NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
एक अध्ययन : क्या शिक्षा को जानबूझ कर बर्बाद किया जा रहा है?
पिछले कुछ वर्षों की रिपोर्ट का अध्ययन करने पर पता चलता है कि मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान देश में शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है।
पीयूष शर्मा
22 Jan 2019
सांकेतिक तस्वीर

बीजेपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान अपने चुनावी घोषणा पत्र में नेल्सन मंडेला की पंक्तियों “एक समाज की आत्मा इससे ज्यादा और किसी बात से परिलक्षित नहीं होती कि वह अपने बच्चों का किस तरह ख्याल रखता है ” को शामिल करते हुए बच्चों को राष्ट्र का भविष्य माना था। परन्तु आंकड़े बताते है कि अपने कार्यकाल में मोदी सरकार ने राष्ट्र के भविष्य को संवारने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया है।

देश के ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की गुणवत्ता पर एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (असर 2018) जारी हुई है, जिसमें बहुत ही चौंकाने वाले आंकड़े सामने आये हैं। पिछले कुछ वर्षों की रिपोर्ट का अध्ययन करने पर पता चलता है कि  मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान देश में शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आई है।

भाषा के पढ़ने के स्तर में गिरावट

असर के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न कक्षाओं में जा रहे बच्चों में मोदी सरकार के कार्यकाल में भाषा के पढ़ने के स्तर में गिरावट आयी है। बच्चों के पढाई के स्तर के संबंध में ऐसी उम्मीद की जाती है कि वह अपने से पिछली कक्षा तथा वर्तमान की कक्षा की विषयों के ज्ञान में महारत हासिल करे। परन्तु असर रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि बच्चें कक्षा दो के स्तर का पाठ भी नहीं पढ़ पा रहे हैं, बल्कि 2014 से पाठ नहीं पढने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

वर्ष 2010 में कक्षा 8 के 16.5 फ़ीसदी बच्चे कक्षा दो के स्तर का पाठ नही पढ़ सकते थे जो अब 2018 में बढ़कर 27 फ़ीसदी हो गये हैं। इसके साथ ही कक्षा 5 में भी करीब 46 प्रतिशत कक्षा दो का पाठ नहीं पढ़ सकते थे जो अब बढ़कर 49.5 फ़ीसदी हो गये हैं यानी कक्षा 5 में पढने वाले आधे बच्चें कक्षा दो के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते हैं।

कक्षा 3 में, कक्षा दो के स्तर का पाठ पढ़ने वालों की संख्या में 2010 से 2018 में थोड़ी बढ़ोतरी हुई परन्तु यह बहुत मामूली है क्योंकि करीब 73 प्रतिशत कक्षा 3 के बच्चे अपने से पिछली कक्षा जिसको वह अभी पास करके आये हैं उसके पाठ को नहीं पढ़ पा रहे हैं। यह एक चिंता का बहुत बड़ा विषय है, सबसे बड़ी बात तो यह है कि 2010 व 2014 में बेहतर स्थिति थी।

1. Class 3, 5 and 8 learing level in language.jpg

गणित में गुणवत्ता के स्तर में लगातार कमी

इस वर्ष कक्षा 8 के सभी बच्चों में से केवल 44 प्रतिशत ही 3 अंकों में एक अंक के भाग के सवालों को सही-सही हल कर पाने में सक्षम है यानी आधे से अधिक करीब 56 प्रतिशत भाग का सवाल हल नहीं कर सकते हैं, जबकि 2010 में करीब 32 फ़ीसदी ऐसे बच्चे थे जो भाग का सवाल नहीं कर सकते थे। यही स्थिति कक्षा 5 के बच्चों की भी है, 2010 में करीब 64 फ़ीसदी बच्चे भाग का सवाल करने में असमर्थ थे जिनकी संख्या 2018 में बढ़कर 72 फ़ीसदी से अधिक हो गयी है।

2. Class 5 and 8 learing level in Math.jpg

“असर” ने बच्चों की पढ़ने और गणित करने की क्षमता का घरों में सर्वेक्षण किया जिसमें निजी व सरकारी दोनों स्कूलों के बच्चें शामिल हैं। असर ने पढ़ने व गणित की गुणवत्ता के स्तर की जो रिपोर्ट पेश कि वह साफ़-साफ़ दर्शाती है कि मोदी सरकार ने बच्चों के पढ़ने और गणित के स्तर को बेहतर करने का कोई प्रयास नहीं किया है बल्कि ऐसी शिक्षा विरोधी नीतियों और निर्णयों का क्रियान्वयन किया है जिससे गुणवत्ता और कम हुई है।

