NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
समाज
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
धार्मिक पूर्वाग्रहों की छाया में भोजन
भोजन को लेकर अलग अलग समुदायों/सम्प्रदायों में अलग-अलग तरह की बंदिशें बनी हैं, जो कई बार एक-दूसरे के ख़िलाफ़ भी दिखती हैं।
सुभाष गाताडे
13 May 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: BBC

वर्णसमाज को ही देखें जिसने भोजन को ‘सात्विक’ और ‘तामसिक’ की श्रेणी में बांटा है, जिसमें लहसुन और प्याज़ भी शुमार किए जाते हैं। उनके मुताबिक़ तामसिक भोजन ऐसा भोजन होता है ‘जो निराशा, अज्ञान, आलस, आपराधिक प्रव्रत्ति और संदेह को जन्म दे’, जो ऐसी बात है जिसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। 

बहरहाल, ऐसी मान्यताएँ अपने घर तक, अपने निजी जीवन तक सीमित रहें तो ठीक है, लेकिन अगर एक धर्मनिरपेक्ष राज्य में ऐसी मान्यताएँ नीतियों में प्रतिबिम्बित होने लगें, सेवा प्रदाताओं के रुख को निर्धारित करने लगें तो वह किस तरह सामाजिक ताने बाने को प्रभावित कर सकती हैं, इसका अन्दाज़ा लगाना मुश्किल है। 

इस सम्बन्ध में ताज़ा ख़बर कर्नाटक से है, जहाँ पता चला है कि बच्चों के कुपोषण को दूर करने तथा स्कूलों में उनके दाख़िले को बढ़ाने में कामयाब रही मिड डे मील योजना पर सेवा प्रदाता के धार्मिक पूर्वाग्रहों की छाया पड़ती दिख रही है। मालूम हो कि अक्षय पत्र संगठन - जो इस्कॉन नामक धार्मिक समूह के साथ सम्बद्ध है - कर्नाटक के लगभग तीन हज़ार स्कूलों के लाखों बच्चों तक मिड डे मील पहुँचाता है, ने उन स्कूलों में लहसुन एवं प्याज़ बन्द कर दिया गया है और अंडे दिए जाने पर अघोषित पाबन्दी लगी है। इतना ही नहीं जब बच्चों ने बेस्वाद खाने को लेकर शिकायतें की और स्कूलों में खाने की खपत कम हो गयी, तब भी उनके सुझावों, शिकायतों पर कोई ग़ौर नहीं किया गया। 

पिछले दिनों कर्नाटक के सिविल सोसायटी संगठनों से सम्बद्ध लोगों एवं विशेषज्ञों ने राज्य के मुख्य सचिव को लिख कर इस मामले में अपनी सख़्त आपत्ति दर्ज करा दी और उन्होंने कहा कि अपने धार्मिक पूर्वाग्रहों को बच्चों पर लाद कर उपरोक्त संस्था ने मानव संसाधन मंत्रालय के अपने दिशानिर्देशों का भी उल्लंघन किया है। दिशानिर्देश साफ़ कहते हैं ‘‘सिविल सोसायटी संगठन/एनजीओ धर्म, जाति, सम्प्रदाय आदि के आधार पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं करेगा और वह प्रस्तुत कार्यक्रम को किसी विशेष धार्मिक आचार के प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं करेगा।’ ‘नम्मा आहार नम्मा संस्क्रति’ नामक समूह में एकत्रित इन लोगों ने दावा किया है कि इस पूरे मामले में केन्द्र सरकार से सम्बद्ध नेशनल इन्स्टिटयूट ऑफ़ न्यूटिशन की भूमिका भी निष्पक्ष नहीं दिखी है, जिसने इस पूरे मामले को ‘‘अवैज्ञानिक, पूर्वाग्रहों से प्रेरित और गैरजिम्मेदार तरीके’’ से निपटाने की कोशिश की है जिसने अक्षय पत्रा फाउण्डेशन द्वारा आपूर्ति किए जा रहे खाने के पोषण मूल्य को लेकर एक एकांगी रिपोर्ट भेजी है। 

विडम्बना ही है कि सेवा प्रदाताओं/सरकारों के धार्मिक पूर्वाग्रहों की छाया मिड डे मील पर पड़नेवालों में कर्नाटक कोई अपवाद नहीं है। अगर अक्षय पत्रा फ़ाउण्डेशन-कांग्रेस-जनता दल की साझा सरकार के तहत बच्चों को तामसिक खानों से तथा अंडे से वंचित कर रहा है, तो साथ साथ हम यह भी पाते हैं कि अब तक भाजपा शासित 15 राज्यों में या जिनमें से तीन में से उसकी हुकूमत अब ख़त्म हो चुकी है/ स्कूलों के मिड डे मील में अंडे को शामिल नहीं किया गया है। हम याद कर सकते हैं कि किस तरह मध्यप्रदेश में इसके पहले सत्तासीन शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने मिड डे मील में अंडे देने का विरोध किया था और कहा था कि इसके बजाय बच्चों को केले दिए जाएँ जबकि यह स्पष्ट था कि केले नाशवान होते हैं।

