NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
चुनाव 2022
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
पक्ष-प्रतिपक्ष: चुनाव नतीजे निराशाजनक ज़रूर हैं, पर निराशावाद का कोई कारण नहीं है
UP के चुनाव का ज़ोरदार झटका शायद उन सभी विपक्षी राजनीतिक ताकतों को जो अपना अस्तित्व बचाना और भाजपा को हराना चाहती हैं, उन्हें 24 की लड़ाई को अधिक गम्भीरता से जीवन-मरण का संग्राम बनाकर लड़ने के लिए बाध्य कर सके।

लाल बहादुर सिंह
16 Mar 2022
election

UP विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद स्वाभाविक रूप से लोकतांत्रिक खेमे में गहरी निराशा का माहौल है। संघ-भाजपा राज के सबसे क्रूर प्रतीक योगी शासन से मुक्ति की चाह में हम सब चुनाव नतीजों के बारे में एक हद तक आत्मगत मूल्यांकन का भी शिकार रहे।

चुनाव परिणाम ने बेहद निराश इसलिये भी किया है क्योंकि इसे 2024 के लिए सेमी फाइनल के रूप में देखा जा रहा था। बहरहाल यह boon in disguise भी साबित हो सकता है। बंगाल चुनाव के बाद एक complacency का माहौल बन रहा था कि मोदी  अब ढलान पर है, UP में विपक्ष की राजनीतिक ताकतों को सम्भवतः जिस गम्भीरता के साथ चुनावी तालमेल समेत चुनाव की समग्र रणनीति को लेना चाहिए था, उसमें उन्होंने चूक की। 2024 लोकसभा चुनाव के 2 साल पहले UP के चुनाव का जोरदार झटका शायद उन सभी विपक्षी राजनीतिक ताकतों को जो अपना अस्तित्व बचाना और भाजपा को हराना चाहती हैं, उन्हें 24 की लड़ाई को अधिक गम्भीरता से जीवन-मरण का संग्राम बनाकर लड़ने के लिए बाध्य कर सके।

UP में भाजपा की घोर लोकतन्त्र-विरोधी सरकार की पुनर्वापसी के कारणों की सही शिनाख्त ही 2024 में उसके लिए दरवाजे बंद कर सकती है।

वैसे तो जो जीता वही सिकन्दर, पर यह निर्विवाद है कि भाजपा ने इस बार कोई लोकप्रिय जनादेश नहीं प्राप्त किया है और मोदी के सुर में सुर मिलाते हुए विश्लेषकों का इसे एन्टी इंकम्बेंसी की बजाय प्रो-इनकम्बेंसी बताना  false नैरेटिव गढ़ने की धूर्त कोशिश है। यदि ऐसा होता तो भाजपा की सीटें पहले से क्यों घटती ?

भाजपा की सीटों में लगातार गिरावट हो रही है। 2017 के 312 से गिरकर 2019 में इसकी 275 सीटों पर बढ़त थी और इस बार भाजपा 255 पर आ गयी।

उसके मत प्रतिशत में 1.6% की जो मामूली वृद्धि हुई है, उसके पीछे प्रमुख फैक्टर यह है कि जहां पहले के चुनाव त्रिकोणीय थे, अबकी बार का चुनाव आमने-सामने की लड़ाई में तब्दील हो गया था और 2 के अलावा अन्य दलों के मत प्रतिशत का भारी हिस्सा खिसक गया, जिसका एक छोटा अंश भाजपा की ओर भी shift हुआ। भाजपा का मत 39.7% से बढ़कर 41.3% हुआ, उसमें 1.6% की बढोत्तरी हुई। वहीं उसका बड़ा हिस्सा मुख्य विपक्षी गठबंधन की ओर शिफ्ट हुआ और उनका मत प्रतिशत बढ़कर 37% पंहुँच गया, जिसमें सपा का हिस्सा 21% से बढ़कर 32% हो गया।

