NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
चुनाव 2019: बढ़ती बेरोज़गारी मोदी को ले डूबेगी
मोदी की सारी योजनाएँ और राष्ट्रवाद का अंधा प्रचार बेरोज़गारी के दर्द को दूर नहीं कर पाएगा।
सुबोध वर्मा
14 Mar 2019
Translated by महेश कुमार
चुनाव 2019: बढ़ती बेरोज़गारी मोदी को ले डूबेगी
चित्र को केवल प्रतिनिधित्वीय उपयोग के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। सौजन्य : द इंडियन एक्सप्रेस

लोकसभा चुनाव के आने से कुछ हफ़्ते पहले मोदी के सामने जो सबसे बड़ी चुनौती है, वो है उनकी सरकार द्वारा नौकरियों के संकट को संबोधित करने की सबसे बड़ी विफ़लता। हाल में हुआ जनमत सर्वेक्षण, जिसमें एक टीवी न्यूज़ चैनल भी शामिल है जो अन्यथा मोदी सरकार के प्रति काफ़ी सहानुभूति रखता है, यह दर्शाता है कि देश भर में मतदाताओं के लिए रोज़गार सबसे बड़ा मुद्दा है। 8 फ़रवरी से 7 मार्च के बीच हवाई हमले हुए और पीएम मोदी द्वारा परियोजनाओं का उद्घाटन जारी रहा- उन्होंने इस दौरान 157 परियोजनाएं "लॉन्च" कीं, जिसकी सुर्खियों ने मीडिया को क़ाबू में कर लिया था, लेकिन बेरोज़गारी का अप्रिय मुद्दा ज़्यादातर लोगों को चिंतित कर रहा है। और यह आने वाले हफ़्तों में चुनाव को ज़रूर प्रभावित करेगा।
सेंटर फ़ॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के अनुसार, 11 मार्च तक बेरोज़गारी 6.9 प्रतिशत थी। मानसून के अंत तक यह इसी रेंज में रही, और 10 फ़रवरी के समाप्त हुए सप्ताह में उच्च दर 8.6 प्रतिशत तक पहुँच गयी थी। रबी की फसल ने इसे थोड़ा कम कर दिया है, लेकिन इस पैमाने पर बेरोज़गारी बरक़रार है और यह 1970 के दशक की शुरुआत में पनपे आर्थिक संकट की याद दिलाती है।
हालांकि, मोदी और उनके सहयोगी लगातार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (EPFO) नामांकन की संख्या दोहरा रहे हैं या ये बता रहे हैं कि कितने वाहनों की बिक्री हुई या कितने होटल बिके, लेकिन सीएमआईई के आंकड़ों में श्रमिक भागीदारी दर (काम करने की आयु की आबादी का हिस्सा) में पिछले दो साल में कोई बढ़त नहीं दिखती है। वास्तव में, फ़रवरी 2019 में यह थोड़ा सा घटकर 42.7 प्रतिशत रह गया है, जबकि जनवरी 2017 में यह 45.3 प्रतिशत था। चूंकि कामकाजी उम्र की आबादी लगातार बढ़ रही है, इसका मतलब है कि काम करने वाले व्यक्तियों की निरपेक्ष संख्या में कमी आ रही है – और अजीब बात यह है कि हमारे देश को पूरी दुनिया में सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था माना जाता है!

नीचे दिया गया चार्ट देश में रोज़गारशुदा व्यक्तियों की संख्या में ठहराव और दिसंबर 2018 में गिरावट को दर्शाता है। यह CMIE डेटा एक घरेलू सर्वेक्षण पर आधारित है, और इस प्रकार यह अनौपचारिक या अर्थव्यवस्था की हल्की नौकरियों सहित सभी तरह के रोज़गार को दर्शाता है।
2016-18 तक कुल रोज़गारशुदा व्यक्तियों के आंकड़े को दर्शाता चार्ट: 

chart 1.jpg
जनवरी 2016 में 40.8 करोड़ से दिसंबर 2018 में 39.7 करोड़ तक की गिरावट है। 

जैसा कि इस चार्ट में दर्शाया गया है, रोजगार नहीं बढ़ रहा है। यह लोगों को दो विकल्पों पर ला के खड़ा कर देता है- या तो पूरी तरह से काम की तलाश करना बंद कर दें और कार्यबल से बाहर आएँ, या सक्रिय रूप से काम की तलाश करते रहें। जो बाद की श्रेणी के लोग हैं, इन्हें 'बेरोज़गार' कहा जाता है। सर्वेक्षण सिर्फ़ इसी संख्या को दर्शाता है, अक्सर उन लोगों का अनुमान नहीं लगाया जाता जो निराश या हतोत्साहित होकर रोज़गार की दौड़ से बाहर हो गए हैं।

अब यहाँ बेरोज़गारी की संख्या पर एक नज़र डालिए। फिर से, सीएमआईई के आंकड़ों को संख्याओं में परिवर्तित करते हुए हम पिछले एक साल में बेरोज़गारों की संख्या में नाटकीय वृद्धि देख सकते हैं। दिसंबर 2018 का नवीनतम अनुमान दर्शाता है कि बेरोज़गारों की संख्या लगभग 7 करोड़ है, जैसा कि नीचे दिए गए चार्ट में दिखाया गया है।

chart2.jpg
जनवरी 2017 में बेरोज़गारों की संख्या 5.4 करोड़ से बढ़कर दिसंबर 2018 में 6.9 करोड़ हो गई है।

