NewsClick

NewsClick
  • English
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • हमारे लेख
  • हमारे वीडियो
search
menu

सदस्यता लें, समर्थन करें

image/svg+xml
  • सारे लेख
  • न्यूज़क्लिक लेख
  • सारे वीडियो
  • न्यूज़क्लिक वीडियो
  • राजनीति
  • अर्थव्यवस्था
  • विज्ञान
  • संस्कृति
  • भारत
  • अंतरराष्ट्रीय
  • अफ्रीका
  • लैटिन अमेरिका
  • फिलिस्तीन
  • नेपाल
  • पाकिस्तान
  • श्री लंका
  • अमेरिका
  • एशिया के बाकी
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें
सब्सक्राइब करें
हमारा अनुसरण करो Facebook - Newsclick Twitter - Newsclick RSS - Newsclick
close menu
आंदोलन
समाज
भारत
राजनीति
इस चुनाव में हमारी भी गुहार सुन लो!
मध्यप्रदेश के दलित, आदिवासी एवं घुमक्कड़ समुदाय के हज़ारों लोग जाति प्रमाण-पत्र के लिए भटक रहे हैं, लेकिन उनकी गुहार कोई नहीं सुन रहा है।
राजु कुमार
20 Mar 2019
इस चुनाव में हमारी भी गुहार सुन लो!

चुनाव में संख्या बल का बड़ा महत्व होता है। भारतीय राजनीति में भले ही आदर्श रूप में जाति एवं धर्म के आधार पर वोट नहीं मांगे जाते, लेकिन राजनीतिक दल सारे समीकरण इसी आधार पर बनाते हैं। जिस जाति या समुदाय की संख्या ज़्यादा, उसकी पूछ-परख ज़्यादा। लेकिन जिनकी संख्या कम है, उनकी कौन सुने? आख़िरकार उनके अधिकार और न्याय के कुछ मायने हैं या नहीं? सामाजिक रूप से पिछड़े हुए इन समुदायों की आवाज़ अनसुनी क्यों कर दी जाती है? इनके लिए बनाए गए नियम और क़ानूनों पर अमल क्यों नहीं हो पाता?

ऐसे ही सवालों को लेकर मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र अधिकार मंच पिछले चार सालों से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, विमुक्त, घुमक्कड़ और अर्द्ध घुमक्कड़ जातियों के लिए काम कर रहा है। इन जातियों के लिए संचालित योजनाओं एवं सामाजिक सुरक्षा का लाभ इन्हें तभी मिल सकता है, जब इनके पास इन जातियों का होने का प्रमाण हो। लेकिन ऐसे हज़ारों लोग हैं, जिनके अलग-अलग कारणों से जाति प्रमाण-पत्र नहीं मिल रहे हैं। इस बारे में कोर्ट द्वारा दिए गए फ़ैसले के बाद भी राज्य सरकार और केन्द्र सरकार एक-दूसरे पर ज़िम्मेदारी डाल कर अपना पल्ला झाड़ते आ रहे हैं।

आरक्षण एवं अन्य सुविधाओं के लिए 1980 तक जाति प्रमाण-पत्रों में धोखाधड़ी के बहुत सारे मामले आते थे। जाति प्रमाण-पत्रों में धोखाधड़ी रोकने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 6 अगस्त 1984 को सभी राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों को एक परिपत्र जारी कर कहा था कि अजा एवं अजजा के जाति प्रमाण-पत्र के लिए 1950 से पहले तक उस राज्य में निवास का रिकॉर्ड होने पर ही जाति प्रमाण-पत्र जारी किया जाए। इस आदेश से धोखाधड़ी पर अंकुश लगाना संभव तो हुआ, लेकिन इसकी वजह से बड़ी संख्या में लोग प्रभावित भी हुए, जो मजबूरीवश एक राज्य से दूसरे राज्य में पलायन कर गए थे।

जाति प्रमाण-पत्र अधिकार मंच के संयोजक सुंदर सिंह खड़से बताते हैं, ‘‘देश में 1950 की सामाजिक स्थिति भयंकर छुआछूत वाली थी। ज़मींदारी प्रथा से निजात पाने के लिए लोग शहरों में पलायन कर गए थे। भुखमरी एवं भेदभाव के शिकार लोगों के लिए रोटी अहम मुद्दा था। वे पलायन कर अपने आसपास के शहरों के अलावा दूसरे राज्यों मे भी जाकर बस गए। जब ये इस अवस्था में आए, कि संवैधानिक अधिकारों को हासिल कर सकें, तब इन्होंने अपने निवास के वर्तमान राज्य में जाति प्रमाण-पत्र के लिए आवेदन लगाना शुरू किया। लेकिन गृह मंत्रालय के 1984 के पत्र के आधार पर 50 सालों से भी अधिक समय से रहने वाले इन वंचित समुदाय के परिवारों को जाति प्रमाण-पत्र नहीं मिल रहा है, क्योंकि इनके पास 1950 से पहले यहाँ रहने का प्रमाण नहीं है। इस समस्या से सबसे ज़्यादा विमुक्त, घुमक्कड़ और अर्द्ध घुमक्कड़ जातियों के लोग जूझ रहे हैं, जिनके पास कहीं का स्थाई निवास प्रमाण-पत्र नहीं है।’’

