NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
संस्कृति
भारत
राजनीति
हमारी मनचाही जीवनशैली में हिंदी जैसा कुछ भी नहीं
हिंदी दिवस पर हिंदी को बचाने या बढ़ावा देने की बातों की बजाय इस पर बात करनी चाहिए कि भाषाओं के संदर्भ में हिंदी का महत्व क्या है? यह कैसे हमें और हमारे समाज को रच रही है?
अजय कुमार
14 Sep 2018
hindi diwas
Image Courtesy: Hindi Firstpost

हिंदी को लेकर चिंता करना या खुशी जताना हिंदी को भी पसंद नहीं होगा। भाषाओं का अस्तित्व संस्कृतियों पर निर्भर करता है और संस्कृतियां तालाब की तरह रुकी नहीं होतीं बल्कि नदी की तरह बहती रहती हैं। इस बहाव के लिए भाषा पर चिंता या खुशी जताने की जरूरत नहीं बल्कि इसके लिए संस्कृतियों की पूरी की पूरी रूपरेखा जिम्मेदार होती है। इसलिए हिंदी दिवस पर हिंदी को बचाने या बढ़ावा देने की बातों की बजाय इस पर बात करनी चाहिए कि भाषाओँ के संदर्भ में हिंदी का महत्व क्या है ? यह कैसे हमें और हमारे समाज को रच रही है? इसके छूटते हुए साथ को संभाला जा सकता है या यह केवल हमारा भ्रम है।

एक तरफ हिंदी अंग्रेजी जैसी भाषा की हैसियत से हाशिये पर जाती हुई लगती है तो दूसरी तरफ भारत के लोकप्रिय मतों के बीच राष्ट्रभाषा का तमगा हासिल करने की वजह से भारत के अन्य भाषाओं और बोलियों को हाशिये की तरफ धकेलती है।

मौजूदा दौर में भारत में अंग्रेजी के दबदबे ने हिंदी को नेपथ्य में धकेल दिया है। कई हिंदी बोलने वालों को लगता है कि वह हिंदी को बचाने का काम कर रहे हैं। हिंदी दिवस के कई आयोजनों में दिए जाने वाले चीखते पुकारते भाषणों में दम तोड़ती हिंदी का बेदमपन देखा जा सकता है। पूरे विश्व की जीवनशैली अपने मूल को छोड़कर जब एक खास तरह के जीवनशैली को अपनाने की लड़ाई लड़ रही हो, उस समय भाषाओं को बचाने के लिए गला फाड़ना बेईमानी लगता है। लेकिन इस बात के साथ एक सच्चाई यह भी है कि कोई भी जीवनशैली अपने मूल रूप में हमेशा मौजूद नहीं रहती है ,वह समय के सफर में बदलती रहती है। जैसे कि आज से पचास साल पहले जो भारत की जीवनशैली थी, वह आज नहीं है और आज वाली जीवनशैली,  आज के  पचास साल बाद नहीं रहेगी। इसलिए हिंदी के ढंग में होने वाले बदलाव को रोक पाना किसी के बस की बात नहीं है वह भी बदलती रहेगी। लेकिन दिक्कत यह है कि हिंदी के ढंग में  बदलाव नहीं हो रहा है बल्कि बदलाव के बजाय हिंदी ढलान पर जाते हुई लग रही है। एक ऐसी नदी के तौर पर दिख रही है, जिसके फैलाव का इलाका कम हो रहा है, धार मंद हो रही है और भविष्य सूखता नजर आ रहा है।  

ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारे समाज की अधिकांश विद्वता अब हिंदी में नहीं रची जाती। अपने खानसामे से लेकर ड्राइवर तक से वह हिंदी में तो बात करती है लेकिन वह अंग्रेजी में सोचती और अंग्रेजी में लिखती है। ज्ञान के सभी क्षेत्रों की पढ़ाई लिखाई अब अंग्रेजी में होती है। ऐसा हो सकता है कि शुरुआती पढ़ाई लिखाई हिंदी में हो लेकिन उच्चतम स्तर की पढ़ाई लिखाई अंग्रेजी में ही होती है। इसलिए ज्ञान उत्पादन की भाषा हिंदी के बजाय अब पूरी तरह से अंग्रेजी बन चुकी है। समाजशास्त्र से लेकर अर्थशास्त्र तक मानविकी से लेकर विज्ञान तक सभी के शोध पर सोचने, विमर्श करने और रिसर्च पेपर लिखने की भाषा अंग्रेजी है। इस तरह से ज्ञान उत्पादन की भाषा न होने की वजह से हिंदी के नदी के फैलाव का इलाका खुद ही कम हो गया है।

