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भारत
राजनीति
बाल अधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का परीक्षण किया, अल्पसंख्यक समूह की अगले क़दम की योजना
"....ऐसा पाया गया कि अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों या स्कूलों में जो बच्चे दाख़िल थे, वे दूसरे बच्चों की तरह सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे थे क्योंकि उनके शिक्षण संस्थानों को आरटीई के प्रावधानों से छूट प्राप्त थी और अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों का लाभ उठा रहे थे।"
रोसम्मा थॉमस
18 Aug 2021
बाल अधिकार आयोग

राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग द्वारा 'अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों की शिक्षा पर संविधान के अनुच्छेद 21 (A) के संदर्भ में 15(5) में दी गई छूटों का प्रभाव' शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है। इस रिपोर्ट के आने के बाद से ही संस्था पर सवाल उठने शुरू हो गए हैं और संस्था की इस बारे में विशेषज्ञता पर सवालिया निशान लग रहे हैं।

ईसाई समुदाय के अहम नेता डॉ जॉन दयाल का कहना है कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में निपट चुका है, तब बाल संरक्षण आयोग को इस संबंध में कौन से अधिकार हैं। डॉ जॉन दयाल का कहना है कि NCPRC का गठन मूलत: बच्चों के सम्मान को बनाए रखने और यह तय करने के लिए हुआ था कि उनकी परवरिश स्वतंत्रता के माहौल में बिना शोषण या बुरे व्यवहार के हो। दयाल ने सवाल उठाते हुए पूछा कि क्यों बाल संरक्षण के लिए बनाई गई संस्था सरकार की दूसरी संस्थाओं के काम या सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का पुनर्परीक्षण कर रही है। वह कहते हैं, "यह दिखाता है कि मौजूदा सत्ता के दौरान सभी आयोगों का कितना राजनीतिकरण हो चुका है।"

NCPRC की अध्यक्ष प्रियंका कानूनगो NCPRC की रिपोर्ट के परिचय में लिखती हैं, "....2014 में.... माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि RTE कानून को अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित और अपने मनमुताबिक़ चलाए जाने वाले संस्थानों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, मतलब कोर्ट ने कहा कि RTE कानून अल्पसंख्यक संस्थानों पर लागू नहीं होगा। चूंकि यह फ़ैसला बच्चों के अधिकार और अल्पसंख्यकों के अधिकारों में विरोधाभास की तस्वीर पेश कर रहा है, तो यह देखा गया है कि इन अल्पसंख्यक संस्थानों में दाखिए किए गए कई बच्चे, दूसरे बच्चों की तरह सुविधाओं का लाभ नहीं उठा पाते, क्योंकि जिस संस्थान में वह पढ़ रहे हैं, उसे कानून के तहत छूट मिली हुई है और अल्पसंख्यक संस्थान के अधिकारों का लभा ले रहा है।" 

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा शैक्षणिक संस्थानों को स्थापित और उनके प्रशासन के अधिकार की रक्षा करता है। यह अल्पसंख्यक समुदाय भाषा या धर्म के आधार पर हो सकते हैं। 2012 में धार्मिक शिक्षा देने वाले शैक्षणिक संस्थानों को RTE कानून से छूट दे दी गई, जिसके तहत किसी निजी शैक्षणिक संस्थान में 25 फ़ीसदी सीटें कमज़ोर आर्थिक वर्ग से आने वाले छात्रों के लिए आरक्षित की जाती हैं।

भेदभाव के खिलाफ़ संरक्षण देने वाला भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15(5) कहता है कि सरकार सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछले वर्ग, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। लेकिन अल्पसंख्य समुदाय द्वारा चलाए जाने वाले शैक्षणिक संस्थानों को इससे भी छूट दी गई है। 

कानूनगो ने NCPCR की रिपोर्ट में कहा है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के तुरंत बाद 2015 में मशविरा किया गया था। कुलमिलाकर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का प्रभाव समझने के लिए छात्रों और शिक्षकों के साथ 16 बार सलाह-मशविरा किया गया। NCPCR द्वारा जो रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, उसे क्वालिटी काउंसिल ऑफ इंडिया ने प्रकाशित किया है, जो गैर-लाभकारी सोसायटी है, मतलब यह सरकार के तहत नहीं आता। लेकिन इसकी वेबसाइट के मुताबिक़, सोसायटी "अफ़सरशाहों को समस्याओं के समाधान" में मदद करती है।

