NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
भारत
राजनीति
अंतरराष्ट्रीय
खाड़ी देशों के साथ भारतीय रणनीति चीनी प्रेतछाया का पीछा कर रही है! 
बीजिंग का यूएनजीए में बयान एक ऐसे वक्त में आया है जब भारत में मौजूद अमेरिकी समर्थक, इजरायली लॉबी की पैरवीकार मीडिया ने फिलिस्तीन के उद्देश्य को मृत रूप में निरुपित करने का काम किया है और इस हिसाब से भारत को अब ‘आगे बढ़ना चाहिए।’
एम. के. भद्रकुमार
09 Dec 2020
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लातिफ बिन राशिद अल ज़यानी (दायें) 24 नवंबर, 2020 को मनामा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का स्वागत करते हुए। 
बहरीन के विदेश मंत्री अब्दुल्लातिफ बिन राशिद अल ज़यानी (दायें) 24 नवंबर, 2020 को मनामा में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का स्वागत करते हुए। 

2 दिसंबर को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘फिलिस्तीन का प्रश्न और मध्य पूर्व में स्थिति’ पर दिए गए चीनी बयान को लेकर नई दिल्ली में इस बारे में आत्मनिरीक्षण करने पर तत्परता की उम्मीद है। इसमें किसी शक की गुंजाईश नहीं है कि किसी महाशक्ति द्वारा हाल के दिनों में फिलिस्तीनी उद्येश्य को लेकर यह सबसे जोरदार समर्थन में से एक है।

यह बयान एक ऐसे समय में आया है जब भारत में मौजूद अमेरिकी समर्थक, इजरायली लॉबी की पैरवीकार मीडिया द्वारा गढ़े गए नैरेटिव में फिलिस्तीन के उद्देश्य को मृत रूप में निरुपित करने का काम किया है और इस हिसाब से भारत को अब ‘आगे बढ़ना चाहिए’। जबकि सरकार निश्चित तौर पर असहज स्थिति में है और फिलिस्तीनी समस्या पर मात्र मुहँजबानी जमाखर्च से काम चला रही है, लेकिन तमाशबीनों को यह धोखे में नहीं रख सकती।

वहीँ बीजिंग ने इससे पूरी तरह से विपरीत रुख को अपनाते हुए फिलिस्तीन के मकसद को “मध्य पूर्व की स्थिति के केंद्र में” रखते हुए इसे क्षेत्रीय शांति को प्रभावित करने वाला बताया है। चीनी बयान में 1 दिसंबर के दिन फिलिस्तीनी लोगों के साथ एकजुटता के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बधाई संदेश को प्रमुखता से उठाते हुए इस बात को दोहराया गया है कि “चीन, फिलिस्तीनी जनता के उनके वैध राष्ट्रीय अधिकारों की बहाली के न्यायपूर्ण उद्देश्य का मजबूती से समर्थन करता है। इसके साथ ही साथ चीन फिलिस्तीनी मुद्दे के शांतिपूर्ण समाधान के सभी सहायक प्रयासों का समर्थन करता है।”

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी फिलिस्तीनी जनता का अभिवादन किया? यह संदेहास्पद है। निश्चित तौर पर ऐसा करना किसी भी प्रकार से हमारे पूर्व औपनिवेशिक मालिक, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन को टेलीफोन करने से कम महत्वपूर्ण नहीं था, जिन्हें उन्होंने व्यक्तिगत रूप से जनवरी 2022 के गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया।

भारतीय नैरेटिव के विपरीत चीनी समझ में फिलिस्तीन-इजराइल संबंध “उत्तरोत्तर तनावपूर्ण होते जा रहे हैं और शांति प्रक्रिया मुश्किल के दौर में घिसट रही है, एवं क्षेत्रीय संघर्ष का खतरा लगातार बढ़ रहा है।” यहाँ पर मध्य पूर्वी चाय की पत्तियों के उबाल को लेकर भारतीय और चीनी समझ में एक बुनियादी असहमति दिखती है।

मोदी सरकार अब्राहम समझौते की एक निर्णायक क्षण के तौर पर पहचान करती है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर अब्राहम समझौते के स्वागत में कई कदम आगे बढ़ाते हुए इसका अनुसरण करते हुए पिछले हफ्ते मनामा और अबू धाबी के दौरे पर गए हुए थे। उन्होंने पूरी तरह से अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पेओ के पदचिन्हों का अनुसरण किया।  

