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जब दिशा रवि और नवदीप कौर पत्रकारिता की एक कक्षा में पहुंचीं
उस दर्शक वर्ग, जिसे सिखाया जा रहा है कि असहमति अवांछित और ख़तरनाक होती है, उसके सामने यहां असहमति की अहमियत पर विमर्श के लिए जगह बनाई जा रही है।
स्मृति कोप्पिकर
10 Mar 2021
disha

हम एक ऑनलाइन क्लासरूम में बैठे हुए थे, जिसमें भारत के अलग-अलग हिस्सों से ताल्लुक रखने वाले करीब़ 20 छात्र मौजूद थे। यहां हम मीडिया में नई अवधारणाओं और तकनीकों के साथ-साथ जीवन की वास्तविकताओं को समझने की कोशिश कर रहे थे। परंपरागत ढंग से पढ़ाने के बजाए बेहतर होता है कि पाठ योजना को हम सवाल-जवाब के विमर्श में बदल लें। मैंने छात्रों से पूछा, "पत्रकारों के लिए टूलकिट क्या होती है?" इसके बाद माहौल में चुप्पी और तनाव छा गया। थोड़ी देर बाद आईं कुछ टिप्पणियां इस तरह थीं-

"क्या कहा मैडम?"

"क्या आपने-आपने अभी-अभी ‘T’ से शुरू होने वाला वह शब्द कहा?"

“अगर कोई हमारी निगरानी रख रहा होगा तो क्या होगा?"

"क्या हम यह शब्द बोल सकते हैं, या फिर इस शब्द के उपयोग के लिए हमें पहचानकर जिम्मेदार ठहराया जाएगा?"

दिशा रवि पर एक सोशल मीडिया "टूलकिट" का संपादन करने का आरोप है। इस टूलकिट को बाद में अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी ट्वीट किया था। 22 साल की दिशा रवि को एक हफ़्ते तक जेल में रहना पड़ा। सरकार ने यहां यह हर मायने में हद से आगे जाते हुए कार्रवाई की थी। इसका मक़सद भारत के युवा लोगों, खासकर अंग्रेजी बोलने वाले युवाओं में संदेश पहुंचाना था। 

मुख्यधारा की मीडिया ने दिशा रवि की "टूलकिट" केस में जिस तरीके से छवि खराब की, उससे रवि की तरह के कई युवा चुप रहने पर मजबूर हुए होंगे। इसका प्रभाव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर भी दिखाई दिया, जिसका इस्तेमाल यह युवा अपने विचार व्यक्त करने और मुद्दों को उठाने के लिए करते हैं। 

अगर दिशा रवि चाहतीं, तो वो भी इस क्लासरूम का हिस्सा हो सकती थीं। वह क्लास में मौजूद किसी बच्चे की तरह ही है- अंग्रेजी बोलने वाली, हाल में कॉलेज से बाहर निकली, टीशर्ट और जैकेट पहनने वाली, पर्यावरण मुद्दों को उठाने वाली, तख़्तियों पर नारे लिखने वाली और सड़कों पर होने वाले प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली।

अगर इस क्लासरूम में मौजूद किसी छात्र ने नए भारत में मौजूद सत्ता का विरोध किया होता, तो वो भी दिशा रवि की जगह हो सकता था। पिछले कुछ महीनों में इन लोगों को मीडिया से जुड़े जो भी काम मिले हैं, उनमें से एक तिहाई किसान आंदोलन के आयामों और उससे जुड़े लोगों के बारे में रहे हैं। यह लोग बोलना सीख रहे हैं, यह लोग मुख्यधारा की मीडिया द्वारा दिखाए जाने वाले और ना दिखाए जाने वाले तथ्यों के अंतर के साथ-साथ मीडिया स्वामित्व और ख़बरो के चयन का तरीका भी समझ रहे हैं। यह लोग मीडिया की किसी मुद्दे को बढ़ाने की ताकत से भी रूबरू हो रहे हैं।

हां, पत्रकारों के लिए टूलकिट। जो लोग कई सालों से पत्रकार हैं, वो आसानी से इसे समझ सकते हैं। पत्रकारों की टूलकिट में ठीक-ठाक स्तर का संशयवाद, व्यक्तिगत और पेशेवर सम्मान, दिमागी आज़ादी, न्याय, संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरुकता, नागरिकों के लिए सबसे ज़्यादा जरूरी जानकारी पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, सच कहने की प्रबल इच्छा (खासकर सत्ता से) और अपनी कहानी को लिखने या बोलने की अच्छी क्षमता शामिल होती है।

पत्रकार अपनी टूलकिट को नौकरी के दौरान पुख्ता करते हैं और उसमें नई क्षमताएं जोड़ेते हैं। वे अपने काम के मुताबिक़ टूलकिट की सामग्री को जमाते हैं, लेकिन टूलकिट के मूल में मौजूद तत्व शायद ही कभी बदलते हों। जो लोग इन मूल तत्वों को बदल देते हैं, जैसे सत्ता से सच बोलने की इच्छा, वे खुद को पत्रकार बुलाना जारी रख सकते हैं, लेकिन इन लोगों की पहचान सत्ता में बैठे लोगों के प्रचार-प्रबंधकों की होती है।

