NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
डॉ अम्बेडकर : पूंजी और श्रम पर उनके नजरिये से किसे डर लगता है ?
बाबा साहब 127वीं जयन्ती के मौके पर इन सारी बातों के लिखे जाने की जरूरत इसलिए है ताकि हर तरह के शोषण के खिलाफ लड़ाई को एक सूत्र में पिरोया जा सके ।
बादल सरोज
13 Apr 2018
baba saheb

डॉ. अम्बेडकर को सिर्फ जाति और वर्ण के प्रश्न तक बाँध कर रख देना एक बड़े ग्रैंड प्लान का हिस्सा है जो शासक वर्गों के लिए भी मुफीद है और उनके लिए भी जो बाबा नाम केवलम करके उन्हें एक मूर्ति में बदल कर भगवान बना देने पर आमादा हैं । 

जाति भेद और अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्षों के अनेक तजुर्बों के बाद डॉ. अम्बेडकर ने 1936 में एक राजनीतिक पार्टी बनाई और उसका नाम रखा - इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी । इसका झण्डा लाल था और घोषणापत्र का सार मोटा मोटी समाजवादी । इस पार्टी के गठन के समय उनकी साफ़ मान्यता थी कि वास्तविक समानता लानी है तो आर्थिक और सामाजिक शोषण से एक साथ लड़ना होगा ।

उनका मानना था कि भारत में वर्गों के निर्माण में जाति और वर्ण की अहम भूमिका रही है । वर्ण और जाति के विकास के बारे में यही समझदारी मार्क्सवादी इतिहासकार डी डी कौशाम्बी ने अपने तरीके से सूत्रबद्द की थी । मार्क्स के समकालीन रहे जोतिबा फुले, जिन्होंने दलित शब्द का पहली बार इस्तेमाल किया था, उस जमाने में ही इस नतीजे पर पहुँच चुके थे कि आर्थिक, सामाजिक शोषण और लैंगिक असमानता के विरुद्ध एक साथ ही लड़ा जा सकता है ।

मगर इन दिनों कुछ निहित स्वार्थों का जोर इस बात पर अधिक है कैसे शोषण के विरुद्ध जारी लड़ाईयों के बीच आपस में लड़ाई कराई जाए । ऐसा क्यों , कैसे, किसलिए है इस पर बाद में चर्चा की जरूरत है । अभी मजदूरों के बारे में डॉ आंबेडकर की चिंताओं और भारत के आर्थिक ढाँचे को ढालने की उनकी समझदारी के मोटे खाके तथा उसे क्रियान्वित करने मौक़ा मिलने पर उस दिशा में किये गए कामों पर नजर डालना ठीक होगा ।

अपने जीवन में डॉ आंबेडकर ने मजदूरों के बीच भी काम किया । रेलवे मजदूरों के बीच उनका भाषण उनकी समझ स्पष्ट कर देता है । इस भाषण में उन्होंने कहा था कि "साझी यूनियन में, लाल झंडे की यूनियन में काम करो, उसी में अपनी समस्याये भी उठाओ । अगर यूनियन तुम्हारी नहीं सुनती है तब  अलग से यूनियन बनाने पर विचार करो ।" टेक्सटाइल मजदूर आंदोलन में उनके और श्रमिक यूनियन के बीच संवाद से न जाने कितनी भूले, चूकें दुरुस्त हुयी थीं । 

डॉ. अम्बेडकर 1942 से 46 तक वाइसराय की कार्यकारी परिषद् में लेबर मेंबर (आज के ढाँचे में श्रम मंत्री के समकक्ष ) रहे । इस अवधि में, अंगरेजी राज के चलते उपस्थित हुयी बंदिशों और सीमाओं के बावजूद डॉ. अम्बेडकर ने उस समय में जारी तीखे मजदूर आंदोलनों की मांगों को अपने एजेंडे में लिया । उनमे से अनेक के बारे में  दूरगामी निर्णय लिए, बाध्यकारी क़ानून बनवाये ।

सातवे भारतीय श्रम सम्मेलन में 27 नवम्बर 1942 को डॉ अम्बेडकर ने आठ घंटे काम का क़ानून रखा । इसे रखते हुए उनकी टिप्पणी थी कि "काम के घंटे घटाने का मतलब है रोजगार का बढ़ना ।" इस क़ानून के मसौदे को रखते हुए उन्होंने आगाह किया था कि कार्यावधि 12 से 8 घंटे किये जाते समय वेतन कम नहीं किया जाना चाहिए ।

