NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
समझिए कैसे फ़ेसबुक का मुनाफ़ा झूठ और नफ़रत पर आधारित है
फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ़्रांसेस हौगेन द्वारा किए गए खुलासों से पता चलता है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अच्छी तरह जानता है कि उसके प्लेटफॉर्म का समाज पर किस तरह नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन लोकतंत्र बचाने के बजाए फ़ेसबुक के लिए मुनाफ़े का लालच ज़्यादा बड़ा है।
सोनाली कोल्हटकर
12 Oct 2021
Fb

फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ़्रांसेस हौगेन ने सिक्सटी मिनट्स पर दिए एक इंटरव्यू में स्कॉट पेली को बताया है कि कैसे सोशल मीडिया कंपनी ने आंतरिक प्रयोग किए हैं, जिनमें पता चला है कि कितने जल्दी और कुशलता से फ़ेसबुक के उपयोगकर्ता श्वेत सर्वोच्चतावादी विश्वासों के जाल गड्डे में चले जाते हैं।

37 साल की डेटा साइंटिस्ट हौगेन ने इस साल की शुरुआत में फ़ेसबुक से इस्तीफ़ा दिया था। इसके बाद उन्होंने फ़ेसबुक के बारे में खुलासे किए और बताया कि कंपनी जानती है कि कैसे उसके एल्गोरिद्म उपयोगकर्ताओं को कट्टरपंथी रास्ते पर धकेल रहे हैं। हौगेन के मुताबिक़, फेसबुक ने कुछ नए टेस्ट अकाउंट बनाए थे, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप, फॉक्स न्यूज़ और एक स्थानीय न्यूज़ आउटलेट का अनुसरण करते थे। फ़ेसबुक एल्गोरिद्म द्वारा दी गई लिंक पर पहली बार क्लिक करने के बाद ही इन अकाउंट के सामने अपने-आप श्वेत सर्वोच्चत्तावाद से जुड़ी सामग्री आने लगी। हौगेन कहती हैं कि एक हफ़्ते के भीतर ही आपको 'क्यूएनॉन' दिखाई देगा, दो हफ़्तों में आपको 'श्वेत नरसंहार' से जुड़ी चीजें दिखाई देने लगेंगी। 

हौगेन की गवाही और उनके द्वारा साझा किए गए दस्तावेज, लंबे वक़्त से फ़ेसबुक के आलोचकों द्वारा कही जा रही बातों की पुष्टि करते हैं। फ्री प्रेस की सह मुख्य कार्यपालन अधिकारी जेसिका गोंजालेज़ कहती हैं, "हम पहले से ही जानते हैं कि नफ़रती भाषण, कट्टरपंथी सामग्री, कोविड व महामारी, चुनावों और दूसरे मुद्दों से जुड़े तमाम झूठ फ़ेसबुक के मंच पर बड़े स्तर पर फैले हुए हैं। लेकिन हम यह चीज नहीं जानते थे कि इनके बारे में फ़ेसबुक को किस स्तर तक मालूम है।"

साढ़े तीन साल पहले, ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के मध्य में, मैंने बताया था कि कैसे मैंने खुद के एक श्वेत रिश्तेदार से नाता तोड़ लिया था। सामान्य तौर पर यह रिश्तेदार अपने अश्वेत रिश्तेदारों के लिए एक दयालु पालक की तरह व्यवहार करता था। लेकिन फ़ेसबुक पर उनकी नफ़रत भरी और झूठी फ़ेसबुक रिपोस्ट ने मुझे उनसे इतना दूर कर दिया कि मैंने उनसे सभी नाते तोड़ लिए। हौगेन की गवाही के संदर्भ में, रिश्तेदार द्वारा जिस नफ़रत के रास्ते का अनुपालन किया जा रहा था, वह मुझे 2018 की तुलना में ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है। फ़ेसबुक पर सक्रिय रहते हुए वह रिश्तेदार लगातार वह मीम और फर्ज़ी खबरें शेयर करता था, जिन्हें वह खोजता नहीं था, लेकिन जो उसके सामने फ़ेसबुक द्वारा पेश की जाती थीं। 

