NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
अंतरराष्ट्रीय
ऐतिहासिक बदलाव से गुजर रही है खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा की दिशा
सऊदी अरब और तुर्की के संबंधों में जमी बर्फ़ को लगातार पिघलते देखा जा सकता है। दूसरी तरफ़ 10 दिन पहले, बगदाद में सऊदी अरब और ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के बीच बातचीत हुई। इस बातचीत को अमेरिका की खाड़ी नीतियों में बदलाव का नतीज़ा माना जा रहा है।
एम.के. भद्रकुमार
21 Apr 2021
gulf

खाड़ी क्षेत्र की भूराजनीतिक दिशा द्विपक्षीय-बहुपक्षीय मामलों में लगातार बदल रही है। जनवरी में सऊदी अरब और कतर ने एक-दूसरे से दोबारा बातचीत शुरू की है। बाइडेन प्रशासन में बदली अमेरिकी रणनीति ने सऊदी और कतर की नीतियों की कई मामलों में आलोचना की है। यह फिलहाल सऊदी-कतर सहयोग में साझा तथ्य है।

सऊदी अरब और तुर्की के संबंधों में जमी बर्फ़ को लगातार पिघलते देखा जा सकता है। दूसरी तरफ़ 10 दिन पहले, बगदाद में सऊदी अरब और ईरान के शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के बीच बातचीत हुई। इस बातचीत को अमेरिका की खाड़ी नीतियों में बदलाव का नतीज़ा माना जा रहा है।

यूएई के राष्ट्रपति शेख खालिफ़ बिन जाएद के सलाहकार अनवर गार्गश ने पिछले हफ़्ते कहा, "पिछले अगस्त में हुए अब्राहम समझौते के चलते मध्यपूर्व का चेहरा बदल रहा है।" गार्गश ने इस समझौते को 'एक वैकल्पिक रणनीतिक विचार' बताया था, जिसका लक्ष्य क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करना था। लेकिन यह ऊंचे दावे बिना आधार के नहीं किए जा रहे हैं।

बल्कि यूएई-इज़रायल के संबंधों में हुए ऐतिहासिक बदलावों से क्षेत्रीय स्तर पर एक नए समूह के बनने का रास्ता साफ़ हुआ। इस नए समूह में वृहद पूर्वी भूमध्यसागर, पश्चिमी एशिया और फारस की खाड़ी से संबंधित देश- ग्रीस, साइप्रस, इज़रायल औऱ यूएई शामिल हैं।

अमेरिका, पारंपरिक खाड़ी सुरक्षा रणनीति के तहत, विरोधी खेमे में फूट डालता रहता था। ताकि ईरान के खिलाफ़ मौजूद किसी भी तरह की भावनाओं का अमेरिका के हितों के लिए दोहन किया जा सके। लेकिन अब इस पारंपरिक रणनीति में अंतर आया है, जिससे क्षेत्र में शांति बहाली की प्रक्रिया शुरू हुई है।

यह सही है कि खाड़ी क्षेत्र के सुरक्षा ढांचे में आए बदलावों की अपनी व्यक्तिगत विशेषताएं भी होंगी। इसलिए सऊदी अरब और कतर के बीच सामान्य होते संबंधों की वज़ह, अमेरिका की नई विदेश नीतियों के प्रति सऊदी अरब की चिंताएं हैं। रियाध, बाइडेन प्रशासन के साथ अपने संबंधों को बेहतर करना चाहता है। इस क्रम में सऊदी अरब डेमोक्रेटिक सांसदों की नज़रों में अपनी और अपने राजकुमार की खराब साख में कुछ सुधार करना चाहता है।

सऊदी अरब और कतर के मध्य संबंधों में सुधार का मतलब यह नहीं है कि दोनों के बीच द्विपक्षीय सहयोग गहरा हो जाएगा या 'मोरिबंद खाड़ी सहयोग परिषद' को नया जीवन मिल जाएगा। लेकिन इससे कूटनीति को ज़्यादा जगह मिलेगी, जिससे आपसी डर और हिंसा का ख़तरा कम होगा। बता दें यहां तुर्की की वज़़ह से ही कुवैत में वह आत्मविश्वास आया, जिसके चलते कुवैते, सऊदी अरब के सामने खड़ा हो पाया। लेकिन अब सऊदी और कुवैत के रिश्ते सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। इससे तुर्की में भी सऊदी अरब के साथ अपने संबंध मजबूत होने की उम्मीद पैदा हुई है।

