NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
पर्यावरण
भारत
राजनीति
उत्तर बंगाल में प्रकृति की भयावहता से नजदीक का अनुभव
उत्तर बंगाल पिछले हफ्ते पहाड़ियों में भारी बारिश और भूस्खलन के चलते सैकड़ों लोग फंस गए थे। यहां पढ़िए इस अनुभव से गुजरने वाले व्यक्ति की आपबीती।
अबिन मित्रा
25 Oct 2021
Close Encounter with Nature

दुआर्स, पश्चिम बंगाल: दुर्गा पूजा त्योहार के खत्म होने के ठीक  बाद दुआर्स जाने की योजना बनी। हमारी योजना गोरूमारा राष्ट्रीय उद्यान पहुंचने की थी, जो मारुति नदी के किनारे स्थित है। वहां भीतर एक इकोस्टे था, जहां हम दो दिन रुके और फिर वहां से 70 किलोमीटर दूर लावा और रिश्यप चले गए। 

सुबह से ही हल्की फुल्की बौछार हो रही थी, जैसे ही हम गोरूबाथन चाय बागानों के पास पहुंचे, बारिश तेज हो गई। यह मेरी पर्वतों की पहली यात्रा नहीं थी, ना ही मैं पहली बार पहाड़ियों में बारिश देख रही थी। किसी को भी बारिश के दौरान पहाड़ियों में गाड़ी चलाते वक्त अतिरिक्त सावधानी रखनी चाहिए। हमारे ड्राइवर सद्दाम भाई भी लावा पहुंचाने तक गाड़ी चलाने में बहुत सावधानी रखते रहे।

तब तक सबकुछ ठीक लग रहा था। दिक्कत तब शुरू हुई जब हमने पहाड़ी से उतारना शुरू किया। तब हम एक चाय की दुकान पर रुक गए ताकि जगह के बारे में थोड़ा जान सकें।

जब हम यह विचार कर ही रहे थे कि रिश्यप तक जाया जाए या नहीं, तभी हमने कुछ कारों को वापस आते देखा। हर कोई हमें चेतावनी दे रहा था कि रिश्यप का रास्ता बहुत खतरनाक है । अब दोपहर हो चुकी थी, अब सबसे बेहतर यह होता कि हम दोपहर के खाने की जगह तलाशते। अब बारिश भी तेज होती जा रही थी, तब हमने खाने की एक छोटी सी जगह खोज ली।

अब लगभग शाम हो चुकी थी। और हमने पहाड़ी से उतारना शुरू कर दिया। रिश्यप को छोड़ते हुए हमने गोरूमारा जाना तय किया। लेकिन लावा से 5 किलोमीटर पहले हम जाम में फंस गए। हमें आगे सड़क दिखाई नहीं दे रही थी। सिर्फ दिख रहा था चट्टानों और मिट्टी का जमावड़ा, जिसने रोड को पूरी तरह बंद कर दिया था।

अब हमारे पास इंतेज़ार करने के अलावा कोई चारा नहीं था, क्योंकि बारिश तेज हो गई थी और अंधेरा घिर आया था। उस जगह पर डेढ़ घंटे फंसे रहने के बाद एक जेसीबी मशीन आई। जिसने मलबा हटाकर कारों को निकलने की जगह बनाई। कारें अंधेरे और भारी बारिश के बीच चल रही थीं। हमें सिर्फ घने काले पहाड़ी जंगल नजर आ रहे थे, जो बारिश के बीच हमें घूर रहे थे। बगल में एक नदी थी। जैसे दोनों में यह दिखाने की शर्त लगी हो कि कौन ज्यादा खतरनाक है। हमारे फॉग लाइट भी जवाब दे गए। हमें सिर्फ कारों की पिछली लाइट दिख रही थी। लेकिन हमारी यात्रा फिर रुक गई और हमें सिर्फ कारों की लंबी कतार दिखाई दे रही थी। पर यह कितनी लंबी थी, हम यह अंदाजा नहीं लगा पा रहे थे।

कई घंटे निकल गए और हम अब भी कार के भीतर फंसे हुए थे। कुछ समय निकलने के बाद मैं कार से बाहर आया और दिक्कत को पता लगाने की कोशिश की। आश्चर्यजनक तौर मैं सड़क पर नहीं, बल्कि पानी में उतरा। पहाड़ से करीब एक फीट तक गहराई का पानी नीचे आ रहा था। हमारे कार के टायर आधे से ज्यादा इसमें डूबे हुए थे।

