NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सिख नेतृत्व को मुसलमानों के ख़िलाफ़ अत्याचार का विरोध करना चाहिए: विशेषज्ञ
पंजाब का नागरिक समाज और विभिन्न संगठन मुसलमानों के उत्पीड़न के खिलाफ बेहद मुखर हैं, लेकिन सिख राजनीतिक और धार्मिक नेता चाहें तो और भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
जसविंदर सिद्धू
09 Dec 2021
Sikhs

हाल ही में हरियाणा के गुरुग्राम में एक गुरुद्वारा संघ ने उन मुसलमानों के लिए अपने दरवाजे खोल दिए थे, जिन्हें कुछ हिन्दू समूहों के गिरोहों द्वारा हैरान-परेशान किया जा रहा था और नमाज अदा करने के लिए निर्दिष्ट स्थानों पर भी उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया जा रहा था। इस भाईचारे के भाव को कई हलकों के द्वारा सराहा गया, इसके बावजूद इसने सिख धार्मिक एवं राजनीतिक नेतृत्व के लिए कुछ प्रश्न भी खड़े कर दिए हैं।

कई सिख इतिहासकारों का मानना है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, उसके बाद से पूरे उत्तर भारत में मुसलमानों को हाशिये पर धकेले जाने की प्रक्रिया शुरू हो गई थी, जिसे चुनौती दिया जाना बेहद आवश्यक था। उनका कहना है कि जिस समुदाय के नेतृत्व को “रक्षक” के तौर पर जाना जाता है, उसे किसी भी अल्पसंख्यक समुदाय पर होने वाले अत्याचारों पर अपनी चुप्पी तोड़नी चाहिए। उनका यह भी कहना है कि जहाँ पंजाबी नागरिक समाज ने हिन्दू कट्टरपंथियों द्वारा मुस्लिमों को निशाना बनाये जाने के खिलाफ आवाज बुलंद करता रहा है, वहीं अब समय आ गया है कि समुदाय के नेताओं को भी मुस्लिमों के साथ हो रहे दुर्व्यवहार के खिलाफ अपनी आवाज उठानी चाहिए। 

इस बारे में खालसा कालेज अमृतसर के सिख इतिहास एवं अनुसंधान केंद्र के प्रमुख डॉ. जोगिंदर सिंह कहते हैं, “इसे [मुस्लिमों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार] बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए; वे भी भारत के नागरिक हैं।” वे आगे कहते हैं “ऐसा सिर्फ मुसलमानों के बारे में नहीं है। सिख धर्म हमें किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाता है और यह संघर्ष हमारे इतिहास का हिस्सा है। हमारे गुरुओं ने न्याय की खातिर अपने और अपने जीवन और परिवारों का बलिदान दिया।” गुरु नानक देव के संदेश के अनुसार, यदि कोई अन्याय होता है, तो सिखों को हर कीमत पर इसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। जोगिंदर सिंह कहते हैं, “सटीक शब्द इस प्रकार से हैं, ‘नानक नाम चारदी कला तेरे भाने सरबत दा भला- जिसका अर्थ है ‘सभी के लिए आशीर्वाद और शांति’।”

अगस्त 2019 में, भाजपा नेताओं ने जम्मू कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त किये जाने के बाद से सार्वजनिक तौर पर कश्मीरी महिलाओं के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणियां करनी शुरू कर दी थीं। इसके फौरन बाद ही सिखों के शीर्ष फैसला लेने वाले निकाय, अकाल तख़्त के जत्थेदार/प्रमुख, ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने एक जोरदार निंदात्मक बयान जारी किया था। उन्होंने कहा, “कश्मीरी महिलाएं हमारे समाज का हिस्सा हैं। उनके सम्मान की रक्षा करना हमारा धार्मिक कर्तव्य है। सिखों को अपने कर्तव्य और इतिहास की खातिर उनके सम्मान की रक्षा करनी चाहिए।” अकाल तख़्त के बयान का इतना तगड़ा असर देखने को मिला कि इसके बाद किसी भी भाजपा नेता ने कश्मीरी महिलाओं के बारे में एक भी शब्द मुहँ से नहीं निकाला।

