NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
विकलांग केवल सड़क पर चलने के लिए टैक्स दें यह तो बहुत बड़ी नाइंसाफी है!
विकलांग लोगों के इस्तेमाल के लिए बनाए गए ज़्यादातर उपकरणों पर पांच फीसदी जीएसटी लगाया गया है।
अजय कुमार
09 Nov 2020
विकलांग
Image courtesy: The Economic Times

शरीर से अपंग लोगों की परेशानियां अगर केवल दिव्यांग कहने से खत्म की जा सकते थी तो क्या ही बात होती। लेकिन ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने जितना जोर अपंग लोगों को दिव्यांग कहलाने में दिलवाया उतना ही जोर अगर उनकी परेशानियां समझ कर उनकी परेशानियां बढ़ाने की बजाए कम करने वाला सिस्टम बनाते तो अच्छा होता।

जीएसटी आया तो उसने टैक्स का पूरा ढांचा बदल दिया। पहले विकलांग लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मशीनों पर टैक्स नहीं लगता था। जीएसटी आने के बाद इस पर टैक्स लगना शुरू हुआ। यानी व्हीलचेयर, ब्रेल लिपि पढ़ने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मशीन, ट्राइसाइकिल जैसे कई मददगार मशीनों पर टैक्स लगना शुरू हुआ। इनकी कीमतें पहले से अधिक बढ़ गई। विकलांग लोगों की परेशानियां पहले से अधिक बढ़ गई। जिम्मेदार मोदी सरकार की नीतियां थी। विकलांग लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। लेकिन कुछ नहीं हुआ। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। इसी 28 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाया है।

इस मामले का नाम निपुण मल्होत्रा वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया था। याचिकाकर्ता की तरफ से याचिका दायर की गई थी कि एक सामान्य इंसान जब चलने के लिए कोई टैक्स नहीं देता है तो एक विकलांग इंसान से चलने के लिए 5% के दर से टैक्स की वसूली क्यों की जा रही है?

बहुत सारे मशीन जिनका इस्तेमाल विकलांग लोगों द्वारा किया जाता है वह जीएसटी के 5% टैक्स वाले कैटेगरी में आते हैं। विकलांग लोगों के लिए अपनी विकलांगता की परेशानी को कम करने के लिए मदद के तौर पर इस्तेमाल की जाने वाली मशीनों पर अगर टैक्स लगाया जाएगा तो इसका मतलब यह है कि सरकार विकलांगों को साल 2016 में बने rights of persons with disabilities कानून से मिले संरक्षण का उल्लंघन कर रही है।

यह कानून कहता है कि विकलांगों के साथ ऐसा कोई व्यवहार नहीं किया जाएगा जो विभेदकारी हो। विकलांगों के लिए मददगार मशीनों पर टैक्स लगाना उनके साथ भेदभाव करना है। यह सारी बातें याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहीं। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि किस पर टैक्स लगाया जाएगा और किस पर टैक्स नहीं लगाया जाएगा। यह अधिकार क्षेत्र सुप्रीम कोर्ट से बाहर का अधिकार क्षेत्र है। सुप्रीम कोर्ट इस पर फैसला नहीं सुना सकती है। यह सरकार की नीतियों से जुड़ा मसला है। याचिकाकर्ता को अपनी याचिका जीएसटी काउंसिल के सामने रखनी चाहिए।

अब सवाल ये कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने विकलांग लोगों के लिए सही कदम उठाया? या विकलांग लोगों की परेशानियों को कम करने के लिहाज से पैदा हुए न्यायिक सवाल को हल करने से पहले ही अपने कदम पीछे कर लिए।

पहली मर्तबा देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक लगता है। सुप्रीम कोर्ट का यह कहना भी ठीक लगता है कि जिसका जो काम उसी को वह काम करने दिया जाए। मामला अगर सरकार की नीतियों का है तो सुप्रीम कोर्ट बीच में ना आए। लेकिन क्या हो अगर जीएसटी काउंसिल भी यह फैसला दे कि विकलांग लोगों पर टैक्स लगाना जायज है? तब जब विकलांग लोगों के लिए न्याय का सवाल उठेगा तो उसका हल कौन करेगा?

