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पेट्रोल-डीज़ल पर बढ़ते टैक्स के नीचे दबते मज़दूर और किसान
वित्त वर्ष 2021-22 के पहले 4 महीने में, एक्साइज ड्यूटी से ही सरकार ने 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक की कमाई की है।
अजय कुमार
08 Sep 2021
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किसान और मजदूर मिलकर सरकारी खजाना भर रहे हैं। लेकिन सरकार किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी देने तक को तैयार नहीं है। बदले में किसानों को ही लाठियां मारती है। भारत का अधिकतर काम करने वाला हिस्सा या तो किसान है या मजदूर है। इसलिए पेट्रोल-डीजल पर लगने वाले भयंकर एक्साइज ड्यूटी की सबसे बड़ी मार कोई सह रहा है तो यह किसान और मजदूर वर्ग ही है। अगर पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी से सरकार का खजाना भर रहा है तो इसमें भी सबसे बड़ा सहयोगी किसान और मजदूर वर्ग ही है।

वित्त मंत्रालय की संस्था कंट्रोलर जनरल ऑफ अकाउंट्स का कहना है कि मौजूदा वित्त वर्ष के पहले 4 महीने में एक्साइज ड्यूटी की वजह से सरकार को एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा कमाई हुई है। यहां बंपर कमाई इसलिए है क्योंकि पिछले साल इन्हीं 4 महीनों में सरकार ने एक्साइज ड्यूटी से तकरीबन ₹68895 करोड़ रुपए की कमाई की थी। पिछले साल की कमाई से इस वित्त वर्ष की इस अवधि के लिए तकरीबन ₹32492 करोड़ अधिक कमाई है। प्रतिशत के हिसाब से देखें तो 48 फ़ीसदी का इज़ाफ़ा। 

लोगों को पलट कर पूछना चाहिए कि यह कमाई कहां जाती है? इतनी बड़ी रकम को हर साल लोगों से वसूल कर सरकार अपनी जेब में भरती है तो इस रकम का इस्तेमाल कहां करती है? आर्थिक जानकारों ने अपनी राय रखते हुए कहा कि सरकार को अगर टैक्स लगाने का हक है तो उसकी यह बताने की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह इन पैसों को कहां खर्च कर रही है? ऐसा तो नहीं हो सकता कि सरकार अपनी ताकत का गलत फायदा उठाते टैक्स पर टैक्स लगाती जाए और जनता के सामने हिसाब भी ना दे। 

सरकार हिसाब देने की बजाए बार-बार झूठ प्रचारित करते है।पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान को उठाकर देख लीजिए हर बार पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने के अलग-अलग कारण बताए गए होंगे। अभी हाल फिलहाल यूपीए सरकार के दौरान ऑयल कंपनियों को जारी किया गया ऑयल बॉन्ड पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाने के कारण के तौर पर बताया जा रहा था। जिस तरह की एक्साइज ड्यूटी की वसूली हुई है उसने फिर से दिखा दिया है कि सरकार का यह कारण पूरी तरह से झूठा कारण है। जनता को बरगलाने वाला कारण है। 

दरअसल हुआ यह था कि साल 2014 से पहले यूपीए की सरकार ने ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को ऑयल बॉन्ड दिया था। इसकी वजह यह थी कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को कम दाम में तेल बेचना पड़ता था और इसके बदले में जो नुकसान सहना पड़ता था उसकी भरपाई करने की जिम्मेदारी सरकार ने ले रखी थी। इसीलिए मार्केटिंग कंपनियों के नाम से ऑयल बॉन्ड जारी किया गया था। साल 2014 के पहले ऑयल बांड के बकाया के तौर पर सरकार को तकरीबन 1 लख 34 हजार करोड रुपए की राशि भुगतान करनी थी। मार्च 2015 में बकाया की राशि से घटकर 1 लाख 30 हजार करोड़ रुपए हो गई। तब से लेकर साल 2021 तक ऑयल बॉन्ड की मैच्योरिटी पूरी नहीं हुई। इसलिए सरकार ने कोई भुगतान नहीं किया। लेकिन इस दौरान हर साल तकरीबन 9990 करोड़ ब्याज की राशि सरकार पर देनदारी बनती थी। साल 2015 से लेकर 2021 तक देखें तो बांड के ब्याज के रूप में तकरीबन 59 हजार करोड़ रुपए की सरकार की देनदारी बनती है। 