एक ऐसे मुल्क में जो विश्व भूख सूचकांक में सबसहारन मुल्कों से होड़ लेता दिखता है, जहाँ आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी चिरकालिक भूख का शिकार है और जो दुनिया के ‘‘वैश्विक भूख सूचकांक में 131 में नम्बर पर स्थित है’’ यह बेहद क्रूर क़दम है कि लोगों को विशिष्ट अन्न खाने से वंचित किया जाए। बच्चे जो देश का भविष्य कहलाते हैं उन्हें सस्ते प्रोटीन के एकमात्रा स्त्रोत अंडे से वंचित किया जाए, जबकि आहार विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते रहते हैं कि स्कूली बच्चों के मिड डे मील में अंडों को अनिवार्य किया जाए।

दरअसल, शाकाहारवाद के प्रति या खास किस्म के शाकाहारी भोजन के प्रति यह बढ़ता जोर केन्द्र तथा विभिन्न राज्यों में भाजपा की हुक़ूमत के साथ सीधे रूप से जुड़ा है। 

हम याद कर सकते हैं कि वर्ष 2014 में मोदी हुक़ूमत बनने के तत्काल बाद गुजरात के पलिटाना में जैन साधुओं द्वारा की गयी भूख हड़ताल कि उनके लिए पवित्रा कहे जाने वाले नगर पलिटाना को शाकाहारी घोषित किया जाए और उनकी महज़ चार दिन की भूख हड़ताल के बाद सरकार ऐलान का यह पलिटाना नगर को, ‘‘शाकाहारी इलाक़ा" घोषित करने का निर्णय लिया गया है। एक लाख आबादी वाले इस नगर की 25 फ़ीसदी आबादी मुस्लिम है। इतना ही नहीं स्थानीय सरकारी अधिकारी बताते हैं कि नगर की चालीस फ़ीसदी आबादी मांसाहारी है। सिर्फ़ मुस्लिम ही नहीं कोली जैसे हिन्दू समुदाय भी मांसाहारी हैं। विगत पपाँच सालों से म्युनिसिपालिटी की सीमा के भीतर मांस और अन्य ग़ैरशाकाहारी भोजन - जिनमें अंडे भी शामिल किए गए हैं - के विक्रय पर रोक लगी है। हज़ारों लोग बेरोज़गार हुए हैं। 

यह बात भी विदित है कि इन्हीं दिनों स्म्रति इराणी की अगुआई में मानव संसाधन मंत्रालय ने विश्वविद्यालय परिसरों के एक अलग क़िस्म की निगरानी का सिलसिला शुरू किया था और यह जानने की कोशिश की थी कि वहां के रसोईघरों में क्या खाना पक रहा है, जिसकी शुरुआत मध्यप्रदेश के राष्टीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता द्वारा केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को भेजे एक पत्र के बाद हुई थी। 

आईआईटी और आईआईएम के निेदेशकों को पत्रा लिख कर मंत्रालय की तरफ़ से पूछा गया था कि वहाँ खाना बनाने और केटरिंग के किस क़िस्म के इंतज़ाम हैं और इस सम्बन्ध में उन्हें ‘‘एक्शन टेकन’’ रिपोर्ट भेजने को कहा गया था। अपने पत्रा में संघ के उपरोक्त स्वयंसेवक ने जो आईआईटी से किसी भी रूप में जुड़ा नहीं था और न ही उसकी संतान या उसके परिवार के सदस्य वहाँ पढ़ रहे थे - शाकाहारी और मांसाहारी छात्रों के अलग-अलग बैठने का इन्तज़ाम करने की मांग की थी, उसका दावा था कि ‘‘यह संस्थान पश्चिम की कुसंस्क्रति को फैला रहे हैं और माता पिताओं को दुखी कर रहे हैं।’’

आख़िर तामसिक भोजन पर रोक, अंडा-मांसाहार पर पाबन्दी आदि बातें भारत की जनता के वास्तविक हालात से क़त्तई मेल नहीं खाती क्योंकि भारत की आबादी का बहुलांश मांसाहारी है। 
मालूम हो कि भारत की जनता का अब तक का सबसे आधिकारिक सर्वेक्षण जिसे ‘पीपल ऑफ़ इंडिया सर्वे’ कहा गया था, जिसे एंथ्रोपॉलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के तत्वावधान में अंजाम दिया गया, वह 1993 में पूरा हुआ था। आठ साला इस अध्ययन का संचालन सर्वे के महानिदेशक कुमार सुरेश सिंह ने किया था जिन्होंने भारत के हर समुदाय की हर रिवाज, हर रस्म का गहराई से अध्ययन किया। सर्वेक्षण के अंत में सर्वे आफ इंडिया की टीम ने पाया कि देश में मौजूद 4,635 समुदायों में से 88 फ़ीसदी मांसाहारी हैं।
   