आयुवर्ग 15-16 में स्कूल न जाने वालों की संख्या ज्यादा

शिक्षा पाना असल में बच्चों के स्कूल में दाखिला लेने भर का मामला नहीं है, इसमें कोई शक नहीं है कि स्कूलों में प्रवेश से वंचित बच्चों की संख्या में भारी कमी आयी है परन्तु आंकड़े बताते हैं कि आयुवर्ग 15-16 में ड्रॉपआउट ज्यादा है और इनमें लड़कियों में स्कूल न जाने की संख्या लड़कों के मुकाबले और ज्यादा है। और 2010 से 2018 के बीच मामूली गिरावट हुई है। इसके बावजूद इस आयु के 13 फ़ीसदी से अधिक बच्चे स्कूलों में नही जा रहे हैं। इस आयुवर्ग के बच्चे विद्यालय में रहें इसके लिए ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि यह आयुवर्ग जल्द ही अर्थव्यवस्था में सीधे तौर पर भागीदारी करेगा। अगर ऐसे में उसके पास जरूरी शिक्षा नहीं होगी तो वह बेहतरी से काम नहीं कर पायेगा|

3. Enrollement level and out of school.jpg

बढ़ती मिश्रित कक्षाएं एक बड़ी समस्या

इसे शिक्षकों की कमी या संसाधनों का अभाव ही कहेंगे कि मिश्रित कक्षाओं का प्रतिशत बीते सालों में बढ़ गया है। मिश्रित मतलब वह कक्षाएं जहां कई क्लास के छात्र एक साथ बैठकर पढ़ रहे हैं। देश में वर्ष 2018 में 63 फ़ीसदी से अधिक प्राथमिक विद्यालयों में कक्षा दो के बच्चे अन्य कक्षाओं के साथ बैठे थे जबकि 2010 में यह आंकड़ा 55 फ़ीसदी था। इसी प्रकार 2018 में 58 फ़ीसदी विद्यालयों में कक्षा 4 के बच्चें अन्य कक्षाओं के साथ बैठे थे जबकि 2010 में यह आंकड़ा 49 प्रतिशत था। और यही स्थिति उच्च प्राथमिक विद्यालयों में भी है।

मिश्रित कक्षाओं का बढ़ना एक बहुत बड़ी समस्या है जिसका तत्काल निदान बहुत जरूरी है क्योंकि हर कक्षा के बच्चों के स्लेबस अलग होते हैं और हर कक्षा के सीखने और पढ़ाने का तरीका अलग अलग होता है। ऐसे में अगर अध्यापक एक से अधिक कक्षाओं को एक साथ बैठाकर पढ़ायेगा तो इसका सीधा असर गुणवत्ता पर पड़ेगा।

इस बारे में हमने असर रिपोर्ट के रीजनल टीम सदस्य सुनील कुमार से बात की उन्होंने हमें बताया कि अभी भी काफी स्कूलों में मिश्रित कक्षाओं का संचालन हमें देखने को मिलता है। असर के आंकड़े भी इसी दिशा में संकेत देते हैं। अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को एक ही कक्षाओं में पढ़ाना अध्यापक के लिए एक चुनौती बना रहता है। जिसका प्रभाव कहीं न कहीं शिक्षा की गुणवत्ता पर पड़ता है। अभी भी स्कूलों में काफी काफी अध्यापकों के पद खाली हैं जिसे जल्द से जल्द भरा जाना जरूरी है और अध्यापकों के पढ़ाये जाने के तरीकों में बच्चों के वर्तमान शिक्षा की स्थिति को समझकर पढ़ाये जाने की आवश्यकता है।

4. Mixed Classes in schools.jpg

शिक्षा की गुणवत्ता काफी हद तक पढ़ाई के जरूरी संसाधनों जैसे  कि किताबों, लाइब्रेरी, कंप्यूटर, पर्याप्त संख्या में योग्य शिक्षक, शौचालय, पेयजल आदि की उपलब्धता पर निर्भर करती है। देश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE एक्ट) के लागू होने के इतने वर्षों बाद भी विद्यालयों में मिलने वाली सुविधाओं में कोई ख़ास बढ़ोतरी नहीं देखने को मिली है।

पेयजल की उपलब्धता में कमी

 “स्वच्छ भारत-स्वच्छ विद्यालय” (SBSV) यह बताता है कि बच्चों के लिए सुरक्षित पेयजल और हाथ धोने के लिए ज़रूरी पानी हो और इसके साथ ही, स्कूल की सफाई और भोजन बनाने के लिए पानी हो, परन्तु रिपोर्ट के आंकड़े बताते है कि 2018 में 74.8 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल उपलब्ध था जबकि 2014 में 75.6 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल उपलब्ध था। इसके साथ ही ऐसे स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई जिनमे पेयजल उपकरण के तौर पर सुविधा तो है परन्तु पानी उपलब्ध नहीं है।

