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कृषि-कानून: जाट बहुल राज्यों की राजनीति में महापंचायत और खापों की पकड़ कितनी है?
किसान महापंचायत, जिन्हें ग्राम सभा की बड़ी सभा कहा जा सकता है, वे जनवरी के अंत से पूरे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को जुटाने में प्राथमिक और मुख्य शक्ति का काम कर रही हैं।
सौरभ शर्मा
20 Feb 2021
Translated by महेश कुमार
कृषि-कानून

फलौदा, मेरठ: ‘हम देखेंगे लाज़िम है कि हम देखेंगे,’ आम लोगों में शुमार इस नज़्म को 1979 में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने लिखा था जिसे मेरठ जिले के फलौदा शहर में 11 फरवरी को हुई किसान महापंचायत के मंच से गाया गया, इस नज़्म के बाद हिंदू-मुस्लिम एकता और 'किसान एकता ज़िंदाबाद' नारे लगाए गए।

स्वतंत्रता संग्राम में भगत सिंह की भूमिका की प्रशंसा में लिखे देशभक्ति के गीत और मनोज कुमार की फिल्म के गीत ‘मेरे देश की धरती’ को भी किसानों ने बड़े उत्साह के साथ सुना। हुक्कों की आमद और ढोल बजाने के शोर में स्थानीय लोग भोजन के पैकेट और पानी का इंतजाम भी कर रहे थे।

महापंचायत में लगभग 1,500 लोग शामिल हुए थे, और सभी केवल चार घंटे के नोटिस पर एकत्रित हुए थे। कार्यक्रम स्थल से 10 किलोमीटर दूर रहने वालों किसानों ने भी पंचायत में भाग लियाथा।

महापंचायत में भाषण दिए गए और मनोरंजन के लिए मिमिक्री कलाकारों ने दर्शकों के सामने समां बांध दिया था। पंचायत की आयोजन टीम में से एक व्यक्ति को सभी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील और असामाजिक तत्वों पर नजर रखने में मदद करने का आग्रह करते देखा जा सकता था।

किसान महापंचायत, जिन्हे ग्राम सभा की बड़ी सभा कहा जा सकता है, वे जनवरी के अंत से पूरे हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को जुटाने में प्राथमिक और मुख्य शक्ति का काम कर रही हैं। किसान महापंचायतें लगभग तीन हफ्ते पहले 28 जनवरी को शुरू हुईं थी जब भारतीय किसान यूनियन (BKU) के नेता राकेश टिकैत ने प्रशासन के प्रति भावनात्मक रूप से नाराजगी जताई थी क्योंकि कथित तौर पर प्रशासन गाजीपुर बॉर्डर से कृषि कानून के खिलाफ चल रहे किसानों के आंदोलन को समाप्त करने की कोशिश कर रहा था।

उसी रात, खापों के आह्वान पर हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग कोनों से सैकड़ों ट्रैक्टर दिल्ली की ओर रवाना हो गए थे क्योंकि उन्होंने महेंद्र सिंह टिकैत के बेटे को रोते हुए देख लिया था।

उस दिन के बाद से इलाके के चौधरियों (इलाके के प्रमुख लोग) ने सैकड़ों सभाओ और खापों को संबोधित किया गया, जिन्होंने केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन विवादास्पद कृषि कानूनों को रद्द करने की मांग को दोहराते हुए आंदोलन को जारी रखने और किसानों की एकता को बनाए रखने का आह्वान किया।

महापंचायत में एक दर्शक

अपने उन नेताओं को सुनने के लिए विभिन्न तबकों के सैकड़ों लोग सभा या पंचायत में आते हैं जिन्हें वे 'चौधरी' कहते हैं। चौधरियों के विचारों को अंतिम शब्द माना जाता है और फिर उसे एक प्रकार के आदेश के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है।

मंच पर पड़ोस के प्रमुख लोगों के साथ-साथ राजनीतिक दिग्गज भी शामिल थे, जिन्होंने सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा किए गए उन वादों को याद दिलाया जिन्हे पूरा नहीं किया गया।

समाजवादी पार्टी के पदाधिकारी अतुल प्रधान इस विशेष पंचायत में मुख्य वक्ताओं में से एक थे। उन्होंने कानूनों के बारे में सभी किसान विरोधी मुद्दों को समझाया और बताया कि पूरे भारत के किसान इन क़ानूनों का विरोध क्यों कर रहे हैं।

“वो महेंद्र बाबा का बेटा है और वो सरकारी अत्याचार की वजह से रो दिया। हमसे यह सब बर्दाश्त नहीं होगा। अगर यहाँ का किसान सरकार बनवा सकता है तो उसी सरकार से काले कानून वापस करवा के रहेगा”, प्रधान ने महापंचायत को संबोधित करते हुए दहाड़ कर कहा।

