NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
 दिल्ली ने नफ़रत की राजनीति को ठुकराया 
भय और ज़हर से भरपूर उच्चस्तरीय और फिज़ूल ख़र्ची के अभियान के बावजूद भाजपा, उसकी विचारधारा और नीतियों पर हुए जनमत संग्रह में बुरी तरह से हार गई है।
सुबोध वर्मा
12 Feb 2020
Translated by महेश कुमार
delhi

दिल्ली ने अब तक के हुए चुनाव अभियानों में से इस अभियान को सबसे भड़काऊ अभियान माना है। जिसे नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल और भाजपा के 240 संसद सदस्यों ने चलाया। जिसका संचालन व्यक्तिगत रूप से गृह मंत्री अमित शाह ने किया था। इस अभियान से जो नतीजे निकले उसका संदेश काफी स्पष्ट और चौंकाने वाला है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी (AAP) ने 70 सदस्यीय विधानसभा में 62 सीटें हासिल की हैं , जिससे भाजपा के खाते में सिर्फ सात सीटें आई हैं। पिछली विधानसभा (2015) में बीजेपी के पास तीन जबकि ‘आप’ के पास 67 सीटे थी।

‘आप’ (AAP) को कुल मिलाकर 53.6 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो पिछली बार के 54.3 प्रतिशत के बराबर ही हैं। बीजेपी ने अपने दो सहयोगियों के साथ मिलकर लड़े और लगभग 40 प्रतिशत वोट हासिल किए हैं, जो पिछली बार के मिले 32.7 प्रतिशत मत के मुक़ाबले उल्लेखनीय वृद्धि है। तीसरी बड़ी पार्टी, कांग्रेस का तो सफाया ही हो गया है क्योंकि उसका वोट शेयर 2015 के 9.3 प्रतिशत से घटकर केवल 4.4 प्रतिशत रह गया है। यह एक ऐसी पार्टी थी जो एक दशक पहले राजधानी शहर में 40 प्रतिशत से अधिक वोट पाती थी।
 
‘आप’ की जीत - और बीजेपी की करारी शिकस्त - दिल्लीवालों की स्पष्ट पसंद है, न केवल इसलिए कि संख्या बहुत अधिक है बल्कि इसलिए भी कि भाजपा ने बड़े ही उग्र तरीके से चुनाव लड़ा। इसने तीन प्रमुख मुद्दों को उठाया, जो सभी हिंदुत्व के एजेंडे का प्रतिनिधित्व करते थे जिनमें मुख्य है- अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) और राम मंदिर मुद्दे का समाधान। लेकिन यह अभियान का सिर्फ एक ढांचा था। जमीनी अभियान में इसने मुसलमानों के खिलाफ नफरत का खुला और चौंकाने वाला विस्फोट किया था, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आरएसएस के झूठ और विकृतियाँ का इस्तेमाल किया था। यह कोई गुप्त तरीके से चलने वाला कानाफूसी का अभियान नहीं था – इसके लिए दाहाड़ने और गर्जन करने वाले नेता चुने गए, भीड़ को उकसाया गया, नारे लगाए गए और खुली धमकी दी गई। न्यूज़क्लिक ने पिछले 20 दिनों में कई रिपोर्टों/विश्लेषणों के माध्यम से इनका दस्तावेजिकरण किया है।

इस तरह के अभियान से दिल्ली के मतदाता चिंतित और परेशान हो गए थे। इस तरह के घृणित विचारों और भावनाओं की चकाचौंध में शहर आहत हुआ और आगबबूला भी हो गया था। बीजेपी की बुरे ख्वाबों की दृष्टि भयावह थी और उसने कई लोगों को भ्रमित कर दिया था।दूसरी ओर, ‘आप’ पार्टी पिछले पांच वर्षों में किए गए कामों के बारे में बात करने के अपने निर्धारित ट्रैक पर अटकी रही। जिसमें उन्होंने सस्ती और अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा, बिजली और पीने के पानी की दरों में कमी, आदि में सरकार की भूमिका और उपलब्धियों का उचित दावा पेश किया। इस कल्याणकारी दृष्टिकोण ने ‘आप’ को बहुत लोकप्रिय बना दिया था, क्योंकि इसने दिल्ली के संघर्षरत आम आदमी को आवश्यक राहत प्रदान की थी; जो बढ़ती बेरोजगारी, स्थिर आय और बुनियादी भोजन और अन्य आवश्यकता की सामाग्री की आसमान छूती महंगाई का सामना कर रहे थे।