Speech by Sundar Sigh Khadse in a convention.jpeg

सुंदर सिंह खड़से सभा को संबोधित करते हुए 

अपेक्षा जैन (जाटव) बनाम मध्यप्रदेश राज्य रिट पिटिशन नंबर 16642/2016 में उच्च न्यायालय जबलपुर ने कहा है कि मध्प्रदेश में जन्मे, पले-बढ़े और शिक्षा हासिल किए व्यक्ति का विस्थापित होकर प्रदेश में आना नहीं माना जा सकता। ऐसे व्यक्ति को मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण-पत्र पाने का अधिकार है। उल्लेखनीय है कि अपेक्षा जैन के पिता उत्तरप्रदेश के जाटव जाति के थे और 1983 मध्यप्रदेश में उनकी नौकरी लग जाने पर वे मध्यप्रदेश आ गए। अपेक्षा का जन्म मध्यप्रदेश में हुआ और उसने यहीं से पढ़ाई की थी, लेकिन उसे जाति प्रमाण-पत्र नहीं मिल पाया था। न्यायालय के आदेश के बाद याचिकाकर्ता को प्रमाण-पत्र मिल गया, लेकिन ऐसे ही हज़ारों मामले फँसे हुए हैं और उनके आवेदन इसी आधार पर ख़ारिज किए जा रहे हैं। इसके पहले भी नीतू सिंह बनाम मध्यप्रदेश राज्य रिट पिटिशन नंबर 1160/2003 उच्च न्यायालय जबलपुर, वंदना धाकड़ बनाम मध्यप्रदेश राज्य रिट पिटिशन नंबर 2014 (3) एमपीएलजे 79 ग्वालियर खंडपीठ में न्यायालय ने ऐसे प्रभावितों के पक्ष में फ़ैसले दिए हैं।

राज्य में सबसे बदतर स्थिति विमुक्त, घुमक्कड़ और अर्द्ध घुमक्कड़ जातियों की है। मध्यप्रदेश में 51 जातियों को इन श्रेणियों में चिह्नित किया गया है और प्रदेश के 29 विधानसभा क्षेत्रों में इनकी प्रभावी संख्या है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इनकी समस्याओं को लेकर जुलाई 2013 में महापंचायत भी की थी। 2013 के चुनाव के पहले आयोजित उस महापंचायत में उन्होंने कई लोक लुभावन घोषणाएँ की थी, लेकिन उस पर अमल नहीं हो पाया। इस संदर्भ में वर्तमान महिला एवं विकास मंत्री व तत्कालीन कांग्रेस विधायक श्रीमती इमरती देवी ने 25 जुलाई 2016 को विधानसभा में सवाल भी किया था और सरकार को इस मसले पर कठघरे में खड़ा किया था और कहा था कि मुख्यमंत्री ने वोट के लिए घोषणाएँ की थी।

सुंदर सिंह खड़से का कहना है, ‘‘घुमंतू जातियों को समाज के बजाय पुलिस एवं प्रशासन से ज़्यादा प्रताड़ित होना पड़ता है। इनमें कई बेक़सूर लोगों को अपराधी ठहरा दिया जाता है। ये घुमंतू प्रवृत्ति को छोड़कर सम्मानजनक जीवन के लिए एक जगह रहना चाहते हैं। लेकिन इन्हें भी उसी समस्या का सामना करना पड़ता है। योजनाओं का लाभ लेने के लिए जाति प्रमाण-पत्र चाहिए, जो कि बन नहीं पाता। इन समुदायों की कई जातियाँ मध्यप्रदेश की हैं, लेकिन घुमंतू होने और बिना किसी काग़ज़ी रिकॉर्ड के जीवन जीने के कारण ये प्रमाण नहीं दे पाते। जाति प्रमाण-पत्र के संदर्भ में 11 अगस्त 2016 को सामान्य प्रशासन विभाग ने एक परिपत्र जारी कर कहा था कि ऐसे आवेदकों को, जिनके पास 1950 या उससे पहले का मध्यप्रदेश के निवासी होने का लिखित रिकॉर्ड नहीं है, उन्हें लिखित रिकॉर्ड प्रस्तुत करने के लिए विवश नहीं किया जाए। राजस्व अधिकारी मौक़े पर जाकर या कैम्प लगाकर जांच कर स्वयं की संतुष्टि के बाद स्थाई जाति प्रमाण-पत्र जारी करने की अनुशंसा करनी चाहिए। लेकिन व्यवहार में अधिकतर मामलों में इस पर अमल नहीं हो रहा है।’’ न्यायालय द्वारा जाति प्रमाण-पत्र के ऐसे प्रकरणों में स्पष्ट फैसले के बावजूद मध्यप्रदेश के सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से केन्द्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय एवं केन्द्रीय अनुसूचित जाति कल्याण मंत्रालय को आरक्षण सुविधा के लिए जाति प्रमाण-पत्र बनवाने के लिए 1950 के निवास संबंधी बंधन ख़त्म करने को लेकर मार्गदर्शन के लिए पत्र लिखा गया है। 2005 में लिखे गए उस पत्र का कोई फ़ौलोअप तक नहीं हुआ है।