मंच पर मौजूद सभी लोगों ने 82 वर्षीय बीकेयू के बुजुर्ग गुलाम मोहम्मद जौला से अनुरोध किया कि वे आगे आए और इकट्ठे हुए लोगों को संबोधित करें, उन्होंने केंद्र सरकार की जमकर आलोचना की। उन्होंने कहा कि “किसान पूरे देश को खिलाते हैं और सरकार हमें खालिस्तानी, आतंकवादी और क्या-क्या नहीं कह रही है। क्या हमें नहीं पता कि ट्रैक्टर परेड के दौरान गणतंत्र दिवस पर हुई हिंसा के पीछे कौन था? ” उन्होने सवाल दागते हुए पूछा।

"वे चाहते थे कि हम विभाजित रहे लेकिन अब हम उनकी सभी रणनीतियों को जान गए हैं। उन्होंने 18 महीनों तक कानूनों को निलंबित करने की पेशकश की, लेकिन हमने उनके प्रस्ताव को ठुकरा दिया क्योंकि हम चाहते हैं कि इन कानूनों को पूरी तरह से रद्द कर दिया जाए अन्यथा इस देश के किसान भूख से मर जाएंगे और सब कुछ अडानी और अंबानी जैसे निजी खिलाड़ियों के पास चला जाएगा। प्रिय दोस्तों, धार्मिक आधार पर विभाजित न हों क्योंकि जब किसान अनाज पैदा करता है तो सब खाते हैं और खेती करना अपने आप में एक धर्म है।” जौला ने मंच से कहा,“ हवाई अड्डों से लेकर गैस तक सब कुछ निजी क्षेत्रों को बेचा जा रहा है और किसान आत्महत्या करके मर रहे हैं; इसलिए, हम सरकार को हमारी मिट्टी, पानी और फसलों को छीनने की इजाजत नहीं देंगे।”

जोला ने कहा कि "जो लोग न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के न होने और कांट्रैक्ट फ़ार्मिंग के लाभों को समझाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें पहले खेतों का काम करना शुरू करना चाहिए।" महापंचायत का समापन किसान एकता जिंदाबाद, हिंदू-मुस्लिम एकता ज़िन्दाबाद के नारों के साथ हुआ। 

गौर करने की बात है कि एक महापंचायत 10 से 12 गांवों के किसानों से मिलकर बनती है, जबकि खाप एक खास उप-जाति के लोगों का समूह होता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में 18 खाप हैं और प्रत्येक का एक चौधरी है। उनके ऊपर एक खाप सचिव होता है जिसका काम होता है कि जब भी जरूरी हो वह खाप की बैठक बुलाएगा। सभी 18 खापों का मुख्यालय राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर मुजफ्फरनगर जिले के सोरम गांव में है।

हालांकि महापंचायतों और खापों में पुरुष किसानों की बड़े पैमाने पर भागीदारी देखी गई है, लेकिन महिलाओं की अनुपस्थिति काफी हद तक इसलिए भी रही क्योंकि उन्हें खेतों में काम करने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है ताकि आंदोलन जारी रह सके।

यह भी उल्लेख करना जरूरी है कि खापों, जिनके पितृसत्तात्मक आदेशों के कारण जैसे कि लड़कियों को डेनिम जींस नहीं पहनना चाहिए आदि’, के चलते खाप हमेशा महिलाओं के साथ टकराव में रही है।

महापंचायत और 2022 का चुनाव

जाट समुदाय उत्तर प्रदेश की आबादी का लगभग 17 प्रतिशत है और इसकी उपस्थिति 19 जिलों में बड़ी तादाद में हैं, खासकर गन्ना बेल्ट में यह संख्या बड़ी है। सत्तारूढ़ भाजपा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की लगभग सभी सीटों को जीतकर राज्य में अपना दबदबा बनाने में सफल रही थी।

जाट समुदाय और अन्य हिंदू उपजातियों के सदस्यों के बीच उपजे गुस्से के मद्देनजर संजीव बालियान सहित भाजपा के शीर्ष नेताओं ने राज्य में 2022 के चुनावों को देखते हुए जनता के साथ बातचीत शुरू कर दी है। मेरठ में एक चाय की दुकान पर बैठे बालियान ने न्यूज़क्लिक को बताया कि, “किसानों के मुद्दे को बातचीत के जरिए हल किया जाएगा। यह किसानों की सरकार है और किसानों के लिए काम करेगी।” हालांकि, उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया कि सरकार किसानों के साथ बातचीत कब शुरू करेगी।

हरियाणा से सटे राज्य में होने वाली महापंचायतों के कारण भाजपा पर भी दबाव बढ़ गया है। गैर-जाट नेताओं के 20 साल के मुक़ाबले राज्य में जाट नेता 33 साल तक सत्ता के केंद्र में रहे हैं। किसानों के आंदोलन ने जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) के तीन प्रमुख नेताओं को इस्तीफे देने के लिए मजबूर किया है। राज्य में भाजपा के साथ जेजेपी और उनकी गठबंधन सरकार को नुकसान हो सकता है।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल ख़बर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

Farm Laws: How Much Sway do Mahapanchayats and Khaps Hold in Jatland Politics

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Haryana
Uttar pradesh
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