NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
यूक्रेन की स्थिति पर भारत, जर्मनी ने बनाया तालमेल
भारत का विवेक उतना ही स्पष्ट है जितना कि रूस की निंदा करने के प्रति जर्मनी का उत्साह।
एम. के. भद्रकुमार
04 May 2022
Translated by महेश कुमार
यूक्रेन की स्थिति पर भारत, जर्मनी ने बैठाया तालमेल
रूस से लड़ने के लिए जर्मनी पचास लेओपार्ड 1 टैंक यूक्रेन भेजेगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जर्मनी की संक्षिप्त यात्रा सोमवार को बर्लिन में भारतीय-जर्मन अंतर सरकारी आयोग की बैठक पर जाकर टिकी, जो अनिवार्य रूप से यूक्रेन संकट पर केंद्रित थी। पश्चिमी मीडिया ने यूक्रेन में रूस के विशेष सैन्य अभियान की आलोचना करने के मामले में भारत की अनिच्छा पर जरूर मोदी से पूछताछ करना पसंद किया होगा। लेकिन प्रेस के सामने मोदी और चांसलर ओलाफ स्कोल्ज़ की संयुक्त उपस्थिति के बाद जर्मन मेजबानों ने परंपरागत सवाल-जवाब को जानबूझकर कर छोड़ दिया।

भारत का विवेक उतना ही स्पष्ट है जितना कि रूस की निंदा करने के मामले में जर्मनी का उत्साह। मोदी और स्कोल्ज़ अलग-अलग नावों में सवार थे। मोदी का "मजबूत व्यक्ति" होने का  दावा बेअसर होते दिख आढ़ा था, जो भारत के हितों के चश्मे के माध्यम से यूक्रेन संकट को देखता है, जबकि एक सैद्धांतिक रुख भी अपनाता है, जबकि स्कोल्ज़ खाली नैतिकता का बोझ उठाए नज़र आ रहे थे।  

स्कोल्ज़ को लगातार यह साबित करना है कि वह वास्तव में राष्ट्रपति बाइडेन का वफादार सहयोगी हैं और किसी भी तरह से "अमनपसंद" नहीं हैं। (स्कोल्ज़ की दुर्दशा को जानने के लिए, स्पीगल का उनके साथ पागलपन से भरे साक्षात्कार को यहाँ पढ़ें, - यह वैकल्पिक रूप से कष्टप्रद, क्रुद्ध करने वाला, ताना मारने वाला, अपमान करने वाला और गुस्सा दिलाने वाला साक्षात्कार है)

मोदी बेपरवाह होने का जोखिम उठा सकते हैं क्योंकि वे इस बारे में स्पष्ट है कि भारतीय हित कहां हैं – एक अत्यधिक अप्रत्याशित अंतरराष्ट्रीय वातावरण में इसकी खुद की रणनीतिक स्वायत्तता अधिक जरूरी है। लेकिन स्कोल्ज़ चूहे की तरह घबराया हुआ है क्योंकि जर्मन हितों को यूरोपीय राजनीति के क्रॉस-करंट और रूस को अपने घुटनों पर लाने के नाटो के युगांतरकारी संघर्ष के बीच जर्मनी फंस गया है।

मोदी सत्ता में अच्छी तरह से जमे हुए हैं, जबकि स्कोल्ज़ अलग-अलग साझेदारों के एक अनिश्चित गठबंधन का नेतृत्व कर रहे हैं। मोदी, स्कोल्ज़ और उनकी विदेश मंत्री एनालेना बारबॉक को रूस पर दो अलग-अलग स्वरों में बोलते हुए देखा जा सकता है। बारबॉक ने जोर देकर कहा कि पश्चिमी प्रतिबंधों को हटाए जाने से पहले रूसी सेनाओं को यूक्रेनी भूमि को खाली कर देना चाहिए, लेकिन स्कोल्ज़ ने कहा कि पश्चिमी प्रतिबंधों को उठाना रूस और यूक्रेन के किसी समझौते पर पहुंचने से जुड़ा हुआ है।

जब रूस संबंधों की बात आती है तो जर्मनी एक विभाजित घर नज़र आता है। इसके विपरीत, भारत में काम कर रहे शोर-शराबे वाले अमेरिकी लॉबिस्टों के समूह के अलावा, भारतीय जनता बड़े पैमाने पर रूस के साथ भारत के मैत्रीपूर्ण संबंधों की केंद्रीयता को पहचानती है।

भारत के पास पैंतरेबाज़ी का स्थान है, क्योंकि रूस दिल्ली के रुख के प्रति अत्यधिक अनुग्रही  है, जो कि, सर्वोत्कृष्ट रूप से, न तो समर्थन करने के मामले में है और न ही मास्को के हस्तक्षेप का विरोध करने के मामले में आगे है - ईएम फोर्स्टर उपन्यास ए पैसेज टू इंडिया में प्रोफेसर गोडबोले की तरह कुछ ऐसा कि, एक ब्राह्मण हिंदू वह है जो बहुत आध्यात्मिक और मानवीय मामलों में शामिल होने का अनिच्छुक होता है।

