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राजनीति
एनआरसी: फॉरेन ट्रिब्यूनल भरोसा पैदा नहीं करते!
एक मामले की सुनवाई के दौरान 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि अगर ट्रिब्यूनल सरकारी आदेश पर बनने लगे तो इससे नागरिकों के अधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। 
अजय कुमार
03 Sep 2019
NRC
Image courtesy: Business Today

नेशनल सिटीजन ऑफ़ रजिस्टर यानी एनआरसी की अंतिम सूची से इसकी वकालत करने वाले और विरोध करने वाले दोनों नाखुश हैं। इन दोनों तरह की नाखुशी में एक बात कॉमन है कि किसी को भी एनआरसी के तहत की गई प्रक्रिया पर भरोसा नहीं है। 

सबका आरोप है कि एनआरसी के तहत बहुत सारी गलतियां हुईं है और जो लिस्ट सामने आयी है, वह सही नहीं है। सबने अपना पक्ष रखते हुए यह तर्क दिया कि एनआरसी की फाइनल लिस्ट जारी होने से पहले ही बहुत ही गड़बड़ियां उजागर होने लगी थीं। जैसे मां का नाम एनआरसी में है लेकिन बेटे का नाम नहीं है। चाचा का नाम है लेकिन चाची का नाम नहीं है।

परिवार के सारे सदस्य का नाम है लेकिन किसी एक सदस्य का नाम नहीं है, दिए गए डॉक्यूमेंट में स्पेलिंग मिस्टेक होने पर कई लोगों को बाहर रखा गया है। कई मामलों में स्थानीय लोगों को कहना है कि अमुक व्यक्ति बाहरी है लेकिन उसे एनआरसी लिस्ट में जगह दे दी गयी है।

इसलिए जानकारों का कहना है कि एक ऐसे विषय पर जिसका सम्बन्ध किसी की नागरिकता से जुड़ा है, जिससे किसी की नागरिकता बनी रह सकती है या छीनी जा सकती है वैसे विषय पर प्रक्रियाओं को घोर उल्लंघन होने के बावजूद और इसके पुख्ता सबूत होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह का रवैया अपनाया है, वह पूरी तरह से असंवैधानिक है। 

एनआरसी के तहत बाहर किये गए लोगों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए फॉरेन ट्रिब्यूनल में अपील करने का अधिकार मिला है। 

120 दिनों के अंदर वह अपनी अपील फॉरेन ट्रिब्यूनल में दाखिल कर सकते हैं। जिस पर उसके बाद छह महीने की छानबीन के अंदर फैसला आ जाएगा। इसलिए यह भी जानना जरूरी हो जाता है कि फॉरेन ट्रिब्यूनल क्या है? और अपील से जुड़े इन कामों को पूरा करने में इसकी अब तक साख कैसी रही है ? 

फॉरेन ट्रिब्यूनल की स्थापना साल 1964 में गृह मंत्रालय द्वारा फॉरेन ट्रिब्यूनल आदेश के जरिये की गयी थी। इसे अधिकारिता मिली है कि यह फॉरेनर एक्ट 1946 के आधार पर तय करे कि कोई व्यक्ति विदेशी है या नहीं। 

सामान्य समझ से परखें तो इसकी अधिकारिता तो सिविल मामले जैसी है लेकिन इसके फैसले से परिणाम क्रिमिनल मामले जैसे निकलते हैं। जैसे किसी की नागरिकता चली जाती है, उसे एक देश से जुड़े अधिकारों से हाथ गंवाना पड़ सकता है, उसे डिटेंशन सेंटर में रहने के के लिए भेज दिया जाता है। देश से बाहर निकाल दिया जाता है। 

फॉरेन ट्रिब्यूनल की स्थापना फॉरेनर एक्ट के तहत हुई थी। इसलिए ऐसा नहीं है कि इसकी स्थापना केवल एनआरसी अपडेशन की उद्देश्य से हुई थी। इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य किसी को बाहरी और विदेशी घोषित करने के फैसले से जुड़ा है। 