सऊदी अरब के नेतृत्व वाले प्रतिबंधों को कतर द्वारा ठोस जवाब देने से तुर्की के क्षेत्रीय प्रभाव में विस्तार हुआ था। इसमें कोई शक नहीं है कि तुर्की-कतर के सैन्य अड्डे और कतर में तुर्की के सैन्यकर्मियों की मौजूदगी से कतर का भयादोहन मजबूत हुआ था।

बहुत सारे पश्चिमी विशेषज्ञों ने जल्दबाज़ी में यह विश्लेषण कर दिया कि सऊदी-कतर की शांति स्थापना से ईरान को सबसे ज़्यादा नुकसान होगा। यहां उन्होंने खाड़ी देशों की प्रयोगधर्मिता को नज़रंदाज कर दिया। जब साढ़े तीन साल पहले खाड़ी विवाद शुरू हुआ, तो निश्चित तौर पर उससे सबसे ज़्यादा लाभ ईरान को हुआ था। इस संकट से ईरान को कुवैत के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई पर ले जाने का मौका मिला। अब खाड़ी कूटनीति में ईरान-कुवैत के संबंध एक अहम विशेषता बन चुके हैं।

इस बीच विएना में अमेरिका के JCPOA पर वापस लौटने और ईरान के खिलाफ़ लगाए गए प्रतिबंधों को वापस लेने की वार्ता भी सही दिशा में प्रगति कर रही है। इससे रियाध को दोबारा सोचने का मौका मिलेगा। इस तरह अब सऊदी अरब दस दिन पहले बगदाद में अपने गुप्तचर प्रमुख खालिद बिन अली अल हुमैदान और ईरान के 'इस्लामिक रिवोल्यूशनी गार्ड्स कॉर्प्स' के कुलीन 'कुद्स लड़ाकों' के प्रमुख जनरल इस्माइल कानी के बीच हुई मुलाकात की व्याख्या कर सकेगा।

यह बैठक पहले हो सकती थी। लेकिन वाशिंगटन द्वारा ईरानी जनरल कासिम सुलेमानी की पिछले साल जनवरी में हत्या से इस पर विराम लग गया। इतना कहा जा सकता है कि सऊदी अरब, ईरान के बारे में जो सोच रहा है, वह अमेरिका की ईरान रणनीतियों से स्वतंत्र है। इससे उम्मीद जागती है।

सऊदी-ईरान के बीच तनाव में ठील आने से रातों-रात संबंध बहुत अच्छे नहीं हो जाएंगे, क्योंकि दोनों के संबंधों के बीच महीन विरोधाभास मौजूद हैं। इसके बावजूद आपसी विद्वेष के खात्मे से खाड़ी में सुरक्षा स्थिति में सुधार होगा।

बल्कि आने वाले एक साल में अमेरिका-ईरान संबंधों की दिशा निर्णायक साबित होने वाली है। अगर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंध ख़त्म हो जाते हैं और ईरान के अंतरराष्ट्रीय समुदाय में समावेश की प्रक्रिया तेज हो जाती है, तो पश्चिम एशिया की तस्वीर पूरी तरह बदल जाएगी। इससे फ़र्क नहीं पड़ता की आने वाले चुनावों में ईरान में सत्ता का केंद्र किसके पास रहता है। ईरान की क्षेत्रीय स्थिरता का हिस्सा बनने की मंशा सच्ची है।

ईरान की कभी बम बनाने की मंशा नहीं थी। दूसरी बात, ईरान की प्राथमिकता अपने पड़ोस में शक्ति प्रभाव फैलाने की नहीं, बल्कि अपनी अर्थव्यवस्था के पुनर्निमाण की है, जिसे दशकों के पश्चिमी प्रतिबंधों से बहुत नुकसान हुआ है। एक सक्रिय सत्ता के तौर ईरान के लिए घरेलू उम्मीदों को गंभीर तौर पर लेना जरूरी है। फिर बाइडेन प्रशासन ने फिलिस्तीन फाइल को दोबारा खोल दिया है।

