NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
चमोली आपदा : सर्वोच्च न्यायालय नियुक्त विशेषज्ञ के अनुसार चार धाम परियोजना भी हो सकती है बड़ी तबाही का कारण
रवि चोपड़ा ने सर्वोच्च अदालत को लिखे अपने पत्र में आगाह किया है कि "हिमालय में गहन और अपरिवर्तनीय इकोलोजिकल क्षति को अनदेखा या ख़ारिज किया गया तो हमें आने वाली पीढ़ियों में इसके भयंकर प्रभाव को झेलना पड़ेगा।"
सीमा शर्मा
19 Feb 2021
Translated by महेश कुमार
चमोली आपदा

उत्तराखंड के मशहूर पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा ने सुप्रीम कोर्ट को चार धाम योजना के दौरान पर्यावरण संबंधी चिंताओं के उल्लंघन की शिकायत करते हुए विस्तार से एक पत्र लिखा है। चोपड़ा, जो जलविद्युत परियोजनाओं पर सर्वोच्च अदालत द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ निकाय (ईबी) और उत्तराखंड में 889 किलोमीटर चार धाम परियोजन (सड़क चौड़ीकरण परियोजना) पर उच्चाधिकार समिति (एचपीसी) का नेतृत्व कर रहे हैं ने आशंका व्यक्त की है कि आने वाले वक़्त में राज्य में चमोली जैसी बाढ़ या आपदाएँ आ सकती हैं। 

चोपड़ा के नेतृत्व में काम कर रही ईबी ने 2013 में केदारनाथ जलप्रलय के प्रभाव को कम करने के लिए 24 मौजूदा और निर्माणाधीन हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट (HEP) की भूमिका का मूल्यांकन किया था और पाया कि उनमें से 23 ने स्थिति को खराब करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 

13 फरवरी के अपने पत्र में, चोपड़ा ने कहा कि उन्हें उत्तराखंड के चार धाम इलाके में हाल ही में हुई आपदा के मद्देनजर सर्वोच्च अदालत को लिखने पर मजबूर होना पड़ा है। एनएच 58 (ऋषिकेश-बद्रीनाथ राजमार्ग) के नीचे अलकनंदा घाटी में बाढ़ का पानी घुसने से पहले ऋषिगंगा और धौलीगंगा (पश्चिम) नदी की घाटियों में दो बांध नष्ट हुए और एक सस्पेंशन पुल बह गया था।

उन्होंने कहा कि उन्हें 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद मुझे ये अवसर मिला था कि में ईबी की अध्यक्षता करूँ- सर्वोच्च अदालत के एक आदेश पर-मुझे जलविद्युत परियोजनाओं (एचईपी) के कारण हिमालय में पर्यावरणीय नुकसान और आपदा के दौरान उनकी भूमिका का आकलन करने के लिए कहा गया था। गौर करें कि ये सारी की सारी एचईपी चार धाम परिजना घाटियों में स्थित हैं।

अप्रैल 2014 में प्रस्तुत की गई ईबी रिपोर्ट ने पैरागलेशियल जोन के संभावित खतरे को उजागर किया था, मुख्य सेंट्रल थ्रस्ट (एमसीटी) की उत्तर की घाटियों को ज़ोर देकर बताया गया था कि वे आपदा-ग्रस्त हैं। (मेन सेंट्रल थ्रस्ट एक बड़ा भूगर्भीय फ़ौल्ट है जहां इंडियन प्लेट हिमालय के साथ यूरेशियन प्लेट के नीचे चली जाती है।)

ईबी ने सिफारिश की थी कि एचईपी को इन घाटियों में नहीं बनाया जाना चाहिए। इलाके के दौरों, वैज्ञानिक प्रकाशनों, सरकारी रिपोर्टों और चश्मदीदों की रिपोर्ट के आधार पर, ईबी रिपोर्ट ने एचईपी के निर्माण के कारण गंगा नदी प्रणाली के हिमालयी इकोलोजी में अपरिवर्तनीय क्षति के सबूत पेश किए थे और 2013 की बाढ़ के कारण विनाशकारी प्रभाव में उनकी भूमिका दर्ज़ की थी। ईबी की सिफारिशों को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने स्वीकार कर लिया गया था और 5 दिसंबर, 2014 के अपने हलफनामे के माध्यम से अदालत के सामने उसे रखा गया था।