मुझे लगता है कि इस तरह की सामग्री ने उनके भीतर प्रवासियों और अश्वेत से भरे उस डर को बहुत बढ़ा दिया, जिसमें उन्हें लगता था कि अश्वेत और अप्रवासी उस तंत्र का लाभ उठा रहे हैं, जो बराक ओबामा और इल्हाल ओमार जैसे राजनेताओं ने श्वेतों के खिलाफ़ कर दिया है। मेरे रिश्तेदार उन हज़ारों दक्षिणपंथी अमेरिकियों की तरह नज़र आते हैं, जिन्होंने 6 जनवरी, 2021 को कैपिटल बिल्डिंग में दंगा किया था, इन लोगों में जो नफ़रत भरी थी, उसे फ़ेसबुक ने बढ़ाने का काम किया था। 

हौगेन ने बताया कि नवंबर, 2020 में चुनावों के बाद फ़ेसबुक ने अपने वे उपकरण बंद कर दिए, जो चुनावों से जुड़ी गलत जानकारी को छांटकर अलग करते थे, हौगेन ने बताया कि कंपनी के कर्मचारियों ने आंतरिक स्तर पर बताया कि इस कदम से 6 जनवरी की हिंसा में अपना योगदान दिया। सदन की चयन समिति, जो दंगों की जांच कर रही है, उसने अब हौगेन को फ़ेसबुक की भूमिका को लेकर अपने सदस्यों से मिलने के लिए बुलाया है। 

फ़ेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क जकरबर्ग अच्छी तरह हौगेन के आरोपों को समझते हैं, उन्होंने एक लंबी पोस्ट में लिखा, "इन आरोपों के केंद्र में यह विचार है कि हम मुनाफ़े को सुरक्षा और कल्याण के ऊपर वरीयता दे रहे हैं। लेकिन यह सच नहीं है।" ज़करबर्ग ने कहा कि हौगेन का विश्लेषण अतार्किक है और यह "इससे कंपनी की गलत तस्वीर पेश हो रही है।"

लेकिन यहां हौगेन सिर्फ़ कंपनी के इरादों और कार्यप्रणाली के बारे में अपना मत साझा नहीं कर रही थी, उनके पास फ़ेसबुक के आंतरिक दस्तावेज़ मौजूद हैं, जो उनके दावों की पुष्टि करते हैं, इन दस्तावेजों का बहुत अच्छे ढंग से विश्लेषण कर वाल स्ट्रीट जर्नर में छापा गया है, जो कोई हाशिए का मीडिया आउटलेट नहीं है। 

द वाल स्ट्रीट जर्नल का कहना है कि उसकी खोजों का मुख्य नतीज़ा यह है कि "फ़ेसबुक अच्छी तरह जानती है कि उसका प्लेटफॉर्म कई तरह के गड़बड़झालों का शिकार है, जिनसे नुकसान हो रहा है, यह नुकसान उन तरीकों से होता है, जिनके बारे में फ़ेसबुक अच्छी तरह समझती है।"

फ़ेसबुक का इन आरोपों के खिलाफ़ जो जवाब है, वह मोटा-मोटी यह है कि कंपनी गलत जानकारी से लड़ने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कोशिश करती है, जबकि इस दौरान स्वतंत्र अभिव्यक्ति को सुरक्षित रखने का संतुलन बनाया जाता है, अगर कंपनी और भी ज़्यादा कार्रवाई करती है, तो इससे उपयोगकर्ताओं के अमेरिकी संविधान में पहले संशोधन में दिए गए अधिकारों का हनन होगा। मार्च में सदन के प्रतिनिधियों के सामने मार्क जकरबर्ग ने कहा था, "हर नुकसानदेह सामग्री को खोज पाना, लोगों की स्वतंत्रता का उल्लंघन किए बिना संभव नहीं है। यह उल्लंघन इस तरीके का होगा, जिसे मैं नही समझता कि वह एक समाज के तौर पर हमें ग्राह्य हो पाएगा।"

