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प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना का नोटिस हमारे लोकतंत्र का निर्णायक पल हो सकता है
सुप्रीम कोर्ट के वकील का जवाब कुछ विवादास्पद मामलों को सूचीबद्ध करता है, और उनका अपने दो ट्वीटस को लेकर माफ़ी मांगने से इंकार करने का अर्थ आने वाले समय में भीषण युद्ध के लिए रंगमंच को तैयार करने के समान है।
एजाज़ अशरफ़
05 Aug 2020
प्रशांत भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना का नोटिस हमारे लोकतंत्र का निर्णायक पल हो सकता है

लोगों के अधिकारों की रक्षा और देश के लोकतान्त्रिक ताने-बाने को बचाए रखने को लेकर अपनी लड़ाकू पहचान को लेकर मशहूर वकील प्रशांत भूषण के बारे में किसी को भी आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए कि उन्होंने जून में अपने दो ट्वीटस के लिए सर्वोच्च न्यायालय से माफ़ी माँगने से इंकार कर दिया है। जिसके लिए उन्हें अवमानना का नोटिस दिया गया है।

अवमानना के नोटिस के अपने जवाब में एक ट्वीट में तथ्यात्मक तौर पर गलत होने के लिए उन्होंने खेद व्यक्त किया था, लेकिन भूषण के मामले में इतना ही काफी है। अन्यथा उनके जवाब, ऐसे मामलों के लिए उदाहरणों के संकलन से भरे पड़े हैं, जोकि पिछले छह सालों के दौरान “सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा में गिरावट में योगदान दिया है।” भूषण के नैरेटिव से पता चलता है कि आपातकाल की तरह ही सर्वोच्च न्यायालय एक बार फिर से “संविधान और आमजन के मौलिक अधिकारों के संरक्षक की भूमिका में कार्य करने में असफल सिद्ध हुआ है।”

अपने जवाब में भूषण ने जिन कुछ मामलों का हवाला दिया है वे शुरू से ही विवादास्पद रहे हैं। क्योंकि इन मामलों में कुछ न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे। या क्योंकि उन्हें ऐसा महसूस होता है कि इन न्यायाधीशों ने केंद्र सरकार को या तो राहत पहुंचाने का काम किया था, या गरीबों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के प्रति “उदासीनता” दिखाई है। उनके जवाबों से ऐसा लगता है कि आगे की लड़ाई के लिए रंगमंच पूरी तरह से सज चुका है।

भूषण ने इन विवादास्पद मामलों का उद्धरण देते हुए एक वृहत्तर दार्शनिक बिंदू का हवाला दिया है- कि सर्वोच्च न्यायालय की आलोचना न्याय के प्रशासन के मार्ग को प्रशस्त करता है। ऐसा करने के लिए वे प्रख्यात न्यायविद एचएम सीरवाई की पुस्तक भारत का संवैधानिक कानून को उद्धृत करते हैं, जो कहती है- “....एक न्यायाधीश जो ऐसी सार्वजनिक घोषणाएं करता है जिससे उसकी निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं तो वह खुद से ही न्याय के प्रशासन के ख़िलाफ़ एक अपराधी साबित हो जाता है।”

अब चूँकि इस प्रकार के न्यायाधीश को तो सिर्फ महाभियोग की बेहद जटिल प्रकिया के जरिये ही पद से हटाया जा सकता है तो ऐसे में सीरवाई के विचार में “न्याय के हित में स्वयं इसकी आवश्यकता है कि इस प्रकार की सार्वजनिक उद्घोषणा की अक्षमता के ख़िलाफ़ सार्वजनिक तौर पर आलोचना होनी चाहिए।”

इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती कि सीरवाई क्या कहते जब वे देखते कि न्यायाधीश अरुण मिश्र ने जिन्होंने फरवरी माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वागत में उन्हें “बहुमुखी प्रतिभा का धनी”  घोषित किया था, “जो सोचते तो वैश्विक तौर पर हैं लेकिन उसे जमीनी स्तर पर प्रयोग में लाते हैं।” ज्ञातव्य हो कि न्यायमूर्ति मिश्रा सर्वोच्च्च न्यायालय की पीठ के उन तीन सदस्यों में से एक हैं, जिन्होंने दो ट्वीटस पर भूषण पर अवमानना का नोटिस जारी किया था, जिनमें से एक 29 जून को और दूसरा 27 जून को किया गया था।

29 जून के ट्वीट में कहा गया था: “सीजेआई [भारत के मुख्य न्यायाधीश] एक ऐसे समय में जब उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को लॉकडाउन मोड में डाल रखा था, और नागरिकों को उनके न्याय हासिल कर पाने के मूलभूत अधिकारों से वंचित कर, वे नागपुर राज भवन में एक बीजेपी नेता के 50 लाख [रुपये] की कीमत की मोटरसाइकिल की सवारी कर रहे थे!”

अपने जवाब में भूषण ने इस बात पर खेद जताया है कि वे इस बात का ध्यान रखने में असफल रहे कि मोटरसाइकिल उस दौरान ठहरी (standstill) हुई थी, इसलिए मुख्य न्यायाधीश शरद ए बोबडे को हेलमेट पहने रखने की बाध्यता नहीं थी। लेकिन इसके बाद वे अपने ट्वीट की तार्किकता पर लौटते हुए लिखते हैं: “जहाँ एक तरफ मुख्य न्यायाधीश... पिछले चार महीनों से कोविड महामारी के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय के नियमित कामकाज की अनुमति नहीं दे रहे थे, वहीं दूसरी तरफ वे सार्वजनिक स्थल पर अपने आस पास कई अन्य लोगों से घिरे पाए गए, वो भी बिना कोई मास्क पहने एक मोटरसाइकिल पर सवार नजर आते हैं। यह सब मुझे बेतुका लग रहा था।”

वे इसे बेतुका इस बिना पर कहते हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय के नियमित कामकाज के बाधित होने का मतलब था कि वे सभी जरुरी मामले- जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय में बंदियों द्वारा दाखिल की गई बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिकाएं या नागरिकता संशोधन अधिनियम और धारा 370 के निरस्तीकरण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई नहीं हो पा रही हैं। भूषण कहते हैं कि उनके विचारों की प्रतिध्वनि कुछ क़ानूनी संगठनों और एपी शाह जैसे पूर्व न्यायमूर्तियों के समर्थन में देखी जा सकती है।

अपने दूसरे ट्वीट के बचाव में वे लोहा लेने के लिए पहले की तुलना में जुझारू तेवर के साथ नजर आते हैं, जिसमें लिखा गया था: “भविष्य में जब इतिहासकार पिछले 6 वर्षों का जायजा लेंगे कि कैसे बिना किसी औपचारिक आपातकाल की घोषणा किये हुए भी भारत में लोकतंत्र को नष्ट कर दिया गया, तो वे इस तबाही में खासतौर पर सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका को चिह्नित करेंगे और उसमें भी विशेषकर पिछले 4 सीजेआई की भूमिका को लेकर सवालिया निशान खड़े होंगे।”

अंतिम चार मुख्य न्यायाधीशों में न्यायाधीश जेएस खेहर, दीपक मिश्र, रंजन गोगोई और बोबडे शामिल हैं। भूषण उन्हें “आयोगों और चूक” के कृत्यों द्वारा “हमारे लोकतंत्र के अनुकरण” की अनुमति प्रदान करने के लिए उन्हें दोषी करार देते हैं। और अपने आरोपों को साबित करने के लिए वे सुबूतों की एक फेहरिस्त प्रस्तुत करने के लिए तैयार दिखते हैं।

