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"हम मेहनतकश जब अपना हिस्सा मांगेंगे"
बैठना, पानी पीना, शौचालय जाना यह न केवल इंसानी ज़रूरत है बल्कि हम सब का बुनियादी अधिकार भी है पर एक बहुत बड़े श्रमिक वर्ग को चन्द पूजीपतियों द्वारा खुलेआम इन जरूरतों और अधिकारों से भी वंचित रखा जा रहा है।
सरोजिनी बिष्ट
01 May 2019
सांकेतिक तस्वीर
Image Courtesy: nayaindia.com

"हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा मांगेंगे
एक खेत नहीं एक देश नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे" 

फ़ैज़ साहब का यह गीत अपने रचनाकाल से ही मजदूर दिवस में गाया जाने वाला अहम गीत रहा है।  इस गीत की प्रसांगिकता हर दौर में कायम रही किन्तु आज जब हम पुनः एक ऐसे दौर में पहुँच रहे हैं जहाँ जनसंघर्षों को कुचला जा रहा हो, मजदूर किसान नौजवान छात्र लगातार अपने हक़ के लिए आंदोलनरत हों, शासकवर्ग की तानाशाही चरम पर हो तब ऐसे गीत और प्रासंगिक हो उठते हैं।  चूँकि मौका मई दिवस का है तो मजदूरों श्रमिकों व कामगारों के हक़ वजूद की बात होनी चाहिए यानी समाज के अंतिम पंक्ति में खड़े उस व्यक्ति की जिसका श्रम सबसे अधिक है फिर भी उसके हाथ खाली हैं।  
इस चर्चा में सबसे पहले जिक्र करना होगा पश्चिम बंगाल के चाय बागान श्रमिकों का जो अपनी दैनिक न्यूनतम मजदूरी की लड़ाई लड़ते लड़ते इतने हताश हो चले हैं कि उन्होंने चुनाव में अपना वोट बहिष्कार तक की बात कह डाली। राज्य सरकार से तो नाउम्मीदी जता चुके इन आंदोलनरत श्रमिकों में उम्मीद की आस तब जगी जब इनके क्षेत्र में रैली करने स्वयं प्रधानमंत्री आये।  चुनाव से पहले प्रधानमंत्री उत्तर बंगाल के दौरे पर आते हैं, यहाँ के चाय बागान श्रमिकों से यह कहकर अपना नाता जोड़ते हैं कि आप और मैं कोई अलग नहीं आप चाय उगाते हैं और मैं कभी चाय बेचा करता था इसलिए हमारा रिश्ता पुराना है,  प्रधानमन्त्री जी के इस ‘स्नेह’ भरे शब्दों ने सालों से बदहाली की मार झेल रहे चाय श्रमिकों को एक उम्मीद की किरण दिखाई कि जब  प्रधानमंत्री तक उनसे अपना नाता जोड़ रहे हैं तो उनकी आवाज़ भला कैसे नहीं सुनी जाएगी।

पर हुआ क्या?

वह आये उनसे अपना वर्षों पुराना नाता जोड़ा, भावुक हुए और भाषण देकर चले गए। 

चुनाव नजदीक आते रहे लेकिन न तो इन चाय बागान मजदूरों की माँगो पर बात हुई और न ही इनकी बदहाली के लिए चिंता दिखी।  

आखिर इन मजदूरों की माँग इतनी भर तो है न कि इन्हें सम्मानजनक दैनिक मजदूरी दी जाए जो अभी  तक 159 रुपये प्रतिदिन मात्र है वह भी लंबे संघर्ष के बाद हासिल हुई। इसके अलावा बन्द पड़े चाय बागानों को खोला जाए और जीवनयापन के संकट से जूझते श्रमिकों और उनके परिवारों को बेहतर जिंदगी मिल सके। ऐसे हालात बने कि चाय बागान बंद होने की नौबत ही न आये ताकि यहाँ के चाय श्रमिकों के  दूसरे राज्य में हो रहे पलायन को रोका जा सके। चूँकि चाय बागान भारी घाटे में चल रहे हैं इसलिए राज्य सरकार भी बहुत कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं,  ऐसा कहकर भले ही राज्य सरकार अपना पल्ला झाड़ ले पर लाखों कामगारों के सुरक्षित भविष्य की जवाबदेही किसी के हिस्से तो तय करनी होगी। ममता बनर्जी सरकार ने 2015 में चाय बागान श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी सलाहकार कमेटी गठित की थी तब से केवल और केवल बैठकों का दौर ही चल रहा है कभी बैठकों में छिटपुट निर्णय हो जाता है तो अधिकांश बैठकें निराधार ही साबित हुए। 
अब बात उस क्षेत्र के कामगारों की जो न तो किसी के चुनावी मुद्दे में शामिल हैं और न ही किसी के घोषणा पत्र में।  राजनीति स्तर पर तो छोड़िये सामाजिक स्तर पर भी शायद ही कभी इन कामगारों की सुध ली गई हो।

जब आप बड़े बड़े शोरूम दुकानें या मॉल में जाते हैं तो वहाँ बीस, पच्चीस, तीस या उससे कुछ ही अधिक साल की महिलाओं और कुछ हद तक पुरुषों को सेलर के तौर पर खड़ा देखा होगा। ये देश के उन कामगारों का वर्ग है जिन्हें अपनी ड्यूटी के दौरान बैठने तक की इजाज़त नहीं। इनके प्रति हालात इतने बदतर हैं कि शारीरिक अस्वस्थता में यदि चन्द मिनटों का इन्हें आराम चाहिए तो बाथरूम में जाकर बैठना पड़ता है। पर हक़ अधिकार तो इनके भी है जिन्हें पूँजी के बल पर छीना जा है और जब अन्याय बढ़ेगा तो स्वाभाविक है शोषित वर्ग लड़ना सीख ही जाएगा।  पिछले साल ही केरल में रिटेल सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं ने अपने हक़ में एक लंबी जंग जीती।  वर्किंग ऑवर में उन्हें बैठने की इज़ाजत नहीं थी यहाँ तक की उन्हें  शौचालय जाने तक का पर्याप्त समय नहीं दिया जाता था।  लेकिन अपने लगातार प्रयास और संघर्ष से इस क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं ने श्रम विभाग की नींद तोड़कर अपने पक्ष में नियम बदलने को मजबूर कर दिया।  नए नियम के तहत इन महिलाओं को न केवल रेस्ट रूम की सुविधा मिली बल्कि कार्य के वक्त कुछ देर का ब्रेक भी दिया जाएगा और जहाँ देर तक महिलाओं को काम करना होता है वहाँ हॉस्टल की सुविधा देनी होगी और जो मालिक इन नियमों का पालन नहीं करेगा उस पर दो हजार से लेकर एक लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकेगा। 
बैठना,  पानी पीना,  शौचालय जाना यह न केवल इंसानी जरूरत है बल्कि हम सब का बुनियादी अधिकार भी है पर एक बहुत बड़े श्रमिक वर्ग को चन्द पूजीपतियों द्वारा खुलेआम इन जरूरतों और अधिकारों से भी वंचित रखा जा रहा है। भारत श्रमिकों मजदूरों कामगारों का देश है इनकी सुध तो लेनी होगी। जब तक समाज के अंतिम पायदान में खड़ा हर व्यक्ति सशक्त संपन्न नहीं होगा तब तक महाशक्ति बनने की व्याख्या हमारी अधूरी ही होगी। 

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