टिहरी बांध परियोजना में व्याप्त कमियों सहित सभी मौजूदा परियोजनाओं में बाढ़ से संबंधित चिंताओं को भी उजागर किया गया था और ईबी ने बाढ़ चेतावनी तंत्र के विकास और उसकी स्थापना के लिए सिफारिशें भी की थीं। चोपड़ा ने कहा कि अगर इन चिंताओं को संबोधित किया जाता और ईबी की सिफारिशों को अपनाया गया होता तो चमोली जिले में ऋषि गंगा और तपोवन विष्णुगाड परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर हुई जान-माल की हानि से बचा जा सकता था।

उन्होंने कहा कि 24 प्रस्तावित एचईपी परियोजनाओं पर सर्वोच्च अदालत के स्टे के बावजूद, जब जमीनी स्तर के निर्माण कार्य शुरू भी नहीं हुए थे, दुर्भाग्य से, सभी निर्माणाधीन परियोजनाओं के निर्माण कार्य बिना किसी रोक-टोक के जारी रहे। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की कीमती इकोलोजी और नाजुकता को देखते हुए, संबंधित अधिकारियों को इन परियोजनाओं पर विचार करना चाहिए था। उन्होंने जोर देकर कहा कि 7 फरवरी की आपदा ने उनके डर और चेतावनी की पुष्टि की है। उन्होंने लिखा कि,'' पिछले सात वर्षों में इन खतरनाक बांधों के निर्माण पर सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं जोकि 200 से अधिक व्यक्तियों की मौत, घरेलू पशुओं और राष्ट्रीय संपत्ति के विनाश के साथ समाप्त हो गए हैं।''

हालांकि, अभी तक निर्माणाधीन या चालू परियोजनाओं पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है। उन्होंने कहा कि अगर सर्वोच्च अदालत ने स्टे नहीं दिया होता तो ऋषिगंगा एचईपी के ऊपर और नीचे की तीन और निर्माणाधीन परियोजनाओं से बाढ़ के प्रभाव को कई गुना बढ़ा दिया होता।

चार धाम परियाजना पर अदालत का ध्यान केन्द्रित करते हुए, उन्होंने लिखा कि कई पुराने भूस्खलन-वाले स्थान और खंड, जहाँ ढलान की स्थिरता अनिश्चित है, जो तीन चार धाम राजमार्गों पर मौजूद हैं और जिनकी पहचान रक्षा मंत्रालय (MoD) ने डीफेंस फीडर सड़कों के रूप में की है। एचपीसी को पेश किए गए सड़क, परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) के आंकड़े 574 किमी (उत्तर प्रदेश के ऋषिकेश से एनएच-94 ऋषिकेश से उत्तरकाशी, एनएच-58 ऋषिकेश से माना और एनएच-125 टनकपुर से पिथौरागढ़ तक) के लंबे मार्ग 161 संवेदनशील स्थानों की पहचान की है जो लोकेशन हर 3.5 कि.मी. पर मौजूद है। 

31 दिसंबर, 2020 को उच्चतम न्यायालय को दी गई तीन सदस्यीय रिपोर्ट में इन तीन राजमार्गों पर 42 स्थानों को सूचीबद्ध किया गया था, जहां 2020 के मानसून के महीनों में लगातार रुकावटें देखी गईं। 2020 के शेष महीनों के दौरान कई अन्य रुकावटें भी देखी गईं थी। 

 “मेरे और दो सदस्यों द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में इस बात का दृढ़ता से तर्क दिया गया है कि राजमार्गों को चौड़ा करने की तुलना में आपदाओं के खिलाफ काम करना अधिक महत्वपूर्ण है। अभी तक ढलान के स्थिरीकरण का काम पर्याप्त नहीं हुआ है, जो लगातार विफलताओं को दर्शाता है और उसके कारण सड़क बंद हो जाती है। अत्यधिक पेड़ की कटाई, भूस्खलन, सड़क निर्माण और मलबे से ढलान और नदियों के प्रदूषित होने का खतरा होता है”। उन्होंने कहा कि आपदा की संभावना वाले क्षेत्र की संवेदनशील प्रकृति को पहचानने के बजाय, रोड, ट्रांसपोर्ट और हाइवे मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय अपने निर्णय बदलते रहते हैं। 

चोपड़ा ने इस तरह की प्रवर्तियों का हवाला देते हुए कहा कि मार्च 2018 में, रोड, ट्रांसपोर्ट और हाइवे मंत्रालय ने विशेष रूप से हिमालयी क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्गों के लिए 5.5 मीटर टार की सड़क की चौड़ाई को अधिसूचित किया था, और 2012 की अपनी पहली अधिसूचना में संशोधन किया था जिसमें सभी राष्ट्रीय राजमार्गों की टार सड़क की चौड़ाई 10 मीटर परिभाषित थी। हालांकि, रक्षा मंत्रालय ने पिछले साल 27 नवंबर के अपने आवेदन में सेना की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए 7 मीटर की कैरिजवे चौड़ाई के साथ एक डबल लेन सड़क बनाने के लिए कहा था।