दूसरे शब्दों में कहें तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का कहना है कि वह नफ़रती भाषण, गलत जानकारी और फर्जी खबरों से निपटने के लिए अधिकतम प्रयास कर रहा है। किसी को लगेगा कि इसका मतलब हुआ कि इस तरह की ज़्यादातर सामग्री को चिन्हित किया जा रहा है और हटाया जा रहा है। लेकिन हौगेन का कहना है कि "फ़ेसबुक दावा करती है कि वो 94 फ़ीसदी नफ़रती सामग्री हटा देती है, लेकिन इसके आंतरिक दस्तावेज़ कहते हैं कि कंपनी सिर्फ़ 3 से 5 फ़ीसदी नफरती सामग्री ही हटा पाती है। आखिर जब आप ज़्यादा सामग्री का उपभोग करते हैं, तो फ़ेसबुक ज़्यादा पैसे बनाती है।" फिर नफ़रत और गुस्सा लोगों को प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रखने के लिए बड़े प्रेरक हैं। 

हौगेन ने जो खुलासे किए हैं, उनके आधार पर गोंजालेज़ का मानना है कि "फ़ेसबुक को अच्छी तरह मालूम है कि उसका प्लेटफॉर्म कितने बड़े स्तर पर सामाजिक नुकसान कर रहा है।" बदतर यह कि "कंपनी मोटे तौर पर इन समस्याओं को ख़त्म करने के लिए कुछ नहीं कर रही है और फिर उसके बाद कांग्रेस समेत अमेरिकी जनता के सामने झूठ बोलती है और उन्हें गुमराह करती है।"

गोंजालेज़ को आशा है कि हौगेन द्वारा इन खुलासों के फ़ैसले कांग्रेस को स्तब्ध कर देने वाले मुद्दे पर कुछ सकारात्मक होगा। 5 अक्टूबर को सीनेट पैनल के सामने हौगेन की गवाही के दौरान, उनके सामने सांसदों ने तार्किक और सोचे-समझे सवाल रखे। वह कहती हैं, "हमने देखा कि दोनों पक्षों के सांसदों ने गंभीर सवाल पूछे। जो अमेरिकी सीनेट में दिखने वाले सर्कस से काफ़ी अलग था।"

गोंजालेज़ को आशा है कि कांग्रेस एक डेटा प्राइवेसी कानून पास करेगी, जो उपभोक्ताओं से इकट्ठा किए गए डेटा को नागरिक अधिकारों की तरह मानेगा। यह अहम है, क्योंकि फ़ेसबुक अपना बड़ा पैसा इस डेटा को विज्ञापन बनाने वालों को बेचकर कमाती है। गोंजालेज़ देखना चाहती हैं कि "हमारा और हमारे बच्चों के निजी डेटा का इस्तेमाल ख़तरनाक और नुकसानदेह सामग्री फैलाने में ना किया जाए। इसका इस्तेमाल नफ़रत, हिंसा व झूठ फैलाने में ना किया जाए।" 

फ़ेसबुक के इरादों को भांपना बिल्कुल आसान है। जकरबर्ग के इंकार के बावजूद, गोंजालेज़ कहती हैं कि "फ़ेसबुक का सिस्टम मुनाफ़े के लिए नफ़रत और झूठ के मॉडल पर आधारित है और फ़ेसबुक यह फ़ैसला ले चुकी है कि वो लोगों को सुरक्षित रखने के बजाए पैसा बनाएगी।" ऐसा नहीं है कि फ़ेसबुक इसलिए नफ़रत बेंच रही है कि लोकतंत्र को खत्म करना उसका एजेंडा है। बात इतनी है कि अगर मुनाफ़ा दांव पर लगा हो, तो लोकतंत्र को नुकसान उसके लिए बहुत मायने नहीं रखता।  

सोनाली कोल्हातकर फ्री स्पीच टीवी और पैसिफिका स्टेशन्स पर चलने वाले टीवी और रेडियो शो "राइजिंग अप विद सोनाली" की संस्थापक, प्रस्तुतकर्ता और एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं। वे इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट "इकनॉमी फॉर ऑल" की फैलो भी हैं। 

इस लेख को इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट इकनॉमी फ़ॉर ऑल ने उत्पादित किया था।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

How Facebook’s Quest for Profits Is Paved on Hate and Lies

Facebook
Facebook algorithms
Hate Speech
Hate Crimes

Related Stories

मनासा में "जागे हिन्दू" ने एक जैन हमेशा के लिए सुलाया

‘’तेरा नाम मोहम्मद है’’?... फिर पीट-पीटकर मार डाला!

