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भारत
राजनीति
दलित-मुस्लिम एकता की ऐतिहासिक जरुरत
इसके लिए उसे ऐसे दल और समुदाय से जुड़ना होगा जिसमें शक्ति के स्रोतों में उनकी भागीदारी के प्रति सम्मान का भाव हो.
एच.एल.दुसाध
13 Feb 2017
दलित-मुस्लिम एकता की ऐतिहासिक जरुरत

जिस तरह सदियों पूर्व वजूद में आये हिन्दू-आरक्षण उर्फ़ वर्ण-व्यवस्था के जरिये बंध्याकरण पद्धति से दलितों में शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार,धार्मिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में हिस्सेदारी की चाह चिरकाल के ख़त्म कर दी गयी,जिसके फलस्वरूप आज इक्कीसवीं सदी में वे भी टाटा-बिडला,मीडिया स्वामी,ज्ञान उद्योग के अधिपति या किसी धाम का शंकराचार्य बनने का सपना नहीं देखते.वैसा ही कुछ कल के शासक मुसलमानों के साथ भी होता दिख रहा है.आजाद भारत में हिन्दूराज उर्फ़ सवर्ण शासन में जिस तरह षड्यंत्र करके उन्हें शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक –शैक्षिक इत्यादि ) से दूर धकेल कर अशक्त व लाचार बनाया गया है ,जिसकी झलक नवम्बर, 2006 में सच्चर रिपोर्ट में दिखी,उससे उनमें भी भागीदारी की चाह ख़त्म सी हो गयी है .मुसलिम समुदाय को इस स्थिति में ठेलने के लिए आजाद भारत का शासक वर्ग तो जिम्मेवार रहा ही,खुद तथाकथित धर्मनिरपेक्षवादी भी कम जिम्मेवार नहीं रहे ,जिन्होंने इस समुदाय के जेहन में बड़ी चालांकी से शक्ति के स्रोतों में भागीदारी की बजाय ‘सुरक्षा’को सर्वोच्च मुद्दे के रूप में चिपका दिया.इसीलिए यूपी चुनाव में 143 सीटों को प्रभावित करने की हैसियत रखने वाले मुस्लिम समुदाय में अपने समर्थन के विनिमय में शक्ति के स्रोतों में भागीदारी की कहीं सुगबुगाहट भी नहीं सुनाई पड़ रही है.लेकिन मुस्लिम समुदाय कब तक सवर्णवादियों और धर्मनिरपेक्षतावादियों की साजिश का शिकार होकर अपनी हिस्सेदारी से आँखे मूंदे,सिर्फ सुरक्षा को तरजीह देता रहेगा! आज जरुरत यह है कि वह अपने दोस्तों और दुश्मनों की साजिश को समझे और सुरक्षा को दरकिनार कर सही रणनीति बनाकर शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी के लिए आगे बढ़े.इसके लिए उसे ऐसे दल और समुदाय से जुड़ना होगा जिसमें शक्ति के स्रोतों में उनकी भागीदारी के प्रति सम्मान का भाव हो.

स्मरण रहे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1992 में घोषित ‘अल्पसंख्यकों के अधिकारों के अनुच्छेद दो (2) में सांस्कृतिक ,धार्मिक और सामाजिक जीवन में भाग लेने के अधिकारों के साथ-साथ आर्थिक और सार्वजनिक जीवन में भाग लेने के अधिकार को भी स्पष्ट मंजूरी दी गयी है .इसी तरह इस घोषणा के अनुच्छेद चार (5) में यह कहा गया है कि अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्तियों को ‘अपने देश की आर्थिक उन्नति और विकास में पूर्ण सहभागिता का अवसर देने के लिए राज्यों को उपयुक्त विचार करना चाहिए’.दूसरे शब्दों में संयुक्त राष्ट्र संघ का ‘अल्पसंख्यकों के अधिकारों का घोषणापत्र’ उससे सहमत प्रत्येक राज्य से यह उम्मीद करता है कि वह अल्पसंख्यकों के विकास के लिए विशेष उपाय करेगा.किन्तु भारत में वह घोषणापत्र व्यर्थ हो गया  तो इसलिए कि यहां की सवर्णवादी सरकारें और प्रभुवर्ग शक्ति के स्रोतों में अल्पसंख्यकों की वाजिब हिस्सेदारी के खिलाफ बराबर उदासीन ही नहीं,षडयंत्ररत रहा है.यही नहीं , इन्हें ऐसे समूहों का साथ नहीं मिला जो शक्ति के स्रोतों में अपनी हिस्सेदारी के लिए सवर्णवादी सत्ता के खिलाफ संघर्षरत हो. इसमें कोई शक नहीं कि इस लिहाज से सही रणनीति दलितों के साथ मिलकर अपने लोकतान्त्रिक हक़ अर्थात सभी क्षेत्रों में हिस्सेदारी के लिए मजबूती से आगे बढ़ाना ही हो सकती है.क्योंकि मंडल-1(1990,जब पिछड़ों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिला )  और मंडल-2(2006,जब उच्च शिक्षा में पिछड़ों को आरक्षण मिला )में पिछड़ों के पक्ष में अग्रिम मोर्चे पर खड़े रहकर दलित समुदाय ने यह साबित कर दिया है कि यही वह एकमात्र सामाजिक समूह है,जो अपने अतिरिक्त अन्य वंचित समुदायों की हिस्सेदारी की लड़ाई में सर्वशक्ति से अगली पंक्ति में खड़ा हो सकता है. 