“अब रोड, ट्रांसपोर्ट और हाइवे मंत्रालय ने 2012 के सर्कुलर के अपने पुराने स्टेंडर्ड को (10 मीटर टारयुक्त सरफेस) पर भरोसा करके पिछले साल 15 दिसंबर को 2018 के सर्कुलर में संशोधन के माध्यम से अपना विचार फिर से बदल दिया है। यह निर्णय 2018 की उसकी खुद की अधिसूचना में दिए तर्क और साक्ष्य को पलट देता है।

गौर कीजिए सड़क को अधिक चौड़ा करने के लिए ढलान को ज्यादा काटना पड़ेगा, अधिक पेड़ काटने होंगे, और इससे अधिक भूस्खलन होंगे और नतीजतन मिट्टी का कटाव होगा और नदियों में अधिक कीचड़ बहेगी। 

चोपड़ा ने आगे लिखा है कि हाल ही में जो आपदा आई है वह एमसीटी क्षेत्र के उत्तर में हुई है, जो भूस्खलन, फ्लैश बाढ़ और भूकंप के मामले में अत्यधिक संभावित क्षेत्र है। उन्होंने आगे कहा कि 'भारत-चीन सीमा के लिए बनी रक्षा सड़क का एक हिस्सा और उस सड़क पर ऋषिगंगा नदी के ऊपर बना एक पुल बह गया है, जिससे क्षेत्र में आपदा के खिलाफ काम करने का हमारा तर्क साबित होता है। वे लिखते हैं कि वनों की कटाई, ढलान काटने से या उसे नष्ट करने, सुरंग बनाने से नदियों के क्षतिग्रस्त होने से या अत्यधिक पर्यटन आदि जैसी बड़ी गड़बड़ियों के कारण इस क्षेत्र में अस्थिरता और आपदा की संभावनाएं बहुत अधिक बढ़ जाती है, इस इलाके के आस-पास के ग्लेशियरों पर इस तरह की गतिविधियों के संचयी प्रभाव को अनदेखा नहीं किया जा सकता है,"। 

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में 13 अगस्त, 2013 को हुई केदारनाथ त्रासदी के मामले में “उत्तराखंड राज्य में बड़ी संख्या में पनबिजली परियोजनाओं की बढ़ती संख्या” पर चिंता व्यक्त की थी और कहा था कि “बांधों, सुरंगों के निर्माण के लिए ब्लास्टिंग, पावरहाउस, कीचड़ बहाने, माइनिंग, वनों की कटाई आदि जैसे घटकों से इको-सिस्टम पर संचयी प्रभाव” पड़ता है जिसकी अभी वैज्ञानिक रूप से जांच की जानी बाकी है।”

चार धाम परियायोजना शुरू कर दी हुई, लेकिन अभी तक इसका संचयी प्रभाव आकलन भी नहीं किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर एचपीसी बनाकर एक समान चिंता व्यक्त करने के की पहल की है। उन्होंने कहा कि यह चिंता चार धाम क्षेत्र में संवेदनशील हिमालयी इकोलोजों के पर्यावरणीय क्षरण या नुकसान को कम करने के लिए जरूरी है।

चोपड़ा ने आगाह किया कि "इस तरह हिमालय को नुकसान पहुंचाने और अपरिवर्तनीय इकोलोजी को नुकसान को नजरअंदाज और खारिज करने से हमें और आने वाली पीढ़ियों को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ेंगे", इसलिए परियोजना में शामिल संबंधित मंत्रालयों को ऐसे किसी भी प्रयास से बचने की जरूरत है। 

अपने पत्र में, उन्होंने कहा कि यह "अत्यधिक खेदजनक" बात है कि 15 जनवरी को दिए गए अपने हलफनामे में, रक्षा मंत्रालय ने असंवेदनशीलता के उद्देश्य को आरोपित कर दिया था और अदालत से मंत्रालय को इस तरह के अभियोग को वापस लेने को कहा है।

