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भारत और अफ़ग़ानिस्तान:  सामान्य ज्ञान के रूप में अंतरराष्ट्रीय राजनीति
भारत केवल घरेलू राजनीति में मशगूल रहने की बजाए, क्षेत्रीय सुरक्षा की चिंताओं का भी ध्यान रखे, और दक्षेस (SAARC) समूह को पुनरुज्जीवित करने के लिए अवश्य कोई रास्ता निकाले। 
पार्थ एस घोष
20 Sep 2021
SAARC
चित्र सौजन्य: दि डिप्लोमेटिस्ट 

अफगानिस्तान में हालिया हुए घटनाक्रमों ने विशेषज्ञों को हलकान-परेशान कर दिया है। फिर भी वे इसमें आनंद लेते हुए खुद को व्यस्त रखे हुए हैं। जो लोग आखिरी दिन तक तालिबान की अचानक जीत को भांप नहीं सके थे, वे सब के सब रातोंरात भविष्यवक्ता हो गए हैं कि उस बदनसीब देश में आगे और क्या-क्या होने वाला है।

विश्व राजनीति का चाहे कुछ भी हो जाए, संघर्षों पर जीने वाली जनजाति लगातार संघर्ष में ही फलती-फूलती रहती है। मुझे घिसी-पिटी सैन्य-औद्योगिक जटिलता की धारणा के बारे में बात नहीं करनी है, मुझे तो एक संघर्षों में जकड़ी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में इसके अंतर्निहित भौतिक हित के बारे में बात करनी चाहिए। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर पहले से ही काफी शोध-अनुसंधान किए गए हैं। 

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के उदात्त सिद्धांतों के पीछे में हम जिस चीज को नजरअंदाज करते हैं, वह है, हमारा सरल सामान्य ज्ञान। लेकिन ऐसा न हो कि हम भूल जाएं। हम एक स्वर्णिम कहावत को हमेशा याद रखना चाहिए : सामान्य ज्ञान दुनिया में सर्वाधिक असाधारण चीज है। इसको निम्नलिखित कसौटी पर परखें और आप इन उदाहरणों में सामान्य ज्ञान के ध्वस्त होने का एक तर्क पाएंगे। 

एक, अगर संयुक्त राज्य अमेरिका अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक जाना-माना दादा है, जिसका अफगानिस्तान में पहले से कोई वास्ता ही नहीं था, तो अब हम उसके वहां से बोरिया-बिस्तर समेट कर चले आने के लिए उसकी निंदा क्यों करते हैं? कोई व्यक्ति चित भी मेरी, पट भी मेरी जैसा तर्क कैसे दे सकता है। 

दो, क्या पाकिस्तान 1971 में अपने पूर्वी हिस्से (जो अब बांग्लादेश है।) को गंवा देने के बाद से ही अफगान नैरेटिव पर अपना दखल जमाने के जरिए वहां एक “सामरिक गहराई” वाला संबंध स्थापित करने के फिराक में नहीं था? यदि ऐसा है, तो वह अपने शागिर्द, तालिबान, की जीत का जश्न क्यों नहीं मनाएं, अगर आज उस पर वह अपना दावा जता रहा है तो इस पर किसी को ताज्जुब क्यों होना चाहिए? 

तीन, 9/11 हमले के समय से जब अमेरिका पाकिस्तान से मिल कर अफगानिस्तान के भाग्य का निर्णायक हो गया, तब भारत युद्ध के पचड़े में न पड़ कर स्वयं को वहां की विकास-परियोजनाओं तक ही सिमटा लिया था। यदि ऐसा है, तो भारत का उसके लिए अचानक मध्यस्थकार होना सिर्फ इसलिए मायनेखेज हो जाएगा कि बारम्बारता के आधार पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षी अभी उसके पास है?

चार। भारत ने दक्षेस को निष्क्रिय हो जाते देखा है, जब एक आतंकवाद-प्रायोजित देश के रूप में पाकिस्तान ने सितम्बर 2016 में भारत के उरी सेक्टर में हमले किए थे। ठीक है। तो क्या यही भारत शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) में अभी पूरे उत्साह से भागीदारी नहीं कर रहा है, जिसका पाकिस्तान न केवल सक्रिय सदस्य है, बल्कि वह संगठन के जीवनदायक देश, चीन का सबसे घनिष्ठ सहयोगी बना हुआ है?  संयोगवश, भारत एवं पाकिस्तान दोनों ही 8 जून, 2017 को एससीओ में शामिल हुए थे, जबकि उरी हमले की अभी बरसी भी नहीं हुई थी। 