यानी यह तब से काम करती आ रही है, जब एनआरसी नहीं था और तब तक काम करती रहेगी, जब एनआरसी नहीं रहेगी। इस लिहाज से फॉरेन ट्रिब्यूनल एक ऐसी संस्था है जो किसी के उन दावों की जांच परख करती है जो उसके विदेशी होने या न होने से जुड़ी होती हैं।  
 
इसके पास दो तरह के मामले आते हैं। पहला इलेक्शन कमीशन से। इलेक्शन कमीशन डी वोटर लिस्ट से उन लोगों का नाम जारी करती है, जिनकी भारतीय नागरिकता पर उसे भरोसा नहीं हो पाता है। दूसरा, बॉर्डर पुलिस की तरफ से।

बॉर्डर पुलिस उन लोगों को गिरफ्तार करती है, जिनकी नागरिकता शक के घेरे में होती है और इस पर फैसला लेने के लिए फॉरेन ट्रिब्यूनल के पास भेजती है। और यह साबित करने की जिम्मेदारी की अमुक व्यक्ति नागरिक है या नहीं, अमुक व्यक्ति पर ही होती है। इसलिए शक की स्थिति में किसी को अपनी नागरिकता साबित करना बहुत मुश्किल हो जाता है। 

नागरिकता साबित करने के लिए इंडियन एविडेंस एक्ट के तहत जरूरी सारे साक्ष्यों की ओरिजिनल कॉपी उपलबध करवानी पड़ती है। अगर ओरिजिनल कॉपी नहीं है तो ओरिजिनल कॉपी नहीं होने की स्थिति को साबित करना पड़ता है। जब यह साबित हो जाता है तभी साक्ष्य के तौर पर दूसरी कॉपी को स्वीकार किया जाता है।  

नागरिकता साबित करने की ऐसी प्रक्रिया की सबसे अधिक हानि गरीब और वंचित लोगों को सहनी पड़ती है। उनके पास जरूरी डॉक्यूमेंट नहीं होते हैं। असम जैसी जगहों पर बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं हमेशा आती रहती हैं। लोग एक जगह से दूसरे जगह पर जाने के लिए मजबूर होते हैं। इसलिए यह उम्मीद करना कि संघर्ष और आपदाओं के बीच किसी के डॉक्यूमेंट सुरक्षित रहेंगे बेईमानी उम्मीद लगती है।

इसमें एक लम्बे समय तक सर्टिफाइड डॉक्यूमेंट को संभाल कर रख पाना बहुत मुश्किल काम है। बहुत सारे लोगों को वो डॉक्यूमेंट न होने की वजह से डिटेंशन सेंटर में भेजा गया, जो यह बता पाते कि उनके माता-पिता असम के ही नागरिक थे।  

फॉरेन ट्रिब्यूनल की प्रक्रियाओं पर बहुत सारे बयान छप चुके हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल की एनआरसी से जुडी पत्रिका में फॉरेन ट्रिब्यूनल में काम करने वाले वकीलों का बयान छपा है।  इनका कहना है कि फॉरेन ट्रिब्यूनल में कई मामलों में सरकारी वकील पेश नहीं होते हैं, जहां उनकी जरूरत होती है। फिर भी मामले का निपटान उनकी मौजूदगी के अभाव में भी कर दिया जाता है। 

ट्रिब्यूनल के सदस्य ही कहते हैं कि किसी का क्रॉस एक्सामिनेशन कैसे किये जाए। इस तरह से उनके द्वारा पूरी तरह से पक्षपाती प्रक्रिया अपनायी जाती है। यह न्यायिक नहीं है। ट्रिब्यूनल की बहुत कम प्रक्रियाएं निष्पक्ष होती हैं। 