‘पत्रकारों की टूलकिट’ विषय पर कक्षाओं में निश्चित तौर पर विमर्श होना चाहिए और इसे सिखाना चाहिए। कई सालों से ऐसा ही होता आया है। लेकिन अब कोई इस टूलकिट का इस्तेमाल कैसे करे, जब यह शब्द ही विवादित हो गया है? जब भी मीडिया रवि के बारे में बात करता है, तो जानबूझकर या बिना सोचे समझे "टूलकिट गैंग", "टूलकिट केस" और "टूलकिट विवाद" जैसे वाक्यांशों का उपयोग करता है। एक गैर-नुकसानदेह शब्द को गलत भावनाओं के साथ जोड़ दिया गया है, यह वह गुण है जो किसी पत्रकार की टूलकिट में नहीं होना चाहिए।

हां यह जरूर है कि गैर-नुकसानदेह “टूलकिट” को 26 जनवरी की हिंसा के साथ नहीं जोड़ा गया था। ऐसा किया भी नहीं जा सकता था, लेकिन वह दूसरी कहानी है। कोई कथित पत्रकार सुधीर चौधरी को क्या कहे, जिन्होंने अपने प्राइमटाइम शो में इस शब्द को बदनाम किया और कुछ भारतीयों को "टूलकिट गैंग" कहकर संबोधित किया? जबकि इनकी खुद की "पत्रकारिता" बेहद निंदनीय है?

शुरुआती झिझक के बाद छात्र टूलकिट को मौजूदा संदर्भों से अलग कर बोलना सीख गए। आभासी कक्षा में हमने इसकी जितनी ज़्यादा चर्चा की, यह शब्द उतना ही वास्तविक और साधारण बनता गया। यह व्यक्तिगत स्तर तक भी पहुंचा, जहां हमने भविष्य के हर पत्रकार की टूलकिट विकसित करने की कोशिश की। टूलकिट शब्द के साधारण मायने समझाने की प्रक्रिया ने छात्रों को बहुत कुछ सिखाया। इस दौरान असहमति की अहमियत पर विमर्श करने की जगह बनी। यह जगह उन छात्रों के लिए बनी, जिन्हें लगातार बाहर की दुनिया में असहमति के अवांछित और ख़तरनाक होने के बारे में बताया जा रहा है। 

अगर रवि ऐसा कर सकती है, तो दूसरे क्यों नहीं? असहमति क्यों? असहमति के लिए संवैधानिक सुरक्षाएं क्या हैं? अगर हम इतिहास के सही पक्ष में हैं तो जेल जाने से क्यों डरें? जब युवा लोग राजनीतिक होने लगते हैं तो राजनीतिक सत्ताएं क्यों परेशान होने लगती हैं? जैसा दिल्ली पुलिस रवि के बारे में दावा कर रही थी, फिर क्यों विदेशों में भारत की साख खराब करना भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध नहीं है? इन सब चीजों से जुड़े मुद्दों पर तीक्ष्ण विमर्श किया गया।

बल्कि दिशा रवि इस कक्षा का एक हिस्सा थी, लेकिन वैसे नहीं, जैसे सत्ता ने उन्हें जेल भेजने के बाद आकांक्षा की होगी। भारत के यह युवा घबराहट से आगे आकर अब एक स्तर की समझ विकसित कर चुके हैं और अगर मौका पड़े तो यह संघर्ष करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। इन युवाओं ने एक-दूसरे को विश्वास दिलाया है कि यह लोग सोशल मीडिया से खुद को सेंसर नहीं करेंगे।

लेकिन इतना पर्याप्त नहीं था, अब इन छात्रों की भूख बढ़ चुकी थी। रवि के ऊपर विमर्श आराम से किसी भी अंग्रेजीदां शहरी कक्षा का हिस्सा बन सकता है। वे लगातार ख़बरों में हैं, सोशल मीडिया पर लगातार उनकी चर्चा हो रही है। 

लेकिन यहां कक्षा को एक और दूसरी महिला से परिचित करवाना था, जो उम्र में रवि से थोड़ी बड़ी, पर न्याय के आदर्श के लिए ज़्यादा प्रतिबद्ध थी। यह महिला पहले ही बहुत सारा काम कर चुकी थी। उसे भी रवि की तरह गिरफ़्तार किया गया था। लेकिन उसे कस्टडी में इतनी यंत्रणा दी गई, जितनी यह छात्र अंदाजा भी नहीं लगा सकते थे। रवि भी इस यंत्रणा से बच गई। इस महिला का नाम था- नवदीप कौर।