काबिले गौर है कि संविधान के अंतर्गत समानता का अधिकार दलित,आदिवासी,पिछड़े,अल्पसंख्यकों एवं महिलाओं इत्यादि तमाम अशक्त समूहों को है .लेकिन  हकीकत यही है समानता सिर्फ कागजों में है ,जमीनी स्तर पर नहीं है.शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार,फिल्म-मीडिया इत्यादि शक्ति के समस्त स्रोतों पर 9-10 प्रतिशत आबादी वाले विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न सवर्णों का 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा है.इस कारण विश्व में सर्वाधिक गैर-बराबरी भारत में है.विगत दिनों क्रेडिट सुइसे की रिपोर्ट में यह सत्य नए सिरे से उजागर हुआ है कि 10 प्रतिशत ऊँची जातियों के पास 81% धन-संपदा है और नीचे की 30 प्रतिशत आबादी सिर्फ 4 % धन पर गुजर-बसर करने के लिए मजबूर है.बहरहाल भारत में व्याप्त भीषणतम गैर-बराबरी के खिलाफ कोई सचमुच में लम्बे समय से मुखर है तो वह दलित बुद्धिजीवी और कार्यकर्ता हैं.

स्मरण रहे मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद जहां चैम्पियन सवर्णवादी राजनीतिक दल भाजपा ने रामजन्म भूमि मुक्ति की लड़ाई छेड़कर देश की हजारों करोड़ की संपदा और असंख्य लोगों की प्राणहानि करा दिया,वहीँ दूसरे सवर्णवादी दल कांग्रेस के नरसिंह राव ने आरक्षण को महज कागजों तक सिमटाये रखने के लिए ही 24 जुलाई ,1991 को भूमंडलीकरण की अर्थनीति अंगीकार कर लिया.बाद में नई सदी में जब स्वदेशी के परम हिमायती संघ के अटल बिहारी वाजपेयी आरक्षण के खात्मे के लिए नरसिंह राव से भी तेज गति से राष्ट्र को निजीकरण ,उदारीकरण की राह पर सरपट दौडाने के साथ ही लाभजनक सरकारी उपक्रमों,जहां वंचितों को आरक्षण मिलता है,को ठिकाने लगाने के लिए बाकायदे विनिवेश मंत्रालय ही खोल दिए ,तब दलित बुद्धिजीवी शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ने के लिए नई रणनीति के साथ मैदान में उतरे .यह नई रणनीति थी आरक्षण बचाने से आगे बढ़कर सर्वव्यापी आरक्षण की.इसके तहत उन्होंने सरकारी क्षेत्र की नौकरियों से आगे बढ़कर सेना व न्यायालय सहित निजी क्षेत्र की नौकरियों;सरकारी और निजी क्षेत्रों की खरीदारी,डीलरशिप,सड़क-भवन निर्माण इत्यादि के ठेकों,पार्किंग,परिवहन;राज्य एवं केंद्र की कैबिनेट,विभिन मंत्रालयों के कार्यालयों के कर्मचारियों इत्यादि की नियुक्ति में प्रतिनिधित्व की.किन्तु उपरोक्त क्षेत्रों में उनकी प्रतिनिधित्व की लड़ाई सिर्फ दलितों के लिए न होकर भारत के प्रमुख चार सामाजिक समूहों-सवर्ण,ओबीसी,एससी/एसटी और धार्मिक अल्पसंख्यकों –के स्त्री-पुरुषों के संख्यानुपात में बंटवारे की रही .उन्होंने सभी क्षेत्रों में जिसकी जितनी संख्या भारी ..की जो लड़ाई आज से डेढ़ दशक पूर्व शुरू किया था ,वह आज राष्ट्रीय विमर्श का विषय बन गया है.इस लड़ाई को कामयाब बनाने के लिए ही बाबा साहेब डॉ.आंबेडकर के दलित-मुस्लिम एकता के आह्वान से अनुप्राणित होकर दलित बुद्धिजीवियों ने आज से डेढ़ दशक पूर्व दलित-मुस्लिम एकता की दिशा में पहलकदमी किया था,जो कतिपय कारणों से मुकाम पर न पहुँच सकी.किन्तु मोदी-राज में दलित-मुस्लिम एकता इतिहास की एक बड़ी जरुरत बन गयी है.इन पंक्तियों के लिखे जाने के दौरान अमेरिका की एक स्वतंत्र संस्था ने की रिपोर्ट प्रकाशित हुई जिसमें कहा गया है कि ‘2014 के बाद कांग्रेस पार्टी और भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों में अपरिभाषित क़ानूनी,अप्रभावी आपराधिक न्याय तंत्र और विधि शास्त्र में संगति के अभाव के कारण धार्मिक अल्पसंख्यक समुदायों और दलितों ने उत्पीड़न और भेदभाव का सामना किया है.’इसका अर्थ यह हुआ कि सवर्णवादी सत्ता (भाजपा-कांग्रेस) दलित-मुस्लिमों के लिए समान रूप से हानिकारक है,जिससे निजात दलित-मुस्लिम एकता से ही मिल सकती है.   
 
