NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
नज़रिया
भारत
राजनीति
चुनावी बॉन्ड : चंदा या काली कमाई का ‘कट’!
इलेक्टोरल यानी चुनावी बॉन्ड से चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल को रोकने का दावा किया गया था। मगर, यहां तो कालेधन से ज्यादा कालाधन कुबेरों को संरक्षण देने की मंशा झलक रही है।
प्रेम कुमार
12 Apr 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: Naidunia

अरुण जेटली ने देश को इलेक्टोरल (चुनावी) बॉन्ड के बारे में 2017 में पहली बार बताया था कि इसका मकसद राजनीतिक चंदे को पारदर्शी बनाना है। मगर, जब इसके नतीजे सिर्फ और सिर्फ सत्ताधारी दल बीजेपी को 95 फीसदी गोपनीय चंदे के रूप में सामने आए, तो ऐसा लगा मानो राजनीतिक चंदे के चारों ओर ऐसा शीशा लगा दिया गया हो जिसके अंदर से बाहर का सबकुछ दिखता हो, लेकिन अंदर क्या हो रहा है इसे बाहर वाले समझ न सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने ‘अंदर क्या हो रहा है’ इसे बताने के लिए कुछ रोशनी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राजनीतिक दलों को आदेश दिया है कि वे 30 मई तक सीलबंद लिफाफे में चुनाव आयोग को इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप में मिले चंदे की जानकारी सीलबंद लिफाफे में दे। इसमें चंदा देने वाले, चंदे की राशि और बॉन्ड से जुड़ी बाकी जानकारियां भी शामिल हैं।

चुनावी बॉन्ड या इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये चंदा देने वाले धनकुबेर दुनिया से जरूर अपना चेहरा छिपाना चाहते हों, लेकिन जिस राजनीतिक दल को वे लाभ पहुंचा रहे हैं उससे वे पर्दा करें, इसका कोई तर्क नहीं बनता। लिहाजा राजनीतिक दल के पास इलेक्टोरल बॉन्ड के रूप में सभी दान देने वालों का पूरा ब्योरा जरूर होगा। फिर भी यह तमाशा होना अभी बाकी है जिसमें वे कहते दिख सकते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड उन्हें कूरियर से आया, या किसी व्यक्ति से भेजा गया या फिर ऐसे तरीके से, जिसमें वे सबका ब्योरा नहीं रख पाए।  

विपक्षी दलों से दूर क्यों रहे इलेक्टोरल बॉन्ड?

95 फीसदी चंदा सिर्फ सत्ताधारी दल को मिलना ही यह  बताता है कि चंदा देने वाले मानते भी हैं और जानते भी हैं कि यह जानकारी सत्ताधारी दल से छिपी नहीं रह सकती कि किसने इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदे। यह सबसे बड़ी वजह हो सकती है कि बीजेपी को छोड़कर दूसरे दलों को चंदा देने के लिए इलेक्टोरल बॉन्ड से परहेज किया गया। मगर, इस आशंका का आधार क्या है?

पहली बात ये है कि इलेक्टोरल बॉन्ड खरीदने वाले की पहचान बैंक के पास सुरक्षित करानी होती है। इसका खरीदार व्यक्ति, कंपनी, फर्म या अविभाजित हिन्दू परिवार हो सकता है। बॉन्ड के खरीददार चाहें तो इसका फायदा टैक्स डिडक्शन में भी ले सकते हैं। ये बॉन्ड 1000, 10 हज़ार, 1 लाख, 10 लाख और 1 करोड़ के रूप में होते हैं। जाहिर है कि बेचे गये हर बॉन्ड का लेखा बैंक रखता है।

इससे जुड़ी दूसरी और महत्वपूर्ण बात जो एक मीडिया संस्थान के खुलासे से सामने आयी है वो यह कि इलेक्टोरल बॉन्ड में कई तरह के नम्बर अंकित होते हैं जो नंगी आंखों से नहीं देखे जा सकते। फॉरेंसिक लैब में जांच के बाद इसका पता चला। जाहिर है कि इस तरह से प्राप्त सूचना का इस्तेमाल एक दल किसी दूसरे दल के दानदाताओं की जानकारी लेने में कर सकता है।

इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक चंदे का ऐसा माध्यम बनकर उभरा है जो सत्ताधारी दल को धनकुबेरों से चंदा दिलाता है और यह भी सुनिश्चित करता है कि विरोधी दलों को चंदा न मिले या कम से कम मिले। 2017 के बजट में इलेक्टोरल बॉन्ड को लाने के पीछे भी 2019 के आम चुनाव में इसका फायदा उठाना अधिक लगता है। हालांकि यह आगे भी जारी रहने वाला है।

पारदर्शिता की कीमत पर है इलेक्टोरल बॉन्ड

चोरी-छिपे चंदा देने में पारदर्शिता क्या है जिसकी चर्चा केंद्र सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना शुरू करते समय की थी। इलेक्टोरल बॉन्ड से चुनाव में कालेधन के इस्तेमाल को रोकने का दावा किया गया था। मगर, यहां तो कालेधन से ज्यादा कालाधन कुबेरों को संरक्षण देने की मंशा झलक रही है। राजनीतिक दलों के पास बैंक के माध्यम से रकम जाए, इतने भर से सबकुछ ठीक नहीं हो जाता।

