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घटना-दुर्घटना
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दिल्ली की फ़ैक्ट्रियों में लगातार जलते मज़दूर, कौन लेगा ज़िम्मेदारी?
यह पूरी घटना कैसे घटी और क्या इससे बचा जा सकता था? इन मज़दूरों की दर्दनाक मौत का जिम्मेदार कौन है? मज़दूर ऐसी जगहों पर किन परिस्थतियों में काम करते हैं? इन सवालों के जवाब समझने के लिए न्यूज़क्लिक की टीम ने घटनास्थल का दौरा कर पीड़ित मज़दूरों, स्थानीय लोगों, प्रत्यक्षदर्शियों और सरकारी अधिकारियों से बात की।
न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
09 Dec 2019
delhi fire

8 दिसंबर 2019 को दिल्ली की रानी झाँसी रोड की मॉडल बस्ती के अनाज मंडी इलाक़े में आग लगने से सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ अभी तक 43 मज़दूर मारे गए हैं और कई अन्य घायल हैं। परन्तु वहाँ काम करने वाले अन्य मज़दूरों और स्थानीय और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 100 से अधिक मज़दूर मारे जा चुके हैं। ये पिछले दो दशकों में फ़ैक्ट्री में आग लगने की सबसे बड़ी घटना हैं। यह घटना रविवार सुबह 5 बजे अनाज मंडी की संकरी गली में चार मंज़िल बिल्डिंग में घटी है। 

यह पूरी घटना कैसे घटी और क्या इससे बचा जा सकता था? इन मज़दूरों की दर्दनाक मौत का जिम्मेदार कौन है? मज़दूर ऐसी जगहों पर किन परिस्थतियों में काम करते हैं? 

इन सवालों के जवाब समझने के लिए न्यूज़क्लिक की टीम ने घटनास्थल का दौरा कर पीड़ित मज़दूरों, स्थानीय लोगों, प्रत्यक्षदर्शियों और सरकारी अधिकारियों से बात की।

उत्तरी दिल्ली के अनाज मंडी क्षेत्र में सोमवार सुबह फिर से उसी फ़ैक्ट्री में आग लग गई। दिल्ली अग्निशमन सेवा के अधिकारियों ने यह जानकारी दी है।

अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने बताया कि उन्हें सुबह सात बजकर 50 मिनट पर आग के बारे में सूचना मिली थी जिसके बाद दमकल के दो वाहनों को घटनास्थल पर भेजा गया। उन्होंने बताया कि इमारत में रखे कुछ सामानों में आग लग गई थी जिस पर 20 मिनट के भीतर क़ाबू पा लिया गया।

प्रशासन और पुलिस कार्रवाई 

दिल्ली पुलिस की एक टीम अपराध दृश्य की पुनर्रचना करने और 3डी लेज़र जांच तकनीक का इस्तेमाल कर सबूतों को एकत्रित करने के लिए उत्तरी दिल्ली के अनाज मंडी की उस इमारत में पहुंची जहां भयंकर आग लगने से 43 लोगों की मौत हो गई है।

आपको बता दें कि इस साल फ़रवरी में करोल बाग में अर्पित पैलेस होटल में लगी आग के बाद यह दूसरी बार है जब पुलिस आग लगने की किसी घटना की जांच करने के लिए इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही है।

अनाज मंडी की फ़ैक्ट्री के मालिक को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में रखा गया है। पुलिस ने रेहान और फ़ुरकान की हिरासत की मांग की जिसे मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट मनोज कुमार ने मंज़ूर कर लिया।

पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर उनके ख़िलाफ़ ग़ैर इरादतन हत्या और आग के संदर्भ में लापरवाह रवैया अपनाने के लिए भादंसं की संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया था। मामला अपराध शाखा के पास भेज दिया गया है।

इसके अलावा दिल्ली सरकार ने अग्निकांड की जांच के लिए मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए थे और सात दिनों के अंदर रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा। 1997 में हुए उपहार अग्निकांड के बाद यह सबसे भीषण आग त्रासदी थी।

फ़ैक्ट्री थी या मज़दूरों के लिए मौत घर!