जाति प्रमाण-पत्र अधिकार मंच लोकसभा चुनाव से पहले ज़्यादा सक्रिय है, जिससे कि जाति प्रमाण-पत्र की देशव्यापी विसंगतियों को दूर करने के लिए राजनीतिक दलों से वायदा लिया जा सके। इसके साथ ही वे अपने आंदोलन को देशव्यापी बनाने की दिशा में पहल कर रहे हैं ताकि उनकी आवाज़ को अनसुना न किया जा सके।

Madhya Pradesh
Madhya Pradesh government
Adivasis
Caste certificate
Lok Sabha Elections 2019
Narendra modi

Related Stories

गैर-लोकतांत्रिक शिक्षानीति का बढ़ता विरोध: कर्नाटक के बुद्धिजीवियों ने रास्ता दिखाया

छात्र संसद: "नई शिक्षा नीति आधुनिक युग में एकलव्य बनाने वाला दस्तावेज़"

दलितों पर बढ़ते अत्याचार, मोदी सरकार का न्यू नॉर्मल!

सिवनी मॉब लिंचिंग के खिलाफ सड़कों पर उतरे आदिवासी, गरमाई राजनीति, दाहोद में गरजे राहुल

मध्यप्रदेश: गौकशी के नाम पर आदिवासियों की हत्या का विरोध, पूरी तरह बंद रहा सिवनी

राम सेना और बजरंग दल को आतंकी संगठन घोषित करने की किसान संगठनों की मांग

आईपीओ लॉन्च के विरोध में एलआईसी कर्मचारियों ने की हड़ताल

एमपी : ओबीसी चयनित शिक्षक कोटे के आधार पर नियुक्ति पत्र की मांग को लेकर आमरण अनशन पर बैठे

सार्वजनिक संपदा को बचाने के लिए पूर्वांचल में दूसरे दिन भी सड़क पर उतरे श्रमिक और बैंक-बीमा कर्मचारी

झारखंड: केंद्र सरकार की मज़दूर-विरोधी नीतियों और निजीकरण के ख़िलाफ़ मज़दूर-कर्मचारी सड़कों पर उतरे!


बाकी खबरें

  • chunav chakra
    न्यूज़क्लिक टीम
    चुनाव चक्र: क्या है यूपी की सियासी फ़ज़ा, लखनऊ और बनारस से विशेष
    05 Dec 2021
    चुनाव चक्र के इस एपिसोड में हम जानेंगे नारों और विज्ञापनों के बरक्स उत्तर प्रदेश की ज़मीनी हक़ीक़त। चलेंगे राजधानी लखनऊ और सत्ता के दूसरे सबसे विशेष केंद्र बनारस... और बात करेंगे अपने सहयोगी…
  • Babri Masjid
    न्यूज़क्लिक टीम
    बाबरी मस्जिद का ध्वस्त होना बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों की हार
    05 Dec 2021
    6 दिसंबर आंबेडकर को याद करने का दिन था, लेकिन 1992 में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर के उस दिन का मतलब ही बदल दिया गया है . 'इतिहास के पन्ने मेरी नज़र से' के इस भाग में नीलांजन बात करते हैं उन दोनों ख़ास…
  • putin
    डेविड सी.स्पीडी
    पुतिन की लक्ष्मण रेखाओं पर नज़र
    05 Dec 2021
    मालूम होता है कि यूक्रेन को ताजा दी गई $150 मिलियन की सैन्य सहायता में उसके हवाई अड्डों पर अमेरिकी प्रशिक्षणकर्मियों की तैनाती भी शामिल है।
  • satire
    डॉ. द्रोण कुमार शर्मा
    तिरछी नज़र: विश्व गुरु को हंसना-हंसाना नहीं चाहिए
    05 Dec 2021
    अब अगर हम हंसने-हंसाने में ही लगे रहेंगे तो विश्व गुरु कैसे बनेंगे। विश्व गुरु बनने के लिए हमें इस हंसने और हंसाने की आदत को बिल्कुल ही छोड़ना होगा।
  • न्यूज़क्लिक डेस्क
    इतवार की कविता : 'पुनल तुम आदमी निकले...'
    05 Dec 2021
    इतवार की कविता में आज पढ़िये सस्सी-पुन्नू की प्रेमकहानी पर नए ज़ाविये से लिखी इमरान फ़िरोज़ की यह नज़्म।
  • Load More
सब्सक्राइब करें
हमसे जुडे
हमारे बारे में
हमसे संपर्क करें

CC BY-NC-ND This work is licensed under a Creative Commons Attribution-NonCommercial-NoDerivatives 4.0 International License