निर्मला सीतारमण और धर्मेंद्र प्रधान जैसे मंत्री यह बयान देते हैं कि यूपीए सरकार के ऑयल बांड के पाप का भुगतान करने के लिए सरकार को एक्साइज ड्यूटी बढ़ानी पड़ रही है। लेकिन हकीकत यह है कि साल 2015 से लेकर 2021 के बीच एक्साइज ड्यूटी से सरकार ने तकरीबन 14 लाख 60 हजार 36 करोड़ रुपए की बंपर कमाई की है। इसमें से केवल 59 हजार करोड़ रुपए यानी कि केवल 4 फ़ीसदी हिस्सा ऑयल बांड के ब्याज के तौर पर देना पड़ा है। यानी सरकार सरासर झूठ बोल रही है। 

इस साल के आंकड़े भी यही हकीकत बयान कर रहे हैं। ऑयल बांड के ब्याज के भुगतान के तौर पर सरकार को 10 हजार करोड़ रुपए का भुगतान करना है जबकि सरकार ने पहले 4 महीने में ही एक्साइज ड्यूटी से एक लाख करोड़ से अधिक की कमाई कर ली है। 

माल और सेवा कर अधिनियम के लागू होने के बाद केवल पेट्रोल डीजल हवाई जहाज में भरे जाने वाले इंधन और प्राकृतिक गैस पर एक्साइज ड्यूटी लगती है। जिसमें से ज्यादातर कमाई केवल पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले एक्साइज ड्यूटी की वजह से होती है। भाजपा सरकार ने तो एक्साइज ड्यूटी से कमाई को अपना धंधा बना लिया है। इस धंधे को जनता के सामने सही बताने के लिए सरकार के जरिए जो भी तर्क दिए जाते हैं सब अंत में झूठे ही साबित होते हैं।

जैसा कि सबको मालूम है कि भारत के कई इलाकों में पेट्रोल की कीमत ₹100 के आंकड़े को पार कर चुकी है। हर हफ्ते पेट्रोल की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। इस तरह हर हफ्ते पेट्रोल की कीमतों में उतार-चढ़ाव पहले नहीं हुआ करता था। लेकिन अब हो रहा है। इसकी वजह है साल 2014 में अपनाई गई डीकंट्रोल की नीति। जिसका मतलब है कि तेल कंपनियां तय करेंगी कि उन्हें उपभोक्ताओं से कितनी कीमत वसूल करनी है। सरकार की इसमें कोई भागीदारी नहीं होगी। इसका मतलब यह होना चाहिए कि जैसे ही कच्चे तेल की कीमत नीचे गिरे उपभोक्ताओं से कम कीमत वसूली जाए और जैसे ही कच्चे तेल की कीमत ऊपर चढ़े उपभोक्ताओं से अधिक कीमत वसूली जाए।

सैद्धांतिक तौर पर यह होना चाहिए था। लेकिन यह नहीं होता है। जो होता है, वह यह है कि सरकार के पास टैक्स लगाने का अधिकार है। और सरकार जनता को ध्यान में रखकर नहीं, बल्कि अपनी जेब को ध्यान में रखकर पेट्रोल डीजल पर टैक्स लगाती है। इसलिए भले ही तेल की कीमत बहुत अधिक कम क्यों न हो जाए, लेकिन सरकार पेट्रोल और डीजल पर लगने वाला टैक्स कम नहीं करती है। इसलिए पेट्रोल कीमतें कभी भी कच्चे तेल की कीमतों के आधार पर बढ़ती और कम नहीं होतीं बल्कि सरकार के जरिए लगाए गए टैक्स के आधार पर बढ़ती और कम होती हैं।

वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार विवेक कौल अपने ब्लॉग पर लिखते हैं कि जहां तक टैक्स का खेल है तो वह यह है कि साल 2014 में सरकार पेट्रोल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी लगा कर तकरीबन ₹10 वसूल करती थी और डीजल पर तकरीबन ₹4, पेट्रोल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी का पैसा बढ़कर अप्रैल 2020 में तकरीबन ₹22 हो गया और डीजल पर बढ़कर तकरीबन ₹18 हो गया। पिछले साल अप्रैल से लेकर फरवरी 2021 तक फिर से इसमें ₹10 का इजाफा हुआ है। मौजूदा समय में पेट्रोल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी के तौर पर ₹32 और डीजल पर ₹31 की वसूली की जा रही है। जबकि रिफाइंड कच्चे तेल की प्रति लीटर कीमत मात्र ₹32 है।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल की डेटा से पता चलता है कि मोदी सरकार को साल 2014-15 में जब वह चुनकर आई थी तब पेट्रोल पर लगने वाली सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी के तौर पर तकरीबन 99,000 करोड़ रुपए की राशि मिली थी। साल 2019-20 के वित्त वर्ष में यह राशि बढ़कर 2 लाख 35 हजार करोड़ के पास पहुंच गई। साल 2020-21 का आंकड़ा कहता है कि पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी की वजह से केंद्र सरकार को तकरीबन 3 लाख करोड़ रुपए मिले हैं।