शाकाहारवाद की यह सनक स्म्रति इरानी के पद से हटने के बाद भी बनी हुई है, जिसका चरम पिछले साल आईआईटी मद्रास में देखने को मिला था जब वहाँ मेस में प्रवेश के लिए भी अलग-अलग गेट बनाए गए थे। मांसाहारियों के लिए अलग गेट और शाकाहारियों के लिए अलग गेट और दोनों के लिए हाथ धोने के अलग बेसिन। ‘अस्प्रश्यता की अलग ढंग से वापसी’’ को बयां करने वाले इस निर्णय की राष्टीय स्तर पर उग्र प्रतिक्रिया हुई थी और प्रबंधन इस निर्णय का ज़िम्मा केटरर पर डाल कर अपने आप को बचाने की कोशिश की थी।

इस पूरे प्रसंग की चर्चा करते हुए, अम्बेडकर पेरियार स्टडी सर्कल- जो संस्था में सक्रिय छात्रों का एक समूह है और जिसने इस मसले को राष्टीय स्तर की सूर्खियों में लाने का काम किया, का कहना था कि किस तरह ‘‘आधुनिक’’ समाज में जाति अलग रूप धारण कर लेती है। आईआईटी मद्रास परिसर में, वह शाकाहारी और मांसाहारी छात्रों के लिए अलग-अलग प्रवेशद्वारों, बर्तनों और डाइनिंग एरिया के रूप में प्रतिबिम्बित होती है।

food
food and religion in India
Right to Food
veg and non veg battle
karnataka
iit madras
smriti irani
Religious discrimination
mid day meal
Religion and science

Related Stories

कर्नाटक पाठ्यपुस्तक संशोधन और कुवेम्पु के अपमान के विरोध में लेखकों का इस्तीफ़ा

हिजाब मामले पर कोर्ट का फ़ैसला, मुस्लिम महिलाओं के साथ ज़्यादतियों को देगा बढ़ावा

कर्नाटक में लागू हुआ ट्रान्सजेंडर आरक्षण : बाक़ी राज्य भी लें सबक़

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस: कहां हैं हमारे मानव अधिकार?

कोरोना वायरस ने आधुनिक समाज के भेदभाव से भरे चरित्र को उजागर कर दिया

कोरोना संकट में फ़ेक न्यूज़ का शिकार बनते सब्जी और फल बेचनेवाले

सुरक्षा बलों में भी कम नहीं है महिलाओं का शोषण-उत्पीड़न : ITBP की पूर्व डिप्टी कमांडेंट की कहानी

कर्नाटक में बाढ़ की स्थिति गंभीर हुई, अधिकांश नदियां उफान पर

मिड-डे मील के चावल का 'दुरुपयोग'? इस्कॉन, विशाखापत्तनम में मारे गए छापे में मिले 1,200 चावल के बोरे

मेरिट को सिर्फ परीक्षा में प्रदर्शन से मत आंकिए : सुप्रीम कोर्ट


बाकी खबरें

  • Mehsi oyster button industry
    शशि शेखर
    बिहार: मेहसी सीप बटन उद्योग बेहाल, जर्मन मशीनों पर मकड़ी के जाल 
    26 Oct 2021
    बिहार के पूर्वी चंपारण के मेहसी स्थित विश्व प्रसिद्ध सीप-बटन उद्योग की मशीनों पर मकड़ी के जाले लग चुके हैं। बिजली की सप्लाई नहीं है। उद्योग यूनिट दर यूनिट बंद हो रहे हैं। इस उद्योग के कारीगर पंजाब-…
  • coal crisis
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोयला संकट से होगा कुछ निजी कंपनियों को फायदा, जनता का नुकसान
    26 Oct 2021
    कोयले के संकट से देश में बिजली की किल्लत हो रही है। इस किल्लत की वजह क्या है? इस संकट से किसको फायदा और किसको नुकसान होगा? जानने के लिए न्यूज़क्लिक ने बात की पूर्व कोयला सचिव अनिल स्वरुप से
  • Biden’s Taiwan Gaffe Meant no Harm
    एम. के. भद्रकुमार
    ताइवान पर दिया बाइडेन का बयान, एक चूक या कूटनीतिक चाल? 
    26 Oct 2021
    अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पिछले गुरुवार को सीएनएन टाउन हॉल में यह कहा है कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया तो वाशिंगटन उसकी रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • workers
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली: डीबीसी कर्मचारियों का स्थायी नौकरी की मांग को लेकर प्रदर्शन, हड़ताल की चेतावनी दी
    26 Oct 2021
    लगभग 3500 से अधिक कर्मचारी दिल्ली के तीनों नगर निगम में अनुबंध के आधार पर काम कर रहे हैं। राजधानी में डेंगू और अन्य ऐसी महामारी की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद ये ठेके प्रथा के तहत कार्यरत…
  • instant loan
    शाश्वत सहाय
    तत्काल क़र्ज़ मुहैया कराने वाले ऐप्स के जाल में फ़ंसते नौजवान, छोटे शहर और गाँव बने टार्गेट
    26 Oct 2021
    इन ऐप्स के क़र्ज़ वसूली एजेंटों की ओर से किये जा रहे उत्पीड़न के चलते 2020 और 2021 के बीच पूरे भारत में कम से कम 21आत्महत्याएं हुई हैं।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License