NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
गुजरात दंगों की विरासत और उन्मादी भीड़ की हिंसा के 17 साल
3000 से ज़्यादा परिवार आज भी पीने के पानी, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, स्वच्छता सुविधाएँ, और सड़कों जैसी बुनियादी सुविधाओं के अभाव में पूरे गुजरात की 83 राहत कॉलोनियों में रहते हैं।
दमयन्ती धर
02 Mar 2019
Gujarat riots

"भीड़ , भीड़ , भीड़  ... भीड़ है समाज, समाज है भीड़ , भीड़ है व्यक्ति, व्यक्ति है भीड़... हमारे देश में भीड़ की संस्कृति बढ़ रही है... ।"

गुजरात दंगों के 17 साल पूरे होने पर नेशनल पीस ग्रुप द्वारा नुक्कड़ नाटक की तर्ज पर एक कार्यक्रम शुरू किया गया। इस नाटक ने शहर में हुई उन घटनाओं की यादों को ताज़ा कर दिया जिसका ये शहर साक्षी है।

नेशनल पीस ग्रुप के एक्टिविस्ट और एक्टर हुज़ेफ़ा ने कार्यक्रम समाप्त होने पर कहा, “उन्मादी भीड़ हमें परेशान करने फिर से आ गई है। इस बार उन्होंने अख़़लाक़़ और 16 वर्षीय जुनैद (दोनों भीड़ के शिकार हुए) को मार दिया है।”

गुजरात में 2002 के दंगे के दौरान अहमदाबाद के गुलबर्ग सोसायटी में उन्मादी भीड़ की हिंसा के शिकार हुए कांग्रेस सांसद एहसान जाफ़री की बेटी निशरीन जाफ़री कहती हैं, “भीड से मेरा पुराना नाता है। वर्ष 1969 में मैं मुश्किल से 4 साल की थी और मेरे पिता तब 35 वर्ष के थे, उन्मादी भीड़ से ख़ुद को बचाने के लिए रेलवे ट्रैक से गुज़रने की घटना को याद करती हूँ। 1969 के दंगों के बाद जब तक मेरे पिता ने उसी स्थान पर अपना घर नहीं बनाया जहाँ सबकुछ खो दिया था और अपनी ज़िंदगी को फिर से बेहतर नहीं किया तब तक मेरा परिवार एक शरणार्थी शिविर में ही रहता था। उन्हें लोकतंत्र में और हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने में बहुत ज़्यादा विश्वास था।” कांग्रेस के दिवंगत सांसद एहसान जाफ़री की बेटी निशरीन जाफ़री ने कहा, जो गुजरात के 2002 के दंगों में गुलबर्ग समाज, अहमदाबाद में भीड़ हिंसा प्रकरणों में से एक में मारे गए थे।

निशरीन ने कहा, “मेरे पास बताने के लिए बहुत सी कहानियाँ हैं। वो बच्चे जिनके, मेरी दोस्त, मेरे पड़ोसी जिनके साथ मैं बड़ी हुई वे सभी 2002 में उन्मादी भीड़ के शिकार हुए और अपना सबकुछ खो दिया। यह हमारा घर है जहाँ ऐसी महिलाएँ हैं जिनके पति को मार दिया गया और ये महिलाएं अपने बच्चे जिनके पिता को मार दिया गया था जिसके वो आज भी साक्षी हैं। एक महिला रूपाबेन हैं जिन्होंने अपने बेटे को खो दिया है और 17 साल से उसकी तलाश कर रही हैं।”

इस मामले से जुड़े एक वकील शमशाद पठान ने न्यूज़क्लिक से कहा, “17 साल में कुछ पीड़ितों ने न्याय की उम्मीद में दम तोड़ दिया। इस दंगे के बाद 2,000 से अधिक मामले दर्ज किए गए थे। शुरुआती वर्षों में गुजरात सरकार ने पहले देरी की और फिर ए, बी, सी समरी के माध्यम से कई मामलों को बंद कर दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के बाद इन मामलों को फिर से खोल दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने उन मामलों में से 9 बड़े मामलों की पहचान की। इनमें नरोदा पाटिया, नरोदा गाम, गुलबर्ग सोसाइटी, गोधरा, सरदारपुरा आदि मामले शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार इनमें से प्रत्येक मामले के लिए एसआईटी का गठन किया गया था। एसआईटी ने जांच के बाद आरोपियों की सूची में नए नाम जोड़े। कई वर्षों के बाद कुछ मामलों में फ़ैसला दिया गया। लेकिन यह न्याय पीड़ितों के साथ-साथ उन वकीलों के लिए भी अधूरा रहा जो क़ानूनी न्याय के लिए लड़ रहे थे। इन दंगों को रचने की बड़ी साज़िश करने वाले लोग सरकारी तंत्र से जुड़े थे। गुजरात सरकार के मंत्रियों और पुलिस अधिकारियों को उनके कामों के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया। उनकी कभी जांच नहीं हुई।"

