NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
सोशल मीडिया ट्रेंड के संस्थानों पर पड़ने वाले प्रभावों पर विमर्श अब ज़रूरी : मुख्य न्यायाधीश
मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना ने बुधवार को कहा कि अब यह ज़रूरी हो गया है कि सोशल मीडिया ट्रेंड कैसे संस्थानों को प्रभावित करते हैं, इस विषय पर चर्चा शुरू की जाए।
द लीफ़लेट
02 Jul 2021
: मुख्य न्यायाधीश

भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना ने कहा कि अब इस बात पर विमर्श करना जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया ट्रेंड कैसे संस्थानों को प्रभावित करते हैं।

मुख्य न्यायाधीश ने 17वें पी डी देसाई मेमोरियल लेक्चर में "कानून के शासन" पर अपनी बात रखने के दौरान यह टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा, "जहां कार्यपालिका की तरफ से आने वाले भारी दबाव पर बहुत चर्चा की जाती है, उसके साथ अब जरूरी हो गया है कि सोशल मीडिया ट्रेंड संस्थानों को कैसे प्रभावित करते हैं, इसके ऊपर भी विमर्श शुरू किया जाए।"

हालांकि न्यायाधीश रमना ने साफ़ कहा कि इसका मतलब यह नहीं समझा जाना चाहिए कि न्यायपालिका और न्यायाधीशों को वर्तमान में जारी चीजों से पूरी तरह कट जाना चाहिए। न्यायाधीश किलों में बंद रहकर सामाजिक मुद्दों से जुड़े फ़ैसले नहीं दे सकते।

उन्होंने कहा कि पूर्वाग्रह और पक्षपात से अन्याय होगा, खासकर तब जब मामला अल्पसंख्यकों से संबंधित हो, ऐसी संभावना और बढ़ जाती है। इसलिए वंचित तबकों के लिए जब कानून के शासन के सिद्धांत को लागू किया जाता है, तो उसे इन समुदायों का विकास रोकने वाली सामाजिक स्थितियों के प्रति ज़्यादा समावेशी होना पड़ता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सरकारी शक्ति और कार्रवाई से संतुलन बैठाने के लिए न्यायपालिका को पूरी स्वतंत्रता मिलना जरूरी होता है। CJI रमना ने कहा, "न्यायपालिका को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से विधायिका या कार्यपालिका द्वारा नियंत्रित नहीं किया जा सकता। नहीं तो कानून का शासन सिर्फ़ कल्पनाओं में रह जाएगा। ठीक इसी दौरान यह भी याद रखना चाहिए कि न्यायाधीशों को जनमत के हिसाब से भावनाओं में नहीं बहना चाहिए, क्योंकि इस मत को सोशल मीडिया मंचों से बढ़ाकर पेश किया जाता है।"

न्यायाधीशों को दिमाग से काम लेना चाहिए, क्योंकि जिस बात का ज़्यादा हो-हल्ला हो रहा हो, जिसमें बहुमत का यकीन हो, जरूरी नहीं है कि वह सही चीज को प्रदर्शित कर रही हो।

उन्होंने कहा, "नए मीडिया उपकरणों के पास जनमत को एक पक्ष में झुकाने की बहुत ज़्यादा क्षमता होती है, लेकिन इनमें सही या गलत, असली या नकली में अंतर की योग्यता नहीं होती। इसलिए मीडिया ट्रायल न्यायिक फ़ैसलों में निर्देशित करने वाला तत्व नहीं हो सकता। इसलिए स्वतंत्र ढंग से अपने क्रियाकलापों को चलाना और सभी तरह के बाहरी दबाव में भी खड़े रहना जरूरी हो जाता है।"

CJI रमना ने इस बात पर जोर दिया कि कानूनों को पूरी तरह साफ़ और सुलभ होना चाहिए; गुप्त कानून की कोई जगह नहीं होती। इसके अलावा कानून को समानता के आधार पर लागू किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि "न्याय की सुलभता", "कानून के समक्ष समता" का अहम पहलू होता है।

जस्टिस रमना ने कहा, "मुझे इस बात पर जोर देना होगा कि हमारे जैसे लोकतांत्रिक देश में न्याय तक पहुंच, कानून के शासन का आधार बनाता है। अगर वंचित तबके अपनी गरीबी, अशिक्षा या दूसरी कमजोरियों के चलते अपने अधिकारों का उपयोग नहीं कर पाएंगे, तो समान न्याय की गारंटी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। भारत में 'लीगल ऐड अथॉरिटी' को करीब़ 70 फ़ीसदी आबादी की सेवा करनी होती है, मतलब यह लोग मुफ़्त में कानूनी सहायता के हक़दार होते हैं, ऐसे में भारत का 'कानूनी सहायता तंत्र' दुनिया के सबसे बड़े कानूनी सहायता ढांचों में से एक बन जाता है।"

CJI रमना ने लैंगिक समानता पर भी बात रखी। उन्होंने कहा कि महिलाओं के कानूनी सशक्तिकरण से ना केवल उन्हें समाज में अपने अधिकारों और जरूरतों के प्रति आवाज़ उठाने की ताकत मिली है, बल्कि इससे कानूनी सुधार प्रक्रिया में उनकी भागीदारी भी बढ़ी है।