NCPCR का सारांश कहता है, "RTE कानून सभी सरकारी स्कूलों, सरकारी मदद प्राप्त गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों और सरकारी मदद ना पाने वाले गैर-अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू होता है। यह अल्संख्यक स्कूलों पर इसलिए लागू नहीं होता क्योंकि RTE कानून, विशेषतौर पर धारा 12(1)(c) के बारे में माना गया कि यह संविधान के अनुच्छेद 30(1) में दिए गए मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन करता है। अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को छूट दिए जाने के पीछे अल्पसंख्यकों को अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति के संरक्षण के लिए समान मौके दिए जाने का तर्क दिया गया। इस छूट के नतीज़तन अल्पसंख्यक संस्थानों में पढ़ने वाले सभी धार्मिक और भाषायी समुदायों को RTE अधिनियम, 2009 में दिए गए मूलभूत अधिकारों से वंचित रहना पड़ रहा है। इसका अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले छात्रों पर बहुत प्रभाव पड़ता है, क्योंकि दिशा-निर्देशों के आभाव में अल्पसंख्यक स्कूल मनमुताबिक काम कर रहे हैं, छात्रों के प्रवेश, शिक्षकों की भर्ती, पाठ्यक्रम को लागू करने और शिक्षाशास्त्र में मनमाफ़िक शर्तें थोप रहे हैं।"

सारांश में एकतरफा सामान्यीकरण करते हुए कहा गया है- जहां कुछ संस्थान "कुलीनों के कोकून" बन गए हैं, वहीं दूसरे "वंचित छात्रों की अलग-थलग बस्तियां" हो गए हैं। इस अध्ययन का उद्देश्य "ऐसा रास्ता बनाना है, जिससे अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे एक समावेशी माहौल में अध्ययन करने में सक्षम हो पाएं..." बताया गया है कि इस अध्ययन के लिए कथित उपलब्ध रिपोर्टों और आंकड़ों के अलावा, भारत में 23,487 अल्पसंख्यक संस्थानों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। 

2011 की जनगणना के मुताबिक़ भारत में ईसाई आबादी की कुल आबादी में हिस्सेदारी 2।3 फ़ीसदी है। NCPCR की रिपोर्ट दर्शाती है कि भारत की कुल धार्मिक आबादी में ईसाईयों की संख्या 11.54 फ़ीसदी है और वे देश के कुल धार्मिक अल्पसंख्यक स्कूलों में 71.96 फ़ीसदी का संचालन करते हैं। यह पाया गया कि अल्पसंख्यकों द्वारा चलाए जाने वाले इन स्कूलों में 62.50 फ़ीसदी छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। रिपोर्ट में बताया गया कि मुस्लिम समुदाय द्वारा चलाए जाने वाले अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों में 75 फ़ीसदी से ज़्यादा छात्र मुस्लिम समुदाय से आते हैं। जैन और ईसाई समुदाय द्वारा जो स्कूल चलाए जाते हैं, उनमें उनके ही समुदाय से बहुत कम बच्चे आते हैं। "अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले कुल छात्रों में सिर्फ़ 8.76 फ़ीसदी ही सामाजिक और आर्थिक पिछड़े तबके से आते हैं।" फिर रिपोर्ट में दोहराया गया कि ऐसे स्कूलों में गरीब़ छात्रों के लिए किए गए प्रावधानों से छूट दी गई है।

अंतिम तौर पर रिपोर्ट समुदायों द्वारा इन स्कूलों के संचालन पर "पुनर्परीक्षण" करने की सलाह देती है और इन संस्थानों को RTE अधिनियम के दायरे में लाने की सलाह देती है।