बढ़ता 'ट्रेंड' और चौंका देने वाली बेरोज़गारी की उच्च संख्या स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। यह बहुत बड़ा संकट है जिसे कुछ आंकड़ों की बाज़ीगरी या नकली अंकगणित के साथ धोना नामुमकिन ही नहीं बल्कि मुश्किल भी है।
नौकरियों के संकट का एक और पहलू है जिसके बारे में न तो विश्लेषक और न ही मोदी और उनके सलाहकार सोच रहे हैं। वह है वेतन संकट जो सीधे तौर पर नौकरियों की कमी से जुड़ा है।

ग़रीब लोग केवल अस्थायी रूप से रोज़गार के बाज़ार से बाहर निकलते हैं, सिर्फ़ उन महीनों में जिनमें हालात रोज़गार के लिए सबल नहीं होते हैं। केवल मध्यम वर्ग के नुमाइंदे जब नौकरियों कि तलाश कर रहे होते हैं, तब वे किसी कोर्स या प्रशिक्षण में दाख़िला ले लेते हैं क्योंकि वो ऐसा करने के लिए समर्थ हैं, इस प्रकार उन्हें बेरोज़गार नहीं गिना जाता है।
हमारे देश के अधिकांश लोगों के लिए काम का न होना कोई विकल्प नहीं है। वे केवल जीवित रहने के लिए कुछ काम जैसे पार्ट टाइम, मौसमी, अनियमित काम करते हैं जिसके लिए उन्हें बहुत कम दाम मिलता है। तो कड़े काम का कम दाम, एक बढ़ते कैंसर की निशानी है। यह कृषि, निर्माण या घरेलू काम भी हो सकता है या कुछ रुपए कमाने के लिए रिक्शा खींचना भी। यह और कुछ नहीं बल्कि ढकी हुई बेरोज़गारी है क्योंकि सभ्य नौकरियों के अभाव में लोग ये सब काम करने को मजबूर हैं। इस तरह के काम की सीमा का अभी तक कोई अनुमान नहीं हैं, लेकिन 2011-12 में नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइज़ेशन की एक रिपोर्ट ने संकेत दिया था कि 35 प्रतिशत से अधिक लोग इस तरह के काम करते हैं।


चूंकि मोदी और उनकी चुनावी मशीनरी अभी तक हर दिन बढ़ रही इस तबाही के बारे में अनजान और चुप हैं। और चूंकि मीडिया भी इसी दिखावे में लगी है कि जब तक व्यापार करने की आसानी ठीक तरह से निभाई जा रही है, तन तक कोई समस्या ही नहीं है। ऐसे में यह कहना सुरक्षित है कि मोदी और भाजपा को आने वाली 23 मई को वोटों की गिनती के बाद उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा झटका लगने वाला है।

UNEMPLOYMENT IN INDIA
job crisis in India
Modi government
BJP government
loksabha election
Elections
Narendra modi
Narendra Modi Government
Jobless persons in India
unemployment
indian economy
Unemployment under Modi govt in India
Economic growth under Modi govt in India

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

डरावना आर्थिक संकट: न तो ख़रीदने की ताक़त, न कोई नौकरी, और उस पर बढ़ती कीमतें

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

आर्थिक रिकवरी के वहम का शिकार है मोदी सरकार

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

उत्तर प्रदेश: "सरकार हमें नियुक्ति दे या मुक्ति दे"  इच्छामृत्यु की माँग करते हजारों बेरोजगार युवा


बाकी खबरें

  • Chhattisgarh
    रूबी सरकार
    छत्तीसगढ़: भूपेश सरकार से नाराज़ विस्थापित किसानों का सत्याग्रह, कांग्रेस-भाजपा दोनों से नहीं मिला न्याय
    16 Feb 2022
    ‘अपना हक़ लेके रहेंगे, अभी नहीं तो कभी नहीं’ नारे के साथ अन्नदाताओं का डेढ़ महीने से सत्याग्रह’ जारी है।
  • Bappi Lahiri
    आलोक शुक्ला
    बप्पी दा का जाना जैसे संगीत से सोने की चमक का जाना
    16 Feb 2022
    बप्पी लाहिड़ी भले ही खूब सारा सोना पहनने के कारण चर्चित रहे हैं पर सच ये भी है कि वे अपने हरफनमौला संगीत प्रतिभा के कारण संगीत में सोने की चमक जैसे थे जो आज उनके जाने से खत्म हो गई।
  • hum bharat ke log
    वसीम अकरम त्यागी
    हम भारत के लोग: समृद्धि ने बांटा मगर संकट ने किया एक
    16 Feb 2022
    जनवरी 2020 के बाद के कोरोना काल में मानवीय संवेदना और बंधुत्व की इन 5 मिसालों से आप “हम भारत के लोग” की परिभाषा को समझ पाएंगे, किस तरह सांप्रदायिक भाषणों पर ये मानवीय कहानियां भारी पड़ीं।
  • Hijab
    एजाज़ अशरफ़
    हिजाब के विलुप्त होने और असहमति के प्रतीक के रूप में फिर से उभरने की कहानी
    16 Feb 2022
    इस इस्लामिक स्कार्फ़ का कोई भी मतलब उतना स्थायी नहीं है, जितना कि इस लिहाज़ से कि महिलाओं को जब भी इसे पहनने या उतारने के लिए मजबूर किया जाता है, तब-तब वे भड़क उठती हैं।
  • health Department
    एम.ओबैद
    यूपी चुनाव: बीमार पड़ा है जालौन ज़िले का स्वास्थ्य विभाग
    16 Feb 2022
    "स्वास्थ्य सेवा की बात करें तो उत्तर प्रदेश में पिछले पांच सालों में सुधार के नाम पर कुछ भी नहीं हुआ। प्रदेश के जालौन जिले की बात करें तो यहां के जिला अस्पताल में विशेषज्ञ चिकित्सक पिछले चार साल से…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License