वहीँ दूसरी ओर चीन इस बात पर जोर दे रहा है कि “अंतर्राष्ट्रीय न्याय के मामले में दो-राष्ट्रों के बीच का समाधान इसका आधार-सूत्र है, इतिहास के ज्वार के खिलाफ कोई नहीं जा सकता..। इसमें प्रासंगिक संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों, भूमि को लेकर शांति सिद्धांत, एवं द्वि-राष्ट्र समाधान...मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण मापदण्ड हैं...(और) फिलिस्तीनी प्रश्न को हल करने का आधार हैं, और इनका विधिवत पालन एवं क्रियान्वयन किया जाना चाहिए।”

चीनी बयान में दोनों पक्षों से कहा गया है कि वे “कब्जे वाले फिलिस्तीनी क्षेत्र वाले मुद्दे का प्रासंगिक संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के आलोक में जल्द समाधान निकालें, शान्ति वार्ताओं के जरिये निर्णायक फिलिस्तीन-इजराइल सीमा का परिसीमन करें और ऐसी किसी भी प्रकार की कार्यवाही से बचें जिससे तनाव बढ़ने में मदद मिलती हो।”

चीन ने राष्ट्रपति अब्बास के अगले साल की शुरुआत में अंतर्राष्ट्रीय शांति सम्मेलन बुलाये जाने के प्रस्ताव का स्वागत किया है। हाल ही में ईरानी वैज्ञानिक की हत्या पर अप्रत्यक्ष तौर पर जिक्र करते हुए चीनी बयान में निष्कर्ष निकाला गया है,

“खाड़ी क्षेत्र में एक बार फिर से तनाव की स्थिति है, जो कि गंभीर तनाव और चिंता का विषय बना हुआ है। चीन ऐसी किसी भी कार्यवाही के खिलाफ है जिससे क्षेत्रीय तनाव को बढ़ावा मिलता हो और जो क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता को कमजोर करता है। चीन संबंधित पक्षों से आग्रह करता है कि वे क्षेत्र में तनाव कम करने और शांति एवं स्थिरता बनाए रखने के लिए संयुक्त प्रयास चलाए।” 

इसका विपरीत इससे तीक्ष्ण नहीं हो सकता। ईरान में इजराइल द्वारा राज्य प्रायोजित आतंकवाद के मुद्दे पर भारत के विस्तारित पड़ोस अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, ओमान, क़तर, जॉर्डन, तुर्की इत्यादि द्वारा ईरानी वैज्ञानिक की हत्या के खिलाफ एक सुर में निंदा के बावजूद दिल्ली इस पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है।

यह हैरतअंगेज ख़ामोशी मोदी सरकार द्वारा हाल ही में फ़्रांस में हुई हत्याओं पर छाती कूटने से पूरी तरह से उलट नजर आती है। 7 दिसंबर को मोदी ने फ्रांसीसी राष्ट्रपति इम्मानुएल मैक्रॉन को टेलीफोन कर फ़्रांस में हुए “आतंकी हमलों” पर अपनी शोक संवेदना व्यक्त करते हुए भारत की ओर से उस देश को “आतंकवाद, उग्रवाद और कट्टरपंथ के खिलाफ लड़ाई” में अपने “पूर्ण समर्थन” को दोहराया था। 

कोई गलती न करें, चीन खुद को इतिहास के सही पक्ष में स्थापित करने में लगा हुआ है। यहाँ तक कि मध्य पूर्व से अमेरिका ने खुद को वापस खींचना शुरू कर दिया है। दिल्ली में बैठे एक-आयामी नीति-निर्धाता जिस बात को समझ पाने में विफल हैं वह यह है कि चीन एक “विन-विन” दृष्टिकोण को गढ़ने में मशगूल है। 

यह बात अब किसी से छुपी नहीं है कि चीन ने इस बीच ईरान के साथ 25-वर्षीय रणनीतिक सहयोग समझौते के मसौदे पर बातचीत कर रहा है, जिसमें आने वाले पच्चीस वर्षों की अवधि के दौरान 400 अरब डॉलर तक के सहयोग की परिकल्पना की गई है। निश्चित तौर पर चीन के पास महत्वपूर्ण आर्थिक प्रोत्साहन मौजूद है और वह चुपचाप मध्य पूर्व कूटनीति में खुद के लिए एक व्यापक भूमिका को तैयार करने में लगा है, जो स्पष्ट तौर पर अमेरिकी एकपक्षीय आधिपत्य को ख़ारिज करता है।

ईरान के साथ समझौते में व्यापक बदलाव के माध्यम से आगे बढ़ने की जो बिडेन राष्ट्रपतित्व काल की क्षमता पर गंभीर शंका को देखते हुए चीन को उम्मीद है कि वह तेहरान के राजनयिक मामलों में और भी प्रत्यक्ष तौर पर अपने लिए जगह बना पाने में सफल हो सकता है। यह तो रही एक बात। 