अब चूँकि ज्ञान उत्पादन की भाषा अंग्रेजी है इसलिए समाज में रोजगार पाने और मनचाही जीवनशैली अपनाने की भाषा अंग्रेजी बन चुकी है। अगर हम वेटर से क्लर्क और डॉक्टर से लेकर कलक्टर बनना चाहते हैं तो हिंदी अपनाने से हम औरों के मुकाबले बहुत पीछे हो जाते हैं तो हम हिंदी क्यों अपनाये। अगर हमारे आर्थिक मॉडल ने हमें रोजगार की तलाश में हमें शहरों की तरफ धकेल दिया है, जहां भाषा बचाने से ज्यादा जरूरी जीने की चिंता है तो हिंदी जैसी बातों की चिंता किसे हो। हमारी अनंत चिंताओं का हल अगर विज्ञान अपनी तकनीक से कर दे रहा है और विलासिताओं के मोह में धकेल देने की मद्दा रखता है तो उस भाषा की जरूरत पैदा होती है, जिसमें विज्ञान रचा जाता है, न कि हिंदी कि जिसने विज्ञान के बारें में सोचना ही बंद कर दिया है। इन सारे जरूरी हिस्सों से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की गैरमौजूदगी लेकिन भारतीय राजनीति में जनता से संवाद करने में हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की मौजूदगी ने भारत में एक अजीब सा समाज रचा है। जहां के नेताओं के भाषणों और आम जनता की बातचीतों से जरूरी हिस्सा गायब होता जा रहा है। जनता और सरकार के बीच का संवाद लफ्फाजियों और जुमलों से भरा पड़ा है। सब यह सोचने और मानाने लगे हैं कि भाषणों और आम जनता की बातचीत का मुद्दा गंभीर नहीं होना चाहिए, वही होना चाहिए जो जनता सुनना चाहती है, वही होना चाहिए, जिसमे रस हो, मनोरंजन हो, जो बातूनी हो लेकिन जिसमें बात न हो। इसकी सबसे बड़ी गवाही हमारा आज का मीडिया प्रतिष्ठान देता है। जैसे कि जिस गंभीरता की मौजूदगी हमें अंग्रेजी मीडिया में मिलती है,वह हिंदी मीडिया से पूरी तरह गायब हो चुकी है।

अंग्रेजी ने जिस तरह से हिंदी को दबाया है, ठीक इसी तरह हम हिंदी की महिमामंडन और राष्ट्रभाषा के तौर पर पुकारते समय भारत की अन्य भाषाओं को दबाते हैं। ठीक इसी तरह भारत की राजभाषाएँ बोलियों को दबाती हैं। भाषाओं के संदर्भ में दबाना फिर भी बहुत नरम अभिव्यक्ति है क्योंकि भाषाओं के दबने से संस्कृतियां बदलती हैं और जीवनशैलियां मरती हैं। हिंदी की वजह से एक आम भारतीय केवल उत्तर भारत को देश समझने लगता है और हिंदी से इतर जुबान बोलने वाले को दूसरा देशी समझने लगता है। एक भाषाविद् इस पर टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि आज इस देश में हिंदी भाषा अंग्रेजी की दासी ,अन्य भारतीय भाषाओं की सास और अपनी ही दर्जनों बोली या उप भाषाओं की सौतली मां बन गयी है। लेकिन यह बात उन्हें नहीं समझ में आएगी जो गला फाड़ फाड़कर एक देश, एक भाषा और एक धर्म की बात करते हैं। इस तरह से बात करने वाले भारत का क्या किसी भी देश के नागरिक नहीं हो सकते। लेकिन विडंबना यह है कि इस सोच से चले वाले आज भारतीय सरकार के कर्ता धर्ता हैं।   

अब यह सवाल उठता है कि क्या हिंदी के इस ढलान या अन्य भारतीय भाषाओं के ढलान को रोका जा सकता है। इसका जवाब देना बहुत मुश्किल है। सरकारी हिंदी मठाधीशी की तरह काम करती है। इसमें ऐसी पंडिताई की भरमार है, जिसकी जटिलता किसी को भी न भाए और न किसी को समझ में आये। और भाषा जब सरल, सहज और सरस होने से अलग एक दूसरी दुनिया की चीज लगने लगती है तो भाषा मरने लगती है। अब उत्तर प्रदेश में नियम है कि यहां के कल कारखानों में मजदूरों के लिए बने नियम को दिवारों पर चिपकाना जरूरी है लेकिन दिवारों पर चिपके नियम की भाषा ऐसी होती है जिसे मजदूर तो क्या हिंदी भाषी विद्यार्थी भी न समझ पाए। इस तरह की सरकारी हिंदी तो ऐसी लगती है कि जैसे वह हिंदी के बहाव को रोकने का काम कर रही हो। इसके बाद अनुवादों की बारी आती है। सरकारी अनुवाद इतने बेढंगे होते हैं कि ढंग से पढ़ा लिखा आदमी भी उसे पढ़ते समय बेढंगा हो जाए। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से प्रकाशित होने वाली सरकारी किताबें जैसे कि सालाना प्रकाशित होने वाले आर्थिक सर्वेक्षण की किताबें इसका जीता जागता उदाहरण हैं।