महिलाओं के प्रति डॉ अम्बेडकर का सोच उस समय के (और अनेक अर्थों में आज के भी)  कथित बड़े राष्ट्रीय नेताओं से काफी आगे था । श्रम सदस्य के रूप में भी उन्होंने इसी दिशा में प्रयत्न किये । खदान मातृत्व लाभ क़ानून, महिला कल्याण कोष, महिला एवं बाल श्रमिक संरक्षण क़ानून, महिला मजदूरों के लिए मातृत्व लाभ क़ानून के साथ उन्होंने भूमिगत कोयला खदानों में महिला मजदूरों से काम न कराने के क़ानून की बहाली करवाई ।

बिना किसी लैंगिक भेदभाव के समान काम के लिए समान वेतन का क़ानून भी इसी दिशा में एक कदम था ।

ट्रेड यूनियन एक्ट भले 1926 में बन गया था । मगर मालिकों द्वारा श्रमिक संगठनो को मान्यता देना अनिवार्य बनाने का क़ानूनी संशोधन 1943 में हुआ । यही वह समय था जब काम करते समय दुर्घटना के बीमा, जिसे बाद में ईएसआई का रूप मिला,  का क़ानून बना - इसी समय बने कोयला तथा माइका कर्मचारियों के प्रोविडेंट फण्ड और सारे मजदूरों के प्रोविडेंट फंड्स अस्तित्व में आये ।

न्यूनतम वेतन क़ानून के निर्धारण की प्रक्रिया और उसकी शुरुआती ड्राफ्टिंग में डॉ अम्बेडकर का प्रत्यक्ष योगदान था ।

मजदूरी के दूसरे पक्ष, ग्रामीण मजदूरों के सम्बन्ध में डॉ आंबेडकर की समझ साफ़ थी । वे उनके संरक्षण के साथ साथ भूमि सुधारों के हामी थे । भूमि के संबन्धो के पुनर्निर्धारण के मामले में डॉ अम्बेडकर का रुख अपने सहकर्मियों की तुलना में अलग था । यूं भी वे वे राजकीय समाजवाद के हिमायती थे । इसलिए भूमि सुधारों और आर्थिक गतिविधियों में राज्य के हस्तक्षेप के पक्षधर थे । संविधान सभा में संविधान के बुनियादी अधिकारों में जोड़ने के लिए  उन्होंने जो बिंदु सुझाये थे उनमे अन्य बातों के अलावा जो तीन विषय शामिल थे वे इस प्रकार थे :

● प्रमुख केंद्रीय उद्योग सरकारी क्षेत्र में सरकार द्वारा संचालित हों ।
● बुनियादी प्रमुख उद्योग (गैर रणनीतिक) भी सरकारी मालिकाने में रहें, इनका संचालन खुद सरकार या उसके नियंत्रण वाले निगमों द्वारा किया जाए । 
● कृषि राजकीय उद्योग हो । इसका पुनर्संगठन करने के लिए सरकार सारी भूमि का अधिग्रहण करे फिर समुचित आकार में उन जमीनों को गाँव के लोगों के बीच बाँट दे । इस पर परिवारों के समूहों द्वारा सहकारी खेती की जाए । यह काफी हद तक लेनिन के समय संक्रमण के दौर में अस्तित्व में आयी सामूहिक खेती (कोलखोज) जैसी ही बात थी। 

डॉ अम्बेडकर अंग्रेजों की राजस्व प्रणाली के कटु आलोचक थे । उनका मानना था कि किसी अर्थव्यवस्था के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए जरूरी है पर्याप्त वित्त की उपलब्धता और उसका सही इस्तेमाल।  इस लिहाज से कर प्रणाली को वे महत्वपूर्ण मानते थे और इस बारे में उनका मानना था कि : टैक्स आमदनी और भुगतान क्षमता के आधार पर लगना चाहिए । इसकी दरे इस प्रकार से ऊपर की ओर बढ़ती हुयी तय की जानी चाहिए कि वे गरीब के लिए कम और अमीरों के लिए अधिक हों । एक ख़ास सीमा से कम आमदनी वालों को टैक्स से मुक्त रखा जाना चाहिए  आदि आदि ।

