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भारत
राजनीति
विध्वंस, नाम बदलना, पुनर्लेखन : भविष्य पर नियंत्रण करने के लिए कैसे अतीत को बदल रही है भाजपा?
भाजपा इतिहास में दखलंदाज़ी कर रही है,  ताकि सांप्रदायिक आग हमेशा जलती रहे। यह पार्टी का ज्ञान, पहचान है और इसलिए लोगों पर नियंत्रण का प्राथमिक स्रोत है।
शलिनी दीक्षित
13 Jul 2021
Translated by महेश कुमार
विध्वंस, नाम बदलना, पुनर्लेखन : भविष्य पर नियंत्रण करने के लिए कैसे अतीत को बदल रही है भाजपा?

आज़ादी के बाद अंग्रेजों की दिल्ली से रुख़्सती के बाद दिल्ली एक भौतिक बुनियादी ढांचे से घिरा हुआ क्षेत्र रह गया था। उस वक़्त भारतीय राष्ट्रीय पहचान स्थापित करने के लिए, सार्वजनिक स्थलों पर भारतीय मूल्यों को प्रदर्शित करने और स्वराज की घोषणा करने की जरूरत थी। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर दिखाई देने वाली औपनिवेशिक सर्वोच्चता की भौतिक यादों के साथ यह कैसे संभव हो सकता था? क्या अवांछित यादों को हटाया जा सकता है? इसका उत्तर कई कारणों से "नहीं" है। इसमें वित्तीय अड़चनें थीं, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि एक नए राष्ट्र के अतीत को कैसे संबोधित किया जाए, जो औपनिवेशिक अधीनता की दुष्ट छाया को दूर करना चाहता था।

सेंट्रल विस्टा के पुननिर्माण के संबंध में प्रशासकों ने खुद से निर्णय लेने के बजाय व्यापक जनमत की राय ली थी। इसलिए, अतीत के साथ अचानक संबंध तोड़ने के बजाय, राष्ट्रीयकरण की प्रक्रिया को निरंतर चलने वाली प्रक्रिया का रास्ता अपनाया गया। इस दृष्टिकोण में अतीत को फिर से देखना और उसे नकारने या ओवरराइट करने के बजाय उससे सीखना शामिल था। इस प्रक्रिया में, शाही ढांचे को पूरी तरह या अचानक नहीं हटाया गया था। निश्चित रूप से, राष्ट्र-निर्माण के लिए जरूरी, ब्रिटिश प्रतीकों की बाहरी अभिव्यक्तियों को हटा दिया गया था या फिर उन्हे भारतीय प्रतीकों के साथ बदल दिया गया था। लेकिन, अन्य जगहों पर, उन्होंने "पुराने स्पर्श" को बरकरार रखा। उदाहरण के लिए, बीते समय की एक छोटी सी याद के रूप में, राष्ट्रपति भागवत में पुस्तकालय के प्रवेश द्वार के दरवाजे पर ब्रिटिश शेर के प्रतीक को संरक्षित रखा गया। उस समय इसके पीछी यह समझ थी कि इन संरचनाओं में एक नए भारत के निर्माण के साथ-साथ साम्राज्यवाद पर विजय हासिल करने के इतिहास के साथ-साथ औपनिवेशिक शासन की छाप भी थी। इसका मतलब साफ था कि एक अस्वस्थ तोड़फोड़ की जगह एक स्वस्थ निरंतरता का चयन करना था।

हालाँकि, वर्तमान शासन अतीत के साथ स्वस्थ संबंधों को बनाए रखने में विश्वास नहीं रखता है। एक हिंदू राष्ट्र के रूप में भारत की कल्पना करने वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अतीत को बदलने के लिए निकली है, जिसे वह भारत के एक धर्मनिरपेक्ष इतिहास के रूप में पेश करना चाहती है। भारत का कोई भी इतिहास जो देश को हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित नहीं करता है, वह हिंदू राष्ट्रवादी आदर्शों को पूरा करने में एक बड़ी बाधा है। इसलिए, भाजपा उन सभी आख्यानों को नष्ट करना चाहती है जिनमें विविधता और समावेश का सार है। इसका उदाहरण हाल ही में सेंट्रल विस्टा का पुनर्निर्माण है। वर्तमान सरकार इस प्रतिष्ठित विरासत से जुड़े स्थलों को और सार्वजनिक भूमि के 35 हेक्टेयर टुकड़े को "सरकारी इस्तेमाल" के नाम पर बदलने की तेजी से तैयारी कर रही है। इसका मतलब होगा कई विरासत से जुड़ी इमारतों को ध्वस्त करना और संसद भवन, राष्ट्रपति भवन, इंडिया गेट और युद्ध स्मारक जैसे स्थानों को फिर से डिजाइन करना।

