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लम्बे समय से क़ायम अमेरिका की जाति व्यवस्था पर इसाबेल विल्करसन का लेख
यह नामुमकिन सा लगता है कि जो कभी भारत में रहा नहीं,वह भारत की जातीय हमले की गंभीरता को उतनी ही अच्छी तरह समझ सकता है जिस तरह विल्करसन समझ सकती हैं।
योगेश एस.
26 Aug 2020
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द न्यू यॉर्क टाइम्स मैगज़ीन ने अपने 1 जुलाई के अंक में पुलित्जर पुरस्कार से पुरस्कृत लेखिका,इसाबेल विल्करसन द्वारा लम्बे समय से क़ायम अमेरिका की जातीय व्यवस्था पर ध्यान खींचने वाला एक लेख प्रकाशित किया था।  यह लेख उनकी नयी पुस्तक, कास्ट: द लाइज़ दैट डिवाइड अस के हिस्से का एक संपादित अंश है। उस भारतीय के लिए यह लेख बेहद चौंकाने वाला है, जिसकी जाति उसके पैदा होने से लेकर मौत तक कभी बदलती नहीं है। अप्राकृतिक जाति व्यवस्था की जन्म-भूमि,भारत की लोक कल्पना शायद ही कभी अमेरिका को जाति से जोड़ पाती है।

पश्चिमी देशों के लोगों के लिए जाति व्यवस्था भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है; कुछ लोग इसे विभाजनकारी व्यवस्था के रूप में भी देखते हैं। लेकिन,शायद ही कभी इस जाति व्यवस्था को मानवीय इच्छाओं, आकांक्षाओं, भावनाओं और सपनों पर क्रूरता के साथ थोपी हुई व्यवस्था के तौर पर देखा जाता है। यह नामुमकिन सा लगता है कि जो कभी भारत में रहा नहीं,वह भारत की जातीय हमले की गंभीरता को उतनी ही अच्छी तरह समझ सकता है,जिस तरह विल्करसन समझ सकती हैं।जाति व्यवस्था का विश्लेषण करना एक बात है; लेकिन इससे पीड़ित होने के बाद इसका विश्लेषण करना पूरी तरह से अलग बात है। अगर आप जाति के शिकार हैं, तो आपका विश्लेषण इसके संपूर्ण विनाश की सिफ़ारिश करेगा और आपका विश्लेषण इसके अलावा कुछ भी नहीं चाहेगा, इस पूर्ण विनाश से कुछ भी कम नहीं।

किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जो इस जाति-समाज का हिस्सा नहीं रहा है,कभी इसके हाशिये पर रहने के दंश को  नहीं झेला है,उसका इस जाति के मायने को समझ पाना इस बात का संकेत है कि वैश्विक स्तर पर जाति के साथ गंभीर जुड़ाव को अहसास किया जाने लगा है। विल्करसन का यह लेख अपने नज़रिये में एकदम नया है और उस लिहाज से मौलिक है कि वहां से वह जाति को एक ऐसी धारणा के रूप में देखने का प्रयास करती हैं,जो लंबे समय से अमेरिकियों के दिमाग़ को नियंत्रित करती रही है। विल्करसन जाति और नस्ल के बीच के इस बारीक फ़र्क़ को समझने में कामयाब हैं कि कोई जाति तो छुपा सकता है,मगर नस्ल को नहीं छुपा सकता है। उसके लिए, जाति एक साथ कई चीज़ें हैं, वह उनमें से एक-एक चीज़ को रूपकों की एक श्रृंखला की अपनी ठोस समझ के ज़रिये स्पष्ट करती जाती हैं। उनकी रचना अपने आप में एक दुर्लभ साहित्यिक उपलब्धि है। भारत का कोई भी सवर्ण लेखक अब तक उस हद तक कामयाब नहीं हुआ है। वह जाति की व्याख्या एक ऐसे पुराने घर के रूप में करती हैं,जो उसमें रहने वालों के लिए निहायत ही ख़तरनाक है।

जॉर्ज फ़्लॉयड की हत्या को प्रेरित करने वाली धारणा के रूप में जाति की कार्यप्रणाली का हवाला देते हुए वह कहती हैं, “हम जो कुछ नहीं देख पाये, कम से  कम तत्काल जो हमें नज़र नहीं आ पाया, वह दरअस्ल एक अदृश्य मंच था, पुराने नियमों और मान्यताओं वाली एक ऐसी जाति व्यवस्था वाला मंच, जिसने इतनी बड़ी दहशत को मुमकिन बना दिया, जिसने उस दृश्य में प्रत्येक घटकों को अपनी चपेट में ले लिया हुआ है … अन्य पुराने घरों की तरह अमेरिका में एक अनदेखा ढांचा है,और यह इसकी वह जाति प्रणाली है, जो इसकी कार्यप्रणाली का केंद्रीय हिस्सा है,ठीक उसी तरह,जैसे कि घर को थामने वाले खंभे और शहतीर होते हैं,इन्हें हम उन भौतिक इमारतों में नहीं देख सकते,जिन्हें हम घर कहते हैं। जाति हमारे विभाजनों का बुनियादी ढांचा है। यह मनुष्य के अनुक्रम की बनावट है, हमारे मामले में 400 साल पुराने सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने वाले निर्देशों का अवचेतन संहिता। जाति को देखना देश के एक्स-रे पर रौशनी डालने जैसा है।”