भाजपा को 57 सीटों का भारी नुकसान तो हुआ ही, उसने 74 सीटें 5% से कम मार्जिन से close contest में जीती हैं। जाहिर है, अगर ये सपा की झोली आ जातीं तो परिणाम पलट जाता, सपा की 185 सीटें हो जातीं और भाजपा 181 सीटों के साथ उससे पीछे हो जाती।

EVM मशीनों की खराबी, उनसे छेड़छाड़ की तमाम शिकायतें आईं, वोटर लिस्ट से नाम काटने, कई जगह सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर काउंटिंग को प्रभावित करने और चुनाव परिणाम के अचानक अस्वाभाविक ढंग से बदल दिए जाने की रिपोर्ट्स आईं, जिन्होंने लोगों के मन में चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता और निष्पक्षता को लेकर अनेक शक पैदा किये हैं। मतों की जिस तरह पैसे के बल पर खरीद फरोख्त की खबरें आईं, close election में अंतिम नतीजों को तय करने में इस सब के महत्व को समझा जा सकता है।

इसके साथ ही close election में भाजपा की जीत के पीछे एक बेहद महत्वपूर्ण फैक्टर विपक्ष का बिखराव रहा, यह तमाम सीटों के मतों के आंकड़ों से स्वतः ही स्पष्ट है। उससे अधिक महत्वपूर्ण यह कि विपक्ष की एकता (कम से कम उस विपक्ष की जो भाजपा को हराना चाहता था और गठबंधन में शामिल होना चाहता था, मसलन कांग्रेस और वाम-लोकतान्त्रिक ताकतें) गठबंधन को भाजपा के विरुद्ध एक political प्रोफाइल और नैरेटिव दे सकती थीं, जो दरअसल उभर ही नहीं पाया। विपक्ष का पूरा चुनाव अभियान जाति-समुदायों के जोड़तोड़ और कुछ अर्थवादी वायदों तक सिमट कर रह गया। एकजुट विपक्ष का भाजपा के विरुद्ध राजनीतिक प्रोफाइल उभरता तो वह न सिर्फ अंकगणितीय ढंग से उनके मतों को जोड़ता बल्कि उसका चुनाव पर गुणात्मक असर पड़ता।

प्रदेश में 11 लाख खाली पड़े पदों को भरने जैसे मुद्दे, जो दरअसल गेम चेंजर हो सकते थे, काफी देर से उठाए गए और  रोजगार के मोर्चे पर भाजपा की नाकामी और वायदाखिलाफी को focussed ढंग से highlight नहीं किया जा सका।

दलित-आदिवासी एजेंडा को विपक्षी गठबंधन ने address ही नहीं किया-चाहे उनके ऊपर सामंती दबंगों के सामाजिक उत्पीड़न का मामला हो या उनकी भूमिहीनता, रोजगार, आरक्षण, आर्थिक बेहतरी और राजनीतिक हिस्सेदारी का मामला हो, न वह उनके बीच उभरे नेताओं, संगठनों, दलों के साथ कोई गठबंधन बना सका।

बसपा की राजनीतिक दावेदारी कमजोर होने से उससे shift होते गरीबों तथा कम आबादी वाले छोटे छोटे अति पिछड़े समुदाय के गरीबों के, जो अभी political community नहीं बन पाए हैं, उनके एक हिस्से को लाभार्थी बनाकर तथा खरीद-फरोख्त के माध्यम से भाजपा अपने पक्ष में गोलबंद करने में सफल रही।

