NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अर्थव्यवस्था
गंभीर किस्म की समस्याओं से भरी है यूनिवर्सल बेसिक इनकम योजना
आय समर्थन कार्यक्रम के जरिये राज्य को गरीबों से पिंड छुड़ाने जैसी हरकत नहीं करनी चाहिए, क्योंकि एक निश्चित धनराशि सौंपने के बाद वक्त के साथ इसका वास्तविक मूल्य भी घट जाएगा।
प्रभात पटनायक
03 Feb 2019
Translated by महेश कुमार
सांकेतिक तस्वीर
Image Coutesy: Wikimedia Commons

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा हाल ही में रायपुर में की गई घोषणा जिसके अनुसार उनकी पार्टी ने गरीबों के लिए एक सुनिश्चित आय गारंटी योजना शुरू करने के लिए एक "ऐतिहासिक निर्णय" लिया है, और नरेंद्र मोदी सरकार ने भी अपने आखिरी बजट में कुछ ऐसी ही आय सहायता योजना की घोषणा कम से कम, "किसानों" के लिए की है। भारत की विशाल आबादी के सामने एक बार फिर "सार्वभौमिक बुनियादी आय" (यूनिवर्सल बेसिक इनकम ) का विचार एक बार फिर हवा में झूम रहा है। यह विचार दो साल पहले भारत सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में आया था, हालांकि यह केवल चर्चा के लिए था, न कि वह सरकार के विचारों का प्रतिनिधित्व करता था, बल्कि यह उस समय के मुख्य आर्थिक सलाहकार के विचार थे, जो विश्व बैंक द्वारा सुझायी गयी पुरानी दवा को ही पेश कर रहे थे।

हालांकि यह पहली नजर में एक स्वागतयोग्य कदम भी हो सकता है, लेकिन इससे इंकार नही किया जा सकता कि यह गंभीर समस्याओं से भरा हुआ है। सबसे पहले यह पूछने वाला सवाल है कि क्या यह आय योजना, सब्सिडी और कल्याणकारी योजनाओं के अलावा दी जाएगी और क्या इसे मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं पर किए जा रहे व्यय की जगह दिया जाएगा।

फिर, इस संबंध में आए अधिकांश सुझाव मौजूदा योजनाओं की जगह आय योजना को लाने की कल्पना करते हैं, यदि मौजूदा योजनाओं जो कि स्पष्ट रूप से, पहली नजर में आय गारंटी के रूप में प्रकट होती हैं, तो वास्तविकता में वह पर्याप्त नहीं होगा। तब भी जब इसकी गणना न केवल मौजूदा कीमतों और सब्सिडी मूल्य के आधार पर की जाएगी बल्कि एक आय समर्थन के रूप में वह अपर्याप्त तब भी होगी जब ऐसी सब्सिडी को वापस ले लिया जाएगा, फिर भले ही यह गणना सब्सिडी के मूल्य की वापसी के प्रभाव को शामिल करती हो, लेकिन माल और सेवाओं की गारंटीयुक्त वितरण की अनुपस्थिति में फिर भी वह अपर्याप्त होगी।

उदाहरण के लिए, आय सहायता की राशि की गणना इस धारणा पर की जा सकती है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को वापस ले लिया जाएगा, और सभी खाद्यान्न खुले बाजार के मूल्य पर खरीदना होगा; लेकिन इस आधार पर की गई गणना भी आय समर्थन योजना द्वारा दी गई राशि पर्याप्त नहीं होगी यदि खाद्यान्न को वास्तव में लोगों तक नहीं पहुंचाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो, पीडीएस के जरिये कुछ को सब्सिडी वाला खाद्यान्न नहीं मिलता है; लेकिन इसके जरिये यह भी सुनिश्चित होता है कि वास्तव में खाद्यान्न काफी सारे लोगों तक पहुंचाया जाता है। पीडीएस योजना को वापस लेने से लोगों को तय खाद्य सामग्री भी नहीं मिल पाएगी, और प्रति आय नकद सहायता उन्हें पर्याप्त खाद्यान्न उप्लब्ध नहीं करवा पाएगी।

