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भारत
राजनीति
क्या अर्नब और कंगना को महत्वपूर्ण बना रही है महाराष्ट्र सरकार?
अर्नब और कंगना जैसे लोग हमें बार बार ललकारेंगे – आओ! मुझ पर प्रहार करो। आओ! मुझसे संघर्ष करो! यह उनकी बुनियादी रणनीति है।
डॉ. राजू पाण्डेय
11 Nov 2020
arnab kangana
फ़ोटो साभार : इंटरनेट

महाराष्ट्र सरकार ऐसा लगता है कि अर्नब गोस्वामी को नायक बनाकर ही दम लेगी। न्यू इंडिया की आक्रामक, हिंसक तथा विभाजनकारी विचारधारा की लाक्षणिक विशेषताओं से परिपूर्ण, किंचित असमायोजित व्यक्तित्वधारी अतिमहत्वाकांक्षी अर्नब को महाराष्ट्र सरकार ने अपनी कोशिशों से निरंतर चर्चा में बनाए रखा है। इसके पूर्व भी महाराष्ट्र सरकार कंगना को महाराष्ट्र की राजनीति में धमाकेदार एंट्री दिलाने में अपना योगदान दे चुकी है। पहले महाराष्ट्र सरकार ने कंगना के ऑफिस का अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की, बाद में कंगना और उनकी बहन के विरुद्ध पुलिस ने राजद्रोह का मामला भी दर्ज किया। इनसे कंगना को खूब पब्लिसिटी मिली। इस आक्रामक और प्रतिशोधात्मक कार्यशैली को महाराष्ट्र सरकार यदि अपनी रणनीतिक चूक मानती तो अर्नब प्रकरण में इसकी पुनरावृत्ति न होती और महाराष्ट्र सरकार का रवैया अधिक संयत दिखाई देता।

अर्नब प्रकरण में महाराष्ट्र सरकार के आक्रामक व्यवहार की एक ही व्याख्या हो सकती है- शिवसेना, कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन में आने के बाद प्रगतिशील और समावेशी बनने की कोशिश जरूर कर रही है किंतु अपनी पुरानी फ़ासिस्ट सोच और कार्यशैली से छुटकारा शायद उसे अभी नहीं मिल पाया है। कांग्रेस और एनसीपी भी हाल के इन वर्षों में उस भाषा की तलाश करते रहे हैं जिसमें उग्र,संकीर्ण और हिंसक हिंदुत्व के हिमायतियों को माकूल जवाब दिया जा सके, शायद उन्हें प्रतिशोध और बदले की भाषा ही ठीक लगी होगी।

अर्नब और कंगना के साथ यदि हम बहुत ज्यादा रियायत बरतें तो ये भारतीय लोकतांत्रिक विमर्श के प्रॉब्लम चिल्ड्रन कहे जा सकते हैं- ऐसे बच्चे जिनमें आत्म नियंत्रण का अभाव होता है, जिनका व्यवहार असामाजिक होता है, जो विध्वंसक प्रकृति के होते हैं और जिन्हें शिक्षित करना कठिन होता है। किंतु शायद ऐसी उदारता बरत कर हम उस रणनीति को अनदेखा कर देंगे जिसे नव फ़ासिस्ट शक्तियों ने ईजाद किया है।

सामाजिक समरसता हमारे लोक जीवन का स्थायी भाव है। सामासिक संस्कृति तथा अनेकता में एकता हमारे देश की मूल एवं अंतर्जात विशेषताएं हैं। देश के शांतिप्रिय नागरिक दैनंदिन जीवन के संचालन और अपनी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति में लीन हैं। उनके अपने छोटे छोटे सुख-दुःख हैं, अभाव हैं, आवश्यकताएं हैं, कामनाएं और महत्वाकांक्षाएं हैं। घृणा, हिंसा,प्रतिशोध और वैमनस्य के विमर्श के लिए उनके पास अवकाश नहीं है, न ही उनकी इसमें कोई रुचि ही है। ऐसे सृजन धर्मी,रचनात्मक और शांत जनसमुदाय को हिंसा प्रिय एवं विध्वंसक बनाना आसान नहीं है। यही कारण है कि अर्नब और कंगना जैसे लोगों को चीखना-चिल्लाना पड़ता है, बेसिरपैर की हरकतें करनी पड़तीं हैं, डुगडुगी बजानी पड़ती है, तमाशा खड़ा करना पड़ता है ताकि अपनी धुन में मग्न समाज का ध्यान इनकी ओर जाए।

