NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
भारत
राजनीति
सरकार के विश्वासघात की आशंका ने उत्तर-पूर्व में अशांति को प्रेरित किया
नागरिकता कानून ने असम में कड़वाहट घोल दी है, कश्मीर की दुर्दशा उत्तर-पूर्व को आशंकित कर रही है।
तोको अनु
17 Dec 2019
assam protest
चित्र सौजन्य: पीटीआई

नॉर्थ ईस्ट गुस्से से उबल रहा है। नागरिकता संशोधन विधेयक के क़ानून बन जाने के बाद विरोध में स्थानीय लोगों द्वारा उग्र विरोध प्रदर्शन किये जा रहे हैं। इस क़ानून को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाने के छह दिन बाद भी स्थिति बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है। इसे क़ानून बनने के बाद हज़ारों की संख्या में लोग सरकार द्वारा असम में थोपे गए कर्फ्यू के हालातों को धता बताते हुए इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए। पुलिस और विशेष बलों के साथ संघर्ष करते हुए राजनीतिक होर्डिंग बैनर उखाड़ फेंके गए और कई वाहनों, बस टर्मिनल और गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया गया। वहीँ इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, हालांकि सरकार ने दावा किया है कि कुछेक प्रतिबंधों में ढील दे दी गई है।

अनुमान के अनुसार रविवार तक असम में कम से कम छह प्रदर्शनकारियों की मौत चुकी है, जिनमें से चार लोग पुलिस की गोलियों से मारे गए हैं और सैकड़ों की संख्या में लोग घायल हैं। मेघालय की राजधानी शिलांग में रात के समय का कर्फ्यू जारी है। एसएमएस और मोबाइल इंटरनेट सेवा को दो दिनों के लिए रोक दिया गया। त्रिपुरा के आदिवासी बहुल इलाकों में तनाव की स्थिति बनी हुई है, और शुक्रवार तक एसएमएस और इंटरनेट सेवाओं को बाधित रखा गया। अरुणाचल प्रदेश में ईंधन भण्डार पूरी तरह से ख़त्म हो जाने के कारण ईटानगर में ईंधन का गंभीर संकट पैदा हो गया है। मणिपुर में मणिपुर पीपुल अगेंस्ट सिटिजनशिप अमेंडमेंट बिल (एमएएनपीएसी) द्वारा तीन दिवसीय बंद का ऐलान किया गया जिसमें नागरिकों से इस विधेयक के ख़िलाफ़ सड़कों पर आने का अनुरोध किया गया था।

नए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम के अंतर्गत छह समुदायों के लोगों को जिनमें सिख, हिंदू, ईसाई, पारसी, जैन और बौद्ध शामिल हैं, और अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक उत्पीड़न के चलते पलायन कर रहे हैं, उनको क़ानूनी तौर पर भारतीय नागरिक के रूप में मान्यता दी जाएगी। हालांकि सरकार ने मानवीय आधार पर शरण देने को उचित ठहराया है लेकिन उत्तर-पूर्व में लोगों ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया है। क्षेत्र में प्रदर्शनकारियों को इस बात की आशंका है कि धार्मिक आधार पर शरण के नाम पर अप्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने से इलाके की जनसांख्यिकीय संरचना बदल जाएगी। संसाधनों के लिए मारामारी बढ़ेगी जिसके चलते स्थानीय निवासी हाशिये पर खिसक जायेंगे और अंततः यह कदम स्थानीय लोगों की पहचान को ख़तरे में डाल देगा।

विपक्षी दलों का मानना है कि नया नागरिकता अधिनियम, संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है और यह भारत के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के ख़िलाफ़ है। धर्म को नागरिकता का आधार बनाकर, यह न सिर्फ मुसलमानों के साथ भेदभाव करता है बल्कि अन्य धार्मिक समूहों को प्राथमिकता देकर उन्हें दोयम दर्जे के नागरिकों के रूप में भी अपमानित करता है। हालांकि हक़ीक़त में ये मुसलमान हैं जो अल्पसंख्यक के रूप में म्यांमार और श्रीलंका में उत्पीड़न का शिकार हैं और उन्हीं को इस विधेयक से बाहर रखा गया है।

जहां यह विधेयक सारे देश भर में विवादास्पद साबित हुआ है वहीं असम खासतौर पर इसके प्रति संवेदनशील रहा है। असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी) की कवायद के बाद यह स्पष्ट हो गया कि सरकार क्यों संसद के माध्यम से इस क़ानून को जल्द से जल्द पारित कराना चाहती है। एनआरसी इस मकसद से लाइ गई थी कि इसके जरिये वहां के निवासियों की असमिया वंशावली साबित हो सके। इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 19 लाख लोग अपनी नागरिकता सिद्ध कर पाने में असमर्थ रहे जिसमें से अधिकांश लोग हिंदू थे। इनके एनआरसी से बाहर होने का अर्थ था कि इन सभी को बंदी गृहों में भेजे जाने का ख़तरा पैदा हो गया था। अब इस नए क़ानून के माध्यम से तकरीबन 15 लाख हिन्दू जो असम में एनआरसी से बाहर हो चुके थे अब नागरिकता के हक़दार हो गए हैं।