क्या सुप्रीम कोर्ट तब कहेगी कि यह मामला उसके क्षेत्राधिकार से बाहर है? नहीं बिल्कुल नहीं कहेगी। इसलिए सुप्रीम कोर्ट को जुडिशल रिव्यु जैसी शक्तियां हासिल है। यानी वह किसी भी मामले को न्याय के लिहाज से देख सकती है अगर मामले में पहले भी किसी संस्था के द्वारा न्याय हो चुका हो तब भी। यहां इस मामले में बात टैक्स कम करने या बढ़ाने की नहीं थी बल्कि बात यह सवाल बनकर उभरी थी कि क्या विकलांग लोगों के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मददगार मशीनों पर टैक्स लिया जाना चाहिए?

इस सवाल का वर्गीकरण कार्यपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र में किया जा सकता है लेकिन इस सवाल की मूलभूत प्रकृति न्यायिक है? और याचिकाकर्ता की सीधी अपील है कि विकलांग लोगों के साथ भेदभाव किया जा रहा है। इस भेदभाव को खत्म किया जाए।

जब से जीएसटी लागू हुआ है तब से लेकर अब तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जिसका सपना केंद्र सरकार ने जीएसटी लागू करते समय देखा था। राज्यों ने अपनी टैक्स उगाही की संप्रभुता भी केंद्र सरकार के हाथ में इसलिए गिरवी रख दी क्योंकि उन्हें भी कहीं ना कहीं यह लगा कि जीएसटी की वजह से टैक्स उगाहन बढ़िया होगा। लेकिन अभी तक जीएसटी से जुड़े सारे सपने बर्बाद हो चुके हैं।

जीएसटी उसी तरह काम कर रही है जिस तरह बाजार उसे काम करने के लिए मजबूर कर रहा है। 15वें वित्त आयोग का अनुमान है कि साल 2022 तक जीएसटी से राज्यों को तकरीबन 7 लाख करोड़ रुपए का घाटा होने वाला है। ऐसे में सरकार टैक्स उगाही को तवज्जो देगी या विकलांग लोगों की परेशानी को। इसका अंदाजा हम सब लगा सकते हैं।

सरकार का तर्क है कि अगर विकलांग लोगों को मदद पहुंचाने वाले मशीन को विक्रेता बिना जीएसटी के बेचेगा तो मशीन में इस्तेमाल कच्चे माल पर दिए गए जीएसटी का इनपुट क्रेडिट नहीं मिल पाएगा। थोड़ा टेक्निकल है। आसान तरीके से ऐसे समझिए -अगर व्हील चेयर बनाने वाला लोहा खरीदने पर 50 रुपए टैक्स के तौर पर सरकार को देता है। तो व्हीलचेयर बनाने वाले को 50 रुपए का इनपुट क्रेडिट तभी मिलेगा जब वह व्हीलचेयर बेचने पर 50 रुपये से अधिक का कर वसूल करें।

यह बात ठीक है। लेकिन कानूनी मामलों के जानकार सुहरिथ पार्थ सारथी कहते हैं कि इस तर्क में दो तरह की कमियां है। पहला यह कि जीएसटी काउंसिल के द्वारा जारी सभी तरह के नोटिफिकेशन कहते हैं कि मानव जीवन से जुड़ी सबसे जरूरी चीजों वह जीएसटी से बाहर रखा जाएगा। जैसे कि कई सारे विरोध प्रदर्शन के बाद महिलाओं से जुड़े सेनेटरी पैड पर लगने वाले जीएसटी को हटा लिया गया। दूसरा यह कि इनपुट क्रेडिट का मामला कोई बहुत बड़ा मामला नहीं है। संसद चाहे तो आसानी से ऐसा रास्ता निकाल सकती है कि विकलांग लोगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मशीनों को बनाने वाले मैन्युफैक्चर को इनपुट क्रेडिट मिल जाए।

