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बंगाल की लड़ाई : टीएमसी-भाजपा की हाथापाई के बीच जनता के असली मुद्दों को उठाते लेफ़्ट और कांग्रेस
विधानसभा चुनावों से ठीक पहले, जैसे-जैसे राज्य की राजनीति आग उगल रही है, वामपंथी दल किसानों के समर्थन में उठे राष्ट्रव्यापी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए राज्य में नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
रबींद्र नाथ सिन्हा
06 Jan 2021
बंगाल की लड़ाई

कोलकाता: विधानसभा चुनाव में अभी चार महीने बाकी हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) सुप्रीमो और राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच ऊंचे शोर वाली तू-तू मैं-मैं होने लगी है।

हालांकि टीएमसी सत्ता में रहने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने को तैयार बैठी है, और दूसरी तरफ भाजपा पहली बार राज्य की सत्ता हथियाने के लिए मिशन 2021 चला रही है। अब तक जो बात सामने आई है, उससे तो यही लगता है कि दोनों पक्ष अपनी बैठकों/सभाओं में या उसके बाद बेकार के मुद्दों पर शाब्दिक युद्ध लड़ते  नज़र आते हैं।

दूसरी तरफ इसके अलग, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), जो वाम मोर्चे का नेतृत्व करती है, वह किसानों के राष्ट्रव्यापी आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए नए कृषि-कानूनों के खिलाफ चुपचाप कई विरोध प्रदर्शनों का आयोजन कर रही है। वाम मोर्चे के अन्य घटक और कांग्रेस जहां भी संभव है वे माकपा के जुलूस में शामिल हो जाते हैं, ये वे सब संबंधित पार्टी के बैनर तले किए जाने वाले आंदोलन कार्यक्रमों को चलाने के अलावा कर रहे है।

माकपा द्वारा चलाया जा रहा कृषि-विरोधी कानून आंदोलन ममता बनर्जी सरकार की उस अनिच्छा पर भी निशाना साधता है जिसमें वह राज्य विधानसभा में उक्त क़ानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने को तैयार नहीं है जबकि ममता सार्वजनिक रूप से ब्यान में कहती रही है कि सभी गैर-भाजपा दलों को इस मुद्दे पर एकजुट विरोध करना चाहिए। हालाँकि, उनके इशारे पर टीएमसी कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर प्रदर्शन किया है। विपक्ष ने उनसे मांग की है कि नए कृषि-क़ानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के लिए विधानसभा का संक्षिप्त सत्र बुलाया जाए जैसा कि केरल, पंजाब और राजस्थान विधानसभाओं ने किया है। आखिर में सोमवार को मुख्यमंत्री ने विपक्ष की मांग मान ली है।

यह इस बात का संकेत है कि किसानों के मुद्दों को राज्य में अधिक से अधिक सहानुभूति मिल रही है, इसका अंदाज़ा सिविल सोसाइटी के एक वर्ग द्वारा दिए गए नैतिक समर्थन से लगाया जा सकता है, जिसमें प्रसिद्ध थिएटर हस्तियां और साहित्यकार भी शामिल हैं।

उभरती राजनीतिक परिस्थिति में एक ओर नाटक 3 जनवरी को तब जुड़ गया जब ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने एक नई घोषणा की।  हैदराबाद से सांसद ओवेशी ने हुगली जिले के फुरफुरा शरीफ, जोकि लोकप्रिय मुस्लिम तीर्थस्थल है वहाँ के पीरज़ादा अब्बास सिद्दीकी से बातचीत की, और घोषणा की कि एआईएमआईएम उनके नेतृत्व में विधानसभा चुनाव लड़ेगी। दिलचस्प बात यह है कि सिद्दीकी ने इस बात का भी ऐलान किया कि उनकी पार्टी दलित संगठनों, ईसाई समूहों और धर्मनिरपेक्ष संगठनों के साथ मिलकर एक मोर्चा बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने पिरजादा तवाहा सिद्दीकी से नाता तोड़ दिया है, जो लंबे समय तक फुरफुरा शरीफ का चेहरा बने हुए थे और जो जाने-माने टीएमसी-ममता समर्थक है।

सिद्दीकी-ओवैसी की जोड़ी की यह मुहिम मुस्लिम मतों को विभाजित करने की ठोस रणनीति  का हिस्सा है- जिनकी मतदाताओं में 27-28 प्रतिशत की हिस्सेदारी है- जो अभी तक मुकम्मल तौर पर ममता को समर्थन करते थे। एक स्थानीय और बंगाली भाषी मुस्लिम धर्मगुरु के साथ ओवैसी का गठजोड़ मुस्लिम बहुल इलाकों में उनकी पहुंच बनाने में मदद करेगा, जहां हिंदी या अंग्रेजी में भाषण मददगार नहीं होंगे। 

