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राजनीति
चुनाव विश्लेषण के कुछ मिथक
हमेशा की तरह, इस बार भी कई मिथकों के बारे में प्रचार किया जा रहा है जैसे – इन चुनावों में आर्थिक मुद्दे अप्रासंगिक हो गए या राष्ट्रवाद सर्वोच्च हो गया। लेकिन सच्चाई है क्या?
सुबोध वर्मा
25 May 2019
Translated by महेश कुमार
Modi

दुनिया के सभी चुनावों की तरह, इस साल भारत में हुए आम चुनाव के बारे एक पौराणिक कथा तैयार कर दी गई है। इसमें जो कुछ समझ में आता है वह यह है – इस कहानी को चुनाव अभियान के दौरान तैयार किया गया था जबकि कुछ को परिणाम आने के बाद तैयार किया गया तब जब यह तय हो गया कि भाजपा के नेतृत्व वाला गठबंधन स्पष्ट विजेता के रूप में उभर रहा है। सबसे लोकप्रिय मिथकों में से कुछ ने तो वर्तमान विश्लेषकों के दिमाग़ पर ही क़ब्ज़ा जमा लिया है- उनके लिए आर्थिक मुद्दे कोई मायने नहीं रखते, बस राष्ट्रवाद ही सब कुछ है, जातिवाद मर चुका है, इसी तरह की बातें की जा रही हैं।

मुख्यधारा का मीडिया और सत्ताधारी पार्टी के समर्थकों के बीच ऐसी प्रचलित शक्ति काम कर रही है कि ये खुद ही इस तरह की मिथ्या का हिस्सा बन गए हैं, और ज़ाहिर है वे ख़ुद के द्वारा स्थापित इतिहास का हिस्सा बन जाएंगे। लेकिन, आइए इसकी वास्तविकता पर क़रीब से एक नज़र डालते हैं।

लोगों के लिए आर्थिक चोट मायने नहीं रखती है

यह शायद सभी मिथकों में सबसे आम है, इतने सारे प्रगतिशील दिमाग़ वाले व्यक्ति भी इस मिथ्या को पसंद करते हैं। बेरोज़गारी थी है, और काफ़ी ऊँची दर पर है, असमानता बढ़ी है, मज़दूरी अचानक कम और स्थिर हो गई है, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसी कई महत्वपूर्ण सेवाओं की क़ीमत/लागत घातक रूप से ज़्यादा हो गई है या महंगी हुई है, और लोग फिर भी इसके लिए मोदी या उनकी सरकार को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा रहे हैं। वास्तव में, बावजूद इसके वे उसे कहीं ज़्यादा मज़बूत जनादेश देते हैं। यही तर्क दिया जा रहा है।

यह सोच किस बात की उपेक्षा करती है आइए देखें: अब सवाल उठता है कि क्या लोगों के सामने कोई विकल्प प्रस्तुत किया गया था? यदि आप किन्हीं प्रमुख विपक्षी दलों (वाम दलों को छोड़कर) के अभियानों को देखें, तो आर्थिक संकट के मुद्दे हाशिए पर चले गए थे और या उन्हे मात्र परंपरा के तौर पर उठाया गया था। गुड्स एंड सर्विसेज़ टैक्स और नोटबंदी का बार-बार संदर्भ दिया गया, लेकिन वे बड़े आर्थिक संकट का कुल योग नहीं हैं। कांग्रेस ने शुरू में बेरोज़गारी के बारे में बात की थी, लेकिन भाजपा द्वारा राष्ट्रवाद की कहानी को अपना मुख्य मुद्दा मानने के बाद वे भी लड़खड़ा गए। घोषणापत्र से उनकी सोच स्पष्ट थी, कि वे सरकार में आने के बाद 22 लाख नौकरियाँ देंगे, यह यहीं आकर रुक गया। देश भर के अन्य विपक्षी दलों - समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रीय जनता दल – ने क्या बेरोज़गारी के मुद्दे पर मोदी पर चोट की? उन्हें लगा कि वे कुछ बयानबाज़ी करके इस मुद्दे के साथ न्याय कर रहे हैं। लेकिन किसी के पास कोई स्पष्ट तर्क या देने के लिए आश्वासन नहीं था। वे मोदी के जाल में पुरी तरह से फँस गए थे। उन्होंने और उनकी पार्टी ने नौकरियों के संकट को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया – और विपक्ष ने भी ऐसा ही किया।

