NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
महिलाओं की मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए नीतिगत सुरक्षा उपायों की बढ़ती ज़रूरत
भारत में लोगों के बीच मासिक धर्म से जुड़े किसी भी तरह की चर्चा और महिलाओं पर उनके मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं के सामने नहीं आने के नुक़सानदेह असर की ओर ध्यान दिलाना बेहद ज़रूरी है।
प्रार्थना सेन
06 Oct 2021
mensturation
लाल, गुलाबी, नारंगी पृष्ठभूमि पर महिला स्वच्छता टैम्पोन का क्लोज़ अप

भारत में आम लोगों के बीच मासिक धर्म से जुड़े किसी भी तरह की चर्चा और उनके मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं के नहीं दिखने के नुक़सानदेह असर के इर्द-गिर्द की वर्जनाओं की ओर ध्यान दिलाते हुए प्रार्थना सेन अपने इस लेख में हमारे नीतिगत ढांचे में मासिक धर्म की हक़ीक़त की व्यवस्थित मान्यता और वैधता की ज़रूरत को रेखांकित करती हैं।

भारत में महिलाओं की एक बड़ी आबादी है, लेकिन बाज़ार में मासिक धर्म से जुड़े उत्पादों की जहां तक बात है,तो इसे लेकर विकल्पों की एक सीमित श्रृंखला है, यह देखते हुए कि देश के भीतर मासिक धर्म को अक्सर एक वर्जित विषय के तौर पर ग़लत तरीक़े से समझा जाता है, और यही वजह है कि इस कथित 'वर्जित' विषय से जुड़ा किसी भी तरह का कोई सार्थक सुधार एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

भारत में जहां तक मासिक धर्म से जुड़े विषय की बात है, तो विज्ञापन इस बारे में बात करने का एकमात्र ज़रिया है। एक सामाजिक वर्जना होने के चलते इस मामले में सुधार लाने की तो बात ही छोड़ ही दीजिए, सार्वजनिक मंच पर शायद ही कभी इस पर खुलकर चर्चा की जाती है।

मासिक धर्म के अधिकारों को किसी लिंग विशिष्ट के अधिकारों के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए; दरअस्ल ये बुनियादी मानवाधिकार हैं। आज़ादी के 74 साल बाद महिलाओं की मासिक धर्म से सम्बन्धित चिंताओं को संबोधित करने वाला विधेयक पहली बार संसद में महज़ तीन साल पहले पेश किया गया था। हालांकि, इसे सरकार का समर्थन नहीं हासिल हो पाया,लिहाज़ यह विधेयक वहीं ख़त्म हो गया।

भारतीय समाज के भीतर मासिक धर्म को आम धारणा बना दिया जाये,इसका प्राथमिक तरीक़ा तो सिर्फ़ क़ानूनी समर्थन ही है।

भारत के सतत विकास की राह चुनौतियों से ख़ाली नहीं है। भारत का लक्ष्य लैंगिक समानता हासिल करने और सभी महिलाओं और लड़कियों (SDG 5) को सशक्त बनाने के साथ-साथ 2030 तक शहरों और मानव बस्तियों को सुरक्षित, समावेशी और टिकाऊ (SDG 11) बनाने जैसे सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करना है। महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं को लेकर नीतिगत प्रावधान और क़ानूनी सुरक्षा उपाय इस खाई को भरने में मददगार साबित हो सकते हैं।

राष्ट्रीय मासिक धर्म स्वच्छता योजना- प्रोत्साहन की फ़ौरी ज़रूरत

भारत में इस सरकार ने महिला सशक्तिकरण के विभिन्न आयामों पर ध्यान केंद्रित किया है, ताकि इन योजनाओं के ज़रिये लैंगिक समानता हासिल की जा सके। जहां ‘बेटी बचाओ बेटी पढाओ’ (BBBP) लिंग आधारित ग़ैर-बराबरी को ख़त्म करने और लड़कियों को सशक्त बनाने पर केंद्रित योजना है,वहीं प्रधान मंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) ग़रीबी रेखा से नीचे (BPL) की श्रेणी में महिलाओं को एलपीजी सिलेंडर मुहैया कराने के प्रावधान पर केंद्रित है।

हालांकि,लोग टेलीविज़न चैनलों और अख़बारों पर सरकार प्रायोजित विज्ञापन अभियानों के ज़रिये बीबीबीपी और पीएमयूवाई योजनाओं के तहत करदाताओं के पैसे से किये जा रहे व्यापक कार्यों को लेकर जागरूक रहते हैं, लेकिन, 2014 में शुरू की गयी राष्ट्रीय मासिक धर्म स्वच्छता योजना (NMHS) को उस रूप में बहुत ज़्यादा कवरेज या प्रमुखता नहीं मिली है।