इस बिल्डिंग में कई तरह की फैक्ट्रियां चल रही थीं। इसमें शीशे, जैकट, थैले, बैग और प्लास्टिक के खिलौने का काम होता था। इस फ़ैक्ट्री के दूसरे माले पर लगी आग पूरी ईमारत में फैल गयी।

जिस फैक्ट्री में आग लगी उसकी बनावट ऐसी थी, जिसमें छोटी सी घटना भी मज़दूरों की जान लेने के लिए काफ़ी है। रविवार की घटना तो एक भयावह स्थति से कम नहीं हैं। फ़ैक्ट्री से मज़दूरों के बाहर निकलने का एक ही गेट था। कई मज़दूरों के अनुसार फ़ैक्ट्री में बच्चे भी थे, कई मज़दूर दम घुटने से मरे हैं।

मज़दूरों ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा कि इस इलाक़े में आग लगाना आम बात है।2 महीने पहले भी रविवार को जिस फैक्ट्री में आग लगी है, उसके कुछ दूर वाली एक अन्य फैक्ट्री में आग लगने से 2-3 मज़दूरों की मौत हो गई थी।

मज़दूरों ने बातचीत के दौरान बताया कि इस पूरे इलाक़े में मज़दूर छह हज़ार से लेकर नौ हज़ार तक मासिक कमाते हैं। परन्तु इन सब के ऊपर मौत का साया हर समय लटकता रहता है। मालिक मुनाफ़े की हवस में कोई श्रम क़ानून लागू नहीं करते हैं। न न्यूनतम वेतन मिलता है, न इएसआई पीएफ़ और न ही फैक्टरियों में सुरक्षा के इंतज़ाम हैं। फैक्टरियों में कई बच्चे भी काम करते हैं। मज़दूरों ने यह भी दावा किया कि हर फैक्ट्री से प्रति बच्चे के हिसाब से पुलिस मालिक से हर महीने 500 रुपए वसूलती है। हर साल इन फैक्टरियों में गुमनाम तरीक़े से मज़दूर मारे जाते हैं परन्तु इसपर कोई बवाल नहीं होता है।

ज़िम्मेदारी किसकी?

दिल्ली में आग की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। लेकिन सवाल यह है की ये आग लग क्यों रही है? इनसे मरने वाले मज़दूरों की मौत का ज़िम्मेदार कौन है?

न्यूज़क्लिक से फ़ोन पर बात करते हुए दिल्ली अग्निशमन के अधिकारी ने जानकारी दी कि उन्हें रविवार सुबह इस घटना की जानकारी मिली और उसके बाद उन लोगों ने घटनास्थल पर जाकर लोगो को रेस्क्यू किया। उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि वहां आग से बचने के लिए किसी भी तरह का कोई भी सुरक्षा इंतज़ाम नहीं किया गया था। यह एक तरह से ग़ैरक़ानूनी तौर पर फ़ैक्ट्री चल रही थी।

जब हमने उनसे पूछा कि आप लोग ऐसी फ़ैक्ट्रियों पर कार्रवाई क्यों नहीं करते तो उन्होंने साफ़ तौर पर कहा, "हम केवल फ़ैक्ट्री या बिल्डिंग को नो ओब्जेक्शन सर्टिफ़िकेट देते हैं की यह बिल्डिंग सुरक्षित है या नहीं। इसके बाद यह जाँच करना कि फ़ैक्ट्री नियमों का पालन कर रही है या नहीं यह पता कर के कार्रवाई करने का काम हमारे पास नहीं हैं। इसकी ज़िम्मेदारी एमसीडी और दिल्ली पुलिस की है।"