पुनर्वास कॉलोनियों की ज़िंदगी

इन दंगों के बाद राज्य भर में राहत शिविर स्थापित किए गए। कई शिविर जो अस्थायी राहत कालोनियों के रूप में थे वे समय गुज़रने के साथ स्थायी बस्ती बन गए जहाँ दंगा पीड़ितों को अपना घर 12x20 फ़ीट के कमरे की तरह बनाने के लिए मजबूर किया गया। 
वर्तमान में गुजरात भर में 83 ऐसी राहत कॉलोनियों में 3000 से अधिक परिवार रहते हैं। अहमदाबाद में 15, आनंद में 17, साबरकांठा में 13, पंचमहल में 11, मेहसाना में 8, अरावली में 5 और भरूच और खेड़ा ज़िलों में 4-4 कॉलोनियाँ हैं। ज़्यादातर कॉलोनियाँ जमीयत उलेमा-ए-हिंद, गुजरात सार्वजनिक राहत समिति, इस्लामिक रिलीफ़ कमेटी और संयुक्त आर्थिक मंच के अलावा कुछ छोटे ट्रस्टों और गैर सरकारी संगठनों द्वारा बनाई गई हैं।

गुजरात सरकार द्वारा किए गए विकास के वादे में इनमें से ज़्यादातर बस्तियां शामिल नहीं हैं जहाँ पीने के पानी, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, स्वच्छता सुविधाएं, और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। हिम्मतनगर तालुका, साबरकांठा जैसी राहत कॉलोनियों के मामलों में सरकार की उदासीनता स्पष्ट है। यहाँ के लोगों को कॉलोनी ख़ाली करने के ख़तरों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि गुज़रते वर्षों में ज़मीन क़ीमती हो गई है।

gujrat.PNG

ऐसी ही एक अन्य कॉलोनी है आनंद ज़िले के पिपली गांव में मुर्तज़़ानगर। इस टिन की छत वाली कॉलोनी में 19 घर हैं जो बुरी तरह से निर्मित हैं जिसमें दरारें पड़ गई हैं और यहाँ पर्याप्त रोशनी या सड़कों कमी है। इस कॉलोनी में 24 परिवार रहते हैं जो पहले आनंद के विभिन्न गांवों के भूमिहीन किसान या मज़दूर थे और अब मज़दूरी करके अपना रोज़ का ख़र्च पूरा कर रहे हैं।

दंगा पीड़ितों के लिए काम करने वाले एक एनजीओ जनविकास द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों के अनुसार 59 कॉलोनियों में पर्याप्त आंतरिक सड़कें नहीं हैं, 53 कॉलोनियों में जाने के लायक सड़कें नहीं हैं, 68 कॉलोनियों में सीवेज सिस्टम नहीं है, 18 में स्ट्रीट लाइट्स की कमी है और 62 कॉलोनियों में लोगों को 17 साल गुज़ारने के बावजूद स्वामित्व अधिकार नहीं है।

महिलाएं- इस हिंसा से सबसे ज़्यादा पीड़ित

2002 के दंगों की पीड़ित महिलाओं के लिए काम करने वाले एक स्वयंसेवक और एक्टिविस्ट नूरजहां देवान ने न्यूज़़क्लिक से कहा, “जब भी कोई समुदाय दूसरे समुदाय के ख़िलाफ़ बदला लेना चाहता है तो समुदाय की महिलाएं पीड़ित बन जाती हैं क्योंकि वे सबसे आसान निशाना होती हैं। बलात्कार किसी महिला के परिवार और समुदाय के पुरुषों को अपमानित करने का एक साधन बन जाता है।"

अहमदाबाद के सिटिज़न फ़ोरम द्वारा स्पॉन्सर्ड छ: सदस्यीय फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम ने पाया था कि इन दंगों के दौरान महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराध को काफ़ी कम संख्या में रिपोर्ट किया गया था।