महाराष्ट्र सरकार न केवल इनकी चीख-चिल्लाहट पर तवज्जोह देने वाली भीड़ का हिस्सा बन रही है बल्कि अपनी अतिरंजनापूर्ण प्रतिक्रियाओं के द्वारा इन महत्वहीन व्यक्तियों और इनकी विकृत सोच को चर्चा के काबिल भी बना रही है। अर्नब अपने चैनल से महीनों तक शोर मचाने के बाद भी जितना ध्यान नहीं खींच पाते वह उन्हें इन चंद दिनों में हासिल हुआ है।

घृणा, हिंसा, प्रतिशोध और विभाजन के नैरेटिव पर किसी तरह की प्रतिक्रिया करना ही नफरतजीवियों के उद्देश्य को कामयाब बनाना है क्योंकि तब हम भूख, गरीबी, बेकारी,बीमारी, अशिक्षा जैसे सारे बुनियादी मुद्दों को दरकिनार कर थोपे गए कृत्रिम,गैरजरूरी और आभासी मुद्दों पर अपनी ऊर्जा जाया करने लगते हैं। किंतु महाराष्ट्र सरकार तो एक कदम आगे बढ़कर उसी नफरत और बदले की जबान में इन्हें उत्तर देने की कोशिश कर रही है जिसमें इन्हें महारत हासिल है।

चाहे वे अर्नब हों या कंगना इनके जरिए जो नैरेटिव तैयार किया जा रहा है वह भयावह और घातक है। कंगना हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री के अब तक के स्वाभाविक विकास को एक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत कर रही हैं। कंगना की प्रस्तुति का तरीका कुछ परिमार्जित है, वे अपनी बातों को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए उनमें निजी अनुभवों का तड़का लगाती हैं और उन्हें स्वीकार्य बनाने के लिए नारीवाद तथा नशे से लड़ाई जैसे व्यापक मुद्दों का समावेश भी करती हैं किंतु उनकी मूल प्रेरणा को आक्रामक और हिंसक हिंदुत्व के बुनियादी पाठ्यक्रम में आसानी से तलाशा जा सकता है। 

भारत के सांस्कृतिक-साहित्यिक-बौद्धिक परिदृश्य पर वामपंथियों और मुसलमानों के जबरिया, षड्यंत्रपूर्ण एकछत्र आधिपत्य की झूठी कहानियाँ लंबे समय से सोशल मीडिया पर तैरती रही हैं। यह कहानियाँ मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री को सांप्रदायिक रंग में रंग देती हैं। इन जहरीली कहानियों में हिन्दू नाम रखकर देश की जनता से धोखा करने वाले मुसलमान सुपरस्टारों का जिक्र होता है  जिन पर  यह  बेबुनियाद आरोप लगाया जाता है कि हिन्दू जनता इनकी फिल्में देखकर इन्हें दौलत और शोहरत देती है लेकिन इनका लगाव पाकिस्तान के प्रति अधिक होता है। कहा जाता है कि यह मुसलमान नायक हिन्दू स्त्रियों से विवाह कर उनका धर्म भ्रष्ट कर देते हैं। इस विमर्श के अनुसार ऐसे अनेक नामचीन पटकथा लेखक हैं जो अपनी स्क्रिप्ट में हिंदुओं को संकीर्ण और दकियानूसी सोच वाला और मुसलमानों को उदार बताते हैं। इनकी लिखी फिल्मों में शुद्ध हिंदी बोलने वाले पात्रों का उपहास उड़ाया जाता है और मुसलमान नायक हिन्दू नायिकाओं से प्रेम कर उनसे विवाह करते हैं। यह अपनी पटकथाओं में सिखों का भी मखौल बनाते हैं। इस घृणा और विभाजन के विमर्श के अनुसार हमारे फ़िल्म जगत में ऐसे संवाद लेखक भी हैं जो शुद्ध हिंदी से नफ़रत करते हैं और अपने संवादों के जरिये उर्दू का प्रचार करते हैं। यही हाल गीतकारों का है जो यह मानते हैं कि मुहब्बत सिर्फ उर्दू में ही बयान की जा सकती है। यह विमर्श मानता है कि मुम्बई फ़िल्म इंडस्ट्री का एक प्रबुद्ध लगने वाला और तटस्थता का ढोंग रचने वाला तबका वामपंथी विचारधारा से प्रभावित फ़िल्म समीक्षकों का है जो मुसलमानों को महिमामंडित करने वाली फिल्मों को देश की गंगा-जमनी तहजीब का आदर्श उदाहरण मानता है और ऐसी फिल्मों एवं इनके कलाकारों को पुरस्कृत कराने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा देता है।