 “हमारा विचार गंभीर रूप से हिमालयी इकोलोजी की रक्षा के बारे में है, जो सर्वोच्च न्यायालय की भी चिंता है। यह मानने के बजाय कि हमारी रिपोर्ट उपलब्ध सबूतों/साक्ष्यों के वैज्ञानिक  विश्लेषण और 2013 में हुई त्रासदी पर आधारित है, यह अत्यंत खेदजनक है कि 15 जनवरी के अपने हलफनामे में, एमओडी ने असंवेदनशीलता के उद्देश्य को आरोपित करने का आग्रह किया है। यह न्यायालय एमओडी से इस तरह के अभियोग को वापस लेने के लिए कह सकता है। हम इस बात पर जोर दे सकते हैं कि रक्षा मंत्रालय के हाल ही के हलफनामे में ऐसे कोई ठोस तर्क मौजूद नहीं है, जिससे कि हम हिमालय के मामले में मौजूद गहन और अपरिवर्तनीय इकोलोजिकल क्षति को अनदेखा और खारिज करें, जो कि हमें और आने वाली पीढ़ियों को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा,'' पत्र समाप्त।   

लेखक, स्वतंत्र पत्रकार है जो पर्यावरण, वन्य जीवन, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक और लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

Chamoli Disaster: SC Appointed Expert Says Char Dham Project May Cause Further Catastrophes

UTTARAKHAND
Uttarakhand disaster
Char Dham Pariyojana
Char Dham Project
Chamoli disaster
Chamoli Flash Flood
Rishi Ganga
KEDARNATH
Kedarnath Tragedy
Environment
climate change

Related Stories

गर्म लहर से भारत में जच्चा-बच्चा की सेहत पर खतरा

उत्तराखंड के ग्राम विकास पर भ्रष्टाचार, सरकारी उदासीनता के बादल

मज़दूर वर्ग को सनस्ट्रोक से बचाएं

लू का कहर: विशेषज्ञों ने कहा झुलसाती गर्मी से निबटने की योजनाओं पर अमल करे सरकार

उत्तराखंड: क्षमता से अधिक पर्यटक, हिमालयी पारिस्थितकीय के लिए ख़तरा!

मध्यप्रदेशः सागर की एग्रो प्रोडक्ट कंपनी से कई गांव प्रभावित, बीमारी और ज़मीन बंजर होने की शिकायत

लगातार गर्म होते ग्रह में, हथियारों पर पैसा ख़र्च किया जा रहा है: 18वाँ न्यूज़लेटर  (2022)

‘जलवायु परिवर्तन’ के चलते दुनियाभर में बढ़ रही प्रचंड गर्मी, भारत में भी बढ़ेगा तापमान

दुनिया भर की: गर्मी व सूखे से मचेगा हाहाकार

उत्तराखंड : ज़रूरी सुविधाओं के अभाव में बंद होते सरकारी स्कूल, RTE क़ानून की आड़ में निजी स्कूलों का बढ़ता कारोबार 


बाकी खबरें

  • Dalit Movement
    महेश कुमार
    पड़ताल: पश्चिमी यूपी में दलितों के बीजेपी के ख़िलाफ़ वोट करने की है संभावना
    17 Jan 2022
    साल भर चले किसान आंदोलन ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी समीकरण बदल दिए हैं।
  • stray animals
    सोनिया यादव
    यूपी: छुट्टा पशुओं की समस्या क्या बनेगी इस बार चुनावी मुद्दा?
    17 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा मवेशी हैं। प्रदेश के क़रीब-क़रीब हर ज़िले में आवारा मवेशी किसानों, ख़ास तौर पर छोटे किसानों के लिए आफत बन गए हैं और जान-माल दोनों का नुकसान हो रहा है।
  • CPI-ML MLA Mahendra Singh
    अनिल अंशुमन
    झारखंड: एक विधायक की मां जीते जी नहीं दिला पायीं अपने पति के हत्यारों को सज़ा; शहादत वाले दिन ही चल बसीं महेंद्र सिंह की पत्नी
    17 Jan 2022
    16 जनवरी 2005 को झारखंड स्थित बगोदर के तत्कालीन भाकपा माले विधायक महेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई थी। 16 जनवरी को ही सुबह होने से पहले शांति देवी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उन्हें जीते जी तो…
  • Punjab assembly elections
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पंजाब विधानसभा चुनाव की नई तारीख़, अब 20 फरवरी को पड़ेंगे वोट
    17 Jan 2022
    पंजाब विधानसभा चुनाव की नई तारीख़ घोषित की गई है। अब 14 फरवरी की जगह सभी 117 विधानसभा सीटों पर 20 फरवरी को मतदान होगा।
  • Several Delhi Villages
    रवि कौशल
    भीषण महामारी की मार झेलते दिल्ली के अनेक गांवों को पिछले 30 वर्षों से अस्पतालों का इंतज़ार
    17 Jan 2022
    दशकों पहले बपरोला और बुढ़ेला गाँवों में अस्पतालों के निर्माण के लिए जिन भूखंडों को दान या जिनका अधिग्रहण किया गया था वे आज तक खाली पड़े हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License