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समझिए कैसे फ़ेसबुक का मुनाफ़ा झूठ और नफ़रत पर आधारित है
फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ़्रांसेस हौगेन द्वारा किए गए खुलासों से पता चलता है कि दुनिया का सबसे बड़ा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अच्छी तरह जानता है कि उसके प्लेटफॉर्म का समाज पर किस तरह नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। लेकिन लोकतंत्र बचाने के बजाए फ़ेसबुक के लिए मुनाफ़े का लालच ज़्यादा बड़ा है।
सोनाली कोल्हटकर
12 Oct 2021
Fb

फ़ेसबुक की पूर्व कर्मचारी फ़्रांसेस हौगेन ने सिक्सटी मिनट्स पर दिए एक इंटरव्यू में स्कॉट पेली को बताया है कि कैसे सोशल मीडिया कंपनी ने आंतरिक प्रयोग किए हैं, जिनमें पता चला है कि कितने जल्दी और कुशलता से फ़ेसबुक के उपयोगकर्ता श्वेत सर्वोच्चतावादी विश्वासों के जाल गड्डे में चले जाते हैं।

37 साल की डेटा साइंटिस्ट हौगेन ने इस साल की शुरुआत में फ़ेसबुक से इस्तीफ़ा दिया था। इसके बाद उन्होंने फ़ेसबुक के बारे में खुलासे किए और बताया कि कंपनी जानती है कि कैसे उसके एल्गोरिद्म उपयोगकर्ताओं को कट्टरपंथी रास्ते पर धकेल रहे हैं। हौगेन के मुताबिक़, फेसबुक ने कुछ नए टेस्ट अकाउंट बनाए थे, जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, उनकी पत्नी मेलानिया ट्रंप, फॉक्स न्यूज़ और एक स्थानीय न्यूज़ आउटलेट का अनुसरण करते थे। फ़ेसबुक एल्गोरिद्म द्वारा दी गई लिंक पर पहली बार क्लिक करने के बाद ही इन अकाउंट के सामने अपने-आप श्वेत सर्वोच्चत्तावाद से जुड़ी सामग्री आने लगी। हौगेन कहती हैं कि एक हफ़्ते के भीतर ही आपको 'क्यूएनॉन' दिखाई देगा, दो हफ़्तों में आपको 'श्वेत नरसंहार' से जुड़ी चीजें दिखाई देने लगेंगी। 

हौगेन की गवाही और उनके द्वारा साझा किए गए दस्तावेज, लंबे वक़्त से फ़ेसबुक के आलोचकों द्वारा कही जा रही बातों की पुष्टि करते हैं। फ्री प्रेस की सह मुख्य कार्यपालन अधिकारी जेसिका गोंजालेज़ कहती हैं, "हम पहले से ही जानते हैं कि नफ़रती भाषण, कट्टरपंथी सामग्री, कोविड व महामारी, चुनावों और दूसरे मुद्दों से जुड़े तमाम झूठ फ़ेसबुक के मंच पर बड़े स्तर पर फैले हुए हैं। लेकिन हम यह चीज नहीं जानते थे कि इनके बारे में फ़ेसबुक को किस स्तर तक मालूम है।"

साढ़े तीन साल पहले, ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के मध्य में, मैंने बताया था कि कैसे मैंने खुद के एक श्वेत रिश्तेदार से नाता तोड़ लिया था। सामान्य तौर पर यह रिश्तेदार अपने अश्वेत रिश्तेदारों के लिए एक दयालु पालक की तरह व्यवहार करता था। लेकिन फ़ेसबुक पर उनकी नफ़रत भरी और झूठी फ़ेसबुक रिपोस्ट ने मुझे उनसे इतना दूर कर दिया कि मैंने उनसे सभी नाते तोड़ लिए। हौगेन की गवाही के संदर्भ में, रिश्तेदार द्वारा जिस नफ़रत के रास्ते का अनुपालन किया जा रहा था, वह मुझे 2018 की तुलना में ज़्यादा साफ़ दिखाई देता है। फ़ेसबुक पर सक्रिय रहते हुए वह रिश्तेदार लगातार वह मीम और फर्ज़ी खबरें शेयर करता था, जिन्हें वह खोजता नहीं था, लेकिन जो उसके सामने फ़ेसबुक द्वारा पेश की जाती थीं। 