25 साल की दलित महिला कार्यकर्ता और मजदूर अधिकार संगठन की सदस्या नवदीप कौर को रवि की गिरफ़्तारी से एक महीने पहले गिरफ़्तार किया गया था। लेकिन इस गिरफ़्तारी को मुख्यधारा की मीडिया ने ज़्यादा तवज्ज़ो नहीं दी। बता दें मज़दूर अधिकार संगठन किसान आंदोलन को समर्थन दे रहा है।

नवदीप कौर की कहानी रवि से कहीं ज़्यादा पेचीदा है। हरियाणा पुलिस का दावा है कि नवदीप एक फैक्ट्री के कामग़ारों को उकसा रही थी और उन्होंने पुलिस पर हमला भी किया। जबकि परिवार ने पत्रकारों को बताया कि नवदीप वहां प्रदर्शनकारियों को पुलिस पर हमला करने से रोक रही थी। वहीं मज़दूर संगठन ने पुलिस वालों पर “असहमति को दबाने के लिए काम करने” का आरोप लगाया है। कौर की कहानी भारत की जाति और वर्ग जैसे विकारों से ग्रसित भद्दी सच्चाई दिखाने का काम करती है।

अमेरिकी उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की भांजी मीना हैरिस ने 6 फरवरी को नवदीप के समर्थन में ट्वीट किया। इसके बाद मीडिया में नवदीप के शारीरिक उत्पीड़न और पुलिस कस्टडी में हुई हिंसा की खब़रें सामने आईं। नवदीप कौर पर पुलिस ने कई मुक़दमे दर्ज किए हैं, इनमें हत्या का प्रयास तक शामिल है। परिवार का कहना है कि पुरुष अधिकारियों ने नवदीप का यौन उत्पीड़न किया और उसे प्रताड़ना दी। परिवार के मुताबिक़ पुलिसकर्मियों ने नवदीप को बालों से घसीटा और उसकी लाठियों-जूतों से पिटाई की, यहां तक कि उनके गुप्तांगों को भी निशाना बनाया गया। इसके बावजूद जब 26 फरवरी को नवदीप बेल पर बाहर आईं, तो अपने उद्देश्य को लेकर उनकी संतुष्टि अलग ही झलक रही थी। 

नवदीप कौर की कहानी और मीडिया द्वारा इस विषय पर किए गए व्यवहार से हमें सामाजिक न्याय, सामाजिक मुद्दों पर सक्रियता, मैदान पर लोगों को इकट्ठा करना और प्रदर्शनों में भागीदारी के मुद्दों को समझने का मौका मिला, जिससे कक्षा का विमर्श ज़्यादा बेहतर, विविध और स्तरीकृत हो पाया। यह “टूलकिट” मामले में छात्रों द्वारा हासिल की गई सीखों के परे गया और इससे इन 20 युवाओं को जिंदगी का एक ढंग महसूस हुआ, ऐसी ज़िंदगी जो किसी उद्देश्य के लिए बिना डर के गुजारी जाती है।

पत्रकार और एंकर रवीश कुमार ने अपने शो में रवि, उनकी जेल यात्रा और वहां रवि की दृढ़ता के बारे में बताया। इससे “युवाओं में जेल का डर खत्म हुआ।” कौर का नाम भी इसमें जोड़ा गया। चौधरी और रवीश के प्राइमटाइम शो की क्लिप दिखाकर शानदार ढंग से इस कक्षा को ख़त्म किया गया। इन क्लिप के ज़रिए सत्ता के समर्थन वाली “पत्रकारिता” और सत्ता से सच बोलने वाली पारंपरिक पत्रकारिता के अंतर को समझाया गया।

इस कक्षा के ज़रिए भारतीय युवाओं का एक बहुत छोटा हिस्सा, सजा के डर से खुद पर थोपी गई सेंसरशिप को देखना समझ पाया है। अब यह लोग आंखों में आंखें डालकर देखना सीखे हैं और थोड़े से मजबूत बनकर निकले हैं। लेकिन भारत के सामने आज के दौर में मौजूद चुनौतियों को देखते हुए इतना काफ़ी नहीं लगता। आज हम देख रहे हैं कि भारत में संस्थान कमजोर हो रहे हैं, संवैधानिक मूल्यों से समझौता हो रहा है और प्रोपगेंडा तंत्र को पत्रकारिता के तौर पर पेश किया जा रहा है। लेकिन कुछ ना करने से, थोड़ा करना भी बेहतर होता है। कम से कम अब इन छात्रों में टूलकिट और असहमति जैसे शब्द डर पैदा नहीं करेंगे।

लेखक मुंबई आधारित वरिष्ठ स्तंभकार और पत्रकार हैं। वे राजनीति, शहर, मीडिया और लैंगिक मुद्दों पर लिखती हैं। यह उनके निजी विचार हैं।

इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करिए।

When Disha Ravi and Nodeep Kaur ‘Walked’ into a Journalism Classroom

Disha Ravi
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