किसी तरह मैं आगे बढ़ा और मैंने पाया कि एक बड़े चीड़ के पेड़ के सड़क पर गिरने के चलते हमारा रास्ता बंद है। पेड़ इतना बड़ा था कि हम सड़क के उस पार नहीं देख पा रहे थे। मैंने आगे की कार वाले से हेडलाइट चालू करने की अपील की, ताकि मैं फोटो ले सकूं।

तब हमारे कार चालक ने वापस जाने की सलाह दी। अब हमारे पास ना तो खाना था, ना पानी और ना ही हमें पता था कि सड़क कब ठीक होगी। हमें समझ नहीं आ रहा था कि आगे क्या करें।

आगे की सड़क ठीक ना दिखाई देने के चलते हम वापस लौट गए। हम गाड़ी चलाते रहे और लावा पहुंच गए। लेकिन यह हमारी परेशानियों का खात्मा नहीं था। लावा में रात में एक भी व्यक्ति दिखाई नहीं दे रहा था। ऊपर से बिजली चले जाने के चलते चारों तरफ अंधेरा था। किसी तरह हमें एक होमस्टे मिला।

लेकिन हमारी कार पानी से भरी सड़क पर फंस गई। हमने इसे बाहर निकालने की कोशिश की। लेकिन हम असफल रहे और हमें अगली सुबह तक इंतेज़ार करना पड़ा। होमस्टे वालाइन ने किसी तरह कुछ खाने का जुगाड किया, इसके बाद हम अपने कमरों में चले गए।

लेकिन एक बजे हमारे दरवाजे पर तेज दस्तक हुई और हम जगे। हमें पता चला कि हमारे होमस्टे के पीछे बड़ा भूस्खलन हुआ है। हमसे पानी कार में वापस जाने को कहा गया। जल्द ही करीब पांच मिनट तक शोरगुल होता रहा, जो किसी तड़कती बिजली की आवाज की तरह था। लेकिन कोई भी बिजली इतनी देर नहीं तड़कती। यह भूस्खलन की आवाज थी। मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

होमस्टे में जाने के लिए हमने जो सड़क ली थी, अब वो मौजूद नहीं थी। मैं देख रहा था कि तेजी से ढहती ज़मीन के बीच मिट्टी पानी में  मिलती जा रही थी। हमें सड़क में भी बड़ी दरार दिखाई दी। स्थानीय लोगों ने हमें सजग रहने की सलाह दी, हम रातभर जागते रहे।
डर और चिंता की रात गुजर गई और हमारा डर खत्म हो गया। चार घंटे में सुबह हो गई और हमने देखा कि रात में कितना नुकसान हुआ। हमारे होमस्टे के ठीक सामने तीन फीट मिट्टी धंस चुकी थी। हर कोई वहां रास्ता बनाने के लिए आया और कुछ लोग हमारे लिए खाना लाए। हमने एक दूसरी कार की मदद अपनी कार को निकालने के लिए ली।

अब हम थक चुके थे, हमने रात भी गीले कपड़ों में बिताई थी। आसपास हजारों पत्थर, कीड़े और बड़ी मात्रा में मिट्टी थी। फिर खबर आई कि जिस जगह से हम लौटे, वहां पर्यटकों से भरी एक कार पर बड़ा पत्थर गिरा।

कलिमपोंग में सड़क की हालत और भी खराब थी। पूरी सड़क पर भूस्खलन और ऐक्सिडेंट हुए थे। वापस लौटते वक़्त पापरखेती नाम की जगह पर 100 फीट गहरा गड्ढा था। पहाड़ों का जमीन के साथ संपर्क कट चुका था। मिट्टी और भूस्खलन को पार करने के बाद हम सड़क पर पहुंचे, वहां देखा कि हर जगह स्थिति काफी खराब थी।

होमस्टे के मालिक समेत सभी कर्मचारी सोच रहे थे कि पहाड़ से नीचे कैसे उतरा जाए। क्यूंकि सभी के लिए यह स्थिति नई थी। उन्होंने कभी इतनी बारिश और तबाही नहीं देखी थी। सुबह से शाम तक पूरे लावा में बिजली, पानी नहीं था। फोनों की बैटरी खत्म हो चुकी थीं। कुछ स्थानीय लोगों ने हमें बताया कि अब रोड खुल चुकी है।हमने किसी तरह कुछ खाया और गरूबाथन के रास्ते दुआर्स के लिए निकल गए।