सुप्रीम कोर्ट के वकील जोस अब्राहम बताते हैं, "मूल तौर पर शिक्षा का अधिकार अधिनियम भारत के सभी स्कूलों पर लागू था। लेकिन इसकी वैधानिकता को चुनौती दी गई और सुप्रीम कोर्ट ने 2012 में फ़ैसला दिया कि RTE अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 30 (1) के तहत दिए गए अल्पसंख्यक अधिकारों का हनन करता है और इसलिए यह अल्पसंख्यक संस्थानों, चाहे उनको सरकारी मदद मिलती हो या नहीं, उनके ऊपर लागू नहीं होगा।" उन्होंने आगे बताया कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को कानून की तरह लिया गया, जो सभी पर लागू था। एक बहुत अच्छे तरीके से तय हो चुके कानूनी स्थिति को कमज़ोर संबंधी तर्क कोर्ट में नहीं टिक पाएंगे।

गुजरात में पहले से ही अल्पसंख्यक संस्थानों के अपने शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासन और शिक्षकों को भर्ती करने की स्वतंत्रता पहले ही ख़तरे में है, जहां अल्पसंख्यक स्कूलों के संगठन ने गुजरात माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा (संशोधन) अधिनियम, 2021 को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। स्कूलों का डर है कि यह अधिनियम बिना सरकारी हस्तक्षेप के उनके प्रशासन की ताकत को छीन लेगा। 

NCPCR प्रमुख को एक खुले ख़त में वरिष्ठ पत्रकार ए जे फिलिप ने "लोगों को झटका देकर हैराने" के लिए उनकी तारीफ की है। फिलिप ने आयोग का अक्टूबर, 2020 का एक आकस्मिक आदेश याद दिलाया जिसमें उन बाल सुधार गृहों को बंद करने का आदेश दे दिया गया था, जहां अनाथ बच्चों या भागे हुए बच्चों या छोटी-मोटी घटनाओं में पुलिस द्वारा पकड़े गए बच्चों को रखा गया हो। इस तरह के बच्चों को जिले की बाल कल्याण समिति बाल सुधार गृह भेजती थी, जहां उन्हें रहने के लिए घर और 18 साल की उम्र तक सरकार द्वारा शिक्षा का प्रबंध किया जाता है। इन गृहों को बंद कर और बच्चों को उनके परिवारों को वापस या उन्हें गोद लेने के लिए सौंपने का प्रबंध करना एक ऐसा तरीका था, जिससे आयोग सरकार का पैसा बचा सकती थी। इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और इसे लागू नहीं किया गया। फिलिप ने ऐसे पुराने वाकिये भी याद दिलाए, जहां कोर्ट ने अल्पसंख्यक संस्थानों के प्रशासन में सरकारी हस्तक्षेप के खिलाफ़ फैसला दिया है।

मुस्लिम छात्र संगठन (मुस्लिम स्टूडेंट्स ऑर्गेनाइज़ेशन) की राष्ट्रीय अध्यक्ष शुजात अली कादरी कहती हैं, "एक अनियमित सर्वे अलग-अलग अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले इतने ज़्यादा संस्थानों के साथ न्याय नहीं कर सकता। यह मामला अल्पसंख्यक संस्थानों के पाले में छोड़ देना चाहिए कि क्या वो RTE के दायरे में आना चाहते हैं या नहीं। पहले से ही यह संस्थान स्थानीय समुदायों की सेवा कर रहे हैं ना कि सिर्फ़ अपने समुदायों के बच्चों की। गैरजरूरी और न्यायोचित ना ठहराए जाने वाले हस्तक्षेप से सिर्फ़ आपसी टकराव बढ़ेगा।"

नई दिल्ली में एक कैथोलिक स्कूल से रिटायर होने वाले शिक्षक, जो अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं, उन्होंने नाम ना छापने की शर्त पर बताया, "आज सरकार का हर संस्थान ख़तरे में है। यह उन व्यक्तिगत लोगों का हौसला ही है, जो अपने सम्मान को बेचने से इंकार कर रहे हैं, यही चीज हमें इस दलदल से बाहर लाएगी। अगर सरकार असफल हुई है, तो हम भी हुए हैं। आखिरकार लोकतंत्र इसी भरोसे पर तो आधारित है कि सामान्य लोगों में भी बेहद विशेष संभावनाएं होती हैं।"

लेखिका पुणे में रहने वाले स्वतंत्र पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Child Rights Body Scrutinises SC Order as Minority Groups Plan Next Move

 

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