वैष्णव जन: गांधी जी के मनपसंद भजन के मायने

रुड़की : डाडा जलालपुर गाँव में धर्म संसद से पहले महंत दिनेशानंद गिरफ़्तार, धारा 144 लागू

बात बोलेगी: मुंह को लगा नफ़रत का ख़ून

नफ़रती भाषण: कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को ‘बेहतर हलफ़नामा’ दाख़िल करने का दिया निर्देश

दिल्ली पुलिस का ये कहना कि धर्म संसद में हेट स्पीच नहीं हुई, दुर्भाग्यपूर्ण है: पूर्व आईपीएस अधिकारी

कैसे चुनावी निरंकुश शासकों के वैश्विक समूह का हिस्सा बन गए हैं मोदी और भाजपा

अब भी संभलिए!, नफ़रत के सौदागर आपसे आपके राम को छीनना चाहते हैं

यूपी: खुलेआम बलात्कार की धमकी देने वाला महंत, आख़िर अब तक गिरफ़्तार क्यों नहीं


बाकी खबरें

  • weekend curfew
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    दिल्ली में ओमीक्रॉन के बढ़ते मामलों के मद्देनज़र शनिवार-रविवार का कर्फ़्यू
    04 Jan 2022
    डीडीएमए की बैठक के बाद उप मुख्यमंत्री सिसोदिया ने कहा, ‘‘शनिवार और रविवार को कर्फ़्यू रहेगा। लोगों से अनुरोध किया जाता है कि बेहद जरूरी होने पर ही घर से बाहर निकलें।’’
  • Subramanian Swamy
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    ख़बर भी, नज़र भी: भाजपा के अपने ही बाग़ी हुए जा रहे हैं
    04 Jan 2022
    मोदी सरकार चाहती है कि कोर्ट उनके ही नेता सुब्रमण्यम स्वामी की उस याचिका पर कोई ध्यान न दे जिसमें उन्होंने एअर इंडिया की विनिवेश प्रक्रिया रद्द करने और अधिकारियों द्वारा दी गई मंज़ूरी रद्द करने का…
  • Hindu Yuva Vahini
    विजय विनीत
    बनारस में हिन्दू युवा वाहिनी के जुलूस में लहराई गईं नंगी तलवारें, लगाए गए उन्मादी नारे
    04 Jan 2022
    "हिन्दू युवा वाहिनी के लोग चाहते हैं कि हम अपना धैर्य खो दें और जिससे वह फायदा उठा सकें। हरिद्वार में आयोजित विवादित धर्म संसद के बाद बनारस में नंगी तलवारें लहराते हुए जुलूस निकाले जाने की घटना के…
  • Maulana Hasrat Mohani
    परमजीत सिंह जज
    मौलाना हसरत मोहानी और अपनी जगह क़ायम अल्पसंख्यक से जुड़े उनके सवाल
    04 Jan 2022
    आज भी अल्पसंख्यक असुरक्षित महसूस करते हैं, ऐसे में भारत को संविधान सभा में हुई उन बहसों को फिर से याद दिलाने की ज़रूरत है, जिसमें बहुसंख्यकवाद के कड़वे नतीजों की चेतावनी दी गयी थी।
  • Goa Chief Ministers
    राज कुमार
    गोवा चुनावः  34 साल में 22 मुख्यमंत्री
    04 Jan 2022
    दल बदल के मामले में गोवा बाकी राज्यों को पीछे छोड़ता नज़र आ रहा है। चुनाव से पहले गोवा के आधे से ज्यादा विधायक पार्टी बदल चुके हैं। आलम ये है कि कहना मुश्किल है कि जो विधायक आज इस पार्टी में है कल…
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License