सिटिज़न फ़ोरम से जुड़ी एक एक्टिविस्ट ज़किया सोमन ने कहा, "मुझे याद है कि हमने पूरे गुजरात में कम से कम 200 या 250 बलात्कार के मामले दर्ज किए थे। ज़्यादातर मामलों में बलात्कार के बाद पीड़ितों को मार दिया गया था। हालांकि ऐसे मामलों में जहाँ पीड़िता जीवित थी, पुलिस को बहुत कम रिपोर्ट किया गया। पीड़ितों को इतनी तकलीफ़ दी गई कि उन्होंने और उनके परिवारों ने इसके बारे में कभी भी बात करना नहीं चाहा।”

नूरजहां ने आगे कहा, “हमने जिन महिलाओं की काउंसलिंग की वे इतनी परेशान थीं कि वे रातों में सो नहीं पा रही थीं। ऐसी महिलाएँ, जिनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, जिन्होंने अपने संबंधियों की हत्या को देखा, वे हमेशा परेशान रहीं और उन्हें नींद की परेशानी होती रही।”

नूरजहां ने कहा, “दंगों के बाद पीड़ितों ने अपनी ज़िंदगी को फिर से बेहतर बनाने की कोशिश शुरू की तो उन्हें मुस्लिम होने के चलते आसानी से नौकरी नहीं मिलती थी। सुरक्षा को लेकर परिवार अपनी लड़कियों को स्कूल भेजने में संकोच कर रहे थे।”

Gulbarg society massacre
zakia jafri
Gujarat Riots
BJP
BJP Govt
Narendra modi
2002 Gujrat riots
Communal Riots in Gujarat
Female Victims of Gujarat Riots

Related Stories

भाजपा के इस्लामोफ़ोबिया ने भारत को कहां पहुंचा दिया?

कश्मीर में हिंसा का दौर: कुछ ज़रूरी सवाल

सम्राट पृथ्वीराज: संघ द्वारा इतिहास के साथ खिलवाड़ की एक और कोशिश

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

धारा 370 को हटाना : केंद्र की रणनीति हर बार उल्टी पड़ती रहती है

मोहन भागवत का बयान, कश्मीर में जारी हमले और आर्यन खान को क्लीनचिट

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति


बाकी खबरें

  • indian economy
    अजय कुमार
    क्या 2014 के बाद चंद लोगों के इशारे पर नाचने लगी है भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति?
    18 Nov 2021
    क्या आपको नहीं लगता कि चंद लोगों के पास मौजूद बेतहाशा पैसे की वजह से भारत की पूरी राजनीति चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बन चुकी है।
  • daily
    न्यूज़क्लिक टीम
    निर्माण कार्य बंद होने पर मज़दूरों ने की मुआवज़े की मांग, श्रीनगर एनकाउंटर और अन्य ख़बरें
    17 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक के डेली राउंडअप में आज हमारी मज़ार रहेगी निर्माण कार्य बंद होने पर मज़दूर संकट में, श्रीनगर एनकाउंटर और अन्य ख़बरों पर।
  •  कॉप-26 के इरादे अच्छे, पर गरीब देशों की आर्थिक मदद पर कुछ नहीं
    न्यूज़क्लिक टीम
    कॉप-26 के इरादे अच्छे, पर ग़रीब देशों की आर्थिक मदद पर कुछ नहीं
    17 Nov 2021
    न्यूज़क्लिक की इस ख़ास पेशकश में वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह और न्यूज़क्लिक के मुख्य संपादक प्रबीर पुरकायस्थ ने कॉप-26 में जलवायु परिवर्तन पर किए गए एग्रीमेंट पर चर्चा की है।
  • congress
    सुहित के सेन
    राहुल जहां हिंदुत्व को धर-दबोचने में सफल, लेकिन कांग्रेस सांगठनिक तौर पर अभी भी कमज़ोर
    17 Nov 2021
    जहाँ एक तरफ विचारधारा चुनावों में सफलता पाने के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है, वहीं इसके लिए एक सांगठनिक नींव अपनेआप में अपरिहार्य है।
  • judge
    भाषा
    लखीमपुर हिंसा: एसआईटी जांच की निगरानी पूर्व न्यायाधीश राकेश कुमार जैन करेंगे
    17 Nov 2021
    पीठ ने राज्य सरकार द्वारा दिए गए आईपीएस अधिकारियों के नामों पर भी गौर किया और जांच के लिए गठित एसआईटी में तीन आईपीएस अधिकारियों को शामिल किया।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License