असम के लोग गुस्से में इसलिये हैं क्योंकि उनका मानना है कि एनआरसी का गठन उन अवैध प्रवासियों को छांट कर बाहर करने के लिए किया गया था, जिन्होंने असम में निवास तो किया लेकिन 24 मार्च 1971 की आधी रात के बाद राज्य की सीमा के भीतर कदम रखा था। एनआरसी, उनके अनुसार बिना किसी जांच के पड़ोसी मुल्कों से आव्रजन को ध्यान में रखकर इसलिये गठित की गई थी, ताकि शरणार्थियों के मुद्दों को हल किया जाये और पूर्वोत्तर के स्थानीय लोगों की पहचान की रक्षा हो सके। एनआरसी का मकसद कभी भी धार्मिक आधार पर लोगों के साथ भेदभाव करना नहीं था। इस तरह वे मानते हैं कि यह नया क़ानून सरकार के वायदे की पूर्ण विफलता को दर्शाता है जो उसने इस क्षेत्र की जनता से किया था।

इस बात को ज़रुर ध्यान में रखा जाना चाहिए कि 2014 के अपने चुनावी घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बांग्लादेश और पाकिस्तान से हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का वादा किया था। भाजपा ने अपने 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में नागरिकता संशोधन विधेयक के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया था।

कई लोगों ने नागरिकता विधेयक को "काला विधेयक" कहा है, जो पूरे देश में धर्म के नाम पर विभाजनकारी आग को हवा देने का काम करेगा, जैसा कि इसने उत्तर-पूर्व में किया है। असम विधानसभा अध्यक्ष हितेंद्र नाथ गोस्वामी ने कहा है कि नए क़ानून के पीछे की वास्तविक मंशा संदेह के घेरे में है क्योंकि इस बात की पूरी संभावना है कि यह सांप्रदायिक विभाजन को हवा देगा। असम के पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत ने सरकार के नए नागरिकता नियमों को हिंदू-मुस्लिम विभाजन पैदा करने वाला एक "विभाजनकारी हथियार" घोषित किया है जिसे तत्काल रद्द करना होगा। उन्होंने इसे उत्तर-पूर्व की सांझी संस्कृति के लिए भी ख़तरा बताया है।

वर्तमान में अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड पर नागरिकता अधिनियम लागू नहीं होता है जो इनर लाइन परमिट क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं। इसके अलावा असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के आदिवासी क्षेत्र जो संविधान की छठी अनुसूची में शामिल हैं, वे भी इसमें शामिल हैं। नए क़ानून के तहत, इनर-लाइन परमिट या आईएलपी को बुधवार के दिन मणिपुर के लिए विस्तारित किया गया है, और राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने इसके लागू करने के आदेश पर अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं।

लेकिन इस छूट के हासिल होने के बावजूद, 1955 के नागरिकता कानून में संशोधन के ख़िलाफ़ उत्तर-पूर्व में अभूतपूर्व हिंसक विरोध प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहा है। क्योंकि अभी भी पूरे क्षेत्र में अनुच्छेद 371 के तहत उत्तर-पूर्व को प्राप्त विशेष स्थिति के खोने का डर और अनिश्चितता बनी हुई है, खासकर यह डर 5 अगस्त को अनुच्छेद 370 को निरस्त किये जाने के बाद से पैदा हुई है।

अनुच्छेद 370 के ज़रिये जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को संरक्षण प्राप्त था, जब तक कि सरकार ने इस राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित नहीं कर दिया और अगस्त में इस संरक्षण को रद्द कर दिया। तभी से यह क्षेत्र सख्त प्रतिबंधों से गुज़र रहा है।

ऑल-अरुणाचल प्रदेश स्टूडेंटस यूनियन के अध्यक्ष हवा बगांग कहते हैं, ''चूंकि बीजेपी सरकार ने आश्वासन दिया है कि अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मणिपुर राज्य पूरी तरह से नए नागरिकता नियमों से बाहर हैं लेकिन ऐसी अटकलें चल रही हैं कि भविष्य में यह अपने इस वादे से पलट सकती है। यह जानने के बावजूद कि उन्होंने जो कश्मीर के साथ किया है, हम कैसे आश्वस्त हो सकते हैं कि वही बर्ताव वे हमारे साथ नहीं करेंगे?”

