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भारत
राजनीति
चुनाव 2019 : प्रज्ञा ठाकुर मामले में क्यों नहीं अपनी शक्तियों का उपयोग करता सुप्रीम कोर्ट?
भारतीय लोकतंत्र के हितों की रक्षा के लिए अपनी पूरी शक्ति इस्तेमाल करने का शीर्ष अदालत के लिए यह उचित समय है।
सौरव दत्ता
30 Apr 2019
प्रज्ञा ठाकुर
Image Courtesy: The Hindu

2019 के लोकसभा चुनावों में भोपाल से बीजेपी की उम्मीदवार प्रज्ञा सिंह ठाकुर की बीजेपी और आरएसएस नेताओं ने काफी प्रशंसा की और उनका समर्थन किया है। हाल में योग गुरु रामदेव ने 26 अप्रैल को कहा कि वह राष्ट्रवादी हैं।

जब से प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी की घोषणा की गई तब से हमने संघ के नेताओं और पत्रकारों को उन्हें सामान्य बनाने की कोशिश करते हुए देखा है। ठीक इसी समय कई संपादकीय उनकी आलोचना करते हुए लिखे गए हैं। विशेष रूप से हेमंत करकरे के बारे में उनकी अपमानजनक टिप्पणी को लेकर। करकरे महाराष्ट्र एटीएस के प्रमुख थे और 26/11 के मुंबई हमले के दौरान आतंकवादियों से बहादुरी के साथ लड़े और शहीद हो गए।

न्यूज़क्लिक के क़रीबी सूत्रों ने बताया कि भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर की उम्मीदवारी पर फैसले को लेकर जब चुनाव आयोग उनकी उम्मीदवारी के ख़िलाफ़ दायर की गई कई शिकायतों के बाद भी जानबूझकर अपना पैर पीछे खींच रहा है तो ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का रुख किया जाएगा।

यहां कुछ तथ्य दिए गए हैं जो काफी छानबीन के बाद सामने आए हैं। ये प्रज्ञा ठाकुर और उनके समर्थकों द्वारा किए गए सभी दावों को खारिज करते हैं और ये तथ्य फैसला करने में सर्वोच्च न्यायालय की सहायता करने में भी सक्षम होंगे :

यातना देने के दावे आधारहीन हैं

प्रज्ञा ठाकुर यह कहते हुए नहीं थकती हैं कि दिवंगत हेमंत करकरे के नेतृत्व में महाराष्ट्र एटीएस ने हिरासत में उन्हें किस तरह यातनाएं दी थीं। प्रेस से बात करते हुए या रैलियों में प्रज्ञा को अपनी इस कठिन परीक्षा के बारे में बताते हुए आंसू बहाते देखा जाता है। उनके समर्थकों और राजनीतिक प्रबंधकों ने भी इन्हीं बातों को दोहराया लेकिन वास्तविकता क्या है?

मुंबई मिरर की एक रिपोर्ट इस सच को उजागर करती है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक विस्तृत जांच के बाद पाया कि उनके आरोप बेबुनियाद है। जब उन्हें कथित रूप से लंबे समय तक हिरासत में रहने के दौरान लगी चोटों के लिए चिकित्सीय साक्ष्य उपलब्ध कराने के लिए कहा गया तो वह कुछ भी नहीं दे पाईं।

न केवल एनएचआरसी बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने भी उन दावों को खारिज कर दिया। 23 सितंबर 2011 को दिए गए फैसले में जस्टिस पांचाल और गोखले की पीठ ने उनके दावे को अयोग्य पाया। सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को मान लिया जिसमें कहा गया था कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि ठाकुर को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था या उन्हें यातना दी गई थी।

कैंसर की रोगी? डॉक्टर्स दावे को झूठा बताते हैं

प्रज्ञा यह दावा करने में कोई कसर नहीं छोड़ती हैं कि वह स्तन कैंसर से पीड़ित हैं। वास्तव में उन्होंने अदालत के समक्ष ये बात कही जिसने उनकी ज़मानत अवधि बढ़ा दी। लेकिन जब न्यूज़क्लिक ने मुंबई के जेजे अस्पताल के डॉक्टरों से बात की जहां ठाकुर ने 2010 में शुरुआती इलाज कराया था तो सभी ने एक स्वर में कहा कि उन्होंने कई जांच की थीं जब प्रज्ञा ठाकुर ने अपने स्तनों में गांठ और दर्द की शिकायत की थी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। वास्तव में उन्होंने कहा कि वह अक्सर उचित इलाज नहीं होने को लेकर हंगामा करती थीं और वे उनसे काफी नाराज़ होते थे। मुम्बई मिरर की एक रिपोर्ट में कैंसर के इलाज के लिए भारत के प्रमुख केंद्र टाटा मेमोरियल अस्पताल के बड़े ऑन्कोलॉजिस्ट कैंसर की बीमारी होने और गोमूत्र तथा गाय के गोबर और अन्य पदार्थों के मिश्रण के सेवन से ठीक होने के उनके दावों को खारिज करते हैं।

हालांकि द हिंदू के बॉम्बे संस्करण में लखनऊ स्थित राम मनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस के डॉ एस.एस. राजपूत के हवाले से एक रिपोर्ट है जिसमें कहा गया है कि उन्होंने ठाकुर के तीन बार ऑपरेशन किए थे और वह 2008 में कैंसर से पूरी तरह से ठीक हो गई थीं। द हिंदू की ये रिपोर्ट इस प्रकार बाद के डॉक्टरों के कैंसर के किसी भी लक्षण का पता लगाने में सक्षम नहीं होने का समर्थन करती है क्योंकि वह 2008 में ही ठीक हो गई थीं। इसलिए सवाल उठता है कि चिकित्सीय रिकॉर्ड की जांच किए बिना अदालत उनके दावों को लेकर इतना मासूम क्यों थी? प्रज्ञा ठाकुर, उनके आकाओं और अप्रतचिक (राजनीतिक संगठन के सदस्य) ने उनकी सहानुभूति में जो कुछ कहा उसे मीडिया का एक वर्ग दोहरा क्यों रहा है?