स्कोल्ज़ जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नए हैं, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की हाल की भारत यात्रा से एक या दो चीजें सीख सकते थे। जॉनसन ने यूक्रेन को बैक बर्नर पर रखा और भारत के विशाल बाजार में ब्रेक्सिट के बाद अपने देश का मार्ग बनाने के लिए "ग्लोबल ब्रिटेन" के एजेंडे पर ध्यान केंद्रित किया था।

जो कहता है कि, स्कोल्ज़ ने रूस से गैस की आपूर्ति के खिलाफ प्रतिबंधों को लेकर अमेरिका से उन्हे वापस लेने के मामले में उल्लेखनीय रूप से अच्छा प्रदर्शन किया है। तेल और गैस (और कोयले) की रूसी आपूर्ति पर जर्मनी की निर्भरता भारी रही है और अमेरिकी इसे एक वास्तविकता के रूप में स्वीकार करता है। मुद्दा यह है कि जर्मनी और रूस के बीच घनिष्ठ संबंध रहे हैं और यूक्रेन संकट वाशिंगटन के लिए उन मापदंडों को फिर से परिभाषित करने का प्रयास कर रहा है जिनके भीतर जर्मन-रूसी संबंध भविष्य में काम करेंगे।

भारत के मामले में, अगर वाशिंगटन ने मोदी सरकार को धमकाने की हिम्मत की, तो इसका मुख्य कारण शीत युद्ध के बाद के दौर में, लगातार कांग्रेस सरकारों के तहत, रूस के साथ भारत के संबंध इस हद तक खराब हो गए कि अमेरिकियों ने खुद को आश्वस्त किया कि यह एक जागरूक भारत है। नीति निर्देश "वाशिंगटन की आम सहमति" की मजबूरियों से निर्धारित होता है, जो भारत के पिछले नेतृत्व के लिए एक प्रकाशस्तंभ रहा है। अप्रत्याशित रूप से, बाइडेन  प्रशासन ने गलत निर्णय लिया कि मोदी को भी इस खेल में निष्पक्ष होना चाहिए।

लेकिन जर्मन और भारतीय संकट के बीच मुख्य अंतर यह है कि जहां जर्मन उद्योग रूस के साथ संबंधों में एक हितधारक है, वहीं भारत के कॉरपोरेट घरानों, जो उन्हें सबसे अच्छी तरह से ज्ञात हैं, अमेरिकी इच्छा के सम्मान में रूसी मैदान को दरकिनार कर देते हैं। इस प्रकार, वाशिंगटन में शक्तिशाली भारतीय पैरवीकार हैं और इसलिए, रूस के प्रति एक स्वतंत्र नीति को आगे बढ़ाने के लिए मोदी सरकार का दुस्साहस सराहनीय हो जाता है।

संभावना है कि यूक्रेन संघर्ष समाप्त होने के बाद जर्मनी रूस के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ा सकता है। यूरोपीय इतिहास में "जर्मन प्रश्न" के कालक्रम में, रूस की मुख्य रूप से एक संतुलनकर्ता की भूमिका रही है। लेकिन जर्मनी में एक गहरा आर्थिक और राजनीतिक संकट  छाने वाला है और यह कैसे खत्म होगा यह अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है।

बढ़ती मुद्रास्फीति और जीवन स्तर में नाटकीय गिरावट जर्मन मूड को खराब कर रही है, क्योंकि यूक्रेन का मलबा उस के सर पर गिर रहा है। अब तक, अनुमानित 5 मिलियन यूक्रेनी शरणार्थी यूरोप में प्रवेश कर चुके हैं। निकट भविष्य में यह आंकड़ा दोगुना होने की उम्मीद है।

इस बीच, पैदा हो रहा खाद्य संकट अफ्रीका या पश्चिम एशिया में लाखों लोगों को भुखमरी के कगार पर खड़ा कर देगा, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर यूरोप की ओर पलायन होगा। इस तरह का प्रवास अनिवार्य रूप से यूक्रेन के समाज के अवशेषों को जर्मनी में लाएगा, जिसका अर्थ है कि संगठित अपराध, मानव तस्करी, अवैध नशीली दवाओं का वितरण और अंतरराष्ट्रीय अपराध आदि में वृद्धि होगी। कोई गलती न हो, यूक्रेनी माफिया अपराध की एक नई शातिर संस्कृति का परिचय देंगे क्योंकि यह यूरोपीय सड़कों पर हावी होना शुरू कर देगा। 

