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भारत
राजनीति
देश के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की गुणवत्ता अपने निचले पायदान पर
कक्षा 5 के आधे बच्चे ऐसे हैं जो कक्षा-2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते हैं| कक्षा 8 के आधे से अधिक करीब 56 प्रतिशत आसान सा भाग का सवाल हल नहीं कर सकते हैं| आयुवर्ग 15-16 में 13.5 प्रतिशत लडकियां स्कूल में नहीं जा रही हैं|
पीयूष शर्मा
17 Jan 2019
aser report

भारत के ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की स्थिति पर सर्वे करने वाली गैर-सरकारी संस्था ‘प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन’ ने अपनी सालाना रिपोर्ट ‘असर’ (ASER) यानी एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट 2018 जारी की है, जिसमें चौकाने वाले आंकड़े सामने आये हैं | कक्षा 5 के तकरीबन 50 फीसदी  बच्चे कक्षा 2  के पाठ को नहीं पढ़ सकते हैं और कक्षा पांच के 72 फीसदी  बच्चे भाग का सवाल हल नहीं कर सकते हैं| एक बुनयादी जरूरत के रूप में शिक्षा का सवाल हमेशा गुणवत्ता से जुड़ता है, रिपोर्ट बताती है कि गुणवत्ता के लिहाज से स्थिति बहुत खराब है|

“असर” बच्चों की नामांकन स्थिति और बुनियादी पढने और गणित करने की क्षमता का घरों में किया जाने वाला सर्वेक्षण है| 2018 में “असर” 596 जिलों, 17,730 गाँवो में साढ़े तीन लाख से अधिक घरों के करीब 5 लाख 46 हजार बच्चों तथा करीब 16000 स्कूलों को सर्वे में शामिल किया गया हैं|

बच्चों में पढ़ने व गणित का स्तर:

कक्षा 5 के आधे बच्चे ऐसे हैं जो कक्षा-2 के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते हैं, यह आंकड़ा 2016 में 47.9 प्रतिशत था जो 2018 में बढ़कर 50.3 प्रतिशत पर आ गया है| तथा देश में भाग के सवाल हल कर पाने में सक्षम कक्षा 5 के बच्चो में मामूली बढ़ोतरी हुई है| 2016 में ऐसे बच्चों का हिस्सा जहाँ 26 प्रतिशत था, वहीं 2018 में यह 27.8 प्रतिशत हो गया है यानी  72 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो आसान सा भाग का सवाल  नहीं कर सकते हैं|

कक्षा 8 अनिवार्य प्राथमिक स्कूली शिक्षा में अंतिम पडाव है| इस स्तर पर बच्चे से अपेक्षा की जाती है कि पिछली कक्षाओं के स्तर का पाठ्यक्रम व अपनी कक्षा के स्तर की सामान्य जानकारी हासिल करे, परन्तु असर 2018 के आंकड़े बताते हैं कि कक्षा 8 में नामांकित देश के लगभग 27 प्रतिशत ऐसे बच्चे हैं जो कक्षा 2 के स्तर का पाठ भी नहीं पढ़ सकते हैं| यह आंकड़ा 2016 से जस का तस है| गणित के स्तर में पिछले तमाम वर्षों के दौरान कुछ ख़ास बदलाव नहीं हुआ है| इस वर्ष कक्षा 8 के सभी बच्चों में से केवल 44 प्रतिशत ही 3 अंको में एक अंक के भाग के सवालों को सही-सही हल कर पाने में सक्षम है यानी आधे से अधिक करीब 56 प्रतिशत भाग का सवाल हल नहीं कर सकते हैं|

इसके आलावा दैनिक जीवन से जुड़े सवालों पर प्रदर्शन के मामले में 14-16 आयुवर्ग में बच्चों का प्रदर्शन खराब रहा है| जैसे की सर्वे में एक सवाल पूछा गया कि, बाजार में किताबों की 2 दुकानें है जहाँ यह 5 किताबें मिलती हैं, यदि आपको यह पाँचों किताबे खरीदनी हैं, तो आपको कम-से-कम कितने रूपये देने होंगे|  इस सवाल का सही जवाब  केवल 37 प्रतिशत बच्चे ही दे पाए| इसी तरह करीब 70 प्रतिशत बच्चे खरीद-बिक्री में  छूट की गणना से जुड़े सवाल नहीं कर सकते है| ऐसे सवालों में लड़कियों की स्थिति और बदतर थी|

शिक्षा पाना असल में बच्चों के स्कूल में दाखिला लेने भर का मामला नहीं है, इसमें कोई शक नही है की स्कूलों में प्रवेश से वंचित बच्चों की संख्या में भारी कमी आयी है परन्तु आंकड़े बताते है कि आयुवर्ग 15-16 में ड्रॉपआउट ज्यादा है और यह संख्या लड़कियों में और ज्यादा है| इस और ध्यान दिए जाने की जरूरत है ताकि इस आयुवर्ग के बच्चे स्कूल में रहें और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करें| यदि इनको सही शिक्षा नहीं मिलेगी तो समस्या बड़ी होती जाएगी, इसके पीछे दो कारण हैं, पहला 14-18 आयुवर्ग के बच्चे कामगारों की श्रेणी में आने को तैयार हैं, जिसका सीधा असर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है और दूसरा यह प्रतिस्पर्धा के दौर में सही रोजगार प्राप्त नहीं कर पाएंगे|  