क्लीन चिट की झूठी अफवाह

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, योगगुरु रामदेव और संघ के कई लोग रैलियों में कहते रहे कि प्रज्ञा ठाकुर को क्लीन चिट दे दी गई है। सच्चाई से आगे कुछ भी नहीं हो सकता है। किसी को बॉम्बे की विशेष राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कोर्ट के न्यायाधीश एस.डी. टेकाले के दिसंबर 2017 के फैसले को पढ़ना चाहिए। अपने आदेश के 231 और 232 पैरा में वह स्पष्ट कहते हैं कि ठाकुर और उनके सहयोगियों के ख़िलाफ़ पर्याप्त मात्रा में सबूत हैं जो मुकदमा चलाने लायक है। इस फैसले को किसी भी अदालत के सामने चुनौती नहीं दी गई है इसलिए यह अभी भी वैसा ही है। इसलिए तथाकथित क्लीन चिट की सभी बातें झूठ के अलावा और कुछ नहीं हैं।

सर्वोच्च न्यायालय का दायित्व

यह एक सवाल खड़ा होता है कि शीर्ष अदालत को क्या करना चाहिए खासकर क्योंकि एनआईए अदालत ने कहा है कि उसके पास प्रज्ञा ठाकुर के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की कोई शक्तियां नहीं हैं और चुनाव आयोग कार्रवाई करने के लिए सबसे ज़्यादा प्रतिकूल रहा है? इसके जवाब के लिए 25 सितंबर 2018 को जनहित फाउंडेशन मामले में संविधान पीठ द्वारा दिए गए फैसले हवाला देना चाहिए। पीठ ने स्पष्ट कहा कि भारतीय राजनीति का वैधीकरण राजनीतिक दलों से शुरू होता है।

फैसले में कहा गया, "एक बहुदलीय लोकतंत्र में जहां सदस्य दलगत तरीक़े से चुने जाते हैं और पार्टी अनुशासन के अधीन होते हैं ऐसे में हम संसद को एक मजबूत क़ानून लाने की सलाह देते हैं जहां राजनीतिक दलों को उन व्यक्तियों की सदस्यता रद्द करना अनिवार्य हो जिनके ख़िलाफ़ जघन्य और गंभीर अपराधों के आरोप लगाए गए हों और संसद तथा राज्य विधानसभाओं के चुनाव में ऐसे व्यक्ति को न खड़ा किया जाए।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा इस तरह का कानून '' साफ, बेदाग़, निष्कलंक और सदाचारी संवैधानिक लोकतंत्र'' के युग में प्रवेश का काम करने और राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए एक लंबा रास्ता तय करेगा। न्यायाधीश इसके लिए कोई कानून नहीं बना सकते हैं जो संसद का दायरे में है लेकिन उम्मीदवारों की उनकी आपराधिक पृष्ठभूमि को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए। प्रज्ञा ठाकुर और उनके साथी (इनमें से दो चुनाव भी लड़ रहे हैं) पर पिछले साल अक्टूबर में यूएपीए की धारा 16 (आतंकवादी कार्य करने) और 18 (आतंकी कार्रवाई करने की साजिश रचने) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत हत्या, आपराधिक साज़िश करने और समुदायों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देने का आरोप लगाया गया था। उन्हें अपने चुनावी हलफनामे में इन सभी आरोपों को कथित हत्या, कथित हत्या का प्रयास, कथित आतंकवादी कृत्य आदि करके लिखा है।

लेकिन निश्चित रूप से इनमें से कोई भी कारक सर्वोच्च न्यायालय को भारतीय लोकतंत्र के हितों में अपनी पूर्ण शक्तियों का उपयोग करने से नहीं रोकता है।

अब तक शीर्ष अदालत ने कई मौकों पर संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूरी शक्तियों का इस्तेमाल किया है। इसके कई बार वांछनीय परिणाम आते हैं तो कभी-कभी फैसलों को लेकर आलोचनाएं सामने आती हैं। चूंकि जो चीजें हैं उसमें प्रज्ञा ठाकुर को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कोई वैधानिक प्रावधान नहीं है। ठीक इसी समय शीर्ष अदालत के निर्णयों की एक श्रृंखला है जहां इसने राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए सभी बाधाओं को हटा दिया है। निस्संदेह यह चुनाव महत्वपूर्ण है जिसमें भारत की अवधारणा दांव पर है। क्या शीर्ष अदालत तब भी मूकदर्शक बनी रहेगी जब भारतीय गणराज्य के आधारभूत स्तंभों में ये दो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता ख़तरे में है?

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