NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
चुनाव 2019 : वोट के फायदे के लिए बीजेपी और टीएमसी ने बांट दिया बंगाल
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में और उनकी खुद की द्वेषपूर्ण चालों से बंगाली समाज को साम्प्रदायिक रूप देने की कोशिश की जा रही है, जिसका असर चुनावों के काफी बाद तक रहेगा।
सुबोध वर्मा
03 May 2019
Translated by महेश कुमार
पश्चिम बंगाल
सांकेतिक तस्वीर। फोटो साभार : Scroll

जब काज़ी नज़रूल इस्लाम ने "एक तीर से छलनी हुए कोमल पक्षी" के बारे में लिखा था, क्या उस वक्त उन्होंने आज के पश्चिम बंगाल की कल्पना की थी, या क्या यह रवीन्द्र नाथ टैगोर की दॄष्टि थी कि "जहाँ मन भय के बिना रहे" जिसको कि अब नष्ट किया जा रहा है? इसलिए, इस तथ्य से कोई परहेज नहीं किया जा सकता है कि राज्य में चल रही चुनावी प्रक्रिया में ज़हर के बीज बोए जा रहे हैं जो आने वाले वर्षों में आग लगाने वाली फसल पैदा करेंगे।

कुछ दिनों पहले, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने आपको श्रीरामपुर में एक सार्वजनिक चुनावी सभा में राम, दुर्गा और सरस्वती का भक्त बताकर संबोधित किया, और दावा किया कि वे अपने धार्मिक त्योहारों को ठीक से नहीं मना सकते हैं, उनकी बेटियां और बहनें घर से बाहर नहीं जा सकतीं हैं और जबकि "अन्य" लोग अपनी पसंद के मुताबिक कुछ भी कर सकते हैं, वह भी बिना किसी डर और खुशी के साथ। बंगाल में मोदी के अधिकांश सार्वजनिक भाषणों का स्वर कुछ ऐसा ही रहा है। उन्होंने अब तक 18 संसदीय क्षेत्रों में सात जनसभाओं को संबोधित किया है, जहां आज तक चुनाव हो चुका है, यह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) द्वारा बंगाल को दी जा रही प्राथमिकता को दिखाता है। ऐसा अनुमान है कि मोदी शेष 24 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 15 ओर जनसभाओं को संबोधित कर सकते हैं।

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी कोई पीछे नहीं हैं, वे भी कई सार्वजनिक सभा कर चुके हैं, जिनमें से एक में उन्होंने घोषणा की कि न केवल विजयी भाजपा बंगाल में नागरिकों के एक राष्ट्रीय रजिस्ट्रर (एनआरसी) को लागू करेगी बल्कि यह सुनिश्चित करेगी कि सभी अवैध अप्रवासी (मतलब मुस्लिम अप्रवासी) को एक-एक करके उठाया जाए और बंगाल की खाड़ी में फेंक दिया जाएगा। अगर इस तरह का भाषण बीजेपी के अग्रणी नेता दे रहे हैं, तो आप कल्पना कर सकते हैं कि नीचे के स्तर के नेता किस तरह के विषैले प्रचार को अंजाम दे रहे होंगे।

एक ऐसा राज्य जिसकी 27 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, और जिसकी सीमा पड़ोसी बांग्लादेश के साथ है और उनके साथ सीमा-पार आना जाना एक संवेदनशील मुद्दा है, इस तरह की सांप्रदायिक तर्ज खुले ध्रुवीकरण की रणनीति है, और इसका केवल एक ही उद्देश्य है: अधिक से अधिक वोट प्राप्त करना और अधिक सीटें जीतना। आखिर यह हताशा क्यों है? क्योंकि बीजेपी जानती है कि उसे अन्य राज्यों से काफी सीटों की जरूरत है क्योंकि वह उत्तर प्रदेश, बिहार और अन्य उत्तर भारत के राज्यों में बड़ी तादाद में सीटें खोने जा रही है। लेकिन, इस प्रक्रिया में, बीजेपी ने एक बड़ा लंबा युद्ध छेड़ दिया है, एक ऐसे भविष्य की लडाई जो एक अभूतपूर्व पैमाने पर नागरिक संघर्ष में तब्दील हो जाएगी और पूरे राज्य को अपनी चपेट में ले सकती है। इस आशंका के प्रति भाजपा अंधी हो गयी है, या शायद, वे इसकी परवाह ही नहीं करते हैं। या शायद यही उनका उद्देश्य है।