बहुत कुछ ऐसा भी था जो ‘आप’ नहीं कर पाई - जिसमें श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी को सुनिश्चित करना, ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगाना, श्रम कानूनों को लागू करना और सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण पर रोक लगाना आदि। निष्पक्षता से कहा जाए तो यह दिल्ली सरकार अपनी उपलब्ध सीमित शक्तियों  के साथ  केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली नरेंद्र मोदी सरकार के साथ विद्रोही दुश्मनी में फंसी थी। लेकिन बाकी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ‘आप’ और केजरीवाल बहुत लोकप्रिय थे।

तो, यह दो तरह की राजनीति की लड़ाई थी। एक, सांप्रदायिक की चोट करना, हिंसा का डर फैलाना,  सबसे अपमानजनक झूठ, गाली और ज़हरीला प्रचार करना। दुसरा एक खास किस्म का विकासात्मक प्रकार का एजेंडा था, जिसमें विभिन्न वर्गों को अपील गई थी, जो कि दृष्टिकोण और स्वच्छता और ईमानदारी के साथ धर्मनिरपेक्षता का वादा करता था। शाह ने खुद इसे दो विचारधाराओं के बीच की लड़ाई करार दिया, हालांकि उन्होंने ‘आप’ की विचारधारा को गद्दारों की विचारधारा कहा।

इस पृष्ठभूमि में दिल्ली के मतदाताओं की पसंद न केवल स्पष्ट और दो टूक है। बल्कि यह आरएसएस की राजनीति की जानबूझकर की गई अस्वीकृति है, जिस राजनीति को भाजपा ने दिल्ली में प्रसारित किया था।

वोट शेयर के समीकरण
 
अब परिणामों पर कुछ नज़र डालते हैं। जैसा कि उल्लेख किया गया है, ‘आप’ ने अपना वोट शेयर बरकरार रखा है जबकि बीजेपी ने अपने शेयर में सात प्रतिशत से अधिक का इजाफा किया है। इस बीच, कांग्रेस को लगभग पाँच प्रतिशत वोटों का नुकसान हुआ है, जबकि अन्य सभी - बहुजन समाज पार्टी नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी, आदि के साथ-साथ निर्दलीय उम्मीदवारों को पूरी तरह से अस्वीकार कर दिया गया है। स्पष्ट रूप से यह ‘आप’ और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था, कांग्रेस के पुनरुत्थान का मिथक का बुलबुला भी इसी के साथ फूट गया।

क्या इसका मतलब यह है कि कांग्रेस के मतदाताओं ने बीजेपी को समर्थन कर दिया है, क्योंकि कुछ इस पर विश्वास करेंगे? नहीं, यह एक त्रुटिपूर्ण रूप से गलत धारणा होगी- और आलसी विश्लेषण होगा। पिछली बार (2015 में), कांग्रेस के वोटों का बड़ा हिस्सा मुस्लिम बहुल सीटों और निम्न मध्यम वर्ग या मज़दूर वर्ग के इलाकों में था। ऐसा नहीं है कि उन्हें बहुत कुछ मिला, लेकिन जो कुछ भी था, इन वर्गों से मिला था, जिसमें कुछ समर्थन पारंपरिक मध्यम वर्ग से भी हासिल हुआ था। इस बार, मुस्लिम और श्रमिक वर्ग से जुड़े  मतदाता ‘आप’ की तरफ हो लिए। यह मुख्य रूप से ‘आप’ की कल्याणकारी नीतियों का नतीजा था और इस तथ्य से कि ‘आप’ सीएए के विरोध में मुस्लिम ‘आप’ के उम्मीदवार सबसे आगे थे, शाहीन बाग उसका प्रतीक है।

