NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
उत्पीड़न
चुनाव 2022
नज़रिया
विधानसभा चुनाव
भारत
राजनीति
जनादेश-2022: रोटी बनाम स्वाधीनता या रोटी और स्वाधीनता
राष्ट्रवाद और विकास के आख्यान के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने रोटी और स्वाधीनता के विमर्श को रोटी बनाम स्वाधीनता बना दिया है।
अरुण कुमार त्रिपाठी
11 Mar 2022
poverty

सन 2022 के पांच विधानसभा के चुनाव परिणामों ने एक पुरानी बहस को नए संदर्भ में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि हमें रोटी बनाम स्वाधीनता चाहिए या रोटी और स्वाधीनता चाहिए। सवाल यह है कि हमें सत्ता के नमक का हक अदा करना है या फिर हमें सत्ता से समाज की सेवा करानी है। आज महाभारत का वह सवाल फिर से खड़ा हो गया है जो कृष्ण ने कर्ण के सामने खड़ा किया था और जिस दुविधा में कर्ण ने गलत मार्ग पर चल कर अपने को इतिहास के गर्त में दफना दिया। कृष्ण ने कर्ण से कहा था कि पांडवों के साथ धर्म है और आप उनके बड़े भाई हैं इसलिए आप उनके शिविर में चलिए। इस पर कर्ण कहते हैं, “केशव, आपने तो मेरा पूरा अस्तित्व ही खतरे में डाल दिया है। दुर्योधन जिसके मुझ पर एहसान है, मैं इस संकट के समय कैसे उसका साथ छोड़कर कह सकता हूं कि मैं तुम्हारी ओर से नहीं लड़ सकता क्योंकि पांडव मेरे भाई हैं।” एहसान का यह बोझ हमारे लोकतंत्र पर बड़ा भारी पड़ रहा है और उसे दीमक की तरह काट-काट कर खोखला कर चुका है। उसने अगर कालांतर में कर्ण जैसे योद्धा और दानी को दुर्योधन को गुलाम बना दिया था तो आज लाभार्थी वर्ग के बहाने निर्मित हुए विकास योद्धाओं के गले में गुलामी का पट्टा बांधा जा रहा है। कई वीडियो आए हैं जिसमें महिलाएं और बूढ़े लोग कह रहे हैं कि हमने उनका नमक खाया है, हमें उसका हक अदा करना है।

भूखे भारत को जब आजादी मिली तो इस देश के संवेदनशील बौद्धिक वर्ग के समक्ष यही चिंता थी कि कहीं भूख में बिलबिलाता नागरिक अपनी आजादी को खो तो नहीं देगा। उसी चिंता को रामधारी सिंह दिनकर ने  `रोटी और स्वाधीनता’ जैसी कविता में व्यक्त किया था-----

आजादी तो मिल गई मगर यह गौरव कहां जुगाएगा

मरभुखे!  इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा?

आजादी रोटी नहीं मगर दोनों में कोई वैर नहीं।

पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।

हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देने वाले।

पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेने वाले।

इसके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्ष सह सकता है?

 है कौन पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है?

 झेलेगा यह बलिदान भूख की घनी चोट सह पाएगा?

 आ गई विपद तो क्या प्रताप सा घास चबा रह जाएगा?

है बात बड़ी आजादी का पाना ही नहीं जुगाना भी।

बलि एक बार ही नहीं उसे पड़ता फिर फिर दोहराना भी।।

दशकों पहले लिखी गई दिनकर की यह कविता आज फिर भारतीय समाज और उसकी राजनीति के सामने प्रश्नचिह्न की तरह खड़ी हो गई है। इसी कविता के प्रिज्म से हमें 2022 के चुनाव को देखना चाहिए। बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्व की आंतरिक संरचना पर टिप्पणी किए बिना हम यह कह सकते हैं कि इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को तीन राज्यों में दोबारा और एक राज्य में तीसरी बार सत्ता में लाने में लाभार्थी योजनाओं की अपनी भूमिका थी। बल्कि कहा तो यहां तक जा रहा है कि राम और राशन ने मिलकर भाजपा को एक चक्रवर्ती दल के रूप में स्थापित कर दिया है और 2024 के चुनाव का परिणाम निर्धारित हो गया है। मीडिया और राजनीतिशास्त्रियों ने मान लिया है कि अब उसके सामने राष्ट्रीय स्तर पर कोई चुनौती नहीं है और क्षेत्रीय स्तर पर जो चुनौती है उसे वे चुटकी बजाते हुए ध्वस्त कर देंगे।