यह पेचीदा है न ? भारत का कोई भी सवर्ण लेखक, जो जाति विशेषाधिकारों से संपन्न है,मगर जो जाति-विरोधी,प्रगतिशील या उदारवादी होने का दावा करता है, वह जाति की इतनी सटीक व्याख्या करने और उसकी सूक्ष्मता को समझने के ऐसे ईमानदार रूपकीय स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। विल्करसन इस अवचेतन संहिता की उत्पत्ति को लेकर सचेत हैं,जो हमारे व्यवहार को निर्देशित करता है। असल में तब वह अपनी कल्पनाशीलता से इस कोड की व्याख्या कर रही होती हैं,जब वह कहती हैं, “कोई जाति व्यवस्था इसलिए जारी रहती है,क्योंकि इसे अक्सर दैवीय इच्छा, पवित्र किताबों या प्रकृति के निर्धारित क़ानूनों से उत्पन्न होने के रूप में जायज़ ठहराया जाता है, ऐसी ही धारणाओं से यह व्यवस्था पूरी संस्कृति में मज़बूत हुई है और फिर पीढ़ियों से गुज़रती रही है।” हां,जाति विरासत में मिलती है। जैसे माता-पिता अपने बच्चों को हड्डियों, मांस और खून विरासत में देते हैं, वैसे ही वे अवचेतन में और कभी-कभी अनजाने में अपनी जाति भी विरासत में दे देते हैं।

विल्करसन उस समय लड़खड़ाती दिखती हैं, जब वह कहती है, “जाति का पदानुक्रम भावनाओं या नैतिकता को लेकर नहीं है। यह पदानुक्रम शक्ति और सत्ता को लेकर है कि किन समूहों के पास यह है और किसके पास नहीं है।” यह सच है कि जाति सत्ता को लेकर है। लेकिन,यह केवल सत्ता को लेकर ही नहीं है। कुछ जातियां शक्तिसंपन्न हैं, अन्य शक्तिहीन हैं। क्या हम यह कह सकते हैं कि कोई दलित आईएएस अधिकारी, सत्ता में होने के बावजूद, उस शक्ति के इस्तेमाल को लेकर स्वतंत्र महसूस करता है,जिस तरह से अपनी सामाजिक हैसियत के साथ एक ब्राह्मण आईएएस अधिकारी महसूस करता है ? या फिर किसी दलित आईएएस अधिकारी के साथ उनके सवर्ण सहयोगियों द्वारा उसी तरह से व्यवहार किया जायेगा,जिस तरह से एक सवर्ण सहयोगी के साथ व्यवहार किया जाता है ? अतीत के एक उदाहरण के हवाले से इसे समझा जा सकता है। अपने समय में भारत के सबसे उच्च-शिक्षित व्यक्ति डॉ.भीमराव अंबेडकर जब बड़ौदा महाराजा के सैन्य सचिव के रूप में काम करने के लिए बड़ौदा पहुंचे, तो उनके साथ वैसा ही कठोर व्यवहार किया गया,जैसा कि अछूत जाति में पैदा होने के बाद से उनके साथ व्यवहार होता रहा था। क्या हम यह कह सकते हैं कि जब सत्ता हासिल करने वाले दलित की पहचान का पता चलता है, तो उनके साथ किया जाने वाला व्यवहार उनकी ताक़त के मुताबिक़ किया जायेगा, या उनकी जाति की स्थिति ही यह तय करेगी कि उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाये ? ऐसे हज़ारों मामले हैं,जो साबित करते हैं कि भेदभाव के लिहाज़ से जाति हमेशा सत्ता से कहीं बड़ी होती है।

कुछ जातियां हमेशा नैतिक होती हैं, कुछ हमेशा अनैतिक होती हैं। परिघटना विज्ञान(व्यक्‍तिनिष्‍ठ अनुभवों और चेतना के संरचनाओं का दार्शनिक अध्ययन) के रूप में देखा जाये, तो कुछ जातियां सही और शुभ होने की भावनाओं के रूप में बदल दी जाती हैं और कुछ ग़लत और अशुभ होने की भावनाओं में रूपांतरित कर दी जाती हैं। एक भौतिक द्वंद्ववाद यहां काम कर रहा होता है और विल्करसन इसे नज़रअंदाज़ करते हुए दिखती हैं। फिर भी,उनके तर्क और खोजबीन असरदार हैं। वह हमें जाति को देखने के एक नये स्तर पर ले जाती हैं। वह कहती हैं, “नस्ल उस किसी जाति व्यवस्था को ज़बरदस्त रूप से थामने का काम करती है,जिसे मानव विभाजन के किसी साधन की तलाश होती है। अगर हमें मनुष्यों को नस्ल की भाषा में देखने के लिए प्रशिक्षित किया गया है, तो जाति उस भाषा का एक अंतर्निहित व्याकरण है,जिसे हम बच्चों की तरह सांकेतिक शब्दों में बदलना चाहते हैं, जैसे कि अपनी मातृभाषा सीखने के दौरान करते हैं। व्याकरण की तरह, जाति न सिर्फ़ हम कैसे बोलें,बल्कि हम उन सूचनाओं को किस तरह से इस्तेमाल में लायें,इसका भी एक अदृश्य मार्गदर्शक बन जाती है, जो हमारे सोचे बिना अपने आप किसी वाक्य का हिस्सा बन जाती है।”