सिखों के पवित्र ग्रंथ, गुरु ग्रंथ साहिब में ऐसे कई भजन और शबद हैं जैसे कि ‘शोरा सो पहचानिये जोह लड़े दीन के हेत- बहादुर वही है जो वंचितों/असहायों के लिए लड़े।’ इस प्रकार की पंक्तियाँ स्पष्ट रूप से दूसरों के प्रति सिखों के कर्तव्य का स्मरण कराती हैं। यह एक दूसरी वजह है जिसके चलते इतिहासकारों को लगता है कि सिख समुदाय के धार्मिक एवं सामाजिक-राजनीतिक प्रमुखों को देश में कहीं भी मुसलमानों के पक्ष में तत्काल बोलने की जरूरत है। डॉ. जोगिंदर सिंह के शब्दों में, “मेरे विचार में इस विषय में अकाल तख़्त के जत्थेदार का प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण है और उनकी ओर से हस्तक्षेप अत्यंत आवश्यक है। किंतु दुर्भाग्यवश, अकाली दल और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के राजनीतिक कामकाज के कारण इस संस्था के कामकाज को हाशिये पर डाल दिया गया है।” वे आगे कहते हैं, “इसके बावजूद, यदि जत्थेदार ज्ञानी हरजीत सिंह इस संबंध में स्वतंत्र पहल लेते हैं, तो उससे भी मुस्लिम समुदाय को कुछ राहत मिल सकती है, जो बेहद स्वागत योग्य होगा और जिसकी आज सख्त जरूरत है।”

विशेषज्ञों ने इस ओर भी इंगित किया है कि पंजाबी नागरिक समाज और समूहों ने नियमित रूप से हिन्दू कट्टरपंथियों के द्वारा मुसलमानों को निशाना बनाये जाने का विरोध किया है। चंडीगढ़ के गुरु गोविंद सिंह कालेज में इतिहास के प्रोफेसर हरजेश्वर पाल सिंह कहते हैं, “ऐसा नहीं है कि सिख इस मुद्दे [मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार] पर नहीं बोल रहे हैं। वे आगे कहते हैं, “पंजाब में नागरिक समाज इस बारे में बेहद मुखर है।” उनके अनुसार, पजाबियों ने दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) विरोधी विरोध-प्रदर्शनों में भाग लिया और कुलमिलाकर देखें तो पंजाबी सिख समुदाय मुसलमानों के साथ खड़ा रहा है। उनका कहना था, “लेकिन मुझे लगता है कि सिख धार्मिक संस्थानों को भी अपने साथी अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में बात रखनी चाहिए। इसके बावजूद, इस मुद्दे पर हम इसे सिख समुदाय की विफलता नहीं कह सकते हैं।”

अभी भी उम्मीद है कि सिख राजनीतिक और धार्मिक नेता भी अपनी चुप्पी को उसी प्रकार से तोड़ेंगे, जिस प्रकार से व्यक्तियों और नागरिक समाज की ओर से देखने को मिली है। ऐसा दृष्टिकोण बन रहा है कि सिखों को ऐसी किसी भी परिस्थिति के निर्माण का मुखर विरोध करना चाहिए, जैसा कि इन्हीं लोगों और पुलिस की वजह से सिख समुदाय को अस्सी के दशक में जूझना पड़ा था।