इसलिए - न तो सत्ता पक्ष और न ही मुख्य विपक्ष ने इस बारे में बात की कि वे नई नौकरियों को कैसे पैदा करेंगे, इसके लिए कौन सी नीतियों को लाया जाएगा, देश को कैसे औद्योगिकीकरण आदि की ज़रूरत है, कैसे खेती को बचाया जा सकता है, तो लोग इस मुद्दे पर कैसे मतदान करेंगे? स्वाभाविक रूप से, यह अभियान और मतदान में एक ग़ैर-मुद्दा बन जाता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह लोगों के लिए मायने नहीं रखता है। इसलिए, कई पत्रकारों और अन्य लोगों ने बेरोज़गारी और कम वेतन की शिकायत करने वाले लोगों के बारे में बात की, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की रिपोर्ट ने आर्थिक मुद्दों को मतदाताओं की सबसे बड़ी चिंता के रूप में चिह्नित किया था – लेकिन फिर भी, लोगो ने उस पर वोट नहीं दिया। क्योंकि उनके सामने कोई विकल्प नहीं था।

राष्ट्रवाद ने लोगों को किसी भी अन्य मुद्दे से ज़्यादा झकझोरा 

यह सभी मिथकों में से सबसे ज्यादा प्रचारित मिथकों में से एक है। और, चुनाव अभियान के साथ-साथ चुनाव परिणाम भी इसकी वैधता का संकेत देते हैं। आख़िरकार, भाजपा ने पूरी तरह से पुलवामा-बालाकोट मुद्दे पर अपना अभियान चलाया, और हवाई हमलों को एक महान नेता द्वारा उठाए गए क़दम के रूप में प्रचारित किया गया – जिसे निर्णायक, साहसिक, और दुश्मन से लड़ाई लड़ने वाला, और एक शक्तिशाली दुनिया में सम्मान पैदा करना आदि बताया गया। भाजपा के बढ़े हुए वोट शेयर को इस अकेले मुद्दे के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। इसकी पुष्टि लोगों द्वारा हर जगह एक विचार के रूप में भी की गई।
लेकिन, यहाँ एक सवाल खड़ा होता है: कि कम से कम चार अलग-अलग राज्यों में, विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थितियों में, इसी तरह की घटना को क्यों नहीं देखा गया? पंजाब, ओडिशा, तमिलनाडु और केरल जोकि देश के विभिन्न कोनों में स्थित है, क्यों भाजपा ने यहाँ बुरा प्रदर्शन किया। पंजाब, वास्तव में एक सीमावर्ती राज्य है, यहाँ पाकिस्तान के साथ युद्ध लड़े गए हैं। फिर भी, भाजपा और उसके सहयोगी, अकाली दल ने 2014 में 35 प्रतिशत मत की तुलना में मात्र 37 प्रतिशत मत मिले, जबकि कांग्रेस को 33 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत मत मिले। तमिलनाडु में, भाजपा अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) के साथ गठबंधन छोटी साझेदार थी और यहाँ उनका सफ़ाया हो गया। ओडिशा में, भाजपा का वोट शेयर 22 प्रतिशत से बढ़कर 38 प्रतिशत हो गया, लेकिन वह बी.जे.डी. को हरा नहीं सकी, जो 43 प्रतिशत मत से आगे रही। केरल में भी, भाजपा 13 प्रतिशत वोट शेयर तक सीमित रही।
अगर राष्ट्रवाद ने सब कुछ छीन लिया तो फिर इन राज्यों में उलटा क्यों हुआ? यह तर्क दिया जा सकता है कि बीजेपी इन राज्यों में मज़बूत नहीं है और यह अन्नाद्रमुक और अकाली दल जैसे सहयोगी दलों की बदनाम छवी से ऐसा हुआ  है। लेकिन यह केवल इस बात को साबित करता है कि राष्ट्रवाद हर चीज़ पर हावी नहीं था!

यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि विपक्षी दलों ने बालाकोट हवाई हमलों को लेकर भ्रमित रुख इख्तियार कर लिया, न तो वे यहाँ के थे और न ही वहाँ के। हमले के बाद कांग्रेस बुरी तरह से ख़ामोश हो गई थी और इस पूरी कहानी का जवाब नहीं दे सकी, पहले इसका जायज़ा लेते रहे, फिर उस पर सवाल उठाए। संक्षेप में, इस मुद्दे को बीजेपी को उसी रूप में ढालने और प्रस्तुत करने के लिए सौंप दिया गया जैसा वे चाहते थे।

जातिवाद मर गया 

यह भाजपा और उसके समर्थकों के लिए सबसे विचित्र है। क्योंकि उन्हें यूपी और बिहार जैसी जगहों पर लगभग 50 प्रतिशत वोट मिले हैं, जहाँ वे (और उनके सहयोगी) विपक्षी गठबंधनों के आमने सामने थे, भाजपा के विचारकों का दावा है कि लोगों ने जाति से ऊपर उठ कर वोट दिए। उन्होने उनकी ज़मीन खिसका दी, चुनावों से पहले बार-बार, बीजेपी और उसके मास्टर रणनीतिकारों ने कई राज्यों में एक अपराजेय जाति गठबंधन बनाया है। यूपी में, वे अपना दल, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी और निषाद पार्टी जैसे विभिन्न छोटे जाति-आधारित संगठनों में घुस चुके थे; बिहार में, उन्होने जनता दल (यूनाइटेड) के ग़ैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के बीच समर्थन का फ़ायदा उठाया; पश्चिम बंगाल में, उन्होंने मटुआ समुदाय को रिझाया, मप्र और राजस्थान में, उन्होंने आक्रामक उच्च जाति के संगठनों के साथ गठबंधन किया; महाराष्ट्र में, उनकी राज्य सरकार ने मराठा आरक्षण के ज़रिये समुदाय को जीता और तमिलनाडु में, वे उस गठबंधन का हिस्सा थे जिसमें कई जाति-आधारित दल शामिल थे।

हाँ, भाजपा को कई जाति समूहों के वोट मिले होंगे। लेकिन हर बार ऐसा ही होता है। कोई भी जाति हर बार एक दिशा में 100 प्रतिशत वोट नहीं देती है।
इस जातिवाद की आंधी का एक अन्य पहलू यह है कि यह दलितों (और आदिवासियों) के उत्पीड़न के भाजपा के रिकॉर्ड को आसानी से नज़रअंदाज़ कर देता है, ख़ासकर पिछले पाँच सालों में हुए अत्याचारों को भी भुला देता है। यह कहकर कि जातिवाद मर चुका है, वे वास्तव में कह रहे हैं कि कोई जाति उत्पीड़न नहीं है और न ही इसके प्रति कोई दलित क्रोध है। अगर ऐसा होता तो बसपा को यूपी में लगभग 20 प्रतिशत वोट कैसे मिलते?

ये सभी मिथक एक ही सामान्य स्रोत से बह रहे हैं, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के अलावा और कुछ नहीं है। यह माना जाता है कि हिंदू राष्ट्र उसका आत्म-गौरव है और सर्वोच्च है और इसका पोषण करना आरएसएस का मुख्य काम है। हर चुनावी जीत का विश्लेषण इस ढांचे से किया जाता है, जो मानता है कि आर्थिक मुद्दे मामूली हैं, राष्ट्र का बचाव करना सच्चे हिंदुओं के लिए सबसे ऊपर का काम है (या होना चाहिए) और चुनावी जीत इस लक्ष्य को दर्शाती है। अफ़सोस की बात है कि कई लोग जो आरएसएस के हिंदू वर्चस्ववादी दृष्टिकोण का समर्थन नहीं करते हैं, वे भी इन मिथकों के घेरे में आ जाते हैं। और, ऐसा करने में, समाधान पेश करने के बजाय समस्या का हिस्सा बन जाते हैं।

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