NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
कोविड-19
स्वास्थ्य
भारत
राजनीति
जहां अस्पतालों में शौचालय नहीं वहां आक्सीजन ढूंढ रहे हैं!
स्वास्थ्य का जिस तरह का ढांचा था, उससे आप और क्या उम्मीद कर रहे थे। इन स्वास्थ्य सेवाओं की परिणति ये ही तो होनी थी। स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढिकरण, आधुनिकीकरण और प्रसार करना सरकार की प्राथमिकता पर था ही नहीं।
राज कुमार
28 Apr 2021
gp
साभार -इंडिया स्पेंड

देश में कोरोना महामारी से त्राही-त्राही मची हुई है। आक्सीज़न, वेंटिलेटर, बेड, दवाओं की भारी कमी सामने आ रही है। हज़ारों लोग बिना आक्सीज़न और इलाज़ के मर रहे हैं। हिंदुस्तान ने बदइंतज़ामी का सुपर मॉडल पेश किया है।

फिलहाल लोग स्वास्थ्य ढांचे को लेकर चिंतित हो रहे हैं, सवाल उठा रहे हैं। लेकिन स्वास्थ्य का जिस तरह का ढांचा था, उससे आप और क्या उम्मीद कर रहे थे। इन स्वास्थ्य सेवाओं की परिणति ये ही तो होनी थी। स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढिकरण, आधुनिकीकरण और प्रसार करना सरकार की प्राथमिकता पर था ही नहीं।

स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं और कार्यकर्ता लगातार इस बात को उठाते रहे हैं कि स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को मज़बूत किया जाए। मेडिकल कॉलेज़, ज़िला अस्पताल, सिविल अस्पताल आदि के डॉक्टर्स ये मांग करते रहे हैं कि उप स्वास्थ्य केंद्र, पीएचसी और सीएचसी को मज़बूत किय जाए। वो कहते रहे वहां पर सुविधाओं की कमी के चलते उन पर ज्यादा भार पड़ता है। लेकिन स्वास्थ्य के इस बुनियादी ढांचे पर ध्यान ही नहीं दिया गया।

स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा

स्वास्थ्य ढांचे की सबसे पहली इकाई उप स्वास्थ्य केंद्र है। जहां कम से कम 4 कर्मचारी होने चाहिये। सवास्थ्य कार्यकर्ता, एएनएम, स्टाफ नर्स और सफाई कर्मचारी। उसके बाद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है। जहां मेडिकल ऑफिसर और उसके अंतर्गत 14 पैरामेडिकल स्टाफ होता है। पीएचसी में 4-6 बिस्तरों का वार्ड भी होना चाहिये। इसके बाद सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र है। जहां विशेषज्ञ होते हैं। 24 घंटे इमरजेंसी सुविधा, 24 घंटे प्रसूति सेवाएं और ब्लड बैंक होना चाहिये। इसके साथ ही 30 बिस्तरों का एक अस्पताल भी होना चाहिये। ये मानक हैं और इस तरह की अनुशंसा की गई है। लेकिन, क्या ज़मीनी स्थिति भी यही है? आइये, देखते हैं।

पहला सवाल उठता है कि आखिर कितनी जनसंख्या पर कितने उप-केंद्र, पीएचसी और सीएचसी होने चाहिये। मैदानी इलाके और पहाड़ी इलाकों में ये मानक अलग-अलग होते हैं। मानकों के अनुसार 3000-6000 की जनसंख्या पर एक उप-केंद्र, 20,000-30,000 की जनसंख्या पर एक पीएचसी और 80,000-1,20,000 की जनसंख्या पर एक सीएचसी होना चाहिये। लेकिन, देश के तीनों ही स्वास्थ्य केंद्र मानकों पर खरा नहीं उतरते हैं।

स्टाफ की स्थिति

अगर उप-केंद्र की बात करें तो 54 प्रतिशत उप-केंद्रों में पुरुष स्वास्थ्य कार्यकर्ता नहीं है। 10 प्रतिशत उप-केंद्रों में एएनएम नहीं है। काफी उप-केंद्र ऐसे भी हैं जहां दोनों ही नहीं है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में भी हाल यही है। 10 प्रतिशत पीएचसी बिना डॉक्टर के चल रहे हैं। 38 प्रतिशत में लैब टैक्निशियन नहीं हैं और 24 प्रतिशत में फार्मासिस्ट नहीं हैं। सीएचसी यानि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, ये प्राथमिक रेफरल युनिट भी होते हैं। 5 प्रतिशत सीएचसी में ऑपरेशन थियेटर नहीं हैं। 4 प्रतिशत में फंक्शनल प्रसूति गृह नहीं हैं और 25 प्रतिशत में ब्लड बैंक नहीं हैं। सीएचसी ऐसा अस्पताल होता है जहां विशेषज्ञ डॉक्टर होते हैं। देश के सामुदायिक स्वास्थय केंद्रों यानि सीएचसी में वर्ष 2018 में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या 4017 थी जो वर्ष 2019 में घटकर 3881 रह गई। भारतीय स्वास्थ्य मानकों के अनुसार सीएचसी में 81 प्रतिशत विशेषज्ञों की कमी है। 85 प्रतिशत सर्जनों की कमी है, 75 प्रतिशत स्त्री रोग विशेषज्ञों की कमी है और 80 प्रतिशत बाल रोग विशेषज्ञों की कमी है।