विश्लेषकों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी महज राम मंदिर और विश्वनाथ कोरीडोर, गोरक्षा, धर्मांतरण और लव जिहाद के नाम पर यह चुनाव नहीं जीत सकती थी। उसके सामने कोराना जैसी महामारी के दौरान किए गए जबरदस्त कुप्रबंधन, आंदोलनों के दौरान किए गए दमन, महंगाई, बेरोजगारी और आवारा पशुओं की बड़ी चुनौती थी। वह महज बुलडोजर यानी कानून व्यवस्था और माफिया विरोधी अभियान के सहारे भी नहीं इतनी बड़ी जीत तक पहुंच सकती थी। उसने पहले जिनकी नौकरियां ली थीं उन बेरोजगारों की बड़ी फौज को मुफ्त में राशन दिया और नमक के साथ सरसों का तेल भी दिया। स्कूली बच्चों को यूनिफार्म खरीदने के लिए उनके अभिभावकों को धन दिए और ई-श्रम योजना के तहत खाते में नकद हस्तांतरण किए। किसानों को पीएम किसान सम्मान योजना के तहत धन दिए। इस तरह जनता ने यह कहना शुरू कर दिया कि क्या हमें कभी किसी ने कुछ दिया है ? लेकिन इसी के साथ जनता यह भी मान रही थी कि केंद्र और राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश की सरकार ने चुस्त प्रशासन के नाम पर राज्य को पुलिस स्टेट में बदल दिया था। पर उसने चुना रोटी को ही। उसे स्वाधीनता के नाम पर धार्मिक स्वाभिमान को अपनाया। 

भाजपा और उसके सहारे केंद्र और राज्य में शासन करने वाले नेता यह जानते हैं कि भूखे भजन न होई गोपाला। इसलिए धर्म की माला अगर जपनी है तो पेट में अनाज भी होना ही चाहिए। जब जानवर खेत चर जाएंगे तो अगर खाने के लिए सरकार भी अनाज नहीं देगी तो क्या लोग मंदिर के बाहर बैठेंगे दान लेने के लिए ?  न ही यह लाल बहादुर शास्त्री और नेहरू का युग है कि जनता से एक वक्त उपवास की अपील की जा सकती है। 

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या रोटी देने, एक्सप्रेस-वे बनाने और मेडिकल कालेज खोलने की एवज में आजादी छीनी जा सकती है और लोग उसे छीन लिए जाने देंगे?  1975 में इंदिरा गांधी ने वैसा प्रयास किया था और 1977 में लोगों ने साफ कह दिया था हमें सिर्फ रोटी नहीं चाहिए हमें आजादी भी चाहिए। तब न तो मीडिया इतना सशक्त था और न ही जनता इतनी जागरूक और पढ़ी लिखी। वरना इंदिरा गांधी के 20 सूत्री कार्यक्रम में उस समय ठीक गुंजाइशें थीं लोगों को जीने खाने के लिए। चारों ओर नारे लिखे होते थे कि-- काम अधिक बातें कम, अनुशासन ही देश को महान बनाता है।

दरअसल राष्ट्रवाद और विकास के आख्यान के माध्यम से भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने रोटी और स्वाधीनता के विमर्श को रोटी बनाम स्वाधीनता बना दिया है। विकास के नारे के साथ जो कहानी गढ़ी जा रही है उसका क्रम कुछ इस प्रकार बन रहा है---रोटी बनाम स्वाधीनता बनाम राष्ट्र। यानी अगर राष्ट्र का सवाल उठ गया तो रोटी और स्वाधीनता दोनों छीनी जा सकती है। यहां राष्ट्र का मतलब एक धर्म विशेष की रक्षा से है, एक काल्पनिक चित्र की पूजा से और कुछ विशेष नेताओं के प्रति नतमस्तक होने से है।