साल 2021- 22 के लिए अर्थशास्त्रियों की उम्मीद है कि पेट्रोलियम उत्पादों से केंद्र सरकार 3 लाख करोड़ रुपए से भी अधिक की टैक्स वसूली होगी। यानी ध्यान से देखा जाए तो साल 2014-15 के बाद मोदी सरकार ने पेट्रोल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी से होने वाली कमाई को नीति की तरह अपनाया है। केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पाद पर लगने वाले टैक्स से बंपर कमाई की है। केवल केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि राज्य सरकार भी पेट्रोल पर वैल्यू ऐडेड टैक्स लगाकर कमाई करती हैं। दिल्ली में यह क़रीब ₹21 के आसपास है।

राज्य सरकार इसका विरोध इसलिए नहीं करती हैं क्योंकि राज्य सरकार द्वारा लगा वैल्यू ऐडेड टैक्स- कच्चे तेल की कीमत, डीलर के कमीशन, और सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी तीनों के कुल जमा पर लगता है। यानी सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी अधिक होगी तो राज्य सरकार को पेट्रोल पर अधिक राजस्व मिलने की संभावना होगी।

पेट्रोल पर इतना अधिक सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी वसूलने के बाद भी केंद्र सरकार के कुल जीडीपी में कुल टैक्स वसूली का हिस्सा 2017-18 के वित्त वर्ष के बाद से घटता ही जा रहा है। साल 2017-18 में कुल टैक्स वसूली जीडीपी का तकरीबन 11 फ़ीसदी हुई थी। जो अब घटकर 10 फ़ीसदी तक पहुंच गई है।

इसका मतलब यह है कि भले ही सरकार पेट्रोल पर पहले से ज्यादा टैक्स की वसूली कर रही हो, लेकिन कुल टैक्स की मात्रा जीडीपी के हिसाब से देखी जाए तो पहले से कम हो गई है। निष्कर्ष के तौर पर अगर यह कहा जाए कि पहले मिलने वाले टैक्स के पैसे से अगर जनकल्याण की नीतियां ढंग से लागू नहीं हो पाईं तो अब मिलने वाले टैक्स के पैसे से तो जनकल्याण की नीतियां, पहले के मुकाबले और भी बुरी तरीके से लागू होंगी, क्योंकि कुल टैक्स जरूरत के हिसाब से पहले से भी कम मिल रहा है।

कम टैक्स वसूली के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत की जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्था को मिला कोरोना का साथ तो है ही। लेकिन दूसरा बड़ा कारण यह भी है कि धीरे-धीरे सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स की वसूली बहुत कम कर दी है। और वह भी तब जब कारपोरेट महामारी के दौर में भयंकर कमाई कर रहे हैं।

साल 2020 में 100 बिलेनियर की संपत्ति में हुए इजाफे को अगर सबसे गरीब 10 फ़ीसदी लोगों में बांट दिया जाए तो हर एक व्यक्ति को तकरीबन ₹1 लाख मिल सकता है। इस तरह की प्रवृत्ति वाले समाज में जहां पर अमीर कॉरपोरेट्स अमीर हुए जा रहे हैं, वहां पर कॉरपोरेट को खुली छूट दी गई है। साल 2018 में कॉरपोरेट को रियायत के तौर पर तकरीबन 1 लाख 45 हजार करोड़ रुपए की छूट दी गई।

एक अध्ययन के मुताबिक साल 2010 में केंद्र सरकार के प्रति 100  रुपए के राजस्व में कंपनियों से 40 रुपए और आम लोगों से 60 रुपए आते थे। 2020 में कंपनियां केवल 25 रुपए दे रही हैं और आम लोग दे रहे हैं 75 रुपए।

कहने का मतलब यह है कि भारतीय राज्य की कमाई का बड़ा सोर्स आम लोग हैं न कि कॉरपोरेट। एक समय के लिए अगर भारतीय राज्य को एक कंपनी मान लिया जाए तो कंपनी में आम लोगों का पैसा ज्यादा लग रहा है, धनिक लोगों का पैसा कम, लेकिन मुनाफा धनिक लोगों का ज्यादा हो रहा है।

हद से ज्यादा टैक्स लगाने की वजह से सबसे बड़ा परिणाम तो यह मिला है कि महंगाई छप्पर फाड़ कर बढ़ रही है। सारे विश्लेषक महंगाई के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में टैक्स को लेकर हो रहे इजाफे को दोषी बताते हैं। बीते 7 साल में पेट्रोल-डीजल से टैक्स संग्रह 700 फीसद बढ़ा है। महंगाई की सबसे अधिक मार भी किसान और मजदूर वर्ग को ही सहनी पड़ रही है और सबसे अधिक टैक्स भी यही वर्ग भुगतान कर रहा है।  

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