इसी तरह, नागा स्टूडेंट्स फेडरेशन के अध्यक्ष निनोटो अवोमी कहते हैं, “3 दिसंबर को गृह मंत्री के साथ हमारी बैठक के दौरान उन्होंने हमें आश्वस्त किया था कि नागालैंड को नागरिकता संशोधन विधेयक के दायरे से बाहर रखा जाएगा। लेकिन हमारी चिंता इस बात को लेकर है कि अगर इसे उत्तर-पूर्व के किसी छोटे से हिस्से में भी लागू किया जाता है, तो यह पूरे क्षेत्र को प्रभावित करेगा क्योंकि यहां पर सीमाएं काफी खुली हुई हैं।”

नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ उत्तर-पूर्व में भड़क रहे गुस्से के प्रदर्शन को तमाम विरोध प्रदर्शनों के ज़रिये पूरे उत्तर-पूर्व में प्रकट होना तब तक जारी रहेगा जब तक कि समय-समय पर उठने वाले पहचान का मूलभूत सवाल और आत्मनिर्णय के अधिकार को हल करने की ओर क़दम नहीं बढ़ाया जाता है। अनुच्छेद 370 के ज़रिये कश्मीर को प्राप्त सुरक्षा के निरस्तीकरण ने उत्तर-पूर्व में कई लोगों के लिए, उत्तर-पूर्व में आने वाले समय का संकेत दे दिया था। इस विश्वास के संकट को ख़त्म करने के लिए शायद सरकार को चाहिए कि वह कश्मीर की विशेष स्थिति प्रदान करने पर पुनर्विचार करे। यह उपाय उत्तर-पूर्व को सरकार के इरादों के प्रति आश्वस्त कर सकता है।

अंग्रेजी में लिखा मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं।

Fear of Govt Betrayal Propels Unrest in North-east

North-east Protest
ILP
Amit Shah
Article 370
Inner-line Permit
Assam NRC

Related Stories

ग़ौरतलब: किसानों को आंदोलन और परिवर्तनकामी राजनीति दोनों को ही साधना होगा

कृषि क़ानूनों को निरस्त करने के बाद भाजपा-आरएसएस क्या सीख ले सकते हैं

जीत गया किसान, नफरत हार गई!

विचार: पूर्व के आंदोलनों से किस तरह अलग और विशिष्ट है किसान आंदोलन

बिहार: कश्मीर में प्रवासी बिहारी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ पटना सहित पूरे राज्य में मनाया गया विरोध दिवस

कश्मीर में प्रवासी मज़दूरों की हत्या के ख़िलाफ़ 20 अक्टूबर को बिहार में विरोध प्रदर्शन

कॉन्फ्लिक्ट के बीच जूझती ज़िंदगी

किसान आंदोलन ने मोदी-राज के लोकतंत्र-विरोधी चेहरे को तार-तार कर दिया है!

गृह मंत्रालय 2020 की समीक्षा: धूर्तता और सत्तावादी अहंकार की मिसाल?

किसान आंदोलन का सबक़ : लहरें नहीं मानतीं शाही हुक्मनामों को


बाकी खबरें

  • PM Ujjwala Yojana in J&K
    राजा मुज़फ़्फ़र भट
    जम्मू-कश्मीर में प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना में गड़बड़ियों की जांच क्यों नहीं कर रही सरकार ?
    21 Sep 2021
    नौकरशाह आम लोगों के मसलों का हल प्राथमिकता के साथ इसलिए नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि अनुच्छेद 370 को निरस्त किये जाने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में भ्रष्टाचार और लूट जारी है।
  • French President Emmanuel Macron (L) and US President Joe Biden
    एम. के. भद्रकुमार
    AUKUS पर हंगामा कोई शिक्षाप्रद नज़ारा नहीं है
    21 Sep 2021
    ऑस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका [AUKUS] के बीच हुए नए सुरक्षा समझौते को लेकर राजनयिक टकराव अभी शुरू होने वाला है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 26,115 नए मामले, 252 मरीज़ों की मौत
    21 Sep 2021
    देश में कोरोना संक्रमण के मामलों की संख्या बढ़कर 3 करोड़ 35 लाख 4 हज़ार 534 हो गयी है।
  • UP
    सबरंग इंडिया
    डेंगू, बारिश से हुई मौतों से बेहाल यूपी, सरकार पर तंज कसने तक सीमित विपक्ष?
    21 Sep 2021
    स्थानीय समाचारों में बताया गया है कि 100 से अधिक लोगों को डेंगू, वायरल बुखार ने काल का ग्रास बना लिया। बारिश से संबंधित घटनाओं में 24 लोगों की मौत का अनुमान है
  •  Collapses in Uttarakhand
    रश्मि सहगल
    उत्तराखंड में पुलों के ढहने के पीछे रेत माफ़िया ज़िम्मेदार
    21 Sep 2021
    जो अधिकारी ग़ैरक़ानूनी खनन के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं, उनके ख़िलाफ़ ताकतवर राजनेता मोर्चा खोल देते हैं। लेकिन स्थानीय लोग धड़ल्ले से चल रहे खनन में छुपे निजी हितों और नियमों के उल्लंघन को खुलकर सामने ला…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License