भारत के राष्ट्रनिर्माताओं में समता मूलक समाज बनाने के हिमायती लोगों की खासी संख्या थी। उनमें समाजवादी और साम्यवादी नेता अग्रणी थे। लेकिन महात्मा गांधी और डा आंबेडकर भी समतामूलक समाज ही बनाना चाहते थे। वे यूरोप के साम्यवादी देशों की तर्ज पर स्वाधीनता को मुअत्तल करके रोजी रोटी और जीवन की दूसरी सुविधाओं का सवाल हल करने के हिमायती नहीं थे। आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण और डा राम मनोहर लोहिया ने भारतीय समाजवाद की इन्हीं अर्थों में व्याख्या की है। भारत के वामपंथियों ने भी चुनावी राजनीति में प्रवेश करके दोनों प्रतीकों को एक साथ लेकर चलने की राजनीति की है। यही भारत का विचार है। यही लोकतंत्र का विचार है। डा आंबेडकर ने संविधान में भी यही व्यवस्था की है और अपने काठमांडू के भाषण में उन्होंने बुद्धवाद और मार्क्सवाद की तुलना करते हुए इसी फार्मूले को सही बताया है।

लेकिन आज हिंदू अस्मिता और बहुसंख्यकवाद के लिए रोटी और स्वाधीनता को बनाम बनाया जा रहा है। अगर आपको राशन मिल रहा है, ई श्रम कार्ड से धन मिल रहा है, किसान सम्मान निधि मिल रही है और स्कूलों में मिड डे मील और बस्ते व यूनिफार्म के लिए धन मिल रहा है, आवास योजना के तहत घर मिल रहा है और अच्छी सड़क पर चलने को मिल रहा है तो सवाल मत पूछिए और खामोश रहिए। जब चुनाव आए तो नमक का हक अदा कीजिए। दोष इन सुविधाओं को देने और उन्हें प्राप्त करने में नहीं है लेकिन उसके बदले आजादी को गिरवी रख देने और कारपोरेट व धर्म केंद्रित विकास को स्वीकार्य करने में है।

सवाल उठता है कि आखिर क्यों संविधान, स्वतंत्रता संग्राम और इस देश की बहुलतावादी परंपरा को दरकिनार करके इस तरह का आख्यान और राजनीति खड़ी की जा रही है, जहां देश कांग्रेस मुक्त हो, विपक्ष मुक्त हो और लोकतंत्र मुक्त हो। इसके दो कारण हैं। एक कारण तो नेतृत्व का अपना स्वभाव भी होता है जो अपने आलोचकों को सहने को तैयार नहीं रहता और अपनी बात को ही सर्वश्रेष्ठ मानता है वह अपने आलोचकों और विपक्ष को साजिशकर्ता मानता है। दूसरा कारण बहुसंख्यकवाद है जो चाहता है कि अल्पसंख्यक समाज राशन लाभार्थी बन जाए और नागरिकता छोड़ दे। तीसरा बड़ा कारण वैश्वीकऱण की वे नीतियां हैं जो समझ चुकी हैं कि अगर चैतन्य और सक्रिय लोकतंत्र रहा तो खेती और प्राकृतिक संसाधनों पर पूरी तरह कब्जा करने का उसका लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसलिए भारत के विचार के विरुद्ध नई कहानी गढ़ी जा रही है। अब देश का बौद्धिक वर्ग भी इस कहानी पर रीझ रहा है। वह उसे गरीबों के अनुकूल बता रहा है। वह उसे महिलाओं के अनुकूल बता रहा है और उसे अल्पसंख्यकों के अनुकूल भी बता रहा है।

आने वाला समय चुनौतियों भरा है। एक तो लोगों को रोजगार देने की गंभीर समस्या पैदा होगी। क्योंकि सूचना प्रौद्योगिकी उसके अवसर कम करने वाली है। इसलिए लोगों को पेट भर अनाज देकर और मोबाइल व मोटरसाइकिल चलाने के लिए कुछ खर्च देकर खामोश बैठने की आदत डाली जा रही है। यहां फिर दिनकर का वह सवाल उठ खड़ा होता है कि क्या भारत के लोग आजादी को जुगाने के लिए उठेंगे?