जाति का सर्वनाश करने की तत्काल आवश्यकता को समझने के लिए, हमें हमेशा जिस  चीज़ की ज़रूरत है, वह सुस्त शैक्षिक तर्क नहीं,बल्कि इस तरह के लाक्षणिक रूप से की गयी गहन व्याख्या है। दलित लेखकों द्वारा भारत में जाति को बहुत अधिक गहन और बेहद गंभीर अर्थों में समझाया गया है, फिर भी यह जाति ही है, जिसने भारतीयों को हमारे भीतर बैठे जाति के शैतान को मारने की तात्कालिकता को महसूस करने से रोके हुई है। विल्करसन की जाति पर साहसी विचार, जो इसे मुख्य रूप से उत्पीड़न के पीछे की मानसिकता के रूप में देखता है, इस मुद्दे की गंभीरता को तेज़ी से सामने लाता है। यह उम्मीद जगाने वाला विचार है,क्योंकि यह हमें भारतीय उपमहाद्वीप के पार या भारतीय प्रवासियों के बीच की मौजूदगी को दिखाता है। विल्करसन जाति को एक ऐसा मनोवैज्ञानिक मुद्दा बना देती है,जिससे दुनिया परेशान है, और जिसके बारे में इस दुनिया को जानकारी तक नहीं है।

विल्करसन कहती हैं, “जाति और नस्ल न तो एक समान अर्थ वाले शब्द हैं और न ही एक दूसरे जुदा हैं। वे समान संस्कृति में साथ-साथ बने रह सकते हैं और एक-दूसरे को मज़बूती देने का काम भी कर सकते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका की नस्ल दरअसल जाति की अदृश्य ताक़त का दृश्य एजेंट है। जाति हड्डियों से बनी है, नस्ल चमड़ी से बनी है।”

अगर हम इस बात का ईमानदार जवाब चाहते हैं कि क्या नस्लवाद उतना ही प्रचंड है,जितना की भारत में जातिवाद है, तो विल्करसन हमें इस बात का यक़ीन दिलाती हैं कि बेशक,ऐसा ही है। भारत में किसी काले रंग के व्यक्ति को देखकर किसी नीची जाति या दलित के रूप में कल्पना कर ली जाती है। ऐसा इस झूठ के कारण है कि गोरी चमड़ी वाला व्यक्ति किसी उच्च जाति का व्यक्ति होता है, यही झूठ हमारी चेतना को नियंत्रित करती है। इस झूठ को पिछले पांच दशकों से,बल्कि और भी पहले से बॉलीवुड फ़िल्मों द्वारा मज़बूत किया जाता रहा है। संस्कृति को परिभाषित करने और राजनीति को नियंत्रित करने वाले साधनों पर कब्ज़ा करते हुए जातिवादी व्यवहार ने लंबे समय तक सवर्ण भारतीयों के दिल-ओ-दिमाग़ को नियंत्रित किया है और संस्कृति उद्योग पर निर्विवाद वर्चस्व हासिल करने के बाद स्वीकार्य मानदंड के तौर पर स्पष्ट रूप से नस्लवादी और जातिवादी व्यवहार को मज़बूत किया है।

भारत के बाहर बसने वाले सावर्ण विद्वानों और लेखकों के उलट,विल्करसन का यह लंबा और दिलचस्प लेख जाति की समझ को सामने लाता है। विल्करसन न सिर्फ़ जाति की समझ, बल्कि एक न्यायपूर्ण और सुंदर दुनिया बनाने के लिए इसके सर्वनाश की ज़रूरत की ओर हमारा ध्यान खींचने में भी उन सब से कहीं आगे निकल जाती हैं। अमेरिका में भेदभाव का सामना करने वाली एक काली महिला की ओर से ज़िम्मेदारी वाला यह गहरा विचार बिल्कुल आश्चर्यचकित नहीं करता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि उनकी किताब जाति-विरोधी आंदोलन के साथ एक गंभीर,बौद्धिक और भावनात्मक रूप से जीवंत जुड़ाव पैदा करेगी।

योगेश मैत्रेय एक कवि, अनुवादक और उस पैंथर्स पव पब्लिकेशन के संस्थापक हैं, जो एक जाति-विरोधी पब्लिकेशन हाउस है। वह मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज से पीएचडी कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं, और ज़रूरी नहीं कि इंडियन राइटर फ़ोरम के विचारों का प्रतिनिधित्व करे।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल आलेख आप नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं

Isabel Wilkerson’s Essay on America’s Enduring Caste System

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