आम तौर पर भी, यह प्रस्ताव कि नकद समर्थन योजना प्रावधान में वस्तु वितरण की जगह ले सकता है, उदाहरण के लिए, माता-पिता द्वारा बच्चे के मिड-डे मील के खर्च को वहन करने के लिए भुगतान, पर्याप्त रूप से मिड-डे मील योजना की जगह ले सकता है,जो कि गलत है। मध्याह्न भोजन योजना कई उद्देश्यों को पूरा करती है, न केवल भूख को संतुष्ट करती है बल्कि उचित पोषण भी सुनिश्चित करती है, और बच्चों के बीच सामाजिक विभाजन पर काबू पाने का भी एक माध्यम बनती है। यदि माता-पिता को अपने बच्चों के भोजन का खर्च उठाने के लिए नकद राशि दी जाती है, तो इससे कई उद्देश्य पूरे नहीं हो सकते हैं। इसलिए, यदि नकद आय सहायता योजना मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के बदले में है, और वित्तीय कारणों से ऐसा होने का एक बड़ा खतरा मौजूद है, तो यह पूरी तरह से अवांछनीय होगा। नकद आय समर्थन, कार्यक्रम को अगर सार्थक बनाना है, तो इसे मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के अतिरिक्त होना होगा; और इन योजनाओं को भी ऐसे समर्थन के साथ बढ़ते रहना होगा।

इसी तरह, "किसानों" के लिए आय समर्थन अक्सर फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य के प्रावधान के विकल्प के रूप में देखा जाता रहा है। यह वास्तव में "किसानों" के समर्थन की पेशकश के लिए नहीं है, बल्कि समर्थन को समेटने वाला तरीका है: इसका मतलब है कि सरकार केवल "किसानों" को एक निश्चित धनराशि देकर अपने हाथ झाड़ लेती है और उन्हें बाजार के मूल्य में उतार-चढ़ाव की दया पर छोड़ देती है।

अक्सर "योग्यता" और "गैर-योग्यता" वाली सब्सिडी के बीच अंतर किया जाता है, और यह सुझाव दिया जाता है कि "गैर-योग्यता" सब्सिडी में कटौती करके आय सहायता योजना को वित्तपोषित किया जाना चाहिए। लेकिन कई लोगों ने अनुमान लगाया है कि तथाकथित "गैर-मेरिट सब्सिडी" पहले से ही इतनी कम कर दी गई है कि उनमें किसी भी तरह की कटौती से शायद ही कोई फंड पैदा होगा, जो कि निश्चित रूप से एक आय सहायता योजना के लिए पर्याप्त नहीं होगा। अधिक महत्वपूर्ण बात, हालांकि यह है कि योग्यता और गैर-योग्यता सब्सिडी के बीच भी यह अंतर अपने आप में समस्याग्रस्त है।

आइए उदाहरण के लिए, एक बार उल्लेखित गैर-योग्यता सब्सिडी, अर्थात् उर्वरक सब्सिडी पर नज़र डालें। यदि उर्वरक सब्सिडी के घटने से किसान की उत्पादन लागत में वृद्धि होती है और इसलिए यदि खरीद मूल्य में वृद्धि की आवश्यकता होती है, और यदि यह पीडीएस के मूल्य से जुड़ा है, तो यह कटौती, हालांकि केवल गैर-योग्यता वाली सब्सिडी को प्रभावित करने वाली मानी जाती है, लेकिन असल मैं यह गरीबों को चोट पहुँचाएगी। दूसरी तरफ, यदि निर्गम मूल्य को नहीं बढ़ाया जाता है और इसके बजाय खाद्य सब्सिडी बढ़ाई जाती है, तो एक सब्सिडी में कटौती से दूसरे में वृद्धि होगी। इसलिए, योग्यता और गैर-योग्यता सब्सिडी के बीच अंतर करना और यह मानना कि गैर-योग्यता सब्सिडी को रोका जा सकता है, यह पहली ही नजर में उतना ही मान्य नहीं है।