बाबा साहब ( उन्हें यह नाम उनके लम्बे समय तक सहयोगी रहे कम्युनिस्ट नेता कामरेड आर बी मोरे ने दिया था) 127वीं जयन्ती के मौके पर इन सारी बातों के लिखे जाने की जरूरत इसलिए है ताकि हर तरह के शोषण के खिलाफ लड़ाई को एक सूत्र में पिरोया जा सके । इसलिए भी जरूरी है ताकि आंबेडकर के कुपाठ के आधार पर उदारीकरण की आर्थिक नीतियों को दलितों के लिए वैतरणी की राह बताने वाले, दलित चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स  जैसे अपवाद शिगूफों के आधार पर कारपोरेट पूँजी की वन्दना करने वाले कुछ तथाकथित स्वयंभू अम्बेडकरवादियों की समझदारी का खोखलापन और उनके मकसद की वास्तविकता समझी जा सके । यह ठीक तरह से जाना जा सके कि इन दिनों , इनमे से कुछ भद्र पुरुष जिस शिद्दत से वामपंथ के विरोध के लिए बहाने ढूंढते हैं, उन्हें इस पुण्य काम के लिए सुपारी किसने दी है ।

भीमराव आंबेडकर
मज़दूर वर्ग
वर्ग संघर्ष
जाति उन्मूलन
दलित प्रतिरोध
BR Ambedkar
Annihilation of caste

Related Stories

विचारों की लड़ाई: पीतल से बना अंबेडकर सिक्का बनाम लोहे से बना स्टैच्यू ऑफ़ यूनिटी

दलितों में वे भी शामिल हैं जो जाति के बावजूद असमानता का विरोध करते हैं : मार्टिन मैकवान

भारत में सामाजिक सुधार और महिलाओं का बौद्धिक विद्रोह

उत्तराखंड समान नागरिक संहिता चाहता है, इसका क्या मतलब है?

मंडल राजनीति को मृत घोषित करने से पहले, सीएए विरोध प्रदर्शनों के दौरान अंबेडकर की तस्वीरों को याद करें 

जाति के सवाल पर भगत सिंह के विचार

मध्य प्रदेश : धमकियों के बावजूद बारात में घोड़ी पर आए दलित दूल्हे

वसुधैव कुटुम्बकम: भारत को फिर से एक कैसे करें? 

अम्बेडकरवादी चेतना के अफ़सानों का दस्तावेज़: वेटिंग फ़ॉर अ वीज़ा

पूंजीवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष के बिना अंबेडकर के भारत का सपना अधूरा


बाकी खबरें

  • mamta banerjee
    भाषा
    तृणमूल कांग्रेस ने बंगाल में चारों नगर निगमों में भारी जीत हासिल की
    15 Feb 2022
    तृणमूल कांग्रेस ने बिधाननगर, चंदरनगर और आसनसोल नगरनिगमों पर अपना कब्जा बरकरार रखा है तथा सिलीगुड़ी में माकपा से सत्ता छीन ली।
  • hijab
    अरुण कुमार त्रिपाठी
    हिजाब विवादः समाज सुधार बनाम सांप्रदायिकता
    15 Feb 2022
    ब्रिटेन में सिखों को पगड़ी पहनने की आज़ादी दी गई है और अब औरतें भी उसी तरह हिजाब पहनने की आज़ादी मांग रही हैं। फ्रांस में बुरके पर जो पाबंदी लगाई गई उसके बाद वहां महिलाएं (मुस्लिम) मुख्यधारा से गायब…
  • water shortage
    शिरीष खरे
    जलसंकट की ओर बढ़ते पंजाब में, पानी क्यों नहीं है चुनावी मुद्दा?
    15 Feb 2022
    इन दिनों पंजाब में विधानसभा चुनाव प्रचार चल रहा है, वहीं, तीन करोड़ आबादी वाला पंजाब जल संकट में है, जिसे सुरक्षित और पीने योग्य पेयजल पर ध्यान देने की सख्त जरूरत है। इसके बावजूद, पंजाब चुनाव में…
  • education budget
    डॉ. राजू पाण्डेय
    शिक्षा बजट पर खर्च की ज़मीनी हक़ीक़त क्या है? 
    15 Feb 2022
    एक ही सरकार द्वारा प्रस्तुत किए जा रहे बजट एक श्रृंखला का हिस्सा होते हैं इनके माध्यम से उस सरकार के विजन और विकास की प्राथमिकताओं का ज्ञान होता है। किसी बजट को आइसोलेशन में देखना उचित नहीं है। 
  • milk
    न्यूज़क्लिक टीम
    राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ खिलवाड़ क्यों ?
    14 Feb 2022
    इस ख़ास पेशकश में परंजॉय गुहा ठाकुरता बात कर रहे हैं मनु कौशिक से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड से सम्बंधित कानूनों में होने वाले बदलावों के बारे में
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License