 'वृहत्तर कल्याण' का सिद्धांत

अंग्रेज़ी दार्शनिक जेरेमी बेंथम ने बहुत पहले ही इस बात की वक़ालत की थी कि हर सामाजिक, नैतिक और साथ ही सरकारी क़ानून का मक़सद 'ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ज़्यादा से ज़्यादा ख़ुशी' मुहैया करना होना चाहिए। हालांकि, भारत एक बहुजातीय समाज वाला देश है, यहां हर महिला का धर्म, सामाजिक-आर्थिक स्थिति, वैवाहिक स्थिति या जाति अलग-अलग है,लेकिन इसके बावजूद मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं से उन्हें एक ही तरह का सामना करना पड़ता है। भारत में मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं से सम्बन्धित ज़्यादा से ज़्यादा सरकारी उपायों से निश्चित रूप से बेंथमवादी सिद्धांत के मुताबिक़ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को ख़ुशी मिलेगी।

कोई भी नीति-निर्माण उन लाभार्थियों को ध्यान में रखते हुए किया जाता है,जिनके लिए नीति निर्माण किया जाता है, और इसलिए मासिक धर्म से जुड़ी योजनाओं में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया जाना चाहिए।

दुनिया के दूसरे हिस्सों में मासिक धर्म को लेकर प्रगतिशील प्रावधान

दुनिया भर में मासिक धर्म को किसी न किसी रूप में नीची नज़रों से देखा जाता है। हालांकि, दुनिया भर के कई ऐसे देश भी हैं,जो मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिहाज़ से कुछ प्रगतिशील उपाय लेकर सामने आये हैं।

मसलन, तक़रीबन एक साल पहले स्कॉटलैंड में मासिक धर्म उत्पाद (निशुक्ल प्रावधान) (स्कॉटलैंड) अधिनियम मासिक धर्म की निम्न स्थिति से निपटने के लिए पारित किया गया था। कई अमेरिकी सूबों ने ऐसे क़ानून पारित किये हैं, जो स्कूलों को अपनी छात्राओं को मासिक धर्म से जुड़े उत्पाद मुहैया कराने को अनिवार्य किये हुए है। जापान और दक्षिण कोरिया ने तक़रीबन 70 वर्षों से अपने-अपने श्रम क़ानूनों में मासिक धर्म के दौरान छुट्टियों के प्रावधान को शामिल किया हुआ है।

ख़ासकर जब मासिक धर्म क़ानून हमारे जैसे आबादी वाले लोकतंत्र में समय की ज़रूरत के तौर पर सामने आये हैं,ऐसे में इस तरह के प्रगतिशील उपाय अनुकरण करने योग्य हैं। विश्व बैंक के मुताबिक़, चीन के बाद भारत में दुनिया की दूसरी सबसे ज़्यादा महिला आबादी है। ज़ाहिर है, हमारी तक़रीबन आधी आबादी की इस साझी चिंता का निवारण देश के भीतर लैंगिक समानता हासिल करने की दिशा में एक बड़ा क़दम होगा।

उम्मीद जगाते रुझान

हालांकि, जहां तक सार्वजनिक रूप से चर्चाओं की बात है, तो मासिक धर्म से जुड़ी चिंताएं अक्सर नज़र नहीं आती हैं, मगर कुछ ऐसे उदाहरण ज़रूर हैं, जहां मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं को अहमियत दी गयी है और ये उदाहरण उम्मीद की एक हल्की किरण दिखाते हैं। मिसाल के तौर पर भारत में खाद्य वितरण सेवा की दिग्गज कंपनी जूमैटो और जानी मानी मीडिया कंपनी कल्चर मशीन जैसी कंपनियां अपनी महिला कर्मचारियों के लिए मासिक धर्म की छुट्टी की अनुमति देती हैं।

एक और प्रगतिशील क़दम,जो मील का पत्थर है, वह है- सैनिटरी नैपकिन को 2018 में वित्त मंत्रालय की ओर से 12% जीएसटी से छूट दिया जाना।

हालांकि, हमें भारत में एक "मासिक धर्म क्रांति" की ज़रूरत है; ऐसी क्रांति, जो भारत के बहुजातीय समाज के भीतर मासिक धर्म की वर्जित अवधारणा को आम अवधारणा बनाने में मदद कर सके, और निकट भविष्य में भारत की मासिक धर्म से जुड़ी चिंताओं और सुधारात्मक उपायों को आधार दे सके।