सिखों के बारे में एक और धारणा यह है कि अतीत में मुगलों द्वारा किये गए अत्याचारों और विशेषकर सिख गुरुओं को मृत्युदंड दिए जाने की वजह से वे खामोश हैं। यह एक धारणा है जिसे हिन्दू दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा जमकर प्रचारित किया है। हालाँकि, विशेषज्ञों ने इस तर्क को ठोस ऐतिहासिक संदर्भों के साथ ख़ारिज किया है। जगतपुर बाबा सेंटर फॉर इंटरफेथ हार्मोनी, पटियाला के निदेशक सरबजिंदर सिंह का तर्क है, “सिखों के खिलाफ मुगलों का अत्याचार कोई मुद्दा नहीं है। सिख इतिहास में, दो मुस्लिम भाइयों, गनी खान और नबी खान ने गोविन्द सिंह जी को पंजाब के माछीवाड़ा से मुगलों के कब्जे से निकल भागने में मदद की थी। सिख पंथ हमेशा से ही क्रूर, आतताई हुकूमत के खिलाफ रहा है। उस जमाने में मुगल ‘ज़ालिम’ [उत्पीड़क] थे। यदि कोई दूसरा समुदाय भी ऐसी ही चीजें कर रहा होता तो गुरु निश्चित रूप से उनके खिलाफ भी लड़ रहे होते।

ऐसे कई ऐतिहासिक घटनाएं हैं जिसमें मुसलमानों ने सिखों के लिए लड़ाईयां लड़ी हैं, यहाँ तक कि अपने जीवन को भी बलिदान कर दिया था। दिल्ली के चांदनी चौक पर भाई सती दास, भाई मति दास और भाई दयाला दास के साथ गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद दिल्ली के चांदनी चौक कोतवाली स्थित जेल की देखरेख करने वाले अब्दुल्ला ख्वाजा ने मुगलों के खिलाफ बगावत कर दी थी। सर कलम किये जाने की सूचना के साथ आनंदपुर साहिब पहुँचने वाले वे पहले व्यक्ति थे।

सिख गुरुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था, लेकिन अन्य गुरुओं ने मुसलमानों के साथ बातचीत करना बंद नहीं किया था और मुगल शासकों के साथ अपने व्यापार को जारी रखा। 18वीं शताब्दी में भी इसमें कोई बदलाव नहीं आया, जब सिख शासक सत्ता में थे। उदाहरण के लिए, मालवा क्षेत्र के अधिकाँश सिख शासकों ने अफगान राजा अहमद शाह अब्दाली के नाम पर सिक्के जारी किये थे। डॉ. जोगिंदर सिंह का इस बारे में कहना है, “यह एक गलत धारणा है कि सिखों और मुसलमानों के बीच में एक सतत संघर्ष चल रहा था। आप पीर बुद्धू शाह का भी उदाहरण ले सकते हैं। उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह की ओर से लड़ाई लड़ी थी। इसलिए, सिख इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें मुसलमानों ने सिखों की तरफ से लड़ाई लड़ी थी।”

यहाँ तक कि 18वीं सदी में बंदा बहादुर सिंह के नेतृत्व वाले खालसा सेना का संयोजन भी काफी हद तक मुस्लिम थी। डॉ. जोगिंदर सिंह के मुतबिक, “मेरे विचार में सिख नेतृत्व ने एक मौका गंवा दिया है जब इस सरकार द्वारा कश्मीरियों के लिए संविधान के एक विशेष अनुच्छेद को वापस ले लिया गया था।” उनका आगे कहना था, “सिख नेताओं को अल्पसंख्यक समुदाय को संदेश देना चाहिए था। उन्हें लगता है कि दिल्ली में उनकी अच्छी साख है, इसलिए वे सुरक्षित हैं, लेकिन यहाँ पर कोई भी सुरक्षित नहीं है।”

उन्होंने निष्कर्ष के तौर पर कहा, “देखिये कैसे सरकार और मीडिया ने तीन कृषि कानूनों का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी किसानों को खालिस्तानी और अलगाववादियों के तौर पर वर्गीकृत करने का काम किया था।”

लेखक स्वतंत्र खोजी पत्रकार हैं। व्यक्त किये गए विचार व्यक्तिगत हैं।

Experts Say Sikh Leadership Must Oppose Atrocities Against Muslims

Sikh history
Anti-CAA Protests
Anti-Muslim Violence
Minorities in India
Akal Takht
Punjabi civil society

Related Stories

'नथिंग विल बी फॉरगॉटन' : जामिया छात्रों के संघर्ष की बात करती किताब

सिख इतिहास की जटिलताओं को नज़रअंदाज़ करता प्रधानमंत्री का भाषण 

लाल क़िले पर गुरु परब मनाने की मोदी नीति के पीछे की राजनीति क्या है? 