मुझे लगता है कि इस तरह की सामग्री ने उनके भीतर प्रवासियों और अश्वेत से भरे उस डर को बहुत बढ़ा दिया, जिसमें उन्हें लगता था कि अश्वेत और अप्रवासी उस तंत्र का लाभ उठा रहे हैं, जो बराक ओबामा और इल्हाल ओमार जैसे राजनेताओं ने श्वेतों के खिलाफ़ कर दिया है। मेरे रिश्तेदार उन हज़ारों दक्षिणपंथी अमेरिकियों की तरह नज़र आते हैं, जिन्होंने 6 जनवरी, 2021 को कैपिटल बिल्डिंग में दंगा किया था, इन लोगों में जो नफ़रत भरी थी, उसे फ़ेसबुक ने बढ़ाने का काम किया था। 

हौगेन ने बताया कि नवंबर, 2020 में चुनावों के बाद फ़ेसबुक ने अपने वे उपकरण बंद कर दिए, जो चुनावों से जुड़ी गलत जानकारी को छांटकर अलग करते थे, हौगेन ने बताया कि कंपनी के कर्मचारियों ने आंतरिक स्तर पर बताया कि इस कदम से 6 जनवरी की हिंसा में अपना योगदान दिया। सदन की चयन समिति, जो दंगों की जांच कर रही है, उसने अब हौगेन को फ़ेसबुक की भूमिका को लेकर अपने सदस्यों से मिलने के लिए बुलाया है। 

फ़ेसबुक के संस्थापक और सीईओ मार्क जकरबर्ग अच्छी तरह हौगेन के आरोपों को समझते हैं, उन्होंने एक लंबी पोस्ट में लिखा, "इन आरोपों के केंद्र में यह विचार है कि हम मुनाफ़े को सुरक्षा और कल्याण के ऊपर वरीयता दे रहे हैं। लेकिन यह सच नहीं है।" ज़करबर्ग ने कहा कि हौगेन का विश्लेषण अतार्किक है और यह "इससे कंपनी की गलत तस्वीर पेश हो रही है।"

लेकिन यहां हौगेन सिर्फ़ कंपनी के इरादों और कार्यप्रणाली के बारे में अपना मत साझा नहीं कर रही थी, उनके पास फ़ेसबुक के आंतरिक दस्तावेज़ मौजूद हैं, जो उनके दावों की पुष्टि करते हैं, इन दस्तावेजों का बहुत अच्छे ढंग से विश्लेषण कर वाल स्ट्रीट जर्नर में छापा गया है, जो कोई हाशिए का मीडिया आउटलेट नहीं है। 

द वाल स्ट्रीट जर्नल का कहना है कि उसकी खोजों का मुख्य नतीज़ा यह है कि "फ़ेसबुक अच्छी तरह जानती है कि उसका प्लेटफॉर्म कई तरह के गड़बड़झालों का शिकार है, जिनसे नुकसान हो रहा है, यह नुकसान उन तरीकों से होता है, जिनके बारे में फ़ेसबुक अच्छी तरह समझती है।"

फ़ेसबुक का इन आरोपों के खिलाफ़ जो जवाब है, वह मोटा-मोटी यह है कि कंपनी गलत जानकारी से लड़ने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा कोशिश करती है, जबकि इस दौरान स्वतंत्र अभिव्यक्ति को सुरक्षित रखने का संतुलन बनाया जाता है, अगर कंपनी और भी ज़्यादा कार्रवाई करती है, तो इससे उपयोगकर्ताओं के अमेरिकी संविधान में पहले संशोधन में दिए गए अधिकारों का हनन होगा। मार्च में सदन के प्रतिनिधियों के सामने मार्क जकरबर्ग ने कहा था, "हर नुकसानदेह सामग्री को खोज पाना, लोगों की स्वतंत्रता का उल्लंघन किए बिना संभव नहीं है। यह उल्लंघन इस तरीके का होगा, जिसे मैं नही समझता कि वह एक समाज के तौर पर हमें ग्राह्य हो पाएगा।"