लंबी योजना

उन लोगों के लिए जिन्होंने हाल के वर्षों में बंगाल में घटी घटनाओं पर ध्यान दिया है, उन्हें यह स्पष्ट होगा कि इस तरह की सांप्रदायिक रणनीति मोदी के अभियान के प्रबंधकों के लिए नयी बात नहीं है। कई वर्षों से यह बंगाल में भाजपा/राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की महत्वपूर्ण रणनीति रही है। और, ऐसी सभी रणनीतियों की वजह से, और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांप्रदायिक और मजबूत अहंकारवादी राजनीति के चलते उन्हे फायदा हुआ है।

2014 में केंद्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद राज्य में सांप्रदायिक हिंसा में अचानक वृद्धि आई है, आइए नीचे तालिका पर एक नजर डालें।

communal incidents.jpg

सरकार की ओर से सूचना केवल 2017 तक उपलब्ध है, लेकिन रुझान चौंकाने वाले है। 2014 और 2017 के बीच राज्य में सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या में लगभग चार गुना वृद्धि हुई है।

जबकि बनर्जी और उनकी पार्टी नीतिगत उपायों की एक श्रृंखला के माध्यम से मुस्लिम आधार को मज़बूत  करने की कोशिश कर रही है, कुछ तो इसमें उचित भी हैं पर ज्यादातर राजनैतिक लालच के लिए किया जा रहा है, लेकिन भाजपा/आरएसएस इसका जवाब देने के लिए एक उग्रवादी हिंदुत्व एजेंडे को चला रहे हैं। इसने तथाकथित अवैध आव्रजन (इमिग्रेशन) का विरोध और हिंदू त्योहारों पर आक्रामक परेड का आयोजन करना शुरू कर दिया है। हिंदुओं को भेदभाव के शिकार के रूप में चित्रित किया जा रहा है – यह झूठ 73 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले राज्य में फैलाया जा रहा है जो अपने आप में एक त्रासदी है।

2016-17 में सांप्रदायिक झड़पों की कई घटनाएँ घटी थीं, ज्यादातर दुर्गा मूर्ति विसर्जन और अक्टूबर में मुहर्रम के जुलूसों के प्रतिस्पर्धी यात्राओं से उत्पन्न हुई थीं। ऐसा पूरे राज्य भर में हो रहा था, और बीजेपी ने दो त्योहारों के संयोग का उपयोग हिंसा को भड़काने के लिए किया, जबकि टीएमसी सरकार और उसकी पुलिस ने अपनी मजबूत अहंकारवादी रणनीति को जारी रखा। नतीजतन, पश्चिम मिदनापुर, बर्दवान, कोलकाता, हावड़ा, हाजीनगर, इलामाबाजार, आदि में हिंसा भड़क उठी थी। कलियाचक, मालदा में, एक मुस्लिम भीड़ उस वक्त उग्र हो गई जब हिंदू महासभा के एक नेता ने अपमानजनक बयान दिए, उग्र भीड़ ने पुलिस स्टेशन को जला दिया।

2018 में, मार्च के महीने में, भाजपा द्वारा खुले तौर पर रामनवमी को मनाने के कारण वहां खूनी मुठभेड़ हो गयी। बंगाल और आस-पास के बिहार के कई जिलों में भगवा झंडों और तलवारों और त्रिशूलों के साथ बाइक जुलूस निकाले गए, जिससे भड़काऊ नारेबाजी के बाद हिंसा भड़क गई और बढ़ते तनाव पर अंकुश लगाने के लिए पुलिस को मुस्तैद होना पड़ा। दो समुदायों के बीच झड़पों में कम से कम तीन लोगों की मौत हो गई थी। आसनसोल-दुर्गापुर-रानीगंज बेल्ट में, भड़की भीड़ ने लूटपाट की और एक मस्जिद के इमाम की हत्या भी कर दी थी।

यह बीजेपी/आरएसएस और इससे संबद्ध संगठनों का कड़ा अभियान है, जिसे अब बीजेपी और टीएमसी के बीच चुनावी लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है।