बेशक सामंती-ब्राह्मणवादी ग्रामीण तबके तथा शहरी मध्यवर्ग के बहुसंख्य हिस्से मजबूती से भाजपा के साथ खड़े रहे। फिलहाल, हिंदुत्व का नैरेटिव जिसमें बहुसंख्यकवाद, आरक्षण व दलित-पिछड़ों के राजनीतिक उभार के खिलाफ प्रतिक्रिया, अंधराष्ट्रवाद, मजबूत नेता का cult घुला मिला है, उनको आकर्षित करने और अपने साथ जोड़े रखने में सफल है। जाहिर है जब तक विपक्ष की ओर से कोई बड़ा वैकल्पिक लोकतांत्रिक नैरेटिव नहीं उभरता जो इन्हें नई दिशा में ले जा सके,ये तबके संघ-भाजपा की रीढ़ बने रहेंगे।

चुनाव को कई उदारवादी बुद्धिजीवी मंडल बनाम कमंडल के रूप में पेश कर रहे थे और उसे हिंदुत्व बनाम लोहियावाद-अम्बेडकर और सामाजिक न्याय की लड़ाई का विचारधारात्मक colour दे रहे थे। जाहिर है वह सच नहीं था, हिंदुत्व की विचारधारा और राजनीति पिछड़ों के एक हिस्से के अंदर भी पैठ बनाने और उसे appropriate करने में सफल हुई है। ठीक इसी तरह भाजपा की जीत को हिंदुत्व की विचारधारात्मक जीत मान लेना भी अतिरंजित है। अगर यह सच होता कि समाज में भारी साम्प्रदायिक राजनीतिक विभाजन हो गया है तो भाजपा को 80% से अधिक हिन्दू आबादी वाले प्रदेश में 40% वोट ही क्यों मिलता ? विपक्षी गठबंधन से अनेक ऐसी सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार जीते हैं, जो हिंदुओं के समर्थन के बिना सम्भव ही नहीं था। यह कैसे होता ?

दरअसल विपक्षी गठबंधन सरकारी नीतियों से पैदा जनता के जीवन के गहरे संकट और असंतोष को भाजपा सरकार की नीतिगत विफलता के रूप में स्थापित करने और जनता की पीड़ा और आक्रोश को आंदोलन के माध्यम से भाजपा के खिलाफ, मोदी-योगी के नेतृत्व के खिलाफ राजनीतिक तौर पर मोड़ पाने में विफल रहा।

जाहिर है भाजपा के खिलाफ यह काउंटर-नैरेटिव गढ़ पाने के लिए जिस वैचारिक vision की जरूरत थी और जिस राजनीतिक आंदोलनात्मक सक्रियता की मांग थी, विपक्ष उस पर खरा नहीं उतर सका। यह भाजपा की जीत के पीछे मुख्य कारण है।

इसका सबसे बड़ा सुबूत किसान-आंदोलन के केंद्रित इलाके मुजफ्फरनगर-शामली-बागपत-मेरठ का नतीजा है जहां भाजपा 19 में केवल 6 सीटें जीत सकी और 13 विपक्षी गठबंधन ने जीत लीं। यह किसान आंदोलन से बने राजनीतिक माहौल का ही असर था कि उस पट्टी में गन्ना मंत्री सुरेश राणा और संगीत सोम जैसे धुरंधर चुनाव हार गए।

ठीक इसी तरह पोस्टल बैलट में आधे से अधिक 51.5% मत सपा को मिले, जो इस बात का सबूत हैं कि कर्मचारियों के बड़े हिस्से ने ध्रुवीकरण या जाति-सम्प्रदाय की बजाय अपने जीवन से जुड़े नीतिगत सवाल को लेकर वोट किया।

क्या विपक्ष आने वाले दिनों में जनता के जीवन से जुड़े ज्वलंत सवालों पर
आंदोलन में उतरेगा और किसान आंदोलन जिसके अगल चरण का एलान हो रहा है, उसके साथ खड़ा होकर उसे पूरे प्रदेश और देश में फैलाएगा, युवाओं के रोजगार के सवाल और मेहनतकशों के अधिकारों तथा लोकतन्त्र की लड़ाई को राजनीतिक मुद्दा बनाकर भाजपा के खिलाफ एक काउंटर-नैरेटिव खड़ा करेगा और भाजपा विरोधी राष्ट्रीय गठबंधन खड़ा करेगा ?