अंग्रेजी न जानने वालों से पूछा जाता है कि क्या आप जानते हैं कि डॉक्यूमेंट पर क्या लिखा है तो जवाब होता है कि अंग्रजी में लिखा है और हम नहीं जानते हैं कि क्या लिखा हुआ है। इस पर ट्रिब्यूनल अंग्रेजी में फैसला देती हैं कि दोषी कह रहा है कि उसे कुछ भी नहीं मालूम है। 

बहुत सारे गरीब लोगों कि इससे जुडी प्रक्रियाओं की जानकारी नहीं होती है, इसलिए वो अपना सत्यापन तो नहीं करवा पाते हैं, ऐसे में मदद के नाम पर मध्यस्थ उनका शोषण भी करते हैं।  

बहुत सारी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक फॉरेन ट्रिब्यूनल पर यह आरोप लगाया गया है कि सरकार इन पर दबाव डालती है कि वह अधिक से अधिक बाहरी या विदेशी घोषित करें। ठीक से काम न करने की वजह से 20 जून 2017 को फॉरेन ट्रिब्यूनल के 19 सदस्यों को निष्काषित कर दिया गया।  

1985 से 2016 तक फॉरेन ट्रिब्यूनल में साढ़े चार लाख मामले आये। इसमें से तकरीबन 80 हजार लोगों को बाहरी घोषित कर दिया। यानी हर साल तकरीबन 2500 लोग विदेशी घोषित हुए। साल 2017 में इसमें अचानक से इजाफा हुआ। 11 महीने में तकरीबन साढ़े 13 हजार लोगों को विदेशी घोषित कर दिया गया। यानी महीने में 1200 लोग बाहरी करार दे दिए गए।  

लोगों के पास अपना पक्ष रखने के लिए काबिल वकील नहीं होते हैं। जो होते हैं वह बहुत अधिक फी चार्ज करते हैं। जिनका नाम डी वोटर में आ जाता है, उनके लिए वकील रखना और उसपर खर्च करना भी उनकी कमाई का एक हिस्सा ले लेता है। कई लोगों को तो पता भी नहीं चलता कि उनके उपर फॉरेन ट्रिब्यूनल में केस चल रहा है। अचानक से तब पता चलता है जब बॉर्डर पुलिस का सदस्य उनके घर पर आता है वह कहता है कि वे विदेशी घोषित किये जा चुके हैं।  

औरतों के साथ और अधिक नाइंसाफी होती है। बहुत सारी गरीब औरतों का बर्थ सर्टिफिकेट नहीं होता है। उनके पास नागरिकता साबित करने के दस्तावेज नहीं होते है। बहुत सारी औरतों की शादी 18 साल से पहले ही हो जाती है। उन्हें उनके पिता का नहीं पति का नाम मिलता है।  इसलिए अपनी नागरिकता साबित करने में वह अपने बाप से रिश्ता दिखाने वाले दस्तावेज को प्रस्तुत नहीं कर पाती है।

इस तरह से फॉरेन ट्रिब्यूनल के अभी तक के कामों के देखकर यह तो नहीं लगता कि इससे लोगों में भरोसा पैदा हो कि यह ठीक ढंग से आगे भी काम करेगी। सामाजिक कार्यकर्ता और एनआरसी से जुड़े मुद्दे पर बहुत दिनों से काम कर रहे हर्ष मंदर ने हिंदू अखबार में लिखा है कि जो लोग एनआरसी से बाहर निकाल दिए गए हैं उनके लिए सबसे चिंताजनक बात यह है कि उनकी अगली सुनवाई फॉरेन ट्रिब्यूनल में होगी। 

जिस मनमौजी अंदाज में फॉरेन ट्रिब्यूनल काम करते आयी हैं, वह डरा देने वाला है। फॉरेन ट्रिब्यूनल में ऐसे वकील काम करते हैं, जिनके पास कोई ज्यादा ज्यूडिशियल अनुभव नहीं होता है। उन्हें राज्य सरकार नियुक्त करती है। उनका कार्यकाल भी निश्चित नहीं होता है। राज्य सरकार जब चाहें तब उन्हें बाहर कर सकती है। 