इस सबके बावजूद सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया की मौजूदगी की वजह से हिंदी में कुछ नया होता दिख रहा है। सब लेखक बन चुके हैं। और हिंदी का बेतरतीब लेकिन सुंदर विस्तार हो रहा है। चूँकि आम जनता के सरोकारी मुद्दों का दायरा बहुत फैला हुआ नहीं होता है इसलिए सोशल मीडिया की वजह से हिंदी की जो लोकप्रियता बढ़ी है, वह जनसरोकारी मुद्दों तक ही सीमित है। लेकिन डिजिटल मीडिया की वजह से हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का जो भी फैलाव हो रहा है, वह हिंदी नदी के कम इलाके में बहाव को फैलाता नहीं है लेकिन इस तरफ इशारा तो जरूर करता है कि इस नदी का बहाव हमेशा जारी रहेगा।

अब सवाल उठता है कि क्या हिंदी को संभाला जा सकता है या यह केवल हमारा भ्रम है। पत्रकार सोपान जोशी इसका बहुत सुंदर जवाब देते हैं। वह कहते हैं कि भाषाएं नदियों की तरह होती हैं। किसी भी जगह पर नदी का पानी किसी ऊपरी इलाके से आता है, क्योंकि पानी सदैव नीचे ही बहता है। ऊपर जाने के लिए उसे भाप बनना पड़ता है, जिसके लिए सूरज जैसे विशाल हीटर की ज़रूरत होती है।

पानी इस्तेमाल करने वाले को पता नहीं होता कि उसका पानी हिमालय के किसी हिमनद के पिघलने से आया है या किसी के खेत में गिरी बारिश के पानी का रिसाव है। वह उस पानी को अपना संवैधानिक अधिकार भी मान सकता है, या देवताओं का प्रसाद भी। लेकिन नदियों की धारा किसी संविधान की धारा से नहीं बहती, न ही बादल मौसम विभाग के नीति निर्धारण या श्वेत पत्र की बाट जोहते हैं, बरसने के लिए। उनका धर्म सूरज, तापमान, दबाव, हवाओं जैसे कारणों से तय होता है। इस तरह से अगर हमारी जीवनशैली अगर हिंदी जैसा कुछ नहीं है तो हिंदी को बचाना या बढ़ाना भी हमारे बस की बात नहीं।

HINDI DIWAS
Language

Related Stories

भोपाल के एक मिशनरी स्कूल ने छात्रों के पढ़ने की इच्छा के बावजूद उर्दू को सिलेबस से हटाया

भाषा का सवाल: मैं और मेरा कन्नड़ भाषी 'यात्री-मित्र'

अंतरराष्ट्रीय आदिवासी भाषा वर्ष: हर दो हफ़्ते में एक भाषा पृथ्वी से हो रही है लुप्त

हिन्दी कभी भी शोषकों की भाषा नहीं रही


बाकी खबरें

  • सत्यम् तिवारी
    वाद-विवाद; विनोद कुमार शुक्ल : "मुझे अब तक मालूम नहीं हुआ था, कि मैं ठगा जा रहा हूँ"
    16 Mar 2022
    लेखक-प्रकाशक की अनबन, किताबों में प्रूफ़ की ग़लतियाँ, प्रकाशकों की मनमानी; ये बातें हिंदी साहित्य के लिए नई नहीं हैं। मगर पिछले 10 दिनों में जो घटनाएं सामने आई हैं
  • pramod samvant
    राज कुमार
    फ़ैक्ट चेकः प्रमोद सावंत के बयान की पड़ताल,क्या कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार कांग्रेस ने किये?
    16 Mar 2022
    भाजपा के नेता महत्वपूर्ण तथ्यों को इधर-उधर कर दे रहे हैं। इंटरनेट पर इस समय इस बारे में काफी ग़लत प्रचार मौजूद है। एक तथ्य को लेकर काफी विवाद है कि उस समय यानी 1990 केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी।…
  • election result
    नीलू व्यास
    विधानसभा चुनाव परिणाम: लोकतंत्र को गूंगा-बहरा बनाने की प्रक्रिया
    16 Mar 2022
    जब कोई मतदाता सरकार से प्राप्त होने लाभों के लिए खुद को ‘ऋणी’ महसूस करता है और बेरोजगारी, स्वास्थ्य कुप्रबंधन इत्यादि को लेकर जवाबदेही की मांग करने में विफल रहता है, तो इसे कहीं से भी लोकतंत्र के लिए…
  • न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    फ़ेसबुक पर 23 अज्ञात विज्ञापनदाताओं ने बीजेपी को प्रोत्साहित करने के लिए जमा किये 5 करोड़ रुपये
    16 Mar 2022
    किसी भी राजनीतिक पार्टी को प्रश्रय ना देने और उससे जुड़ी पोस्ट को खुद से प्रोत्सान न देने के अपने नियम का फ़ेसबुक ने धड़ल्ले से उल्लंघन किया है। फ़ेसबुक ने कुछ अज्ञात और अप्रत्यक्ष ढंग
  • Delimitation
    अनीस ज़रगर
    जम्मू-कश्मीर: परिसीमन आयोग ने प्रस्तावों को तैयार किया, 21 मार्च तक ऐतराज़ दर्ज करने का समय
    16 Mar 2022
    आयोग लोगों के साथ बैठकें करने के लिए ​28​​ और ​29​​ मार्च को केंद्र शासित प्रदेश का दौरा करेगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License