Hindu Nationalism
Hunger Crisis
poverty
unemployment
Hyper-nationalism in India
BJP
RSS
Assembly Elections 2022

Related Stories

हैदराबाद : मर्सिडीज़ गैंगरेप को क्या राजनीतिक कारणों से दबाया जा रहा है?

UPSI भर्ती: 15-15 लाख में दरोगा बनने की स्कीम का ऐसे हो गया पर्दाफ़ाश

भोजन की भारी क़िल्लत का सामना कर रहे दो करोड़ अफ़ग़ानी : आईपीसी

2023 विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र तेज़ हुए सांप्रदायिक हमले, लाउडस्पीकर विवाद पर दिल्ली सरकार ने किए हाथ खड़े

जहांगीरपुरी— बुलडोज़र ने तो ज़िंदगी की पटरी ही ध्वस्त कर दी

अब भी संभलिए!, नफ़रत के सौदागर आपसे आपके राम को छीनना चाहते हैं

एक आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्रनिर्माण की डॉ. आंबेडकर की परियोजना आज गहरे संकट में

मुस्लिम जेनोसाइड का ख़तरा और रामनवमी

बढ़ती हिंसा व घृणा के ख़िलाफ़ क्यों गायब है विपक्ष की आवाज़?

पश्चिम बंगाल: विहिप की रामनवमी रैलियों के उकसावे के बाद हावड़ा और बांकुरा में तनाव


बाकी खबरें

  • migrant
    सोनिया यादव
    महामारी का दर्द: साल 2020 में दिहाड़ी मज़दूरों ने  की सबसे ज़्यादा आत्महत्या
    30 Oct 2021
    एनसीआरबी के आँकड़ों के मुताबिक़ पिछले साल भारत में तकरीबन 1 लाख 53 हज़ार लोगों ने आत्महत्या की, जिसमें से सबसे ज़्यादा तकरीबन 37 हज़ार दिहाड़ी मजदूर थे।
  • UP
    लाल बहादुर सिंह
    आंदोलन की ताकतें व वाम-लोकतांत्रिक शक्तियां ही भाजपा-विरोधी मोर्चेबन्दी को विश्वसनीय विकल्प बना सकती है, जाति-गठजोड़ नहीं
    30 Oct 2021
    पिछले 3 चुनावों का अनुभव गवाह है कि महज जातियों के जोड़ गणित से भाजपा का बाल भी बांका नहीं हुआ, इतिहास साक्षी है कि जोड़-तोड़ से सरकार बदल भी जाय तो जनता के जीवन में तो कोई बड़ी तब्दीली नहीं ही आती, संकट…
  • Children playing in front of the Dhepagudi UP school in their village in Muniguda
    राखी घोष
    ओडिशा: रिपोर्ट के मुताबिक, स्कूल बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में निम्न-आय वाले परिवारों के बच्चे सबसे अधिक प्रभावित
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट इस तथ्य का खुलासा करती है कि जब अगस्त 2021 में सर्वेक्षण किया गया था तो ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 28% बच्चे ही नियमित तौर पर पठन-पाठन कर रहे थे, जबकि 37% बच्चों ने अध्ययन बंद कर दिया था।…
  • climate change
    संदीपन तालुकदार
    जलवायु परिवर्तन रिपोर्ट : अमीर देशों ने नहीं की ग़रीब देशों की मदद, विस्थापन रोकने पर किये करोड़ों ख़र्च
    30 Oct 2021
    रिपोर्ट के अनुसार, विकसित देश भारी हथियारों से लैस एजेंटों को तैनात करके, परिष्कृत और महंगी निगरानी प्रणाली, मानव रहित हवाई प्रणाली आदि विकसित करके पलायन को रोकने के लिए एक ''जलवायु दीवार'' का…
  • mmummies
    संदीपन तालुकदार
    चीन के तारिम बेसिन ममी : डीएनए विश्लेषण से सामने आए हैरान करने वाले तथ्य
    30 Oct 2021
    27 अक्टूबर को 'नेचर' में प्रकाशित नए अध्ययन से पता चलता है कि यह ममी कुछ स्वदेशी लोगों के अवशेष हैं जिन्होंने शायद अपने पड़ोसी समूहों से कृषि विधियों को अपनाया था।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License