न्यूज़क्लिक ने वाम मोर्चा और कांग्रेस के नेताओं से बात की ताकि उनसे इस स्थिति का आकलन लिया जा सकें और इसके मद्देनजर वे अपने सामने क्या चुनौतियाँ पाते हैं। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्य सचिव स्वपन बनर्जी, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) के राज्य सचिव मनोज भट्टाचार्य और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सदस्य प्रदीप भट्टाचार्य ने इस तरह के गैर-मुद्दों जैसे जाति, उप-जाति, धर्म, संप्रदाय, विश्व भारती में भूखंड का आकार क्या है जहां नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन का निवास है के बारे में  टीएमसी-बीजेपी में तू-तू मैं-मैं चल रही हैं, जिसकी भाषा अक्सर निंदनीय है और राज्य की राजनीति के लिए अफसोस की बात है। ममता भी अव्यवहारिक कार्यक्रमों की घोषणा कर रही हैं, जैसे कि ‘सरकार आपके दरवाजे पर’ और ‘पड़ोस में सरकार’, उन्होंने आगे बताया कि ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब वह “लोगों के लाभ के लिए” एक या दो नई योजना की घोषणा नहीं करती है। 

बीजेपी मुख्यत: टीएमसी से निकले दल-बदलूओं पर निर्भर है। वह काफी हताश ढंग से रवींद्रनाथ टैगोर को अपना बताकर बंगाल से नाता स्थापित करने की सख्त कोशिश कर रही है। इस प्रक्रिया में, वह कई बार बड़ी बेवकूफी कर बैठती है, और ऐसा कर वह ममता को भाजपा के पदाधिकारियों को अपनी बहुचर्चित शैली में बाहरी कहकर पीटने का अवसर दे देती है। 

न तो ममता और न ही भाजपा नेता- जिसमें अमित शाह और जेपी नड्डा भी शामिल हैं--- उन मुद्दों पर कुछ बोल रहे हैं जो लोगों की आजीविका से जुड़े हैं, जैसे कि महामारी के दौरान नौकरी का नुकसान, रोजगार के नए अवसरों की कमी, मुद्रास्फीति, विशाल हिस्सों में विकास की कमी, राज्य में गरीबों और दलितों की दशा, फिर किसानों को आवश्यक जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनी उपज को सस्ते में बेचने पर मजबूर होना पड़ता है। सीपीआई के स्वपन बनर्जी ने बताया कि उन्हें रिपोर्ट मिली है कि किसान 1,100-1,200 रुपये प्रति क्विंटल पर धान बेच रहे हैं, जबकि न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,868 रुपये प्रति क्विंटल है (प्रोत्साहन राशि सिर्फ 20 रुपये है अगर धान को केंद्रीय खरीद सेंटर में लाया जाता है)। इस तरह से सस्ता धान बेचना मुख्य रूप से सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीद में देरी के कारण है।

माकपा नेता और राज्यसभा सदस्य बिकाश रंजन भट्टाचार्य का मानना है कि टीएमसी और भाजपा के बीच रस्साकशी को देखते हुए दोनों में कोई फर्क नज़र नहीं आता है। उन्होंने कहा कि दोनों प्रतिक्रियावादी दल हैं- भाजपा जहरीली है और टीएमसी, शायद, थोड़ा विनम्रता से जहर उगलती है। भट्टाचार्य ने दावा किया कि दलबदल दोनों के लिए किसी खेल का नाम है और दोनों ने इसे खेलने के लिए बेतहाशा धन का इंतजाम किया है, जिसका दुरुपयोग अपने राजनैतिक प्रतिदविंदी को खत्म करने के लिए करते हैं।

“राज्य में, सत्ता-विरोधी भावना धीरे-धीरे दिखाई दे रही है और लोगों ने वाम की तरफ झुकाव दिखाना शुरू कर दिया है। माकपा नेता ने न्यूजक्लिक को बताया कि टीएमसी और बीजेपी दोनों यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं कि वामपंथी झुकाव साफ नज़र न आने लगे और वह चुनाव परिणाम को प्रभावित न कर दे। यह पूछे जाने पर कि उनके विचार में सबसे खराब स्थिति क्या हो सकती है, भट्टाचार्य ने चुटकी लेते हुए कहा कि "एक त्रिशंकु विधानसभा"।