यह भारी संतोष का विषय है कि जिस दौर में संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा को रोकने के लिए दलित बुद्धिजीवी शक्ति के स्रोतों में हिस्सेदारी की लड़ाई के कॉमन एजेंडे के आधार पर दलित –मुस्लिम एकता की राह तलाश रहे हैं,उसी दौर में जिस यूपी से देश की राजनीति की दिशा तय होती है,भारत में ‘जिसकी जितनी संख्या भारी ..उसकी उतनी भागीदारी ’का विचार देने वाली बसपा ने सौ के करीब मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में उतार कर मुस्लिम समुदाय की ओर भरोसे का हाथ बढाया है.यदि कोई हेडगेवारवादी भाजपा का खात्मा और सवर्णवादी सत्ता का शिकार वंचित समूहों की शक्ति के स्रोतों में वाजिब भागीदारी चाहता है तो कुछ कमियों और सवालों के बावजूद बसपा पर ही भरोसा करना बेहतर होगा.कारण,जो हिन्दू धर्म-संस्कृति संघ के राजनीतिक संगठन भाजपा का प्राणाधार है,उसके खिलाफ वैकल्पिक सांस्कृतिक –धार्मिक विचारों से लैस सिर्फ बसपा है.इस मामले में दूसरे संघ-विरोधी दल पूरी तरह दरिद्र हैं.यही वह दल है जिसने हेडगेवारवादी भाजपा के धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण के खिलाफ जाति चेतना अभियान चला कर शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनीतिक –धार्मिक-शैक्षिक ) पर 80-85 प्रतिशत कब्ज़ा जमाये सवर्ण वर्ग को राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया.बसपा ही वह पार्टी है जिसके अभियानों के फलस्वरूप ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्ण हित की परिकल्पना करने वाली भाजपा सवर्णों के बजाय तेली-तमोली,कुर्मी-कंहार इत्यादि वंचित जातियों के लोगों को अपनी पार्टी में प्रमुखता देने के लिए विवश हुई.बसपा ही वह पार्टी है,जिसके डर से सवर्णवादी दलों ने ब्राह्मणों को पार्टी अध्यक्ष बनाने से तौबा करना शुरू किया ही,अब ब्राह्मण पीएम-सीएम देखने का सपना देखना छोड़ दिया है.

अब जहां तक शक्ति के स्रोतों में भागीदारी का सवाल है,कुछ वैचारिक विचलन के बावजूद बसपा ही वह पार्टी है जो सत्ता का इस्तेमाल ‘सामाजिक –रूपांतरण’ के लिए करने के लिए प्रतिबद्ध है.यूपी विधानसभा चुनाव-2017 में यदि मुस्लिम समुदाय का भरपूर साथ मिलता है,बसपा पर कांशीराम के भागीदारी दर्शन पर लौटने का दबाव और बनेगा.कारण, तब बसपा की सवर्णों पर निर्भरता ख़त्म हो जाएगी और वह खुलकर अपने भागीदारी दर्शन पर लौट आएगी,ऐसा दलित बुद्धिजीवियों को भरोसा है.बसपा ने जून 2009 में सरकारी ठेकों में आरक्षण लागू करने का ऐतिहासिक निर्णय लेकर ,जिसे अखिलेश सरकार ने सत्ता में आते ही ख़त्म कर दिया था,यह संकेत कर दिया है कि उसमें पारंपरिक आरक्षण से आगे बढ़कर सभी वंचित समुदायों को शासन-प्रशासन सहित उद्योग-व्यापार में भागीदारी देने की चाह है.  

(लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)   

Courtesy: सबरंग इंडिया
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