यह आरोप लगते आया है कि उनपर यह दबाव भी बनाया जाता है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों की पहचान और विदेशी के तौर पर करें। इनके पास काम भी बहुत अधिक होता है। अभी तकरीबन 100 फॉरेन ट्रिब्यूनल असम में काम कर रहे हैं। एक मामले का निपटारा करने में औसतन एक साल से अधिक का समय लग जाता है। 

मान लीजिए कि जैसा कि सरकार कर रही है कि वहां मामलों का जल्दी से निपटारा करने के लिए 1000 ट्रिब्यूनल काम करेंगे। तो भी अगर हर वर्किंग डे पर यह ट्रिब्यूनल काम करें तो 19 लाख मामलों का निपटारा करने में तकरीबन 6 साल से अधिक का समय लग जाएगा। 

एनआरसी मामलों से जुड़े वकील पंकज किशोर कहते हैं कि एनआरसी के तहत जिस तरह की प्रक्रियाएं अपनाई जा रही है, वह पूरी तरह से असंवैधानिक है। जिन लोगों को एनआरसी में शामिल नहीं किया गया है, उनकी सुनवाई फॉरेन ट्रिब्यूनल में होगी। जबकि इस संस्था के ढांचे में ही मूल परेशानी है। 

ट्रिब्यूनल की स्थापना किसी अधिनियम से नहीं बल्कि कार्यपालिका के आदेश से हुई है। हमारे संविधान के अनुच्छेद 343B में ट्रिब्यूनल का जिक्र है कि अधिनियम या कानून बनाकर मामलों की सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल बनाई जा सकती है। यहां पर यह भी जिक्र है किन विषयों पर ट्रिब्यूनल बनाई जा सकती है। इसमें नागरिकता का विषय शामिल नहीं है। लेकिन हम अगर यह भी मान ले कि यह कोई बड़ी बात नहीं है कि नागरिकता इसमें शामिल नहीं है तो इस पर ट्रिब्यूनल नहीं बनाया जा सकता है। लेकिन भारत जैसे देश के लिए यह बहुत बड़ी बात है। 

एक ऐसे देश के लिए जहां पर सबसे बड़ी याचिकाकर्ता सरकार खुद है, वहां पर अगर कोई न्यायिक संस्था सरकारी आदेश से बनी है तो सरकार के प्रति कमिटेड होगी ना कि न्याय के प्रति। सरकार जैसा चाहेगी उसके साथ बर्ताव करेगी। फॉरेन ट्रिब्यूनल में यही होते आ रहा है। इसलिए ट्रिब्यूनल से जुड़े एक मामले में साल 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा था कि अगर ट्रिब्यूनल सरकारी आदेश पर बनने लगे तो यह नागरिकों के अधिकारों पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। 

गृह मंत्रालय के 1964 के आदेश के बजाए इस ट्रिब्यूनल में काम करने वालों की शर्तें, प्रक्रियाओं का उल्लेख किसी कानून में होता तो यह ट्रिब्यूनल ज्यादा स्वतंत्र तरह से काम कर पाती। इनके अधिकारों से अगर सरकार खिलवाड़ करती तो कानून के माध्यम से सरकार पर अंकुश लगा पाती। 

इस तरह से एनआरसी की प्रक्रिया से जुड़ी दुखद बात यह है कि यहां न्याय की सबसे बड़ी संस्था सुप्रीम कोर्ट प्रक्रियाओं के साथ हो रही सारी गड़बड़ियां देख रही है, फिर भी उसका रुझान इसे दुरुस्त करने की बजाए इससे जुड़ी संस्थाओं से काम निकलने जैसा है। इसलिए यह प्रक्रिया न्याय के खिलाफ लगती है और लोगों में भरोसा नहीं पैदा करती है।

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