हमने देखा स्थानीय कामगार सड़क को चालू करने के लिए बहुत मेहनत कर रहे थे। कार धीरे धीरे बढ़ रही थीं। आगे देखा कि चीड़ के पेड़ को काटकर 4-5 फीट चौड़ी रोड बनाई गई है। सड़कों पर कई जगह भूस्खलन हुआ था।

हमने देखा कि एक दिन पहले हमारे सामने जो सुंदर घर थे, उनमें से आधे 100 फीट गहरे गड्ढे में धंस गए हैं। पापरखेती के सामने सड़क जैसी कोई चीज ही नहीं है। हमारी छोटी कार किनारे किनारे चल रही थी।अब बारिश भी कम हो चुकी थी। ढाई घंटे में हम गुरूबाथन पहुंच गए।

शाम ढलते हम चाय बागानों से घिरे पहाड़ों में आ गए। हमारे ड्राइवर ने हमें आश्वस्त किया कि अब हम सुरक्षित हैं, क्योंकि चाय के पेड़ों के तने और जड़ें काफी मजबूत हैं, इसलिए पहाड़ नहीं फिसलेंगे। हम दुआर्स वापस आ गए।

खतरनाक? आपदा? उत्साहित? सुन्दर? भयावह? विध्वंसक? प्रकृति अपने कई रूपों में रहती है। वह सुंदर और खतरनाक दोनों हो सकती है।

मैं अपने एक बड़े अनुभव के साथ कोलकाता लौट आया। यह दो दिन मैं कभी नहीं भूलूंगा।
 
लेखक ग्राफिक आर्टिस्ट और सोशल मीडिया एक्टिविस्ट हैं। वे कोलकाता में रहते हैं।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Close Encounter with Nature’s Fury in the Hills of North Bengal

Dooars
Darjeeling Rains
North Bengal
Bengal landslides

Related Stories


बाकी खबरें

  • sc
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    पीएम सुरक्षा चूक मामले में पूर्व न्यायाधीश इंदु मल्होत्रा की अध्यक्षता में समिति गठित
    12 Jan 2022
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ‘‘सवालों को एकतरफा जांच पर नहीं छोड़ा जा सकता’’ और न्यायिक क्षेत्र के व्यक्ति द्वारा जांच की निगरानी करने की आवश्यकता है।
  • dharm sansad
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने का मामला: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस
    12 Jan 2022
    पीठ ने याचिकाकर्ताओं को भविष्य में 'धर्म संसद' के आयोजन के खिलाफ स्थानीय प्राधिकरण को अभिवेदन देने की अनुमति दी।
  • राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    विजय विनीत
    राय-शुमारी: आरएसएस के निशाने पर भारत की समूची गैर-वैदिक विरासत!, बौद्ध और सिख समुदाय पर भी हमला
    12 Jan 2022
    "आरएसएस को असली तकलीफ़ यही है कि अशोक की परिकल्पना हिन्दू राष्ट्रवाद के खांचे में फिट नहीं बैठती है। अशोक का बौद्ध होना और बौद्ध धर्म धर्मावलंबियों का भारतीय महाद्वीप में और उससे बाहर भी प्रचार-…
  • Germany
    ओलिवर पाइपर
    जर्मनी की कोयला मुक्त होने की जद्दोजहद और एक आख़िरी किसान की लड़ाई
    12 Jan 2022
    पश्चिमी जर्मनी में एक गांव लुत्ज़ेराथ भूरे रंग के कोयला खनन के चलते गायब होने वाला है। इसलिए यहां रहने वाले सभी 90 लोगों को दूसरी जगह पर भेज दिया गया है। उनमें से केवल एक व्यक्ति एकार्ड्ट ह्यूकैम्प…
  • Hospital
    सरोजिनी बिष्ट
    लखनऊ: साढ़ामऊ अस्पताल को बना दिया कोविड अस्पताल, इलाज के लिए भटकते सामान्य मरीज़
    12 Jan 2022
    लखनऊ के साढ़ामऊ में स्थित सरकारी अस्पताल को पूरी तरह कोविड डेडिकेटेड कर दिया गया है। इसके चलते आसपास के सामान्य मरीज़ों, ख़ासकर गरीब ग्रामीणों को इलाज के लिए भटकना पड़ रहा है। साथ ही इसी अस्पताल के…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License