इन सारे घटनाक्रमों से अब अब्राहम समझौते को ईरान के खिलाफ़ मोड़ने की संभावना ख़त्म हो गई हैं। यह चीज इज़रायल और यूएई द्वारा "पश्चिम की ओर देखो" की नीति अपनाने की व्याख्या भी करता है। इसी नीति के तहत इज़रायल और यूएई ने ग्रीस और साइप्रस के साथ मिलकर एक नए क्षेत्रीय समूह का गठन किया गया है।

शुक्रवार को साइप्रस के पाफोस में चारों देशों की बीच हुई विदेश मंत्री स्तर की बातचीत को इस प्रकाश में देखा जा सकता है। वार्ता के आयोजक साइप्रस के विदेश मंत्री निकोस क्रिस्टोडॉउलाइड्स ने इस कार्यक्रम को बड़बोले ढंग से एक नए युग की शुरुआत बताया, जो "वृहद भूमध्यसागर, मध्यपूर्व और खाड़ी को खुशहाली और शांति से भरा स्थिर क्षेत्र बनाने" के साझा दृष्टिकोण से संचालित है।

उन्होंने दावा किया कि इस नए युग से "हमारे पड़ोस को अशांति, विवाद और संकट के प्रतिबंधात्मक विमर्श से निकलने" में मदद मिलेगी और इससे सकारात्मक और समावेशी एजेंडा आगे आएगा, जिससे सहयोग, शांति, स्थिरता और खुशहाली बढ़ेगी।

लेकिन यहां चारों भागीदारों की मंशा तुर्की से साझी दुश्मनी का दोहन कर रणनीतिक प्रभाव हासिल करने की है। इसलिए चारों अपने संसाधनों को एकसाथ ला रहे हैं और आपसी सहयोग को मजबूत कर रहे हैं। (जेरूसलम पोस्ट में इज़रायली नज़रिए को पढ़िए, जिसका शीर्षक 'इज़रायल, यूएई, साइप्रस का सम्मेलन का मक़सद तुर्की को संदेश देना है।')

रविवार को इज़रायल, ग्रीस ने अब तक के सबसे बड़े आपसी रक्षा ऊपार्जन समझौते की घोषणा की। जिसके तहत 1.65 बिलियन डॉलर की मदद से इज़रायल की रक्षा ठेकेदार कंपनी एलबित सिस्टम 22 साल तक हेलेनिक एयरफोर्स के लिए प्रशिक्षण केंद्र का संचालन करेगी। समझौते के तहत इस प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना भी एलबित सिस्टम ही करेगी।

इज़रायल के रक्षा मंत्री बेनी गांट्ज ने कहा, "मैं मानता हूं कि इस कार्यक्रम से इज़रायल और ग्रीस की अर्थव्यवसा मजबूत होगी और क्षमताओं में वृद्धि होगी। इस तरह दोनों देशों के बीच रक्षा, आर्थिक मुद्दों और राजनीतिक स्तर पर साझेदारी में गहराई आएगी।" इस बीच यूएई और ग्रीस ने भी एक अहम रक्षा सहयोग कार्यक्रम पर हस्ताक्षर किए हैं। ग्रीस की योजना 40 जंगी विमानों को खरीदने की है, जिनमें फ्रांस का राफेल और अमेरिका का F-35 विमान शामिल हैं। रिपोर्टों के मुताबिक़ बाइडेन प्रशासन ने 50 F-35 की यूएई को होने वाली बिक्री को अनुमति दे दी है।

साफ़ है कि तुर्की की क्षेत्रीय प्रभुत्व बनाने की महत्वकांक्षा को रोकेने के मुद्दे पर ग्रीस, इज़रायल और यूएई के हित एकसाथ आ रहे हैं, इससे साइप्रस भी सहमत है। इसे अमेरिका का सहयोग भी प्राप्त है। लेकिन यहां सऊदी अरब और इजिप्ट को चार देशों के समूह से अलग रखा गया है। यह देश तुर्की के साथ अपने संबंधों में स्थायित्व लाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।