शिक्षा की गुणवत्ता काफी हद तक पढ़ाई के जरूरी संसाधनों जैसे कि किताबे, लाइब्रेरी, कंप्यूटर, पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक, शौचालय, पेयजल आदि की उपलब्धता पर निर्भर करती है|

रिपोर्ट में नामांकन और स्कूल न जाने वाले बच्चो के बारें में बताया गया है कि 6-14 आयुवर्ग में विद्यालय नहीं जा रहे बच्चों का प्रतिशत 2.8 है परन्तु आयुवर्ग 7-16 में यह 4.4 प्रतिशत है| असर रिपोर्ट के आंकड़े लड़कियों के विद्यालय  में नामांकन की एक अलग ही तस्वीर पेश करते है, राष्ट्रीय स्तर पर आयुवर्ग 11-14 में 4 प्रतिशत से अधिक लड़कियां  विद्यालय नही जा रही हैं और आयुवर्ग 15-16 में 13.5 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जा रही है या वह इस आयु में स्कूल जाना छोड़ दे रही हैं| इसी आयुवर्ग में बीजेपी शासित रहे राज्यों के आंकड़े “बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ” के हवाई दावों की पोल खोलते नजर आ रहे हैं, छत्तीसगढ़ में 21.2 प्रतिशत, गुजरात में 24.9 प्रतिशत, मध्यप्रदेश में 26.8 प्रतिशत, राजस्थान 20.1 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश में 22.2 प्रतिशत लड़कियां विधालय में नामांकित नहीं हैं| इन राज्यों में यह आंकड़े राष्ट्रीय स्तर से कहीं ज्यादा है|

निजी स्कूलों में नामांकन लगातार बढ़ता हुआ जा रहा है, इस वर्ष निजी स्कूलों में कुल नामांकन 30.9 प्रतिशत है, और देश में 11 ऐसे राज्य हैं जिनमें निजी स्कूलों में नामांकन 40 प्रतिशत से अधिक है| इसके साथ ही लड़कियों की तुलना में लड़के निजी स्कूलों में ज्यादा जा रहे हैं|

शिक्षा का अधिकार अधिनियम  (RTE एक्ट) 2010 में लागू हुआ था जिसको 2018 में 8 वर्ष पूरे हो गये हैं परन्तु इस कानून के तहत मिलने वाली सुविधाओं की उपलब्धता अभी भी काफी कम है| सितम्बर 2014 में शुरू किये गये “स्वच्छ भारत स्वच्छ विद्यालय(SBSV) यह बताता है कि बच्चों के लिए सुरक्षित पेयजल और हाथ धोने के लिए जरूरी पानी हो और इसके साथ ही, स्कूल की सफाई और भोजन तैयार करने और खाना पकाने के लिए भी पानी हो| परन्तु रिपोर्ट में 596 जिलों के करीब 16000 स्कूलों के आंकड़े बताते है कि 75 प्रतिशत स्कूलों में ही पेयजल सुविधा प्रयोग करने योग्य है, और 11 प्रतिशत ऐसे स्कूल है जिनमें पानी के लिए नल या अन्य व्यवस्था है परन्तु पानी उपलब्ध नहीं है इसके साथ ही करीब 14 प्रतिशत स्कूलों में पानी के लिए व्यवस्था ही नहीं है|

ग्रामीण स्कूलों में लड़कियों के लिए बने शौचालयों में से केवल 66 प्रतिशत ही प्रयोग करने योग्य है जबकि करीब 11 प्रतिशत स्कूलों में तो लड़कियों के लिए शौचालय ही नहीं हैं| 10 प्रतिशत ऐसे स्कूल है जिनमें लड़कियों का शौचालय ताला लगाकर बंद रखा गया है| शौचालय का स्कूल में न होना लड़कियों के स्कूल में नहीं आने का एक बड़ा कारण है, यह बहुत जरूरी है कि सभी स्कूलों में प्रयोग करने योग्य शौचालय हों|

देश में शिक्षा के गुणवत्ता स्तर की स्थिति बहुत ही चिंताजनक है इसके बारे सरकार को गंभीरता से सोचने की जरूरत है | केवल कानून बनाने मात्र से स्थितियों में सुधार नहीं हो सकता है| स्कूलों में बच्चो की संख्या बढ़ने के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ है, छात्र अपने स्तर के मुताबिक योग्यता हासिल करने के मामले में काफी पीछे हैं| प्रत्येक साल असर रिपोर्ट एक निराशाजनक तस्वीर पेश करती है| सर्वे में शामिल आयुवर्ग के छात्र-छात्राएं आर्थिक मुख्यधारा में शामिल होने से कुछ ही दूरी पर खड़े है, ऐसे में उनमे शैक्षिक गुणवत्ता की कमी देश में कुशल मानव संसाधनों के अभाव में बदल रही है और इसकी वजह से अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुँच रहा है|

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