यदि ऐसा होता है तो निश्चय ही 2024 में बाजी पलटी जा सकती है। आने वाले दिनों की कठिन लड़ाई सटीक रणनीति, आशावाद और हौसले के बल पर ही जीती जा सकती है।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

UP elections
UP election 2022
Election Results
Uttar pradesh

Related Stories

यूपी : आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा की साख़ बचेगी या बीजेपी सेंध मारेगी?

उपचुनाव:  6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश में 23 जून को मतदान

विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया

BJP से हार के बाद बढ़ी Akhilesh और Priyanka की चुनौती !

यूपी चुनाव : पूर्वांचल में हर दांव रहा नाकाम, न गठबंधन-न गोलबंदी आया काम !

यूपी चुनावः सत्ता की आखिरी जंग में बीजेपी पर भारी पड़ी समाजवादी पार्टी

यूपी चुनाव: आजीविका के संकट के बीच, निषाद इस बार किस पार्टी पर भरोसा जताएंगे?

यूपी चुनाव: सोनभद्र के गांवों में घातक मलेरिया से 40 से ज़्यादा लोगों की मौत, मगर यहां के चुनाव में स्वास्थ्य सेवा कोई मुद्दा नहीं

यूपी में न Modi magic न Yogi magic

आज़मगढ़: फ़र्ज़ी एनकाउंटर, फ़र्ज़ी आतंकी मामलों को चुनावी मुद्दा बनाया राजीव यादव ने


बाकी खबरें

  • Supreme Court Asks: Why no Arrest in Lakhimpur Killings?
    न्यूज़क्लिक टीम
    सुप्रीम कोर्ट की सख्ती: लखीमपुर में गिरफ्तारी क्यों नहीं ?
    07 Oct 2021
    बोल के लब आज़ाद हैं तेरे के इस कार्यक्रम में अभिसार शर्मा लखीमपुर मामले पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बारे में बात कर रहे हैं, और बात कर रहे हैं कि किस तरह बीजेपी के प्रवक्ता लगतार किसानों को टारगेट कर…
  • Tribal Settlement Near Tamil Nadu Temple Uprooted
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु: उजाड़ दी गईं मंदिर से सटी आदिवासी बस्तियां 
    07 Oct 2021
    11 इरुलर आदिवासी परिवारों ने आरोप लगाया है कि यह जगह उन्हें स्थायी रिहाइश के लिए जमीन के पट्टे दिए जाने तक रहने के लिए दी गई थी।
  • SC
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    लखीमपुर नरसंहार: न्यायालय ने उप्र सरकार से पूछा क्या आरोपी गिरफ़्तार किए गए हैं?
    07 Oct 2021
    प्रधान न्यायाधीश एन वी रमणा, न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से पेश हुए वकील को इस बारे में स्थिति रिपोर्ट में जानकारी देने का निर्देश दिया।
  • delhi violence
    सबरंग इंडिया
    दिल्ली हिंसा मामले में पुलिस की जांच की आलोचना करने वाले जज का ट्रांसफर
    07 Oct 2021
    अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने पिछले कुछ महीनों में दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों को फटकार लगाई थी, और कुछ मामलों में पुलिस गवाहों की विश्वसनीयता पर संदेह करते हुए जमानत भी दे दी थी।
  •  15 killed in road accident in Uttar Pradesh's Barabanki
    भाषा
    उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में सड़क दुर्घटना में 15 लोगों की मौत
    07 Oct 2021
    बाराबंकी के देवा थाना क्षेत्र के बबुरी गांव के निकट वॉल्वो बस और ट्रक की भीषण टक्कर से बस में सवार 15 लोगों की मौत हो गई और 21 अन्य घायल हो गये।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License