वक़्त की जरूरत है कि प्रचार की दिशा को जन-केंद्रित मुद्दों में बदला जाए, जो एक कठिन काम है, लेकिन इसे लाना होगा और ऐसा कांग्रेस, सीपीआई और आरएसपी नेताओं ने न्यूज़क्लिक से बात करते हुए कहा जो टीएमसी-भाजपा द्वारा राजनीतिक माहौल को खराब करने की तरफ इशारा कर रहे थे। यह सब देखते हुए उनका ज़ोर उन मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन, रैली और सम्मेलन के माध्यम से जन-संपर्क कार्यक्रम का है जो मुद्दे आम जनता को सबसे ज्यादा सताते हैं। खोई जमीन वापस पाने के लिए, लेफ्ट-कांग्रेस के संयुक्त मंच को मतदाताओं को विश्वास दिलाना होगा कि वे यहाँ काम करने के लिए है और वे एक विश्वसनीय विकल्प भी हैं। 

वाम मोर्चा के अध्यक्ष बिमान बोस ने बताया कि फरवरी के अंत या मार्च की शुरुआत में ब्रिगेड परेड ग्राउंड में एक विशाल रैली का आयोजान किया जाएगा। तब तक, सीट साझा करने पर बात को आगे बढ़ाया जाएगा और संयुक्त मंच से सभी साथी निर्वाचन क्षेत्रों में चुनावी प्रचार करेंगे। उन्होंने कहा कि गठबंधन के भीतर सीटों के आवंटन को लेकर कोई अड़चन नहीं है। बोस ने आशा व्यक्त की कि ब्रिगेड परेड ग्राउंड की रैली- जो एक ऐसा स्थान है जहां की सभा को पश्चिम बंगाल के राजनीतिक दल हमेशा एक बड़ी घटना मानते है- वहां संयुक्त मंच से राज्य के समावेशी विकास के बारे में विचार रखा जाएगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि कांग्रेस के साथ सीट-साझा करने पर बातचीत एक या दो दिनों में शुरू हो जाएगी।

ब्रिगेड से पहले, संयुक्त मंच के दल 23 जनवरी को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125 वीं जयंती के अवसर पर एक जुलूस निकालेंगे। टीएमसी भी इस कार्यक्रम में भाग लेगी। पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को कार्यक्रम के संचालन और इसके कार्यान्वयन की देखरेख के लिए बनाई गई समिति का सदस्य बनाया गया हैं। फॉरवर्ड ब्लॉक (FB) के राज्य सचिव, नरेन चटर्जी, जो जाहिर तौर पर हर साल 23 जनवरी के कार्यक्रम में मुख्य भूमिका निभाते हैं, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि भाजपा को इस कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया है। 

हालांकि, वाम मोर्चा और कांग्रेस दोनों नेताओं ने माना कि सीट बंटवारा एक मुश्किल काम है और वाम मोर्चे में कलह को सुलटाना होगा। फारवर्ड ब्लॉक को कांग्रेस विरोधी रुख के लिए जाना जाता है, क्योंकि वे "ऐतिहासिक कारणों” ऐसा करते हैं"। आरएसपी में भी कांग्रेस के साथ जाने को लेकर थोड़ा अटकाव है; लेकिन वह इस बात से सहमत है कि जमीनी वास्तविकताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सीपीआई (एम) और सीपीआई के सूत्रों को उम्मीद है कि एफबी लाइन पर आ जाएगी। 

इस दौरान, भाजपा के प्रवक्ता शामिक भट्टाचार्य ने न्यूज़क्लिक को बताया कि पार्टी के अभियान की धार राज्य में लोकतंत्र की बहाली की होगी। उन्होंने कहा कि ममता-शासन में, सभी लोकतांत्रिक मानदंडों का उल्लंघन किया गया है, विपक्षी दलों को काम करने से रोका गया है, और विधानसभा में चर्चाओं को गंभीरता से रोका गया है, मुख्यमंत्री ने विभागों के कामकाज पर चर्चा करने की अनुमति नहीं दी है। “भ्रष्टाचार बहुत बड़ा मुद्दा है और यहां तक कि टीएमसी कार्यकर्ताओं ने ‘अम्फान’ तूफान की राहत-राशि को भी द्वारा नहीं छोड़ा है। भट्टाचार्य ने आगे कहा कि निर्माण सामग्री में काम करने वाले सिंडिकेट्स के बारे में जितना कम कहा जाए उतना बेहतर है।

(रबींद्र नाथ सिन्हा कोलकाता, पश्चिम बंगाल से एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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