दशकों से, सेंट्रल विस्टा उन लोगों के लिए अनगिनत जीवित यादों की धुरी रहा है, जिन्होंने इस स्थल का इस्तेमाल किया था या किया है। कई प्रमुख विरासत संरक्षणवादी और आर्किटेक्ट इस तरह की कई इमारतों को ध्वस्त करने के बदले में दिए गए बहाने से असहमत हैं, जिन बहानों का योजना के तहत खुलासा हुआ है। ध्यान दें कि "विध्वंस अभियान" केवल औपनिवेशिक विरासत के खिलाफ नहीं है: इस योजना के मुताबिक कई औपनिवेशिक से पहले और औपनिवेशिक काल के बाद के स्थलों और उन से जुड़ी सार्वजनिक स्मृति को ध्वस्त करने की योजना हैं।

अप्रैल 2017 में, भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने जाने-माने प्रगति मैदान के प्रदर्शनी मैदानों से हॉल ऑफ नेशंस और हॉल ऑफ इंडस्ट्रीज को भी गुप्त रूप से ध्वस्त कर दिया था। सन 1972 में बनी इन इमारतों ने औपनिवेशिक भारत के बाद के समय में 25 साल पूरे कर लिए थे। कई वास्तुकारों और इतिहासकारों द्वारा किए गए अनुरोधों की अनदेखी करते हुए, प्रगति मैदान में विध्वंस ने महत्वपूर्ण विरासत चिह्नों को बेरहमी और निरंकुश तरीके से मिटा दिया।

अतीत में अन्य क्षेत्रों में भी भाजपा के विनाश के प्रयास उसके पीछे के इरादों की झलक देते हैं। दक्षिणपंथी हिंदू राष्ट्रवादियों का प्राचीन धार्मिक ग्रंथों और उनकी ब्राह्मणवादी व्याख्या के आधार पर इतिहास के एक ऐसे संस्करण स्थापित करना उनका पुराना एजेंडा है। इन्ही कारणों से वे इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को निशाना बना रहे हैं: यह कुछ और नहीं बल्कि भारतीय राष्ट्र के बनने की कहानी को बदलने, अतीत के प्रतिनिधित्व को "शुद्ध" करने और भारतीय अतीत को हिंदू कथा में स्थापित करने की कोशिश है। वे मुस्लिम शासकों के खिलाफ आम लोगों में नफ़रत की भावना फैलाना चाहते हैं, हिंदू पौराणिक कथाओं को ऐतिहासिक बनाना चाहते हैं, और भारत की ऐतिहासिक विविधता को "हिंदू राष्ट्र" के रूप में चित्रित कर उसे अलग करना चाहते हैं।

1960 और 1970 के दशक के दौरान एनसीईआरटी द्वारा तैयार की गई इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के पहले सेट में धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और सांप्रदायिक सद्भाव के व्यापक उद्देश्यों का व्यापक जिक्र था। चूंकि इन पाठ्यपुस्तकों में हिंदुओं और मुसलमानों को परस्पर विरोधी समूहों के रूप में चित्रित नहीं किया गया था, इसलिए हिंदू राष्ट्रवादी इन पुस्तकों के लेखकों पर "मुस्लिम आक्रमणकारियों" के कुकर्मों को कम आंकने का आरोप लगाते रहे हैं।

केंद्र में भाजपा के सत्ता में आने से पहले, स्कूली पाठ्यपुस्तकों में हिंदुत्व का स्वाद पेश करने का उनका प्रयास उन राज्यों में काम में आया जहां वह सत्ता में आई थी। 1992 में, केंद्र ने इतिहासकार बिपन चंद्र के नेतृत्व में एक संचालन समिति नियुक्त थी, जिसमें पाया गया कि विभिन्न राज्यों में प्रकाशित पाठ्यपुस्तकों ने औपनिवेशिक रूढ़ियों को मजबूत किया, मुसलमानों को हिंदू समाज को "दूषित" करने के लिए दोषी ठहराया और भाजपा की प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का महिमामंडन किया गया था। 