इज़रायल का अनुमान है कि अमेरिका-ईरान संपर्क के पक्ष में बन रहे माहौल को अब रोका नहीं जा सकता और आगे खाड़ी में कोई भी नया सुरक्षा आयाम ईरान के समावेश के साथ ही बनेगा। अब इज़रायल को तेजी से सोचने की जरूरत है क्योंकि ईरान से डर का उपकरण अपनी उपयोगिता से ज़्यादा पुराना हो चुका है। यह भी स्पष्ट है कि ईरान की इज़रायल विरोधी नीतियां कभी यहूदी विरोधी नीतियों में नहीं बदलीं। अब तलवार अलग रखकर आपसी संबंधों को सुधारने का वक़्त है।

इस लेख को मूल अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

 

Gulf Security Paradigm in Historic Shift

 

 

Gulf country
IRAN
Iraq
Saudi Arab
America

Related Stories

और फिर अचानक कोई साम्राज्य नहीं बचा था

ईरानी नागरिक एक बार फिर सड़कों पर, आम ज़रूरत की वस्तुओं के दामों में अचानक 300% की वृद्धि

असद ने फिर सीरिया के ईरान से रिश्तों की नई शुरुआत की

क्या दुनिया डॉलर की ग़ुलाम है?

सऊदी अरब के साथ अमेरिका की ज़ोर-ज़बरदस्ती की कूटनीति

यूक्रेन में छिड़े युद्ध और रूस पर लगे प्रतिबंध का मूल्यांकन

पड़ताल दुनिया भर कीः पाक में सत्ता पलट, श्रीलंका में भीषण संकट, अमेरिका और IMF का खेल?

अमेरिका ने ईरान पर फिर लगाम लगाई

ईरान पर विएना वार्ता गंभीर मोड़ पर 

लखनऊ में नागरिक प्रदर्शन: रूस युद्ध रोके और नेटो-अमेरिका अपनी दख़लअंदाज़ी बंद करें


बाकी खबरें

  • farmers
    चमन लाल
    पंजाब में राजनीतिक दलदल में जाने से पहले किसानों को सावधानी बरतनी चाहिए
    10 Jan 2022
    तथ्य यह है कि मौजूदा चुनावी तंत्र, कृषि क़ानून आंदोलन में तमाम दुख-दर्दों के बाद किसानों को जो ताक़त हासिल हुई है, उसे सोख लेगा। संयुक्त समाज मोर्चा को अगर चुनावी राजनीति में जाना ही है, तो उसे विशेष…
  • Dalit Panther
    अमेय तिरोदकर
    दलित पैंथर के 50 साल: भारत का पहला आक्रामक दलित युवा आंदोलन
    10 Jan 2022
    दलित पैंथर महाराष्ट्र में दलितों पर हो रहे अत्याचारों की एक स्वाभाविक और आक्रामक प्रतिक्रिया थी। इसने राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया था और भारत की दलित राजनीति पर भी इसका निर्विवाद प्रभाव…
  • Muslim Dharm Sansad
    रवि शंकर दुबे
    हिन्दू धर्म संसद बनाम मुस्लिम धर्म संसद : नफ़रत के ख़िलाफ़ एकता का संदेश
    10 Jan 2022
    पिछले कुछ वक्त से धर्म संसदों का दौर चल रहा है, पहले हरिद्वार और छत्तीसगढ़ में और अब बरेली के इस्लामिया मैदान में... इन धर्म संसदों का आखिर मकसद क्या है?, क्या ये आने वाले चुनावों की तैयारी है, या…
  • bjp punjab
    डॉ. राजू पाण्डेय
    ‘सुरक्षा संकट’: चुनावों से पहले फिर एक बार…
    10 Jan 2022
    अपने ही देश की जनता को षड्यंत्रकारी शत्रु के रूप में देखने की प्रवृत्ति अलोकप्रिय तानाशाहों का सहज गुण होती है किसी निर्वाचित प्रधानमंत्री का नहीं।
  • up vidhan sabha
    लाल बहादुर सिंह
    यूपी: कई मायनों में अलग है यह विधानसभा चुनाव, नतीजे तय करेंगे हमारे लोकतंत्र का भविष्य
    10 Jan 2022
    माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे राष्ट्रीय स्तर पर नए political alignments को trigger करेंगे। यह चुनाव इस मायने में भी ऐतिहासिक है कि यह देश-दुनिया का पहला चुनाव है जो महामारी के साये में डिजिटल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License