फिर से उभरता वाम

2011 के विधानसभा चुनावों में अपने नाटकीय नुकसान के बाद, वामपंथियों को राज्य भर में टीएमसी गिरोह के द्वारा लगातार हमलों का सामना करना पड़ा। लेकिन हाल ही के वर्षों में, वामपंथ  की तरफ युवाओं के आने से और कृषि और मज़दूर वर्ग के मुद्दों को उठाने से बड़ी लामबंदी की नीति देखी गई है। यह तीसरी धारा दोनों- बीजेपी/आरएसएस के बढ़ते तूफानी सैनिकों के साथ-साथ हमलावर टीएमसी सरकार के खिलाफ एक ज़बरदस्त लड़ाई लड़ रही है। मीडिया का अधिकांश ध्यान भाजपा-टीएमसी की लड़़ाई पर केंद्रित है, लेकिन वामपंथियों, खासकर भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की दोबारा बढ़ती ताकत के उदय को काफी हद तक नजरअंदाज किया जाता है। इस प्रक्रिया में, सांप्रदायिकता के खिलाफ वामपंथी टकराव को भी नजरअंदाज कर दिया जा रहा है।

वास्तव में, यह केवल वामपंथी ताकत ही है जो हिंसक हिंदुत्व को थोपने के खिलाफ बंगाल की आत्मा को बचाने के लिए लगातार लड़ रही है बल्कि उस नरम हिंदुत्व को रोकने का भी प्रयास कर रही है, जिसे हाल ही में बनर्जी ने हिंदू धार्मिक जुलूसों का आयोजन करके अपनी साख साबित करने के लिए किया था।

लेकिन चुनाव के इस गंदे चरित्र से, बंगाल की राजनीति को विषाक्त करना एक त्रासदी है जिसे अभी भारत पूरी तरह से महसूस नहीं कर पाया है। ममता बनर्जी और नरेंद्र मोदी के बीच, बंगाल की आत्मा को कुचला जा रहा है, और केवल वामपंथी ही इसके खिलाफ खड़े हैं।

General elections2019
2019 आम चुनाव
2019 Lok Sabha elections
West Bengal
TMC
BJP-RSS
Left politics
Left unity
Hate Speeches
Narendra modi
Amit Shah
West Bengal Elections
CPI(M)

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

कविता का प्रतिरोध: ...ग़ौर से देखिये हिंदुत्व फ़ासीवादी बुलडोज़र

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

अब राज ठाकरे के जरिये ‘लाउडस्पीकर’ की राजनीति

जलियांवाला बाग: क्यों बदली जा रही है ‘शहीद-स्थल’ की पहचान

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

ख़बरों के आगे-पीछे: गुजरात में मोदी के चुनावी प्रचार से लेकर यूपी में मायावती-भाजपा की दोस्ती पर..


बाकी खबरें

  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में क़रीब 19 महीने बाद 6 हज़ार से कम नए मामले सामने आए 
    14 Dec 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 88 हज़ार 993 हो गयी है, लेकिन साथ ही देश में अब ओमिक्रॉन वेरिएंट के मामलो की संख्या बढ़कर 41 हो गयी है।
  • health sector
    ऋचा चिंतन
    भाजपा के कार्यकाल में स्वास्थ्य कर्मियों की अनदेखी का नतीजा है यूपी की ख़राब स्वास्थ्य व्यवस्था
    14 Dec 2021
    एक कमज़ोर और अपर्याप्त स्वास्थ्य कार्यबल का ही नतीजा होता है कि लोगों की स्वास्थ्य सेवा की स्थिति ख़राब हो जाती है। यूपी की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है, जहां स्वास्थ्य कर्मी, ख़ास तौर पर ग्रामीण यूपी में…
  • data protection bill
    प्रबीर पुरकायस्थ
    डेटा निजता विधेयक: हमारे डेटा के बाजारीकरण और निजता के अधिकार को कमज़ोर करने का खेल
    14 Dec 2021
    सरकार द्वारा एकत्र किए जाने वाले हमारे डेटा के व्यापारीकरण को निजी डेटा संरक्षण विधेयक के साथ जोड़ दिया गया है।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    PM मोदी का बनारस दौरा, CBSE के प्रश्नपत्र पर विवाद और अन्य ख़बरें
    13 Dec 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी नज़र रहेगी पीएम के काशी दौरे पर जनता का सवाल, CBSE के स्त्री विरोधी प्रश्नपत्र पर विवाद और अन्य ख़बरों पर।
  • Farmers' Movement
    न्यूज़क्लिक टीम
    किसान आंदोलन: लंगर के लिए भी याद रखा जाएगा
    13 Dec 2021
    एक साल से लंबे संघर्ष के बाद किसानों की जीत के साथ उनका आंदोलन खत्म हुआI यह आंदोलन अपने तमाम अन्य पहलुओं के साथ-साथ सभी मोर्चों पर चल रहे लंगरों के लिए भी याद रखा जाएगाI न्यूज़क्लिक ने 10 दिसंबर यानी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License