शौचालय की स्थिति

शौचालय की स्थिति देखने पर ज्ञात होता है कि शौचालयों वाले स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है परन्तु अभी करीब 23 फ़ीसदी स्कूल ऐसे हैं जिनमें शौचालय की सुविधा तो है परन्तु शौचालय प्रयोग करने योग्य नहीं है। और लड़कियों के शौचालय वाले स्कूलों की संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है परन्तु 66 प्रतिशत स्कूलों में ही शौचालय प्रयोग करने योग्य हैं, जबकि करीब 11 प्रतिशत स्कूलों में तो लड़कियों के लिए शौचालय ही नहीं हैं। 10 प्रतिशत ऐसे स्कूल हैं जिनमें लड़कियों का शौचालय ताला लगाकर बंद रखा गया है। शौचालय का स्कूल में न होना लड़कियों के स्कूल में नहीं आने का एक बड़ा कारण है, यह बहुत जरूरी है कि सभी स्कूलों में प्रयोग करने योग्य शौचालय हों।

5. Facilities in Schools.jpg

लाइब्रेरी

पुस्तकालय और किताबें स्कूल का एक अहम हिस्सा होते हैं, परन्तु पुस्तकालयों के बारे में आंकड़े बताते हैं कि 2014 में करीब 22 प्रतिशत स्कूलों में पुस्तकालय नहीं था जो अब 2018 में बढ़कर करीब 26 प्रतिशत हो गये हैं, इसके साथ ही पुस्तकालय में बच्चों के द्वारा किताबों का उपयोग नहीं हो रहा है।

डिजिटल इंडिया

डिजिटल इंडिया बीजेपी के उन चुंनिदा सपनों में से है जिसको वह बहुत जोर-शोर से उठती रही है, और प्रधानमंत्री इसके बारे में बार-बार बात करते रहे हैं परन्तु उनके कार्यकाल के दौरान स्कूलों में कंप्यूटर होने के आंकड़ों को देखते हैं तो बहुत छला हुआ सा महसूस करते हैं। असर के आंकड़े बताते है कि देश के करीब 79 फ़ीसदी स्कूलों में कंप्यूटर है ही नहीं और जिनमें है वहां भी उनमें से मात्र 6.5 प्रतिशत में ही कंप्यूटर का उपयोग हो रहा था जबकि यह आंकड़ा 2010 में 8.6 प्रतिशत था।

मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान जिस तरह से शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्ता में कमी आई है ये शिक्षा विरोधी नीतियों का ही परिणाम है जो यह दिखता है कि शिक्षा उनकी प्राथमिकता में नहीं है। बस चुनाव से पहले जनता को लुभाने के लिए शिक्षा को बेहतर बनाने के लुभावने वादे किए गए थे।

ASER Report
education
Education Rights
Education crises
MHRD
Free Education
Primary education
school children
RTE
BJP
Narendra modi

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • नीलांजन मुखोपाध्याय
    यूपी: योगी 2.0 में उच्च-जाति के मंत्रियों का दबदबा, दलितों-पिछड़ों और महिलाओं की जगह ख़ानापूर्ति..
    02 Apr 2022
    52 मंत्रियों में से 21 सवर्ण मंत्री हैं, जिनमें से 13 ब्राह्मण या राजपूत हैं।
  • अजय तोमर
    कर्नाटक: मलूर में दो-तरफा पलायन बन रही है मज़दूरों की बेबसी की वजह
    02 Apr 2022
    भारी संख्या में दिहाड़ी मज़दूरों का पलायन देश भर में श्रम के अवसरों की स्थिति को दर्शाता है।
  • प्रेम कुमार
    सीबीआई पर खड़े होते सवालों के लिए कौन ज़िम्मेदार? कैसे बचेगी CBI की साख? 
    02 Apr 2022
    सवाल यह है कि क्या खुद सीबीआई अपनी साख बचा सकती है? क्या सीबीआई की गिरती साख के लिए केवल सीबीआई ही जिम्मेदार है? संवैधानिक संस्था का कवच नहीं होने की वजह से सीबीआई काम नहीं कर पाती।
  • पीपल्स डिस्पैच
    लैंड डे पर फ़िलिस्तीनियों ने रिफ़्यूजियों के वापसी के अधिकार के संघर्ष को तेज़ किया
    02 Apr 2022
    इज़रायल के क़ब्ज़े वाले क्षेत्रों में और विदेशों में रिफ़्यूजियों की तरह रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग लैंड डे मनाते हैं। यह दिन इज़रायली क़ब्ज़े के ख़िलाफ़ साझे संघर्ष और वापसी के अधिकार की ओर प्रतिबद्धता का…
  • मोहम्मद सज्जाद, मोहम्मद ज़ीशान अहमद
    भारत को अपने पहले मुस्लिम न्यायविद को क्यों याद करना चाहिए 
    02 Apr 2022
    औपनिवेशिक काल में एक उच्च न्यायालय के पहले मुस्लिम न्यायाधीश, सैयद महमूद का पेशेवराना सलूक आज की भारतीय न्यायपालिका में गिरते मानकों के लिए एक काउंटरपॉइंट देता है। 
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License