राष्ट्रीय स्तर पर, इतिहास को मिथक बनाने के भाजपा के एजेंडे का स्वरूप उस दिन देखने को मिला जब वह 1998 में सत्ता में आई थी। सरकार ने पाठ्यपुस्तकों के दूसरे सेट के माध्यम से हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को शामिल करने के लिए सभी एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों को फिर से लिखा था। इन पाठ्यपुस्तकों ने एक हिंदू राष्ट्रवादी अतीत बनाने के लिए अकादमिक और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को धता बता दिया था। 2004 में जब भाजपा सत्ता से बाहर हो गई तो इन पाठ्यपुस्तकों में मौजदु "त्रुटियों" में "सुधार" किया गया था, लेकिन जब वह 2014 में वापस सत्ता में आई, तो भारत के आधिकारिक इतिहास को नियंत्रित करने के उसके प्रयास फिर से तेज़ हो गए।  

2014 से ही इतिहास के जरिए राष्ट्रवाद को फिर से परिभाषित करने का प्रयास केवल स्कूली पाठ्यपुस्तक स्तर पर नहीं सीमित रहा बल्कि विश्वविद्यालय, समुदाय और सामाजिक स्तर पर भी चलाया गया। उदाहरण के लिए, मार्च में, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इतिहास का एक नया मसौदा पाठ्यक्रम जारी किया जिसमें हिंदू पौराणिक कथाओं को शामिल किया गया है।

ऐतिहासिक महत्व के सार्वजनिक स्थलों का अब भी नामकरण, पुनर्रचना और पुनर्परिभाषित किया जा रहा है। इस कार्यकाल में, भाजपा शासन ने कस्बों, सड़कों, संग्रहालयों, हवाई अड्डों आदि के नाम बदलने की पूरी कोशिश की है। 2015 में, औरंगजेब रोड, नई दिल्ली का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया गया। 2018 में, उत्तर प्रदेश के मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन कर दिया गया। पिछले साल, आगरा में मुगल संग्रहालय का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय कर दिया गया। इस नामकरण पर राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा, "मुगल हमारे हीरो कैसे हो सकते हैं!" 16 वीं शताब्दी में मुगल शासक अकबर द्वारा नामित इलाहाबाद को स्थानीय हिंदू तीर्थयात्रा के बाद 2018 में प्रयागराज का नाम दिया गया था। जबकि यह शहर अभी भी अपनी विशिष्ट मुगल वास्तुकला से सुशोभित है।

इस तरह के विनाश और पुनर्गठन के भावनात्मक, सामाजिक, पारिस्थितिक और वित्तीय झटकों के साथ सरकार बड़ी निरंकुशता से आगे बढ़ रही है। मुगल और मुस्लिम विरासत के प्रति भाजपा की इस तरह की कट्टरपंथी असहिष्णुता समृद्ध विरासत और ऐतिहासिक निरंतरता का नुकसान कर रही है। और यह भारत के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से समझौता कर रही है।

इतिहास सामाजिक प्रतीकों और सार्वजनिक प्रतीकात्मकता में ज़िंदा रहता है। इसे मूर्तियों, स्मारकों, संग्रहालयों और कई अन्य संरचनाओं द्वारा संप्रेषित या इसका एहसास कराया जाता है। हमारे चौराहों और सार्वजनिक पार्कों के नाम, और हमारी सड़कों को उनके संबंधित इतिहास को पेश करने के लिए क्यूरेट किया गया है। वे लोगों को उनके अस्तित्व की निरंतरता के बारे में सूचित करते हैं, उपयोगी ज्ञान प्रणाली प्रदान करते हैं, और हमारी पहचान बनाते हैं। उन्हें ध्वस्त करना उन लोगों की पहचान के कुछ हिस्सों पर हमला करना है जो उनके अपने हैं। इतिहास हमेशा सामाजिक और राजनीतिक घटनाओं की व्याख्याओं को स्थापित करने का एक उपकरण रहा है, जो इसे क्यूरेट करता हैं। हालाँकि, अब हम जो खंडन और व्याख्याएँ देख रहे हैं, वे पूरी तरह से कठोर और फासीवादी हैं। आधिकारिक इतिहास से भौतिक अवशेषों और नामों को मिटाना और सांप्रदायिक ज़हर से भरी कहानी को पेश करना सिर्फ अलोकतांत्रिक कार्य नहीं है बल्कि प्रतीकात्मक हिंसा भी हैं।

लेखक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज़, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ साइंस कैंपस, बेंगलुरु में सहायक प्रोफ़ेसर हैं। व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

Demolish, Rename, Rewrite: How BJP Changes the Past to Control the Future

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