जस्टिस रमना ने कहा कि कुछ सालों में शासक बदलने का अधिकार, तानाशाही के खिलाफ़ पुख़्ता प्रबंध नहीं कर देता। यह विचार कि जनता ही आखिर में संप्रभु है, वह मानवीय सम्मान और स्वायत्ता के विचार में पाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा, "एक तार्किक जनविमर्श, मानवीय सम्मान का आंतरिक तत्व होता है। इसलिए यह सुचारू लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी होता है। जैसा प्रोफ़ेसर जूलियस स्टोन ने अपनी किताब 'द प्रोविंस ऑफ़ लॉ' में लिखा- चुनाव, रोजाना होने वाले राजनीतिक विमर्श, आलोचना और विरोध प्रदर्शन की आवाज़ें लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए जरूरी हैं।"

मुख्य न्यायाधीश ने कानून के शासन को बनाए रखने में वकीलों की भूमिका पर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि वकीलों के लिए जरूरी होता है कि वे अपना कर्तव्य का पालन पूरे सम्मान और कानूनी प्रक्रिया के हिसाब से करें, जिसमें कोर्ट, प्रतिपक्ष के वकील, मुवक्किल, पीड़ित, गवाह और प्रक्रिया में शामिल दूसरे लोगों का पूरा सम्मान हो।

जस्टिस रमना कहते हैं, "हमें आर्थिक पहलू से प्रेरित स्वहित में काम करने वाले नहीं, बल्कि सामाजिक गुणों से प्रेरित व्यवहार की जरूरत है।"

उन्होंने आगे कहा, "हमें सामाजिक जवाबदेही के बारे में एक पेशेवर विचारधारा की जरूरत है। मैं यहां युवा और वरिष्ठ वकीलों से जरूरतमंदों की तरफ हाथ बढ़ाने की गुजारिश करता हूं। न्याय तक पहुंच को सुलभ बनाना सामाजिक न्याय से कम नहीं है। यह तय किया जाए कि आर्थिक हालात, लिंग, वर्ग या जाति कभी न्याय पाने की राहत में बाधा ना बने।"

यह लेख मूलत: द लीफ़लेट में प्रकाशित हुआ था।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें।

Imperative to Start Talking About Impact of Social Media Trends on Institutions: CJI

Social Media Trends
NV Ramana
rule of law
Indian Legal Aid system

Related Stories

मैरिटल रेप को आपराधिक बनाना : एक अपवाद कब अपवाद नहीं रह जाता?

ज़ुल्म के दरवाज़े खोलते जम्मू-कश्मीर के नये सेवा नियम

पेगासस के शिकार हुए पत्रकारों की सुप्रीम कोर्ट में याचिका

क्या यह पेगासस की आख़िरी उड़ान है ?

असहमति कुचलने के लिए आतंक-निरोधक क़ानून का दुरुपयोग हरगिज़ न हो : जस्टिस डीवाइ चंद्रचूड़

सुप्रीम कोर्ट ने कैसे एक अच्छे न्यायिक पल को दर्दनाक बना दिया

जीसस से जयललिता तक : क्या 'बहुमत' ग़लत हो सकता है?


बाकी खबरें

  • ganga
    सबरंग इंडिया
    गंगा मिशन चीफ ने माना- कोरोना की दूसरी लहर में लाशों से ‘पट’ गई थी गंगा, योगी सरकार करती रही इनकार
    27 Dec 2021
    कोरोना की विनाशकारी दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश में गंगा नदी ‘लाशों को फेंकने की आसान जगह’ बन गई थी। ये दावा एक नई किताब में किया गया है जिसके लेखक नेशनल मिशन टू क्लीन गंगा के महानिदेशक और नमामि…
  • Adityanath and Yogi
    सुबोध वर्मा
    कितना प्रभावी है यूपी का 'डबल इंजन'? 
    27 Dec 2021
    उत्तर प्रदेश के कुछ प्रमुख आर्थिक संकेतक इस दावे को झूठा साबित करते हैं कि मोदी-योगी का 'डबल इंजन' शासन का मॉडल लोगों के लिए अच्छा है।
  • covid
    न्यूज़क्लिक टीम
    कोरोना अपडेट: देश में 24 घंटों में 6,531 नए मामले, ओमिक्रॉन के मामले बढ़कर 500 के पार पहुंचे 
    27 Dec 2021
    देश में ओमीक्रॉन का ख़तरा लगातार बढ़ता ही जा रहे है। ओमीक्रॉन देश के अब तक 19 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेश में फ़ैल चुका है, और कुल मामलों की संख्या बढ़कर 578 हो गयी है |
  • Narendra Singh Tomar
    अफ़ज़ल इमाम
    तोमर का बयान- एक तीर से दो निशाने !
    27 Dec 2021
    सूत्रों का मानना है कि किसानों की नई नवेली पार्टियों को मुद्दा थमाने के लिए तोमर ने यह बयान दिया है, ताकि इन दोनों राज्यों में उन्हें सक्रिय होने और जन समर्थन हासिल करने का मौका मिल सके।
  • Jammu and Kashmir
    द लीफलेट
    मुद्दा: जम्मू-कश्मीर परिसीमन आयोग का प्रस्ताव आख़िर क्यों है विवादास्पद
    27 Dec 2021
    जहां जम्मू को छह नयी विधानसभा सीटें मिलेंगी,वहीं कश्मीर को महज़ एक और अतिरिक्त सीट से संतोष करना होगा।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License