यदि मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं और गरीबों को लाभ पहुंचाने वाली सब्सिडी में कटौती किए बिना यह  आय समर्थन दिया जाना है, तो अतिरिक्त करों को बढ़ाना होगा (जब तक कि सरकार अपने कुछ गैर-कल्याणकारी व्यय में कटौती को लागू करने के लिए तैयार नहीं होती है, जैसे कि रक्षा क्षेत्र)। और अगर इन करों का इस्तेमाल केवल गरीबों से वह सब छीनना नहीं है जो उन्हें आय समर्थन के रूप में दिया जाता है, तो उन्हें अप्रत्यक्ष करों जो आम तौर पर गरीबों पर मार मारते हैं के बजाय प्रत्यक्ष करों (जैसे आय, पूंजीगत लाभ और धन करों) पर ज़ोर देना होगा। इन प्रत्यक्ष करों में किसी भी तरह की वृद्धि के बारे में हालांकि, बड़े पूंजीपतियों द्वारा और वैश्विक वित्त पूंजी द्वारा विरोध किया जाएगा। इसलिए, कोई भी सरकार जो इन शक्तिशाली संस्थाओं को धता बताने की इच्छा नहीं रखती है,वह गरीबों को वास्तविक आय सहायता प्रदान नही कर सकती है।

इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि "बेसिक इनकम योजना" के कुछ अति उत्साही समर्थक वित्तीय प्रेस के नव-उदारवादी समर्थकों के बीच पाए जाते हैं, जो बड़े पूंजीपतियों के हितों को अपने दिलों में रखते हैं, और जो वर्तमान में और पूर्व में विश्व बैंक के अधिकारी रहे हैं। इससे पता चलता है कि मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं के अलावा नहीं बल्कि ऐसी योजनाओं के प्रतिस्थापन के माध्यम से आय समर्थन प्रदान किए जाने की उम्मीद है। इस तरह के प्रतिस्थापन से न केवल गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य पीछे छूट जाएगा, बल्कि आबादी को आवश्यक सामान और सेवाएं प्रदान करने के कार्य से भी राज्य अपनी जिम्मेदारी के निर्वाह में पीछे हो जाएगा। (सबसे ज्यादा इसका मतलब होगा गरीबों की मदद अमीरों की कीमत पर नहीं, बल्कि थोड़े कम गरीबों की कीमत पर)।

इसलिए आय समर्थन, जैसी दिखाई देती है वह वास्तव में उसके विपरीत नव-उदारवाद की दिशा में जाने वाली योजना है, जिसके तहत राज्य गरीबों को एक निश्चित धनराशि सौंप कर अपने हाथ धो लेगा और बाद में उन्हें बाज़ार के हवाले कर दिया जाएगा,और फिर वक़्त के साथ जिसका वास्तविक मूल्य भी घट जाएगा।

आय समर्थन के लिए सैद्धांतिक तर्क आमतौर पर इस बात की तस्दीक़ करता है कि सभी के लिए रोजगार का प्रावधान वर्तमान परिदृश्य में संभव नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है, यह एक नव-उदारवादी पूंजीवाद का सच है, हालांकि इसे उत्पादन की पद्धति के बावजूद सार्वभौमिक वैधता के रुप में माना जाता है। लेकिन आइए फिलहाल हम इस प्रस्ताव को सच मानें। ऐसे मामले में, राज्य को मज़दूरी से आय के एवज में श्रमिकों को एक उस समान आय का भुगतान करना चाहिए जिसे वे रोजगार में रहते हुए कमा सकते थे; इसके अलावा, हालांकि, चूंकि रोजगार का अधिकार केवल आर्थिक अधिकार नहीं है, इसलिए अन्य आर्थिक अधिकारों के साथ-साथ यह इसका पूरक होना चाहिए, और राज्य को उन अन्य अधिकारों को भी प्रदान करना चाहिए। दूसरे शब्दों में कहे तो आय समर्थन, मुफ्त, गुणवत्ता वाली सार्वभौमिक सार्वजनिक शिक्षा; राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा के माध्यम से मुफ्त, गुणवत्ता वाली सार्वभौमिक सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा; एक सार्वभौमिक पीडीएस के माध्यम से सब्सिडी वाला भोजन; पर्याप्त वृद्धावस्था पेंशन और विकलांगता लाभ; और इसी तरह के प्रावधान के साथ मिलकर चलनी चाहिए।

