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डी एन झा: एक ऐसा इतिहासकार, जो धारा के विरुद्ध खड़ा था
उनके लिए इतिहास महज़ एक शैक्षिक विषय नहीं था,बल्कि हमारे अतीत के भगवाकरण के ख़िलाफ़ अभियान का एक साधन था, और अतीत, वर्तमान को समझाने का एक ज़रिया था।
सरबनी चक्रवर्ती
06 Feb 2021
डी एन झा

इतिहासकार द्विजेंद्र नारायण झा (1940-2021) के निधन की दुखद ख़बर ऐसे समय में आयी है, जिस समय राष्ट्र को पहले से कहीं ज़्यादा उनकी ज़रूरत थी। प्राचीन भारत को एक "हिंदू अतीत" के रूप में दर्शाने वाले मिथक की धज्जियां उड़ाने के लिए जाने जाना वाले झा का 81 वर्ष की आयु में 4 फ़रवरी, 2021 को निधन हो गया।

वैज्ञानिक और धर्मनिरपेक्ष इतिहास लेखन के ज़बरदस्त हिमायती और आम लोगों के इतिहासकार, डीएन झा का हमेशा इस बात पर ज़ोर रहा कि वस्तुस्थिति का बताया जाना काफ़ी नहीं होता, बल्कि इतिहासकार को एक रुख़ भी अख़्तियार करना चाहिए। बतौर एक इतिहासकार, संघ परिवार के सांप्रदायिक और बहुसंख्यक दुष्प्रचार से ताज़िंदगी लड़ते रहना उनका काम रहा। मिथकों को तोड़ना और विवाद में फ़ंसना उनके लिए कभी कोई नयी बात नहीं थी, बल्कि इन तमाम आलोचना के बीच भी वह अपने रुख़ पर हमेशा क़ायम रहे।  

उनके लिए इतिहास महज़ एक शैक्षिक विषय नहीं था, बल्कि हमारे अतीत के भगवाकरण के ख़िलाफ़ अभियान का एक साधन था, और अतीत, वर्तमान को समझाने का एक ज़रिया था। अपने करियर की शुरुआत में ही भारतीय उपमहाद्वीप के अतीत को 'स्वर्ण युग' के तौर पर किसी मिथक के तौर पर पेश किये जाने को लेकर झा ने लिखा था, "राष्ट्रवादी इतिहासकारों द्वारा प्राचीन भारत के गौरवगान का मतलब था कि उनके सामने जो कुछ था, उन्हें हिंदू भारत के रूप में गौरवगान करना। इस लिहाज़ से उनका लेखन विवेकानंद, दयानंद और दूसरे पुनरुत्थानवादियों के विचारों से जुड़ा हुआ दिखायी देता है। 1930 और 1940 के दशक में यह जुड़ाव पूरी तरह साफ़-साफ़ नज़र आने लगा था, उन्होंने लिखा था, “राष्ट्रवादी इतिहासलेखन ने हिंदू पुनरुत्थानवाद के सबसे बड़े प्रवक्ता, सावरकर  के विचारों को गति दी।”

वह इतिहासकारों के एक ऐसे समूह का हिस्सा थे, जिसने बाबरी मस्जिद के नीचे राम मंदिर के होने के पक्ष में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दावों और भारतीय जनता पार्टी के अभियान की आलोचना करते हुए देश के लोगों के सामने एक रिपोर्ट पेश की थी। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के इन समूहों ने भौतिक संस्कृति और शुरुआती ग्रंथों के साक्ष्य के आधार पर अपनी यह रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। उन्होंने कहा था कि स्टेट को इन विशेषज्ञों पर भरोसा करना चाहिए। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद झा ने टिप्पणी करते हुए कहा था, “यह विवाद, आस्था और चेतना के बीच की लड़ाई है।”

उनकी सबसे मशहूर और महत्वपूर्ण किताब, ‘द मिथ ऑफ द होली काउज़’ उस समय प्रकाशित हुई थी, जब अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार और संघ परिवार के विभिन्न संगठनों के तत्वावधान में एक आक्रामक सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाया जा रहा था। उस किताब की प्रस्तावना में झा ने लिखा था, “गाय की उपासना को हिंदुओं की सांप्रदायिक पहचान के प्रतीक के रूप में बदल दिया गया है और प्रगतिविरोधी और कट्टरपंथी ताक़तों ने यह मानने से इनकार कर दिया है कि गाय वैदिक और बाद की ब्राह्मणवादी और ग़ैर-ब्राह्मणवादी परंपराओं में हमेशा से पवित्र नहीं थी,या फिर प्राचीन भारत में दूसरे जीवों के मांस के साथ-साथ गोमांस अक्सर घर में बनाये जाने वाले व्यंजनों का एक अहम हिस्सा था।” मनु स्मृति और अन्य धर्मशास्त्रों की एक श्रृंखला से उद्धृत करते हुए झा ने तर्क दिया था कि गोमांस खाने पर कभी कोई मनाही नहीं थी।

इस मशहूर इतिहासकार को दक्षिणपंथी ताक़तों की तरफ़ से बार-बार हमलों का सामना करना पड़ा। वाजपेयी सरकार के एक मंत्री-अरुण शौरी ने आरोप लगाया था कि वह यह कहकर इतिहास को विकृत कर रहे हैं कि नालंदा विश्वविद्यालय के बौद्ध परिसर को ब्राह्मणवादी धर्म के अनुयायियों ने नष्ट कर दिया था। हालांकि, इस तरह के होने वाले हमले और की जाने वाली आलोचनाओं के बीच भी वे अडिग रहे।

अपनी आख़िरी किताब, “अगेंस्ट द ग्रेन: नोट्स ऑन आइडेंटिटी, इनटॉलरेंस एंड हिस्ट्री” में झा ने 'प्राचीन भारत में ब्राह्मणवादी असहिष्णुता', 'गाय की पहेली', और 'देवता जो कुछ पीते थे!' जैसे मुद्दों पर चर्चा की है। इस खंड के ज़्यादातर निबंध हिंदुत्व के उभार के समय ही लिखे गये थे।

इन दिनों, जिस समय हमारा देश मौजूदा दक्षिणपंथी राजनीतिक व्यवस्था के तहत लोकतांत्रिक स्वभाव और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने पर ज़्यादा से ज़्यादा हो रहे हमले का गवाह बन रहा है,ऐसे समय में डी एन झा जैसे इतिहासकार बहुत याद आयेंगे, लेकिन इतिहास लेखन के उनका सिद्धांत की ही आख़िरकार जीत होगी।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

D N Jha: The Historian Who Stood Against the Grain

D N Jha
The Myth of the Holy Cow
Hindutva Politics
RSS
Ancient Indian History

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