दूसरे शब्दों में कहें तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का कहना है कि वह नफ़रती भाषण, गलत जानकारी और फर्जी खबरों से निपटने के लिए अधिकतम प्रयास कर रहा है। किसी को लगेगा कि इसका मतलब हुआ कि इस तरह की ज़्यादातर सामग्री को चिन्हित किया जा रहा है और हटाया जा रहा है। लेकिन हौगेन का कहना है कि "फ़ेसबुक दावा करती है कि वो 94 फ़ीसदी नफ़रती सामग्री हटा देती है, लेकिन इसके आंतरिक दस्तावेज़ कहते हैं कि कंपनी सिर्फ़ 3 से 5 फ़ीसदी नफरती सामग्री ही हटा पाती है। आखिर जब आप ज़्यादा सामग्री का उपभोग करते हैं, तो फ़ेसबुक ज़्यादा पैसे बनाती है।" फिर नफ़रत और गुस्सा लोगों को प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रखने के लिए बड़े प्रेरक हैं। 

हौगेन ने जो खुलासे किए हैं, उनके आधार पर गोंजालेज़ का मानना है कि "फ़ेसबुक को अच्छी तरह मालूम है कि उसका प्लेटफॉर्म कितने बड़े स्तर पर सामाजिक नुकसान कर रहा है।" बदतर यह कि "कंपनी मोटे तौर पर इन समस्याओं को ख़त्म करने के लिए कुछ नहीं कर रही है और फिर उसके बाद कांग्रेस समेत अमेरिकी जनता के सामने झूठ बोलती है और उन्हें गुमराह करती है।"

गोंजालेज़ को आशा है कि हौगेन द्वारा इन खुलासों के फ़ैसले कांग्रेस को स्तब्ध कर देने वाले मुद्दे पर कुछ सकारात्मक होगा। 5 अक्टूबर को सीनेट पैनल के सामने हौगेन की गवाही के दौरान, उनके सामने सांसदों ने तार्किक और सोचे-समझे सवाल रखे। वह कहती हैं, "हमने देखा कि दोनों पक्षों के सांसदों ने गंभीर सवाल पूछे। जो अमेरिकी सीनेट में दिखने वाले सर्कस से काफ़ी अलग था।"

गोंजालेज़ को आशा है कि कांग्रेस एक डेटा प्राइवेसी कानून पास करेगी, जो उपभोक्ताओं से इकट्ठा किए गए डेटा को नागरिक अधिकारों की तरह मानेगा। यह अहम है, क्योंकि फ़ेसबुक अपना बड़ा पैसा इस डेटा को विज्ञापन बनाने वालों को बेचकर कमाती है। गोंजालेज़ देखना चाहती हैं कि "हमारा और हमारे बच्चों के निजी डेटा का इस्तेमाल ख़तरनाक और नुकसानदेह सामग्री फैलाने में ना किया जाए। इसका इस्तेमाल नफ़रत, हिंसा व झूठ फैलाने में ना किया जाए।" 

फ़ेसबुक के इरादों को भांपना बिल्कुल आसान है। जकरबर्ग के इंकार के बावजूद, गोंजालेज़ कहती हैं कि "फ़ेसबुक का सिस्टम मुनाफ़े के लिए नफ़रत और झूठ के मॉडल पर आधारित है और फ़ेसबुक यह फ़ैसला ले चुकी है कि वो लोगों को सुरक्षित रखने के बजाए पैसा बनाएगी।" ऐसा नहीं है कि फ़ेसबुक इसलिए नफ़रत बेंच रही है कि लोकतंत्र को खत्म करना उसका एजेंडा है। बात इतनी है कि अगर मुनाफ़ा दांव पर लगा हो, तो लोकतंत्र को नुकसान उसके लिए बहुत मायने नहीं रखता।  

सोनाली कोल्हातकर फ्री स्पीच टीवी और पैसिफिका स्टेशन्स पर चलने वाले टीवी और रेडियो शो "राइजिंग अप विद सोनाली" की संस्थापक, प्रस्तुतकर्ता और एक्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं। वे इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट "इकनॉमी फॉर ऑल" की फैलो भी हैं। 

इस लेख को इंडिपेंडेंट मीडिया इंस्टीट्यूट के प्रोजेक्ट इकनॉमी फ़ॉर ऑल ने उत्पादित किया था।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

How Facebook’s Quest for Profits Is Paved on Hate and Lies

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