इसे अलग तरीके से रखना होगा, अगर नागरिकों को सार्वभौमिक आर्थिक अधिकारों के समूह में शामिल करना है तो, और यदि गरीबी उन्मूलन को राज्य द्वारा दानशीलता के सांचे में नही रखना है, तो आय समर्थन केवल रोजगार के अधिकार को साकार करने का एक साधन हो सकता है, जो अन्यथा माना जाता है जिसे हासिल करना असंभव है। लेकिन यह अन्य अधिकारों की गारंटी देने की आवश्यकता को नकारता नहीं है, जैसे कि मुफ्त शिक्षा का अधिकार और मुफ्त स्वास्थ्य सेवा आदि का अधिकार। आय समर्थन इन अन्य अधिकारों का विकल्प नहीं हो सकता है। इसे इन अन्य अधिकारों के साथ जोड़ना होगा।

ubi
universal basic income
Rahul Gandhi
Narendra modi
WORKERS CLASS
farmers

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

ED के निशाने पर सोनिया-राहुल, राज्यसभा चुनावों से ऐन पहले क्यों!

ईडी ने कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी को धन शोधन के मामले में तलब किया

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • Hijab
    अजय कुमार
    आधुनिकता का मतलब यह नहीं कि हिजाब पहनने या ना पहनने को लेकर नियम बनाया जाए!
    14 Feb 2022
    हिजाब पहनना ग़लत है, ऐसे कहने वालों को आधुनिकता का पाठ फिर से पढ़ना चाहिए। 
  • textile industry
    एम.ओबैद
    यूपी चुनावः "कानपुर की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री पर सरकार की ग़लत नीतियों की काफ़ी ज़्यादा मार पड़ी"
    14 Feb 2022
    "यहां की टेक्स्टाइल इंडस्ट्री पर सरकार की ग़लत नीतियों की काफ़ी ज़्यादा मार पड़ी है। जमीनी हकीकत ये है कि पिछले दो साल में कोरोना लॉकडाउन ने लोगों को काफ़ी परेशान किया है।"
  • election
    ओंकार पुजारी
    2022 में महिला मतदाताओं के पास है सत्ता की चाबी
    14 Feb 2022
    जहां महिला मतदाता और उनके मुद्दे इन चुनावों में एक अहम भूमिका निभा रहे हैं, वहीं नतीजे घोषित होने के बाद यह देखना अभी बाक़ी है कि राजनीतिक दलों की ओर से किये जा रहे इन वादों को सही मायने में ज़मीन पर…
  • election
    सत्यम श्रीवास्तव
    क्या हैं उत्तराखंड के असली मुद्दे? क्या इस बार बदलेगी उत्तराखंड की राजनीति?
    14 Feb 2022
    आम मतदाता अब अपने लिए विधायक या सांसद चुनने की बजाय राज्य के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के लिए मतदान करने लगा है। यही वजह है कि राज्य विशेष के अपने स्थानीय मुद्दे, मुख्य धारा और सरोकारों से दूर होते…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 34,113 नए मामले, 346 मरीज़ों की मौत
    14 Feb 2022
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 1.12 फ़ीसदी यानी 4 लाख 78 हज़ार 882 हो गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License