इसके अलावा चीन के राज्य पार्षद और विदेश मंत्री वांग यी ने हाल ही में ईरान परमाणु समझौते का बचाव करते हुए सुरक्षा मुद्दों का सामना कर रहे खाड़ी क्षेत्र और मध्य पूर्व में राजनीतिक और कूटनीतिक माध्यम से पहल का खुलासा किया। वांग ने यह कदम 10 अक्टूबर को युन्नान प्रांत के तेंग्चोंग में दौरे पर आये ईरानी समकक्ष जावेद ज़रीफ़ से मुलाक़ात के बाद लिया है। 

यह प्रस्ताव क्षेत्रीय बहुपक्षीय संवाद मंच पर आधारित है जिसमें हाल के दिनों में मध्य पूर्व में राजनयिक हस्तक्षेप की दिशा में तेजी से चीनी नीतियों में बदलाव की श्रृंखला के एक प्रमुख चिन्ह के तौर पर देखा जा सकता है। ये नीतियाँ अमेरिका की मध्य पूर्व में हालिया चालों जैसे कि अब्राहम समझौते, से परोक्ष तौर पर प्रतिस्पर्धी हैं, और उन्हें बहिष्कृत करती हैं। रोचक पहलू यह है कि वांग ने इस बात को रेखांकित किया है कि नए मध्य पूर्व मंच में हिस्सा लेने वाले देशों को ईरान परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर करने की आवश्यकता होगी। 

अब इन सबको मध्य पूर्व के नेतृत्वों के रणनीतिक साझेदार के तौर पर चीन की तरफ अधिकाधिक झुकाव की पृष्ठभूमि में देखे जाने की आवश्यकता है, जिसमें सऊदी अरब और यूएई तक शामिल हैं। इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी बुनियादी ढाँचे एवं प्रोद्योगिकी पहल का समर्थन करने को लेकर नियोजित निवेश के सन्दर्भ में, चीन को विविध क्षेत्रीय साझेदारियों में हासिल उपलब्धियाँ बेहद चकित कर देने वाली हैं। 

कई रिपोर्टों में यह बात सामने आई है कि अक्टूबर में सऊदी अरब के नेशनल सेंटर फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने अपनी नई अल रणनीति के तहत चीनी कम्पनी हुआवेइ टेक्नोलॉजीज कंपनी और अलीबाबा क्लाउड के साथ समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं। वहीँ दूसरे चरम छोर पर चीन को लेकर व्यापक तौर पर यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वह कई वर्षों से युद्ध की चपेट में घिरे सीरिया के बुरी तरह से क्षतिग्रस्त बुनियादी ढाँचे के पुनर्निर्माण के लिए सबसे प्रमुख दावेदारों में से एक है। सीरिया के पुनर्निर्माण की लागत का अनुमान, मामूली 200 बिलियन डॉलर से लेकर बेहद कम अनुमान के तौर पर 1 ट्रिलियन डॉलर तक के खर्च का पुर्वानुमान लगाया जा रहा है।

वास्तव में देखें तो चीन ने मध्य पूर्व की उर्जा आपूर्ति पर अपनी निर्भरता को लगातार और अधिक गहरा बनाए रखने के क्रम को जारी रखा है, जो कि इसकी क्षेत्रीय कूटनीति का एक अहम पड़ाव है। इस बीच चाइना-अरब स्टेट्स पोलिटिकल पार्टीज डायलाग जो कि अपेक्षाकृत एक नया मंच है, जिसमें समूचे अरब राष्ट्रों से विभिन्न राजनीतिक दलों से 60 नेताओं को शामिल किया गया है। इस मंच में असद और फिलिस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास शामिल हैं, जो कि एक बड़े मैट्रिक्स के साथ आपस में गुंथे हैं, जिसे चीन नेतृत्व प्रदान करने की आशा रखता है।

बुनियादी तौर पर चीन के मध्य-पूर्व में राजनयिक आदान-प्रदान के पीछे इसके दीर्घकालीन आर्थिक वृद्धि का हाथ है। इसे अलग ढंग से कहें तो चीन की आर्थिक महत्वाकांक्षा हमेशा से इसके विदेश नीति में निर्णय लेने के मामले में इसका प्रमुख आधार स्तंभ रही है, न कि इसके सहायक के तौर पर कभी रही है।