दरअसल चंदे के तौर पर कालाधन लेने का तरीका ही रिवर्स कर दिया गया है। राजनीतिक दल पहले कालाधन कुबेर को टारगेट करें, उन्हें मोटे चंदे का आदेश दें और फिर कहें कि जाओ हमारे लिए इलेक्टोरल बॉन्ड खरीद लो। किस कालाधन कुबेर की मजाल होगी जो ऐसा नहीं करेगा, खासकर तब जब यह आदेश ताकतवर राजनीतिक दल की ओर से आए। राजनीति में ताकत के लिए सत्ता से बड़ी कोई चीज नहीं होती। 95 फीसदी इलेक्टोरल बॉन्ड एक ही दल के लिए खरीदे जाने का मतलब यहां साफ हो जाता है।

चंदे का ब्योरा जनता से क्यों छिपाया जाए

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को सीलबंद लिफाफे में जो जानकारी चुनाव आयोग से साझा करने का आदेश दिया है उसका औचित्य तब तक जनहितकारी नहीं होगा जब तक कि यह जानकारी जनता को न दी जाए। अन्यथा चुनाव आयोग के रूप में एक और राजदार तो पैदा हो जाएगा, मगर राजनीति में कालाधन का उपयोग नियंत्रित नहीं किया जा सकेगा।

चोरी छिपे चंदा पहले भी राजनीतिक दल लेते थे। अब उसे वैधानिक और व्यवस्थित तरीके से लेने का रास्ता खोज निकाला गया है। इसे चंदे के बजाये काली कमाई का ‘कट’ कहा जाए, आप चाहें तो काली कमाई में हिस्सेदारी भी कह सकते हैं। सूचना सार्वजनिक नहीं करने की कीमत भी कह सकते हैं। इसे सत्ता में रहने वाली पार्टी का ‘जजिया’ भी कह सकते हैं। आप चाहें इसे जो कहें लेकिन चंदा लेने-देने की यह नयी व्यवस्था और नया स्वरूप छोटे व क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के साथ भेदभाव भी है और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कालेधन कुबेरों की दौलत से कब्जा करने की एक कोशिश भी।

इसे भी पढ़ें : चुनावी बॉन्ड का विवरण 30 मई तक चुनाव आयोग को सौंपने का आदेश

Electoral Bond Scheme
Supreme Court
election commission of India
black money
Transparency
BJP
Narendra modi
Arun Jatley

Related Stories

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

विचार: सांप्रदायिकता से संघर्ष को स्थगित रखना घातक

ख़बरों के आगे-पीछे: मोदी और शी जिनपिंग के “निज़ी” रिश्तों से लेकर विदेशी कंपनियों के भारत छोड़ने तक

ख़बरों के आगे-पीछे: केजरीवाल के ‘गुजरात प्लान’ से लेकर रिजर्व बैंक तक

यूपी में संघ-भाजपा की बदलती रणनीति : लोकतांत्रिक ताकतों की बढ़ती चुनौती

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

इस आग को किसी भी तरह बुझाना ही होगा - क्योंकि, यह सब की बात है दो चार दस की बात नहीं

ख़बरों के आगे-पीछे: क्या अब दोबारा आ गया है LIC बेचने का वक्त?

ख़बरों के आगे-पीछे: भाजपा में नंबर दो की लड़ाई से लेकर दिल्ली के सरकारी बंगलों की राजनीति

बहस: क्यों यादवों को मुसलमानों के पक्ष में डटा रहना चाहिए!


बाकी खबरें

  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    बिहार : गेहूं की धीमी सरकारी ख़रीद से किसान परेशान, कम क़ीमत में बिचौलियों को बेचने पर मजबूर
    30 Apr 2022
    मुज़फ़्फ़रपुर में सरकारी केंद्रों पर गेहूं ख़रीद शुरू हुए दस दिन होने को हैं लेकिन अब तक सिर्फ़ चार किसानों से ही उपज की ख़रीद हुई है। ऐसे में बिचौलिये किसानों की मजबूरी का फ़ायदा उठा रहे है।
  • श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: ग्राम सभाओं को अब साल में 6 बार करनी होंगी बैठकें, कार्यकर्ताओं ने की जागरूकता की मांग 
    30 Apr 2022
    प्रदेश के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 22 अप्रैल 2022 को विधानसभा में घोषणा की कि ग्रामसभाओं की बैठक गणतंत्र दिवस, श्रम दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के अलावा, विश्व जल दिवस और स्थानीय शासन…
  • समीना खान
    लखनऊ: महंगाई और बेरोज़गारी से ईद का रंग फीका, बाज़ार में भीड़ लेकिन ख़रीदारी कम
    30 Apr 2022
    बेरोज़गारी से लोगों की आर्थिक स्थिति काफी कमज़ोर हुई है। ऐसे में ज़्यादातर लोग चाहते हैं कि ईद के मौक़े से कम से कम वे अपने बच्चों को कम कीमत का ही सही नया कपड़ा दिला सकें और खाने पीने की चीज़ ख़रीद…
  • अजय कुमार
    पाम ऑयल पर प्रतिबंध की वजह से महंगाई का बवंडर आने वाला है
    30 Apr 2022
    पाम ऑयल की क़ीमतें आसमान छू रही हैं। मार्च 2021 में ब्रांडेड पाम ऑयल की क़ीमत 14 हजार इंडोनेशियन रुपये प्रति लीटर पाम ऑयल से क़ीमतें बढ़कर मार्च 2022 में 22 हजार रुपये प्रति लीटर पर पहुंच गईं।
  • रौनक छाबड़ा
    LIC के कर्मचारी 4 मई को एलआईसी-आईपीओ के ख़िलाफ़ करेंगे विरोध प्रदर्शन, बंद रखेंगे 2 घंटे काम
    30 Apr 2022
    कर्मचारियों के संगठन ने एलआईसी के मूल्य को कम करने पर भी चिंता ज़ाहिर की। उनके मुताबिक़ यह एलआईसी के पॉलिसी धारकों और देश के नागरिकों के भरोसे का गंभीर उल्लंघन है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License