उनकी आलोचना की पृष्ठभूमि 2018 में प्रकाशित दो हारवर्ड प्रोफेसरों डॉ. डेनियल ज़िब्लाट और डॉ. स्टीवन लेवित्सकी द्वारा लिखित हाउ डेमोक्रेसीज डाई नामक बहुचर्चित पुस्तक से ली गई है। वे तर्क रखते हैं कि आधुनिक दौर में तख्तापलट द्वारा लोकतंत्र का गला नहीं घोंटा जाता, बल्कि चुनी हुई सरकारें ही खेल के नियमों में बदलाव लाकर इसे अंजाम तक ले जाती हैं। चुनी हुई सरकारों को यदि अलोकतांत्रिक स्वरूप अख्तियार करने से रोकना है तो उसके लिए दो संवैधानिक औजार हैं, जिनसे इस काम को किया जा सकता है।

भूषण के अनुसार “इनमें से एक यह है कि नागरिकों के कुछ ऐसे अनुल्लंघनीय अधिकार हैं, जिन्हें सरकार उनसे नहीं छीन सकती। दूसरा, राजनीतिक बहुमत को पूर्व स्थापित प्रक्रियाओं और संस्थाओं के जरिये अपनी शक्तियों को इस्तेमाल के जरिये करना चाहिए जिसे नजरअंदाज करके आगे बढना संभव नहीं है।” हालांकि उनका दावा है कि "पिछले छह वर्षों में कार्यपालिका और विधायिका" ने व्यवस्थित तौर पर लोकतंत्र को नष्ट करने का काम किया है "विशेष रूप से पिछले 4 सीजेआई के कार्यकाल के दौरान।"

यह इसलिए घटित हो सका क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय अपने संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के संवैधानिक कर्तव्य से पीछे हट चुकी है। भूषण कहते हैं “जब अत्याचार और बहुसंख्यकवाद ने देश में अपने पाँव गहराई से ज़माने शुरू कर दिए, तो न्यायालय ने उसके समक्ष अपने घुटने टेक डाले थे।“

सुबूत के तौर पर वे वे सर्वोच्च न्यायालय के कई महीनों से “बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका और कश्मीर में लॉकडाउन और इंटरनेट की सुविधा देने से इंकार करने की सुनवाई को नहीं सुनने की और इशारा करते हैं। जबकभी उन्हें सुना भी गया, तो तो उन्हें बिना किसी ठोस राहत के अक्सर स्थगित कर दिया गया।” वास्तव में यह ट्रेंड बोबडे के नवम्बर 2019 में मुख्य न्यायाधीश बनने से पहले से ही से बनी हुई थी।

उदाहरण के लिए मुख्य न्यायाधीश के तौर पर न्यायाधीश गोगोई ने भी “अनेकों कश्मीरियों के हिरासत में रखे जाने को लेकर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं की सुनवाई के प्रति अपनी अनिच्छा दिखाई थी।” यह उनके कार्यकाल की बात है जिसमें अनुच्छेद 370 को निरस्त कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद न्यायालय ने इस मसले को हल करने को लेकर कोई तत्परता नहीं दिखाई। भूषण इशारा करते हैं “इस प्रकार, देरी के जरिये सरकार की कार्यवाही को एक तरह से जायज ठहराने और उसे उलटने को कठिन बना देने का ही काम किया गया था।”

वे दावा करते हैं कि इसके विपरीत मुख्य न्यायाधीश गोगोई की ओर से राम मंदिर विवाद के मुद्दे पर अतिसक्रियता देखने को मिली थी। ऐसा इसलिए क्योंकि मुख्य न्यायाधीश के तौर पर उनके कार्यकाल को “कार्यपालिका के साथ निकटता और नागरिकों के अधिकारों की अवहेलना” देखने को मिलती है। उदहारण के तौर उन्होंने केंद्र सरकार से कई हाई-प्रोफाइल मामलों के बारे में तथ्यों को “सीलबंद लिफाफे” में साक्ष्यों को स्वीकार करने की शुरुआत अपने कार्यकाल में कर दी थी।