अगर पूरे देश पर नज़र डालें, तो पाएंगे कि देश में स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के 35 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं। महिला स्वास्थ्य सहयोगियों के 40 प्रतिशत, पुरुष स्वास्थ्य सहयोगियों के 46 प्रतिशत, डॉक्टर्स के 24 प्रतिशत और लैब टैक्निशियन के 51 प्रतिशत पद खाली पड़े हैं।बाकि पदों की भी हालत ऐसी ही है।

अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति

अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की स्थिति को समझने के लिए हम सिर्फ इन अस्पतालों में शौचालयों की स्थिति को देखते हैं। 73 प्रतिशत उप-केंद्रों में महिला और पुरुषों के लिए अलग शौचालय नहीं है। 66 प्रतिशत उप-केंद्रों में स्टाफ के लिए भी शौचालय नहीं है। 36 प्रतिशत पीएचसी में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग शौचालय नहीं है। 3 प्रतिशत पीएचसी में स्टाफ के लिए शौचालय नहीं है। 33 प्रतिशत सीएचसी में महिला और पुरुषों के लिए अलग शौचालय नहीं है और 26 प्रतिशत सीएचसी में स्टाफ के लिए शौचालय नहीं है। ये स्थिति तमाम तरह के स्वच्छता अभियानों के बाद है।

नोटः सभी आंकड़ें स्वास्थ्य एवं परिवार मंत्रालय की वर्ष 2019 की रिपोर्ट से लिए गये हैं। आर्काइव लिंक। आंकड़े 31 मार्च 2019 तक के हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

doctor in india
hospital in india
COVID in India
subcentre in india
healthcare sturucture in idnia

Related Stories

भारत में चिकित्सा का निजीकरण कैसे कोविड-19 से हो रही मौतों में बढ़ोत्तरी का कारण बन रहा


बाकी खबरें

  • kisan andolan
    राजेंद्र शर्मा
    ओये किसान, तू तो बड़ा चीटिंगबाज़ निकला!
    27 Nov 2021
    कटाक्ष: बेचारे मोदी जी को साल भर, जी हां पूरे साल भर, इसके सब्ज़बाग़ दिखाए कि बस, तीन कानूनों की वापसी की ही बात है। तीन कानून बस। इधर कानून वापस हुए और उधर बार्डर खाली, लेकिन...
  •  Prayagraj murder and rape case
    सोनिया यादव
    यूपी: प्रयागराज हत्या और बलात्कार कांड ने प्रदेश में दलितों-महिलाओं की सुरक्षा पर फिर उठाए सवाल!
    27 Nov 2021
    इस घटना के बाद एक बार विपक्ष खस्ता कानून व्यवस्था को लेकर सरकार पर हमलावर है, तो वहीं सरकार इस मामले में फिलहाल चुप्पी साधे हुए है। हालांकि राज्य में एक के बाद एक घटित हो रही ऐसी घटनाएं सरकार के '…
  • ncrt
    गौरी आनंद
    ट्रांसजेंडर छात्रों के लिए NCERT वेबसाइट पर डाली गई शिक्षक प्रशिक्षण नियमावली को हटाया गया, LGBTQ+ समूहों ने किया विरोध
    27 Nov 2021
    700 से ज़्यादा लोगों द्वारा हस्ताक्षरित पत्र को सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को भेजा गया।
  • farming
    डॉ. ज्ञान सिंह
    किसानों की बदहाली दूर करने के लिए ढेर सारे जायज कदम उठाने होंगे! 
    27 Nov 2021
    केवल 3 कृषि कानूनों को वापस ले लेने से ही छोटे किसानों, खेतिहर मजदूरों और ग्रामीण कारीगरों की दुर्दशा में सुधार नहीं होने जा रहा है। भारी कर्ज और बेहद गरीबी में जी रहे किसानों की भलाई के लिए ढेर सारे…
  • poverty
    भरत डोगरा
    डेटा: ग़रीबी कम करने में नाकाम उच्च विकास दर
    27 Nov 2021
    सरकार को असमानता को कम करना चाहिए और जीडीपी विकास दर को बढ़ा-चढ़ा कर पेश नहीं करना चाहिए। ग़रीबों को कोने में धकेलते हुए उनकी क़ीमत पर, आय और पूंजी को चंद मुट्ठियों में जमा किया जा रहा है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License