भाजपा का सांप्रदायिक सूद

तो बीजेपी ने अपने वोट कहां से बढ़ाया? यह वह केंद्र बिन्दु है जहां भाजपा के वीभत्स अभियान की खतरनाक विरासत निहित है। यह इस अभियान का ही एक परिणाम था जिसने उन लोगों के एक वर्ग को आकर्षित किया, जिन्होंने पिछली बार ‘आप’ को वोट दिया था, लेकिन इस बार सांप्रदायिक बयानबाजी से प्रभावित हुए हैं। बड़ी बात यह है कि यह हिस्सा बहुत बड़ा नहीं है। लेकिन वह है। यह संभावित रूप से एक परेशान करने वाला तथ्य है, क्योंकि बीजेपी ने सांप्रदायिक घृणा के बीज बोए हैं – वे संकीर्ण चुनावी लाभ के लिए हैं - और ये आने वाले समय में जहरीले फलों का उत्पादन करेंगे, यदि उनका मुकाबला समय रहते नहीं किया गया।

भाजपा को यह सोचने की जरूरत है कि वह भारत और उसके लोगों को कैसे देखती है। पिछले एक साल में, मई 2019 में लोकसभा जीतने के बावजूद पार्टी कई राज्यों में चुनाव हार चुकी है। विनाशकारी आर्थिक नीतियों के कारण इसका समर्थन तेजी से घट रहा है। भगवा पार्टी ने केंद्रीय स्तर पर विश्वसनीयता बनाए रखी है – वह केवल इसलिए कि उसमें लोगों को यह समझाने की क्षमता है कि वह अकेले देश की सबसे समर्पित रक्षक है, और नफरत की अपनी राजनीति के माध्यम से ज्वलंत मुद्दों से ध्यान हटाने में कामयाब  है। वामपंथ को छोड़कर, सभी राजनीतिक दलों की अक्षमता के कारण उन्हें जमीन पर अपनी कहानी के समर्थन में मदद मिली है। लेकिन, यह समर्थन लंबे समय तक नहीं रहेगा। जैसा कि आर्थिक संकट बढ़ रहा है, और भाजपा/आरएसएस के मध्ययुगीन सपने उजागर हो रहे हैं जोकि अपने आप में काफी डरावने सपने हैं,  यह तिलस्म  टूटना निश्चित है।

delhi election
Delhi Election 2020
arvind kejariwal
hate vs development
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

मंडल राजनीति का तीसरा अवतार जाति आधारित गणना, कमंडल की राजनीति पर लग सकती है लगाम 

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

गुजरात: भाजपा के हुए हार्दिक पटेल… पाटीदार किसके होंगे?


बाकी खबरें

  • malaria
    शंभूनाथ शुक्ल
    'स्वच्छ भारत' के ढोल के बीच मलेरिया से मरता भारत
    01 Sep 2021
    इस साल एक तरफ तो मानसून की बारिश अच्छी हुई, वहीं दूसरी तरफ पूरे उत्तर भारत में मलेरिया, डेंगू और चिकनगुनिया तथा वायरल बुखार ने मानसून की खुशी मायूसी में बदल दी है।
  • Visva-Bharati University
    संदीप चक्रवर्ती
    विश्वभारती विश्वविद्यालय के छात्रों ने साथियों के निष्कासन का किया विरोध, वीसी पर कैंपस के 'भगवाकरण' का आरोप
    01 Sep 2021
    वीबीयू अधिकारियों ने वामपंथी झुकाव वाले तीन मास्टर्स डिग्री छात्रों को बर्ख़ास्त करने का फ़ैसला किया है, जिससे परिसर में एक और विरोध शुरू हो गया है।
  • Dushyant Kumar
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    विशेष: ...मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
    01 Sep 2021
    हिन्दी में ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने वाले जनता के कवि-शायर दुष्यंत कुमार का आज (1 सितंबर) जन्मदिन है। 30 दिसंबर को पुण्यतिथि के मौके पर 2019 में ये वीडियो पैकेज तैयार किया गया था। लेकिन ये आज भी उतना…
  • पीपल्स डिस्पैच
    अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी आक्रमण के बाद से क़रीब 33,000 बच्चे मारे गए या विकलांग हुए
    01 Sep 2021
    चूंकि दो दशक लंबा चला अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान पर नाटो का
  • J&K
    अनीस ज़रगर
    अफ़ग़ान की नई स्थिति के बीच कई कश्मीरी दल चुनावों की तैयारियों में मशगूल
    01 Sep 2021
    फारूख अब्दुल्लाह का दावा है कि नेशनल कांफ्रेंस आगामी चुनावों में भारी जीत दर्ज करने जा रही है। उन्होंने कहा कि उन्हें 2018 के पंचायत चुनावों में अपनी पार्टी के बहिष्कार करने के फैसले पर खेद है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License