पांच। विडम्बना है कि, एससीओ  (जिसमें अफगानिस्तान को एक ‘पर्यवेक्षक’ का दर्जा दिया गया है।) अंततोगत्वा उस तालिबान सरकार को, जो अपनी आतंकवादी रणनीतियों पर अमल करते हुए हुकूमत हथियाने में कामयाब हो गया है, उसको मान्यता देने के लिए हर संभव कोशिश कर सकता है और हरेक सदस्य देश इसके लिए राजी भी हो जाएगा। भारत के सामरिक अध्ययन के पुरोधा के. सुब्रह्मण्यम कहते थे कि एक आतंकवादी समूह राज्य के लिए वास्तविक रूप से उपद्रवकारी हो सकता है, लेकिन वह राज्य-सत्ता पर कभी कब्जा नहीं कर सकता। लेकिन आज इस सत्य को घटित होते देखने के लिए सुब्रह्मण्यम हमारे बीच नहीं हैं। 

अब आते हैं लेख की शुरुआत में जिक्र किए गए सामान्य ज्ञान वाले हिस्से पर। एक भारतीय होने के कारण मैं भारतीय राजनीति में बढ़ते इलेक्ट्रोनिक, प्रिंट एवं सोशलमीडिया के जरिए दिन-रात सांस लेने से अपने आपको नहीं बचा सकता। चूंकि हर दिन एक या अन्य राज्य में चुनाव हो रहे हैं, और प्रत्येक चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही अपनी पार्टी भाजपा के प्रमुख चेहरा होते हैं, तो ऐसे में आज घरेलू राजनीति एवं विदेश नीति के बीच का संबंध विगत की तुलना अधिक स्पष्ट हो गया है। 

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान जब बांग्लादेश के वास्तविक एवं काल्पनिक घुसपैठिए को ‘दीमक’ कह कर उनकी खिल्ली उड़ाई, जिन्हें फौरन खत्म कर देने की बात कही तो ऐसा कह कर उन्होंने बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष ताकतों को कमजोर करने की कोशिश की और उसकी प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद के संतुलन-सामंजस्यकारी राजनीतिक कार्यों को पहले से कठिन बना दिया। यदि अमित शाह को घरेलू दबाव में ऐसा कहना पड़ा तो ऐसी बाध्यता हसीना के लिए भी है। सरल सी बात है। 

अब उत्तर प्रदेश में हाई वोल्टेज चुनाव करीब है, इसे लेकर मोदी सरकार की चुनौतियां भी बेशुमार हैं। वह कि कैसे चुनावी तकाजों के बीच संतुलन साधते हुए एक तरफ तो तालिबान का हौवा खड़ा कर हिंदू वोटों की फसल काटी जाए, जबकि इसी समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ऊंची मेज पर एक ईमानदार पैरोकार का किरदार भी निभाया जाए। 

चूंकि नरेन्द्र मोदी खांटी देशज राजनीतिक हैं और भारत के विदेश मामलों के मंत्री एस. जयशंकर मूलतः राजनयिक सेवा से सियासत में आए हैं, जिनके लिए अपने राजनीतिक बॉस को दी जाने वाली सबसे अच्छी सलाह वही है, जो वे सुनने के लिए तैयार हों, ऐसे में मेरा सामान्य ज्ञान कहता है कि क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से भारत इस समय काफी मुश्किल वक्त में है।

कृपया, भगवान के लिए दक्षेस (SAARC) को पुनरुज्जीवित करने के लिए कोई रास्ता तलाशें, जिसके लिए अभी भी कोई देर नहीं हुई है। यह भी न भूलें कि अफगानिस्तान भी दक्षेस का सदस्य है, भले वह एससीओ का सदस्य नहीं बना है (वह अभी एक ‘पर्यवेक्षक’ ही है।) अगर सियासत को स्थानीय कहा जाता है, तो यह भी रेखांकित किया जाना चाहिए कि क्षेत्रीय सुरक्षा क्षेत्रीय है, वह इतर-क्षेत्रीय नहीं है, और वह बहुत कम वैश्विक है।

(लेखक समाज विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली में वरिष्ठ अध्येता हैं और जेएनयू के दक्षिण एशियाई अध्ययन केंद्र में प्रोफेसर हैं। वे आइसीएसएसआर के पूर्व राष्ट्रीय अध्येता भी रह चुके हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी हैं।)

अंग्रेजी में मूल रूप से प्रकाशित लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें

India and Afghanistan: International Politics as Common Sense

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