कंगना जिस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं उसके पैरोकारों के साथ समस्या यह है कि चाहे वह फिल्मी दुनिया में नारियों के शोषण का विषय हो या ड्रग्स के दुरुपयोग का मामला हो या ताकतवर फिल्मी घरानों द्वारा युवा कलाकारों को पीड़ित करने का मुद्दा हो या माफिया गिरोहों के हस्तक्षेप की घटना हो यदि उसकी परिणति हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली नहीं है तो फिर इनकी रुचि इन प्रकरणों में नहीं रह जाती है। ऐसा नहीं है कि यह मुद्दे महत्वहीन हैं किंतु इन मुद्दों की ओट में बड़ी चालाकी से सांप्रदायिकता के विमर्श को आगे बढ़ाया जा रहा है।

अर्नब सोशल मीडिया की निरंकुशता एवं विषाक्तता को पारंपरिक और औपचारिक मीडिया में प्रवेश दिलाने में लगे हैं। वे भारतीय मीडिया की सहज बनावट में एक षड्यंत्र देखते हैं। टुकड़े टुकड़े गैंग और लुटियंस मीडिया जैसी अभिव्यक्तियाँ प्रधानमंत्री जी की भांति उन्हें भी प्रिय हैं। अर्नब मीडिया में तो हैं लेकिन मीडिया का अनुशासन और आत्मनियंत्रण उन्हें मंजूर नहीं है।

कोई व्यक्ति केवल इस कारण से पत्रकार नहीं माना जा सकता कि पत्रकारिता उसकी आजीविका का जरिया है। अर्नब अपने चैनल के माध्यम से जो कुछ परोस रहे हैं वह समाचार तो कतई नहीं है- उनकी भाषा अशालीन है, तथ्यों से उन्हें परहेज है, वे पहले अपने मनचाहे नतीजे पर पहुंचते हैं और फिर इन्वेस्टिगेशन प्रारंभ करते हैं, चर्चा और विमर्श पर उनका विश्वास नहीं है, विचारधारा का प्रसार और एजेंडा परोसना न कि घटना का वस्तुनिष्ठ आकलन करना उनकी आदत है। वे घमंडी और बददिमाग नजर आते हैं और संभवतः वे ऐसे नजर आना भी चाहते हैं। जिन बातों पर आदर्श पत्रकार लज्जित हुआ करते हैं उन पर अर्नब गर्व करते हैं। वे हर घटना को सांप्रदायिक नजरिए से देखते हैं और बड़ी निर्लज्ज बेबाकी से यह स्वीकार करते हैं कि वे दबे कुचले बहुसंख्यक वर्ग की आवाज़ हैं। उनकी ऊर्जा अपरिमित है।  वे स्वाभाविक को अस्वाभाविक, प्राकृतिक को अप्राकृतिक तथा सत्य को असत्य सिद्ध करने का दुस्साहसिक और शरारतपूर्ण अभियान दिन रात चला सकते हैं।

उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले महत्वाकांक्षी युवाओं की मानवीय दुर्बलताओं को उजागर करने वाली एक असफल प्रेम कहानी से कई राजनीतिक लक्ष्य साधने की असंभव चेष्टा की। उनकी कल्पना यह थी कि सुशांत मामले के रूप में बिहार चुनावों में प्रांतवाद और जातिवाद के जहर को एंट्री मिलेगी और बुनियादी मुद्दों से मतदाता का ध्यान हटाने का एक अवसर उत्पन्न होगा। उनका स्वप्न यह भी था कि यही मामला फ़िल्म इंडस्ट्री के हिंदूकरण में भी सहायक होगा। फ़िल्म इंडस्ट्री की अपार दौलत और फ़िल्म कलाकारों की बेहिसाब लोकप्रियता का लाभ उठाने की इच्छा राजनीतिक दलों के लिए नई नहीं है। 

अर्नब के अभियान में अगर कुछ नया था तो वह फ़िल्म उद्योग को संघ-भाजपा से राष्ट्रवाद का प्रमाणपत्र हासिल करने के लिए बाध्य करने का पुरजोर प्रयास ही था। अर्नब ने अपने सपने को साकार करने के लिए बड़ी नृशंसता से सुशांत, रिया और बहुत सारे दूसरे लोगों की निजी जिंदगी के बखिये उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