और फिर सेवानिवृत्ति के चार महीने बाद ही न्यायमूर्ति गोगोई राज्यसभा के लिए मनोनीत कर लिए जाते हैं। भूषण इस बारे में अनेकों क़ानूनी उदाहरण देते हुए कहते हैं कि राज्यसभा के लिए जस्टिस गोगोई का नामांकन “पूर्व-सीजेआई की ओर से केंद्रीय सरकार के पक्ष में कई महत्वपूर्ण फैसले के सम्बन्ध में मिलने वाले पुरस्कार के तौर पर गंभीर चिंताओं को बढ़ाने का काम करता है।”

भूषण के जवाब में जो सबसे ज्यादा विवादास्पद पहलू हैं वे सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा कथित भ्रष्टाचार और उनके कथित कदाचार से सम्बन्धित हैं। इनमें से कुछ मामले में तो सर्वोच्च न्यायालय के कुछ न्यायाधीश तक शामिल हैं, जबकि अन्य में ऐसा प्रतीत होता है कि उनके और राजनैतिक वर्ग के बीच में कोई सांठगाँठ चल रही थी।

पहले वाले में उदाहरण के तौर पर भूषण प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट मामले का हवाला देते हैं, इसमें “तथ्य और परिस्थितियां” कुछ इस प्रकार की हैं जो “इशारा करती हैं कि मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र इस साजिश में अवैध लाभ के भुगतान में शामिल हैं”। पहले प्रकार के मामले में मुख्य न्यायाधीश गोगोई के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न के आरोपों का मामला भी शामिल है।

दूसरे प्रकार के मामलों में, उदहारण के लिए बिरला-सहारा पेपर मामले के इर्दगिर्द जो सारा नाटक के तौर पर जाना जाता है, जिसमें इनकम टैक्स विभाग की ओर 2013 और 2014 के दौरान आदित्य बिरला समूह और सहारा कंपनी पर मारे जाने वाले छापे में जब्त किये गए दस्तावेजों में निकल कर आने वाले तथ्य शामिल हैं। इन दस्तावेजों से पता चला कि “गुजरात सीएम” सहित कुछ मुट्ठीभर अधिकारीयों और नेताओं को भुगतान किया गया था।

जब 2015 में केवी चौधरी को देश के मुख्य सतर्कता आयुक्त के तौर पर नियुक्त किये जाने को चुनौती दिए जाने के स्वर लगातार उठने लगे थे, जो कि उक्त आयकर जांच के मुखिया थे, तो इस मामले को सुनवाई के लिए न्यायाधीश जेएस खेहर और अरुण मिश्र की बेंच के समक्ष रखा गया था। सुनवाई के दौरान बिरला-सहारा पेपर का मामला भी उठा था।

भूषण कहते हैं: “सुनवाई के दौरान मैंने इस बात की गुजारिश की थी कि इस मामले की सुनवाई को एक ऐसे समय करने की जरूरत नहीं है जब न्यायाधीश खेहर की नियुक्ति की फाइल प्रधानमंत्री के समक्ष लंबित पड़ी है। क्योंकि इस मामले में प्रधान मंत्री को किये गए भुगतानों की भी खोजबीन की जानी बाकी है। कुछ नाराजगी और गुस्से को जाहिर करने के बाद अदालत ने अनमने तौर पर इस मामले की सुनवाई को 11 जनवरी 2017 तक स्थगित कर दिया था।”

जस्टिस खेहर के 4 जनवरी 2017 के दिन मुख्य न्यायाधीश के तौर पर पदभार ग्रहण करने के बाद एक नई खंडपीठ का गठन किया गया था। इसकी अध्यक्षता जस्टिस अरुण मिश्र द्वारा की गई। भूषण याद करते हुए कहते हैं “बिरला-सहारा मामला इस पीठ को भेजा गया था। न्यायधीशों ने कुछ समय तक तो इस मामले की सुनवाई की, लेकिन अंत में मामले को ख़ारिज कर दिया...विशेषतौर पर उनका कहना था कि ऊँचे संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों पर इस प्रकार के ढीले कागजातों के आधार पर जाँच नहीं की जा सकती।”

