया गया है। सही मायने में 2022-23 के लिए यह परिव्यय 2020-21 में किये गये वास्तविक आवंटन से 34% कम है।

देश के इस एकमात्र बड़े पैमाने पर चलाये जाने वाले इस रोज़गार कार्यक्रम को लेकर आवंटन में की गयी यह कमी पूरी तरह से अप्रत्याशित नहीं थी। वित्त मंत्रालय के अधिकारी हाल के दिनों में कहते रहे हैं कि ग्रामीण इलाक़ों में इस तरह के रोज़गार की "मांग" कम होती जा रही है; सचाई यह है कि उन्होंने इस बात का इस्तेमाल अर्थव्यस्था  के पटरी पर आने के एक सबूत के तौर पर किया है, जो कि इस तथ्य को दर्शाता है कि ग्रामीण इलाक़ों के जो लोग लॉकडाउन के दौरान और उसके बाद अपने-अपने घर वापस चले गये थे, अब शहरों और क़स्बों में वापस आ रहे हैं। यह संदेहास्पद दावा ग्रामीण भारत से आ रही उन मीडिया रिपोर्टों के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता है, जिसमें दिखाया जाता रहा है कि ग्रामीण भारत में यह संकट, ख़ासकर मज़दूरों के रोज़गार की कमी की बदहाली अब भी गंभीर है।

आर्थिक सर्वेक्षण और वित्त मंत्री के बजट भाषण,दोनों ही में महामारी के समय में शिक्षा के सामने पेश आयी समस्या का ज़िक़्र किया गया है। लाखों स्कूली बच्चों को स्कूल से बाहर कर दिया गया है, और ऑनलाइन सीखने का बहाने उन्हें ख़ुद का बचाव करना पड़ रहा है। इस बात को लेकर व्यापक सहमति है कि बच्चों की शिक्षा को एक ऐसा गंभीर झटका लगा है, जिसमें उनके जीवन के "खो चुके" सालों को वापस पाने के लिए तत्काल किसी सुधार की ज़रूरत है।

इस बजट की एक शुरुआत इससे अच्छी हो सकती थी, लेकिन ज़रा अंदाज़ा लगाइये कि वह शुरुआती क्या हो सकती थी ? 2021-22 के संशोधित अनुमानों से पता चलता है कि पिछले साल किये गये बजट आवंटन में कटौती की गयी थी। वित्त मंत्री ने उस साल के लिए अपने बजट से 15% अधिक आवंटित किया है, लेकिन अगर इस साल के बजट में कोई संकेत है, तो वह यही है कि इसका तात्कालिक असर हो सकता है। उच्च शिक्षा को भी महामारी का सामना करना पड़ा है, उसे भी ज़्यादा रक़म आबंटित नहीं की गयी। इस बात का कोई संकेत भी नहीं है कि सरकार उन लाखों लोगों को सक्षम बनाने को लेकर समाधान की किसी कार्रवाई की ज़रूरत को महसूस करती भी या नहीं,जिन्होंने महामारी में अपने जीने का आधार खो दिया है।

स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के लिए जो आवंटन किया गया है,उसकी स्थिति भी कंजूसी बरते जाने वाले इसी रवैये को दिखाता है। 2022-23 के लिए आवंटन सही मायने में चालू वर्ष के संशोधित अनुमानों से कम है। महामारी की अनिश्चितताओं को देखते हुए निश्चित रूप से यह एक ग़ैर-ज़िम्मेदाराना कार्रवाई है।

ख़र्च में कटौती का जोखिम

टैक्स के मोर्चे पर जो संख्या है,वह पहली नज़र में आकर्षक दिखायी देती है। पिछले साल पेश किये गये 2021-22 के बजट अनुमानों के मुक़ाबले केंद्र का शुद्ध कर राजस्व तक़रीबन 14% ज़्यादा है। लेकिन,हक़ीक़त यह है कि करों को हमेशा मौजूदा क़ीमतों के लिहाज़ से दर्शाया जाता है।लेकिन, मुद्रास्फीति के प्रभाव से यह अप्रभावित है और मुद्रास्फ़ीती इस समय भारत की एक वास्तविकता है।इस तरह,साफ़ है कि तस्वीर को आकर्षक बनाकर पेश किया गया है। सचाई यही है कि 2022-23 में केंद्र के कर राजस्व में तक़रीबन 9% की बढ़ोत्तरी का अनुमान है। लेकिन, मुद्रास्फीति को रोक पाने के लिहाज़ से अनिश्चित समय में यह किसी भी तरह से पर्याप्त राशि नहीं है। इसके अलावा, "पहले वाली स्थिति के वापस आने" की ग़ैर-बराबरी, ख़ासकर छोटे-छोटे व्यवसायों और आय और नौकरियां गंवा देने वाले परिवारों के बीच की इस ग़ैर-बराबरी का मतलब यही है कि किसी भी लिहाज़ से उनकी पहले जैसी स्थिति में आ पाने की कोई गारंटी नहीं है।

व्यय में यह अनुमानित बढ़ोत्तरी, जिसे वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने पहले जैसी स्थिति की वापसी को लेकर आधार के तौर पर इस्तेमाल किया है, वह सही मायने में वास्तविक रूप से हासिल होने वाले राजस्व पर निर्भर करती है।

इस बजट का यह अकल्पनीय दृष्टिकोण मोदी सरकार के उस वैचारिक पूर्वाग्रहों का नतीजा है, जो कि ज़्यादा से ज़्यादा टिकाऊ और व्यापक आधार वाली पहले की स्थिति की वापसी को सुनिश्चित करने वाले ज़्यादतर उपायों को खारिज करते हैं। मसलन, निवेश चक्र पहले की तरह वापस आ जाये,इसे शुरू करने के लिए एक स्पष्ट क़दम रूप में भारतीय रेलवे जैसे सार्वजनिक उद्यमों और उपक्रमों में सार्वजनिक निवेश का इस्तेमाल करना होगा। इन उपक्रमों में निवेश से इन्हें पटरी पर लाने को सुनिश्चित करने की दिशा में ज़्यादा लक्ष्यगत दृष्टिकोण सुनिश्चित होता, जो कि ज़्यादा टिकाऊ भी होता।

इस सचाई को देखते हुए कि इन समयों में रिकवरी शुरू करने में ख़र्च किये जाने वाले एक-एक रुपये का समान असर नहीं होगा, इसे उन तरीक़ों से ख़र्च करने का मतलब तब होता, जब नौकरियों से होने वाली आय और आजीविका के मामले में इसका ज़्यादा  से ज़्यादा असर पैदा होता। संक्षेप में, इस तरह से किसी भी तरह की कार्रवाई से यह सुनिश्चित होता कि सरकार ने अपने पैसों की ज़्यादा क़ीमत पायी है। लेकिन, उन ताक़तों को कौन बताये, जो कि किसी भ्रम को बेचने पर आमादा हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

 https://www.newsclick.in/budget-2022-23-lacklustre-and-directionless-amid-pandemic-uncertainties

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