केंद्र सरकार ने अर्नब की कल्पना को यथार्थ के धरातल पर साकार करने के लिए देश की शीर्षस्थ जांच एजेंसियों को झोंक दिया। जांच एजेंसियां अपनी बेहतरीन कोशिशों के बावजूद वह असंभव नतीजा नहीं ला पाईं जो अर्नब को प्रसन्न कर पाता।

अर्नब स्वयं को एक अटपटी स्थिति में पा रहे थे - उनका पाखंड उजागर हो गया था। मीडिया के अपने हमपेशा साथियों में उनके मित्र बहुत कम हैं और जो हैं भी वे शायद इतने निर्लज्ज नहीं बन पाए हैं कि अर्नब के पक्ष में खुलकर आ सकें। अर्नब उस सबसे बड़ी सजा की ओर बड़ी तेजी बढ़ रहे थे जो उन्हें सर्वाधिक पीड़ा देती- लोग उनके अनर्गल प्रलाप पर ध्यान देना बंद कर रहे थे। रिया-सुशांत प्रकरण में अर्नब का अनुसरण करने वाले मीडिया हाउसेस को भी यह समझ में आ गया था कि अर्नब की बराबरी करना असंभव है- अर्नब की तरह नीचे गिरने का साहस हर किसी में नहीं होता। धीरे धीरे अन्य टीवी चैनल अर्नब द्वारा परोसे गए मुद्दों को त्यागकर अपने मौलिक निरर्थक मुद्दों की ओर लौट रहे थे। ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र सरकार ने अर्नब को पुनर्जीवित कर दिया है। 

लगभग पूरा केंद्रीय मंत्रिमंडल, देश के सारे भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री, भाजपा एवं कट्टर हिंदुत्व की विचारधारा का समर्थन करने वाले संगठनों के शीर्ष नेता और अनेक धर्म गुरु - सभी के सभी अर्नब के समर्थन में खुलकर सामने आ गए हैं। सोशल मीडिया पर अनेक अभियान चल रहे हैं जिनमें अर्नब को नायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। यह बताया जा रहा है कि अर्नब को बहुसंख्यक हिंदुओं के हितों के लिए आवाज़ उठाने की सजा मिली है। पालघर हत्याकांड को सांप्रदायिक रंग देने वाले अर्नब को संतों की रक्षा के लिए समर्पित सेनानी का दर्जा मिल रहा है। उद्धव ठाकरे की अपने खेमे में वापसी की उम्मीदें इन साम्प्रदायिक शक्तियों को अभी भी हैं इसलिए उन्हें नासमझ बताया जा रहा है। असली निशाना कांग्रेस और वामदलों पर है। 

इन साम्प्रदायिक ताकतों को बहुत कुछ अस्वीकार्य है। अहिंसक गाँधी और उनके नेतृत्व में चला सर्वसमावेशी  स्वाधीनता आंदोलन, देश का संविधान, वैज्ञानिक चेतना संपन्न नेहरू और उनकी प्रखर बौद्धिकता- साम्प्रदायिक शक्तियों की इनसे सिर्फ असहमति ही नहीं है बल्कि शत्रुता है। यदि कोई टाइम मशीन होती तो वे पीछे लौटकर अपनी पसंद का हिंसा, वैमनस्य और विभाजन से परिपूर्ण इतिहास गढ़ लेते किंतु सौभाग्य से ऐसा संभव नहीं है। अहिंसा, प्रेम,शांति, सहिष्णुता और सद्भाव की गौरवशाली विरासत अब हमारे स्वभाव और जीवनचर्या का सहज अंग बन चुकी है। 

अर्नब और कंगना जैसे लोग हमें बार बार ललकारेंगे – आओ! मुझ पर प्रहार करो। आओ! मुझसे संघर्ष करो! यह उनकी बुनियादी रणनीति है। प्रतिशोध, हिंसा और घृणा का विमर्श उनका होम ग्राउंड है। उनकी चुनौती स्वीकार कर ही हम उन्हें विजयी बना देते हैं। यदि हम इनका प्रतिकार न करें तो ये स्वतः ही अपने क्रोध और घृणा की अग्नि में जलकर भस्म हो जाएंगे। यदि इनके आरोपों, आक्षेपों और अनर्गल प्रलाप से हम दुविधाग्रस्त और आक्रोशित होते हैं तो इसका अर्थ यही है कि इस मुल्क की प्यार,अमन और भाईचारे की साझा विरासत पर हमारे विश्वास में कहीं कोई कमी है।

(रायगढ़, छत्तीसगढ़ में रहने वाले डॉ. राजू पाण्डेय स्वतंत्र लेखक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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