सरकार की ओर से व्यवस्थित नज़रिये की ज़रूरत

भारत में मासिक धर्म के आसपास की वर्जनाओं ने नौजवान लड़कियों को अपने पुरुष साथियों के बराबर मौक़ा हासिल किये जाने से रोका हुआ है। उदाहरण के लिए, ड्रॉपआउट(बीच में ही स्कूल छोड़ देना) दर के पीछे की एक वड़ी वजह स्वच्छ मासिक धर्म से जुड़े उत्पादों तक उनकी पहुंच में कमी है।

अर्थशास्त्री और दार्शनिक अमर्त्य सेन ने ग़रीबी को कुछ न्यूनतम क्षमताओं को हासि नहीं कर पाने के नतीजे के रूप में वर्णित किया है; इस मामले में मासिक धर्म से जुड़े उपायों की क़िल्लत को लड़कियों की शिक्षा जैसी बुनियादी न्यूनतम क्षमताओं को हासिल कर पाने की राह में बाधा के तौर पर देखा जा सकता है। इस तरह, मासिक धर्म की हक़ीक़त को हमारे क़ानूनी और प्रशासनिक ढांचे से वैधता और संरक्षण दिये जाने की ज़रूरत है।

हर साल, सैकड़ों एनजीओ और दिग्गज कॉरपोरेट अपनी सीएसआर कार्यक्रम के हिस्से के रूप में देश भर में जागरूकता अभियान चलाते हैं और ग्रामीण इलाक़ों में मासिक धर्म उत्पादों को मुफ़्त बांटते हैं। इस तरह की कोशिशों के बावजूद, मासिक धर्म की अवधारणा आम अवधारणा बन पाने से कोसों दूर है।

मासिक धर्म उत्पादों की सुरक्षित पहुंच और इस्तेमल के अनुपालन को सुनिश्चित कराने वाले सख़्त सरकारी नियम ही एक उल्लेखनीय बदलाव ला सकते हैं और इस 'अभिशाप' का मुक़ाबला कर सकते हैं।

(प्रार्थना सेन सेंट जेवियर्स कॉलेज से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं और इस समय ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के लिए बतौ रिसर्च इंटर्न कार्यरत हैं। व्यक्त विचार निजी हैं।)

साभार: द लीफ़लेट

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख को पढ़ने के लिए नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें

 https://www.newsclick.in/growing-need-policy-safeguards-address-women-menstrual-concerns

menstrual health
menstruation
SDG
beti bachao beti padhao

Related Stories

माहवारी अवकाश : वरदान या अभिशाप?


बाकी खबरें

  • Modi
    लाल बहादुर सिंह
    क्या अब देश अघोषित से घोषित आपातकाल की और बढ़ रहा है!
    29 Nov 2021
    अपने शासन के खिलाफ बढ़ते  विरोध से मोदी परेशान हैं और उन्हें लगता है कि इन आंदोलनों को संविधान प्रदत्त अधिकारों से ताकत और वैधता हासिल हो रही है। इसीलिए अब वे इन अधिकारों के खिलाफ opinion building में…
  • Mumbai Mahapanchayat
    अमेय तिरोदकर
    मुंबई महापंचायत: किसानों का लड़ाई जारी रखने का संकल्प  
    29 Nov 2021
    राकेश टिकैत ने कहा, "उन्होंने हमें जातियों और धर्मों में तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने हमें देशद्रोही तक क़रार दिया और क्या-क्या नहीं किया। लेकिन,आख़िर में उन्हें हार माननी पड़ी।"
  • loksabha
    अफ़ज़ल इमाम
    शीत सत्र: संसद में पहले की अपेक्षा ज़्यादा आक्रामक नज़र आएगा विपक्ष
    29 Nov 2021
    किसानों व कृषि से जुड़े मामलों के साथ-साथ कमरतोड़ महंगाई, बेरोजगारी, देश की बाहरी और आंतरिक सुरक्षा, पेगासस जासूसी कांड, श्रम कानून, त्रिपुरा दंगे, कश्मीर हिंसा और कोरोना जैसे मुद्दों पर भी सरकार की…
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 8,309 नए मामले, 236 मरीज़ों की मौत
    29 Nov 2021
    देश में एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.30 फ़ीसदी यानी 1 लाख 3 हज़ार 859 हो गयी है।
  • Mumbai Mahapanchayat
    न्यूज़क्लिक टीम
    मुंबई में किसानों की ऐतिहासिक जीत का डंका
    29 Nov 2021
    28 नवंबर को मुंबई के आजाद मैदान में 50,000 लोगों की विशाल राज्यव्यापी किसान-मजदूर महापंचायत का आयोजन किया गया। इस महापंचायत में पूरे महाराष्ट्र के किसान, मज़दूर, खेतिहर मज़दूर, महिलाएं, युवा और सभी…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License