निर्विवाद रूप से खाड़ी को लेकर भारतीय और चीनी दृष्टिकोणों के बीच में यह अंतर रहा है। चाइना-मिडिल ईस्ट फोरम भू-राजनीतिक अजेंडा को आगे बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक अजेंडे को आगे बढ़ाने का काम करता है। 

वहीँ दूसरी तरफ जयशंकर द्वारा मनामा, अबू धाबी एवं विक्टोरिया की रोमांचक यात्रा मुख्यतया चीन के अरब खाड़ी और पश्चिमी हिन्द महासागर में कथित हस्तक्षेपकारी अजेंडे के खिलाफ निर्देशित थी। जबकि वास्तविकता में ऐसा कुछ भी नहीं है, क्योंकि यह अनिवार्य तौर पर इस क्षेत्र को अमेरिकी-चीन तनाव के लिए एक प्रॉक्सी के तौर पर देखता है। यह नजरिया गहरे स्तर तक त्रुटिपूर्ण है और इसका अंजाम निरर्थक, अनुत्पादक एवं अंततः अरक्षणीय रहने वाला है, और यह अपने परिणाम में इस दुर्दशा वाली परिस्थिति से भिन्न नहीं हो सकता है कि अमेरिका आसियान के साथ आमने-सामने के मुकाबले में है।

यूएनजीए में दिए गए चीनी बयान का मूल पाठ यहाँ प्रस्तुत है।

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें।

India’s Gulf Strategy is Chasing Chinese Phantoms

China
India
IRAN
Middle East
United Nations General Assembly
Palestine
Narendra modi
S. Jaishankar

Related Stories

तिरछी नज़र: सरकार जी के आठ वर्ष

कटाक्ष: मोदी जी का राज और कश्मीरी पंडित

ग्राउंड रिपोर्टः पीएम मोदी का ‘क्योटो’, जहां कब्रिस्तान में सिसक रहीं कई फटेहाल ज़िंदगियां

भारत में धार्मिक असहिष्णुता और पूजा-स्थलों पर हमले को लेकर अमेरिकी रिपोर्ट में फिर उठे सवाल

भारत के निर्यात प्रतिबंध को लेकर चल रही राजनीति

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

बॉलीवुड को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही है बीजेपी !

भारत में तंबाकू से जुड़ी बीमारियों से हर साल 1.3 मिलियन लोगों की मौत

PM की इतनी बेअदबी क्यों कर रहे हैं CM? आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"


बाकी खबरें

  • veto
    एपी/भाषा
    रूस ने हमले रोकने की मांग करने वाले संरा के प्रस्ताव पर वीटो किया
    26 Feb 2022
    संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में शुक्रवार को इस प्रस्ताव के पक्ष में 11 और विपक्ष में एक मत पड़ा। चीन, भारत और संयुक्त अरब अमीरात मतदान से दूर रहे।
  • Gujarat
    राजेंद्र शर्मा
    बैठे-ठाले: गोबर-धन को आने दो!
    26 Feb 2022
    छुट्टा जानवरों की आपदा का शोर मचाने वाले यह नहीं भूलें कि इसी आपदा में से गोबर-धन का अवसर निकला है।
  • Leander Paes and Rhea Pillai
    सोनिया यादव
    लिएंडर पेस और रिया पिल्लई मामले में अदालत का फ़ैसला ज़रूरी क्यों है?
    26 Feb 2022
    लिव-इन रिलेशनशिप में घरेलू हिंसा को मान्यता देने वाला ये फ़ैसला अपने आप में उन तमाम पीड़ित महिलाओं के लिए एक उम्मीद है, जो समाज में अपने रिश्ते के अस्तित्व तो लेकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करती…
  • up elections
    न्यूज़क्लिक टीम
    यूपी चुनाव 2022: किस तरफ होगा पूर्वांचल में जनादेश ?
    26 Feb 2022
    इस ख़ास बातचीत में परंजॉय गुहा ठाकुरता और शिव कुमार बात कर रहे हैं यूपी चुनाव में पूर्वांचाल की. आखिर किस तरफ है जनता का रुख? किसको मिलेगी बहुमत? क्या भाजपा अपना गढ़ बचा पायेगी? जवाब ढूंढ रहे हैं…
  • manipur
    शशि शेखर
    मणिपुर चुनाव: भाजपा के 5 साल और पानी को तरसती जनता
    26 Feb 2022
    ड्रग्स, अफस्पा, पहचान और पानी का संकट। नतीजतन, 5 साल की डबल इंजन सरकार को अब फिर से ‘फ्री स्कूटी’ का ही भरोसा रह गया है। अब जनता को तय करना है कि उसे ‘फ्री स्कूटी’ चाहिए या पीने का पानी?    
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License