भारत का संविधान विभेदकारी परिस्थितियों को खत्म करने के लिए समानता की परिस्थिति बनाने के लिए जायज वर्गीकरण की इजाजत देता है। ऐसे वर्गीकरण का इस्तेमाल कर कर अगर न्यायपालिका चाहती तो विकलांगों द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले मशीनों को जीएसटी से बाहर रख सकती थी। हाल फिलहाल की स्थिति यह है कि न्यायपालिका ने गेंद सरकार के पाले में फेंक दी है। विकलांगों के साथ विभेदकारी स्थिति मौजूद है।

टैक्स लगाने का मामला एक व्यवस्थित समाज बनाने से भी जुड़ा होता है। इसलिए अमीरों पर अधिक और अपेक्षाकृत कम अमीरों पर कम टैक्स लिया जाता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि टैक्स किसी तरह का दैवीय नियम है, जिसका पालन करना सभी के लिए जरूरी बनाया जाए। इसलिए न्याय का तकाजा तो यही कहता है कि सरकार विकलांगों के सड़क पर केवल चलने के लिए लिए व्हीलचेयर खरीदने पर जीएसटी की उगाही ना करें। अगर ऐसा होता है तो यह शारीरिक तौर पर अपंग लोगों के जीवन के साथ बहुत बड़ा भेदभाव होगा।

GST
Goods and Services Tax
disability
Disabled People
GST on Disability Equipment
Modi government
Narendra modi
BJP

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • CORONA
    न्यूज़क्लिक टीम
    चिंता: कोरोना ने फिर रफ़्तार पकड़ी, देश में 24 घंटों में 2 लाख के क़रीब नए मामले
    12 Jan 2022
    देश में 24 घंटों में कोरोना के 1,94,443 नए मामले सामने आए हैं। देश में अब कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 60 लाख 70 हज़ार 233 हो गयी है।
  • Maurya
    मुकुल सरल
    स्वामी प्रसाद मौर्य का जाना: ...फ़र्क़ साफ़ है
    12 Jan 2022
    यह केवल दल-बदल या अवसरवाद का मामला नहीं है, यह एक मंत्री ने इस्तीफ़ा दिया है, वो भी श्रम मंत्री ने। यह योगी सरकार की विफलता ही दिखाता है। इसका जवाब योगी जी से लिया ही जाना चाहिए।
  • CORONA
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    तीसरी लहर को रोकने की कैसी तैयारी? डॉक्टर, आइसोलेशन और ऑक्सीजन बेड तो कम हुए हैं : माकपा
    12 Jan 2022
    मध्यप्रदेश में माकपा नेता के अनुसार दूसरी लहर की तुलना में डॉक्टरों की संख्या 1132 से घट कर 705 हो गई है। इसी तरह आइसोलेशन बेड की संख्या 29247 से घटकर 16527 रह गई है। इसी प्रकार ऑक्सीजन बैड भी 28,152…
  • Protest in Afghanistan
    पीपल्स डिस्पैच
    अफ़ग़ानिस्तान में सिविल सोसाइटी और अधिकार समूहों ने प्रोफ़ेसर फ़ैज़ुल्ला जलाल की रिहाई की मांग की
    12 Jan 2022
    काबुल यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान और क़ानून पढ़ाने वाले डॉ. जलाल तालिबान और अफ़ग़ानिस्तान के पिछले प्रशासन के आलोचक रहे हैं। उन्होंने महज़ सुरक्षा पर ध्यान दिये जाने की तालिबान सरकार की चिंता की…
  • bjp-rss
    कांचा इलैया शेफर्ड
    उत्तर प्रदेश चुनाव : हौसला बढ़ाते नए संकेत!
    12 Jan 2022
    ज़्यादातर शूद्र, ओबीसी, दलित और आदिवासी जनता ने आरएसएस-भाजपा के हिंदुओं को एकजुट करने के झूठे दावों को संदिग्ध नज़र से देखा है। सपा के अखिलेश यादव जैसे नेताओं को इस असहमति को वोट में बदलने की ज़रूरत है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License