भूषण के जवाब में उधृत है कि जब जस्टिस खेहर और अरुण मिश्र केस की सुनवाई कर रहे थे तो उस दौरान मिश्र अपने भतीजे की शादी की मेजबानी की तैयारी दिल्ली और ग्वालियर में की गई थी। वे कहते हैं “तब के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की तस्वीर एक अख़बार में ग्वालियर में रिसेप्शन के दौरान की देखने में आई थी। यह बेहद अहम है क्योंकि चौहान धन के कथित प्राप्तकर्ताओं में से एक थे।”

9 अगस्त 2016 के दिन तबके अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री कालीखो पुल ने आत्महत्या कर ली थी, बामुश्किल तीन हफ्ते बाद वह जस्टिस खेहर और दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ के फैसले से असंतुष्ट थे, जिन्होंने उन्हें अपदस्थ करने का फैसला सुनाया था। पुल अपने पीछे 60 पेज का सुसाइड नोट छोड़ गए थे, जिसमें भूषण के अनुसार “वे कहते हैं कि जस्टिस खेहर के बेटे द्वारा मनमाफिक फैसले सुनाने के एवज में उनसे 49 करोड़ रुपये की मांग की गई थी। उन्होंने जस्टिस दीपक मिश्र के भाई की ओर से 37 करोड़ रूपये की मांग का भी जिक्र किया था।”

भूषण कहते कि ये दो मामले- बिरला-सहारा पेपर और कालीखो पुल सुसाइड नोट ने “प्रधानमंत्री और भारत के मुख्य न्यायाधीश के तौर पर हमारे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों के बारे में सवालिया निशान” खड़े कर दिए हैं।

लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के उपर भूषण के आरोपों की लिस्ट यहीं पर जाकर खत्म नहीं होती। वे जनवरी 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ चार न्यायाधीशों द्वारा प्रेस कांफ्रेंस के अप्रत्याशित फैसले का जिक्र करते हैं। इसमें वे राष्ट्र को “मुख्य न्यायाधीश [मिश्र] द्वारा अपनी पसंद के कनिष्ठ न्यायाधीशों को मनमाने तरीके से बिना किसी विवेकपूर्ण आधार पर अपनी शक्तियों का दुरूपयोग करते हुए महत्वपूर्ण और राजनीतिक तौर पर संवेदनशील मामलों को एक खास खंडपीठ को सुपुर्द करने का आरोपी पाते हैं।”

भूषण कहते हैं कि हालाँकि वरिष्ठ न्यायाधीशों ने इसे साफ़-साफ़ शब्दों में बयान नहीं किया, “लेकिन यह स्पष्ट था कि इन मामलों को कनिष्ठ न्यायधीशों को सुपुर्द करने के एवज में खास नतीजे हासिल करने की मंशा साफ़ नजर आती है। और अधिकतर मामलों में इसे सरकार की इच्छा के अनुरूप होते देखा गया था।”

यह देखते हुए कि (सेवानिवृत्त) न्यायमूर्ति कुरियन जोसफ, जोकि जनवरी 2018 में पत्रकार वार्ता में शामिल चार न्यायाधीशों में एक थे, ने मीडिया से बात करते हुए कहा था- “कोई था जो बाहर से [तब के] सीजेआई को नियंत्रित कर रहा था, हमने ऐसा महसूस किया।” भूषण के ख़िलाफ़ अवमानना का नोटिस और उसके उत्तर को देखते हुए, ऐसा प्रतीत होता है कि यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक निर्णायक क्षण के सभी निशानों को दर्शाता है, जबतक कि कुछ निर्णायक नहीं हो जाता।

 लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।

 अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें
Contempt Notice on Bhushan Will be Our Democracy’s Defining Moment

Supreme Court
prashant bhushan
Contempt law
Chief justice of India
Article 370

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