सद्भाव बनाम ध्रुवीकरण : नेहरू और मोदी के चुनाव अभियान का फ़र्क़

लखीमपुर खीरी की घटना में निहित चेतावनी को अनदेखा न करें!

दिल्ली पुलिस की 2020 दंगों की जांच: बद से बदतर होती भ्रांतियां

कितना याद रखें, कितना मन को मनाएं और कितना भूलें? 

उमर खालिद ने दिल्ली दंगों को “साजिश” बताया, तो शरजील इमाम ने कहा उनका भाषण “राजद्रोह” नहीं

एंटी-सीएए विरोध की आत्मा को फिर से जीवंत करती एक ग्राफ़िक बुक

असम: आख़िरकार डेढ़ साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए अखिल गोगोई


बाकी खबरें

  • RELIGIOUS DEATH
    श्रुति एमडी
    तमिलनाडु : किशोरी की मौत के बाद फिर उठी धर्मांतरण विरोधी क़ानून की आवाज़
    27 Jan 2022
    कथित रूप से 'जबरन धर्मांतरण' के बाद एक किशोरी की हालिया खुदकुशी और इसके ख़िलाफ़ दक्षिणपंथी संगठनों की प्रतिक्रिया ने राज्य में धर्मांतरण विरोधी क़ानून की मांग को फिर से केंद्र में ला दिया है।
  • cb
    वर्षा सिंह
    उत्तराखंड चुनाव: ‘बीजेपी-कांग्रेस दोनों को पता है कि विकल्प तो हम दो ही हैं’
    27 Jan 2022
    उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद उत्तराखंड में 2000, 2007 और 2017 में भाजपा सत्ता में आई। जबकि 2002 और 2012 के चुनाव में कांग्रेस ने सरकार बनाई। भाजपा और कांग्रेस ही बारी-बारी से यहां शासन करते आ रहे…
  •  नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    न्यूज़क्लिक प्रोडक्शन
    नौकरी दो! प्राइम टाइम पर नफरती प्रचार नहीं !
    27 Jan 2022
    आज के एपिसोड में अभिसार शर्मा बात कर रहे हैं रेलवे परीक्षा में हुई धांधली पर चल रहे आंदोलन की। क्या हैं छात्रों के मुद्दे और क्यों चल रहा है ये आंदोलन, आइये जानते हैं अभिसार से
  • सोनिया यादव
    यूपी: महिला वोटरों की ज़िंदगी कितनी बदली और इस बार उनके लिए नया क्या है?
    27 Jan 2022
    प्रदेश में महिलाओं का उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीतने का औसत भले ही कम रहा हो, लेकिन आधी आबादी चुनाव जिताने का पूरा मददा जरूर रखती है। और शायद यही वजह है कि चुनाव से पहले सभी पार्टियां उन्हें लुभाने…
  • यूपी चुनाव:  उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    रवि शंकर दुबे
    यूपी चुनाव: उन्नाव पीड़िता की मां के बाद अब सोनभद्र की ‘किस्मत’ भी कांग्रेस के साथ!
    27 Jan 2022
    यूपी में महिला उम्मीदवारों के लिए प्रियंका गांधी की तलाश लगातार जारी है, प्रियंका गांधी ने पहले उन्नाव रेप पीड़िता की मां पर दांव लगाया था, और अब वो सोनभद्र नरसंहार में अपने भाई को खो चुकी महिला को…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License