नगर निगम ने इस फ़ैक्ट्री का पिछले हफ़्ते ही ‘‘सर्वेक्षण” किया था लेकिन ऊपर के मालों पर ताला लगा होने की वजह से पूरी इमारत का निरीक्षण नहीं हो पाया था। आधिकारिक सूत्रों ने यह जानकारी दी है।

एक सूत्र ने कहा, "अधिकारी फिर से इमारत का दौरा करने वाले थे और तदनुसार ऊपर के तलों का निरीक्षण करके कारण बताओ नोटिस जारी करने वाले थे।"

यह इमारत दिल्ली(विशेष प्रावधान) क़ानून, 2006 के तहत आती है जो अनधिकृत निर्माण को सील होने से बचाता है।

सूत्र ने कहा, “अधिकारियों को अगर यह इमारत दिल्ली के मास्टर प्लान के प्रावधानों के तहत घरेलू इकाई के तौर पर अनुमेय नहीं लगती तो इसे बंद कर दिया जाता।”

सभी सरकारी एजेंसी अपना अपना पल्ला झाड़ कर एक दूसरे पर दोषारोपण कर रही हैं। लेकिन सवाल उठता है कि इस दर्दनाक हादसे का ज़िम्मेदार कौन है? 

ज़िम्मेदारी तो कई एजेंसियों की है। लेकिन, देखा जाए तो प्रथमिक ज़िम्मेदारी एमसीडी है। ज़बरदस्त भ्रष्टाचार की वजह से ऐसी फ़ैक्ट्रियां रिहायशी इलाक़ों में चल रही हैं। दिल्ली नगर निगम न सिर्फ़ कहीं पर फ़ैक्ट्री या कमर्शियल काम के लिए लाइसेंस और मंज़ूरी देता है, बल्कि अगर कहीं अवैध तरीक़े से कोई कामकाज चल रहा है तो उसको सील करने की ज़िम्मेदारी भी उसी पर होती है।

इसके आलावा स्थानीय प्रशासन और दिल्ली पुलिस पर भी कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

दिल्ली पुलिस की ज़िम्मेदारी किसी भी किस्म के अवैध उद्योग धंधे या कारखानों पर नज़र रखने की है। इसके अलावा फ़ैक्ट्री के इलाक़े में लोकल एडमिनिस्ट्रेशन होता है। वह अपने अपने इलाकों में अवैध तरीक़े से चल रहे कामकाज पर नज़र रखते हैं।

इस मामले में एमसीडी, दिल्ली सरकार के गृह विभाग के तहत आने वाला दिल्ली फ़ायर डिपार्टमेंट, दिल्ली पुलिस और यहां तक कि दिल्ली सरकार के ही अंतर्गत आने वाला डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन भी ज़िम्मेदार है।

आख़िरकार ऐसी घटनाएँ क्यों बढ़ती जा रही हैं?

ये जितनी भी घटनाएँ हुई हैं, इनमें ज़्यादातर फ़ैक्ट्रियाँ अनाधिकृत क्षेत्रों के अनियंत्रित छोटे औद्योगकि क्षेत्रों में स्थित हैं। ज़्यादातर यह क्षेत्र निम्न-मध्य वर्ग या झुग्गी-झोपड़ी के रिहायशी इलाकों में हैं। 

मज़दूर यूनियनों का कहना है, “ऐसी घटनाएँ प्रशासन कि लापरवाही से होती हैं। अधिकारोयों की ज़िम्मेदारी है कि वो फ़ैक्ट्री का इंस्पेक्शन करें और नियमों का लागू कराएं लेकिन अधिकारी भ्रष्ट हैं और प्राय: नियमों के उल्लंघन को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।”

यूनियनों कि मांग है, “यह ग़ैरक़ानूनी फ़ैक्ट्रियाँ या तो बंद कर दी जानी चाहिए या इन्हें कहीं और शिफ़्ट कर दिया जाना चाहिए। राज्य सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि कोई भी फ़ैक्ट्री अधिकृत औद्योगिक क्षेत्र के बाहर नहीं चल रही हो।"

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