कुल मिलाकर, मोदी की यात्रा के दौरान एक अच्छा संतुलन बनाया गया है। संयुक्त बयान ने मेजबान देश के विशेषाधिकार को "रूसी बलों द्वारा यूक्रेन के खिलाफ गैरकानूनी और अकारण आक्रामकता की कड़ी निंदा" दोहराने के मामले को स्वीकार किया है। लेकिन इसने एक एकांत वाक्य यानि "स्टैंड लोन" के बयान का भी गठन किया, जो भारत की इससे दूरी का संकेत देने में मदद करता है। जर्मनी "शत्रुता की तत्काल समाप्ति" के मुद्दे पर भारत के आह्वान में शामिल हो गया, हालांकि बर्लिन ने अमेरिका के नेतृत्व वाले "गठबंधन" को सहायता के रूप में यूक्रेन को आक्रामक हथियारों के एक बड़े हस्तांतरण की घोषणा भी की है और रूस को ”सैन्य रूप से "कमजोर करने" के लिए बाइडेन प्रशासन के आक्रामक एजेंडे के साथ परोक्ष रूप से सहमति व्यक्त की है। 

गौरतलब है कि संयुक्त बयान में जर्मनी का उदास मिजाज झलक रहा था। भारत-जर्मन आर्थिक संबंध अपनी क्षमता से काफी नीचे हैं और आगे भी रहेंगे। सीएनएन ने सप्ताहांत में एक गंभीर रिपोर्ट दी कि न केवल जर्मन अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है, बल्कि "ढांचागत नुकसान" भी हो सकता है जो रिकवरी की प्रक्रिया को कठिन बना देगा। 

स्पष्ट रूप से, आज जर्मन बयानबाजी के पीछे, तथ्य यह है कि बर्लिन के खुफिया तंत्र ने फरवरी 2014 में तख्तापलट में कीव में सत्ता हथियाने के लिए नव-नाजी ताकतों के प्रभुत्व को नेविगेट करके यूक्रेन में एक संदिग्ध भूमिका निभाई थी। यह विवादास्पद अतीत अब और जटिल हो गया है, क्योंकि बर्लिन ने यूक्रेन में टैंक भेजकर संघर्ष को बढ़ावा दिया है, जो आखिरकार नाजी जर्मनी का आक्रमणकारी मार्ग था।

जब यूक्रेन की बात आती है, तो जर्मनी भारत के लिए बेहतर साथी नहीं हो सकता है। हमारे पास एक पारदर्शी रिकॉर्ड है और बड़ी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के साथ, मोदी स्कोल्ज़ को सुनकर, यह चेतावनी दे सकते थे कि "इस युद्ध में कोई जीतने वाली पार्टी नहीं होगी, सभी को भुगतना होगा।"

germany
ukraine
Ukraine crisis
Narendra modi

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

भाजपा के लिए सिर्फ़ वोट बैंक है मुसलमान?... संसद भेजने से करती है परहेज़

हिमाचल में हाती समूह को आदिवासी समूह घोषित करने की तैयारी, क्या हैं इसके नुक़सान? 


बाकी खबरें

  • सम्मान समारोह
    राज वाल्मीकि
    देवी शंकर अवस्थी सम्मान समारोह: ‘लेखक, पाठक और प्रकाशक आज तीनों उपभोक्ता हो गए हैं’
    06 Apr 2022
    27वें देवी शंकर अवस्थी सम्मान से नवाज़े गए कवि आलोचक अच्युतानंद मिश्र। “कोलाहल में कविता की आवाज़” पुस्तक के लिए मिला पुरस्कार।
  • काशिफ़ काकवी, पीयूष शर्मा
    मध्य प्रदेश : एलपीजी की क़ीमतें बढ़ने के बाद से सिर्फ़ 30% उज्ज्वल कार्ड एक्टिव
    06 Apr 2022
    भोपाल : मिट्टी के चूल्हे के पास बैठी 50 वर्षीय रूपरानी,
  • pakistan
    हारून जंजुआ (इस्लामाबाद)
    पाकिस्तान के राजनीतिक संकट का ख़म्याज़ा समय से पहले चुनाव कराये जाने से कहीं बड़ा होगा
    06 Apr 2022
    जानकारों का कहना है कि प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के ख़िलाफ़ विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज किये जाने का पाकिस्तान के लोकतांत्रिक ढांचे पर गंभीर असर पड़ सकता है।
  • srilanka
    भाषा
    श्रीलंका : राष्ट्रपति ने आपातकाल हटाया
    06 Apr 2022
    राष्ट्रपति ने देश में बदतर आर्थिक हालात को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर एक अप्रैल को सार्वजनिक आपातकाल की घोषणा की थी। तीन अप्रैल को होने वाले व्यापक विरोध प्रदर्शनों के मद्देनजर आपातकाल…
  • covid
    न्यूज़क्लिक रिपोर्ट
    कोरोना अपडेट: देश में आज फिर एक हज़ार से ज़्यादा नए मामले, 71 मरीज़ों की मौत
    06 Apr 2022
    देश में कोरोना के आज 1,086 नए मामले सामने आए हैं। वही देश में अब एक्टिव मामलों की संख्या घटकर 0.03 फ़ीसदी यानी 11 हज़ार 871 रह गयी है।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License